
सोशल मीडिया पर फंसी 'अल्फा', सेना और रॉ के चित्रण पर भड़के लोग
आलिया भट्ट और शरवरी वाघ की आगामी फिल्म 'अल्फा' अपनी रिलीज से पहले ही सोशल मीडिया पर भारी विवादों में घिर गई है। टीज़र और शुरुआती झलकियों के सामने आने के बाद दर्शकों का एक बड़ा वर्ग फिल्म में भारतीय सेना और देश की खुफिया एजेंसी 'रॉ' (RAW) को कमजोर और असमर्थ दिखाए जाने पर कड़ी आपत्ति जता रहा है।
खबर का निचोड़:
आलिया भट्ट और शरवरी वाघ की आगामी फिल्म 'अल्फा' अपनी रिलीज से पहले ही सोशल मीडिया पर भारी विवादों में घिर गई है। टीज़र और शुरुआती झलकियों के सामने आने के बाद दर्शकों का एक बड़ा वर्ग फिल्म में भारतीय सेना और देश की खुफिया एजेंसी 'रॉ' (RAW) को कमजोर और असमर्थ दिखाए जाने पर कड़ी आपत्ति जता रहा है।
स्पाई यूनिवर्स की नई फिल्म पर उठा सवालों का बवंडर
यशराज फिल्म्स के चर्चित स्पाई यूनिवर्स की पहली फीमेल-लीड फिल्म 'अल्फा' को लेकर दर्शकों में जबरदस्त उत्साह था। आलिया भट्ट और शरवरी स्टारर इस हाई-ऑक्टेन एक्शन फिल्म से उम्मीद थी कि यह देश की सुरक्षा एजेंसियों के शौर्य को एक नए स्तर पर दिखाएगी। हालांकि, इसके कथानक और कुछ दृश्यों की लीक हुई जानकारियों ने सोशल मीडिया पर एक अलग ही बहस छेड़ दी है। फिल्म की कहानी में भारतीय सेना और खुफिया एजेंसी 'रॉ' के प्रस्तुतीकरण को लेकर दर्शक काफी आक्रामक नजर आ रहे हैं और इंटरनेट पर फिल्म की आलोचनाओं का दौर शुरू हो चुका है।
"असमर्थ और कमजोर दिखाया गया" – दर्शकों का फूटा गुस्सा
फिल्म के कंटेंट को लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। दर्शकों का आरोप है कि फिल्म की मुख्य नायिकाओं को बड़ा और मसीहा दिखाने के चक्कर में पूरी व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र को लाचार और नाकारा साबित कर दिया गया है। सोशल मीडिया पर एक यूजर ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा, "फिल्म की कहानी भारतीय सेना और रॉ को काफी असमर्थ दिखाती है। ऐसा लगता है कि जैसे देश का इतना बड़ा सुरक्षा ढांचा दो किरदारों के बिना काम ही नहीं कर सकता।"
पाकिस्तान से हो रही है तुलना
विवाद की गहराई का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नेटिजन्स इसकी तुलना सीमा पार के नैरेटिव से करने लगे हैं। एक अन्य यूजर ने फिल्म के दृश्यों और कथानक पर तंज कसते हुए लिखा, "यह 'धुरंधर' का पाकिस्तान वाला जवाब लगता है।" इस तरह की टिप्पणियां दर्शाती हैं कि दर्शक अब राष्ट्रभक्ति और सेना से जुड़ी फिल्मों में देश की छवि को लेकर बेहद संवेदनशील हो चुके हैं। वे किसी भी कीमत पर अपनी सेना और खुफिया एजेंसियों की साख से समझौता बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं।
क्रिएटिव लिबर्टी बनाम राष्ट्रीय अस्मिता की बहस
यह पहली बार नहीं है जब बॉलीवुड की किसी बड़ी फिल्म पर सेना या खुफिया एजेंसियों की छवि को धूमिल करने के आरोप लगे हों। अक्सर फिल्ममेकर्स 'क्रिएटिव लिबर्टी' यानी रचनात्मक स्वतंत्रता का हवाला देकर अपने किरदारों को स्क्रीन पर चमकाने की कोशिश करते हैं। लेकिन 'अल्फा' के मामले में यह प्रयोग उलटा पड़ता दिख रहा है। क्रिटिक्स और दर्शकों का मानना है कि मुख्य किरदारों को 'लार्जर दैन लाइफ' दिखाने के लिए देश की असल ताकत यानी हमारी सेना की रीढ़ को कमजोर दिखाना कहीं से भी न्यायसंगत नहीं है। फिलहाल इस विवाद ने फिल्म के मेकर्स के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

झारखंड में 2014-2026 की 44 सरकारी भर्ती परीक्षाएं रद्द, भारी बवाल
झारखंड सरकार द्वारा 2014 से 2026 के बीच आयोजित 44 भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने के फैसले ने राज्य में बड़ा राजनीतिक और सामाजिक तूफान खड़ा कर दिया है। जेएसएससी-सीजीएल समेत कई प्रमुख परीक्षाओं के रद्द होने से 2400 से अधिक चयनित अभ्यर्थियों का भविष्य अधर में लटक गया है। आक्रोशित छात्र सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं, वहीं लाठीचार्ज के विरोध में भाजपा ने राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया है।
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झारखंड सरकार द्वारा 2014 से 2026 के बीच आयोजित 44 भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने के फैसले ने राज्य में बड़ा राजनीतिक और सामाजिक तूफान खड़ा कर दिया है। जेएसएससी-सीजीएल समेत कई प्रमुख परीक्षाओं के रद्द होने से 2400 से अधिक चयनित अभ्यर्थियों का भविष्य अधर में लटक गया है। आक्रोशित छात्र सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं, वहीं लाठीचार्ज के विरोध में भाजपा ने राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया है।
2400 से ज्यादा नौकरियों पर मंडराया संकट
झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) द्वारा आयोजित संयुक्त स्नातक स्तरीय (CGL) परीक्षा समेत 44 भर्ती प्रक्रियाओं को निरस्त करने के फैसले ने हजारों युवाओं के सपनों पर पानी फेर दिया है। इस निर्णय से 2400 से अधिक ऐसे अभ्यर्थी सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं, जिनका चयन हो चुका था और इनमें से कई लोग विभिन्न विभागों में अपनी सेवाएं देना शुरू भी कर चुके थे। वर्षों की कड़ी मेहनत और लंबी कानूनी व प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बाद मिली नौकरी अचानक छिन जाने से चयनित अभ्यर्थियों और उनके परिवारों में गहरा सदमा है।
छात्रों का आक्रोश और सीबीआई जांच की मांग
सरकार के इस अप्रत्याशित कदम से राज्य भर के छात्रों और युवाओं में जबरदस्त असंतोष व्याप्त है। परीक्षाओं में धांधली और अनियमितताओं के आरोपों के बीच छात्र सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि बिना किसी ठोस आधार के पूरी प्रक्रिया को रद्द करना उन ईमानदार अभ्यर्थियों के साथ घोर अन्याय है जिन्होंने अपनी योग्यता के दम पर सफलता हासिल की थी। छात्रों की स्पष्ट मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के लिए इसे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपा जाए, ताकि दोषियों पर कार्रवाई हो सके और निर्दोष अभ्यर्थियों को न्याय मिल सके।
लाठीचार्ज के बाद गरमाई राजनीति और बंद का आह्वान
राजधानी रांची समेत राज्य के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर हुए पुलिस लाठीचार्ज ने इस मुद्दे में आग में घी डालने का काम किया है। पुलिस की इस कार्रवाई के विरोध में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और झारखंड बंद का ऐलान किया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार अपनी विफलताओं और भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध कर रहे छात्रों की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है।
पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल की भी होगी जांच
मामले को नया मोड़ देते हुए राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल वर्तमान ही नहीं, बल्कि भाजपा शासनकाल के दौरान आयोजित हुई 16 अन्य भर्ती परीक्षाओं की भी गहन जांच कराई जाएगी। सरकार का तर्क है कि पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त भर्ती व्यवस्था बहाल करने के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य था। हालांकि, जांच के इस दायरे ने पूरे मामले को पूरी तरह से राजनीतिक रंग दे दिया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जारी इस जुबानी जंग के बीच लाखों युवाओं का भविष्य अधर में लटका हुआ नजर आ रहा है।

नया लोन न लेने पर भी क्यों घट-बढ़ जाता है क्रेडिट स्कोर?
नया लोन या क्रेडिट कार्ड न लेने के बावजूद आपका क्रेडिट स्कोर बदल सकता है। बैंक और वित्तीय संस्थान हर महीने आपकी रीपेमेंट हिस्ट्री, अकाउंट बैलेंस और पुरानी इन्क्वायरी की रिपोर्ट क्रेडिट ब्यूरो को भेजते हैं। पेमेंट में देरी, क्रेडिट यूटिलाइज़ेशन में बदलाव और पुरानी इन्क्वायरी का रिकॉर्ड आपके स्कोर को प्रभावित करता है।
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नया लोन या क्रेडिट कार्ड न लेने के बावजूद आपका क्रेडिट स्कोर बदल सकता है। बैंक और वित्तीय संस्थान हर महीने आपकी रीपेमेंट हिस्ट्री, अकाउंट बैलेंस और पुरानी इन्क्वायरी की रिपोर्ट क्रेडिट ब्यूरो को भेजते हैं। पेमेंट में देरी, क्रेडिट यूटिलाइज़ेशन में बदलाव और पुरानी इन्क्वायरी का रिकॉर्ड आपके स्कोर को प्रभावित करता है।
बिना नया लोन लिए क्रेडिट स्कोर बदलने की मुख्य वजहें
अक्सर लोग सोचते हैं कि जब उन्होंने कोई नया लोन या क्रेडिट कार्ड नहीं लिया है, तो उनका क्रेडिट स्कोर स्थिर रहना चाहिए। हालांकि, क्रेडिट ब्यूरो आपका स्कोर सिर्फ नए लोन के आधार पर तय नहीं करते। बैंक और वित्तीय संस्थान हर महीने आपकी वित्तीय गतिविधियों की रिपोर्ट क्रेडिट ब्यूरो (जैसे CIBIL) को भेजते हैं। इस नियमित डेटा अपडेट के कारण क्रेडिट स्कोर में लगातार उतार-चढ़ाव आता रहता है।
पेमेंट हिस्ट्री और क्रेडिट यूटिलाइज़ेशन का असर
क्रेडिट स्कोर को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक आपकी रीपेमेंट हिस्ट्री है। यदि आपने मौजूदा लोन की एक भी ईएमआई या क्रेडिट कार्ड बिल के भुगतान में देरी की है, तो नया लोन न लेने के बाद भी आपका स्कोर गिर जाएगा। इसके अलावा, क्रेडिट यूटिलाइज़ेशन रेशियो भी बेहद अहम भूमिका निभाता है। यदि आप अपने क्रेडिट कार्ड की सीमा का अधिक हिस्सा इस्तेमाल कर रहे हैं, तो ब्यूरो इसे वित्तीय जोखिम मानता है, जिससे स्कोर कम हो सकता है।
क्रेडिट मिक्स और क्रेडिट हिस्ट्री की अवधि
आपकी क्रेडिट प्रोफाइल में किस प्रकार के लोन शामिल हैं, इससे क्रेडिट मिक्स तय होता है। सुरक्षित (जैसे होम या ऑटो लोन) और असुरक्षित (जैसे पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड) लोन का सही संतुलन स्कोर को मजबूत बनाता है। समय के साथ जब आप किसी पुराने लोन को पूरी तरह चुकाकर बंद कर देते हैं, तो आपकी एक्टिव क्रेडिट हिस्ट्री की अवधि बदल जाती है। किसी पुराने और अच्छे खाते का बंद होना भी कभी-कभी स्कोर में अस्थायी गिरावट का कारण बनता है।
पुरानी लेंडर इन्क्वायरी का प्रभाव
जब भी आप किसी लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन करते हैं, तो लेंडर आपकी क्रेडिट रिपोर्ट चेक करता है। इसे 'हार्ड इन्क्वायरी' कहा जाता है। CIBIL जैसी एजेंसियां लेंडर द्वारा की गई इन इन्क्वायरी का रिकॉर्ड 36 महीने (3 साल) तक रखती हैं। भले ही आपने हाल ही में कोई लोन न लिया हो, लेकिन अतीत में एक साथ कई जगह किए गए आवेदनों का असर लंबे समय तक आपकी प्रोफाइल और स्कोर पर दिखता रहता है।

रिटायरमेंट के बाद भी जेब रहेगी फुल, ये करियर ऑप्शन्स बनाएंगे आत्मनिर्भर
रिटायरमेंट का मतलब जीवन का ठहराव नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। अनुभव और समझ के दम पर वरिष्ठ नागरिक सेकंड इनिंग्स में भी बेहतरीन कमाई कर सकते हैं। टीचिंग, कंसल्टेंसी, ब्लॉगिंग से लेकर होम-स्टे तक, कई ऐसे विकल्प हैं जो आर्थिक स्वतंत्रता के साथ मान-सम्मान भी बनाए रखते हैं।
खबर का निचोड़
रिटायरमेंट का मतलब जीवन का ठहराव नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। अनुभव और समझ के दम पर वरिष्ठ नागरिक सेकंड इनिंग्स में भी बेहतरीन कमाई कर सकते हैं। टीचिंग, कंसल्टेंसी, ब्लॉगिंग से लेकर होम-स्टे तक, कई ऐसे विकल्प हैं जो आर्थिक स्वतंत्रता के साथ मान-सम्मान भी बनाए रखते हैं।
रिटायरमेंट के बाद कमाई के बेहतरीन विकल्प
उम्र का एक पड़ाव पार करने के बाद अक्सर लोग मान लेते हैं कि काम की पारी खत्म हो चुकी है। हकीकत यह है कि रिटायरमेंट के बाद का समय अपने अनुभव को नए तरीके से भुनाने का सबसे सही मौका होता है। आज के डिजिटल दौर में ऐसे कई रास्ते खुल चुके हैं जहाँ भारी-भरकम शारीरिक मेहनत के बिना भी शानदार आमदनी की जा सकती है।
यदि पढ़ाने का शौक है या किसी विषय पर गहरी पकड़ है, तो ऑनलाइन ट्यूशन और टीचिंग सबसे सम्मानजनक विकल्प हैं। दुनिया भर के छात्र आज ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर अनुभवी शिक्षकों की तलाश में रहते हैं। इसके अलावा, विश्वविद्यालय और कॉलेज भी विज़िटिंग लेक्चरर के रूप में रिटायर्ड एक्सपर्ट्स को प्राथमिकता देते हैं।
डिजिटल दुनिया और कंसल्टेंसी में अपार संभावनाएं
लिखने-पढ़ने में रुचि रखने वालों के लिए कंटेंट राइटिंग और ब्लॉगिंग बेहतरीन माध्यम हैं। अपने जीवन के अनुभवों, यात्राओं या किसी खास विषय पर ब्लॉग शुरू करके घर बैठे कमाई की जा सकती है। वहीं, जिन लोगों के पास कानून, फाइनेंस या मैनेजमेंट का लंबा अनुभव है, वे लीगल कंसल्टेंट या फाइनेंशियल एडवाइज़र बनकर अपनी सेवाएँ दे सकते हैं। कॉर्पोरेट जगत को हमेशा परिपक्व और अनुभवी सलाहकारों की जरूरत होती है।
हॉस्पिटैलिटी और सोशल वर्क से बनाएं नई पहचान
यदि घर में खाली जगह है, तो उसे पीजी (Paying Guest) या होम-स्टे में बदलकर हर महीने एक तय आय सुनिश्चित की जा सकती है। टूरिस्ट स्पॉट्स के पास रहने वाले लोग इवेंट या टूर गाइड के रूप में भी नई पारी शुरू कर सकते हैं। इसके अलावा, एनजीओ और सोशल वर्क से जुड़कर न केवल समाज सेवा की जा सकती है, बल्कि इसके बदले सम्मानजनक मानदेय भी मिलता है। ये विकल्प आर्थिक सुरक्षा देने के साथ-साथ मानसिक रूप से भी सक्रिय रखते हैं।

मोबाइल रिचार्ज फिर होगा महंगा, जेब पर पड़ेगा 12% तक का बोझ
भारतीय टेलीकॉम ग्राहक एक बार फिर महंगे रिचार्ज टैरिफ के लिए तैयार हो जाएं। अगले तीन से छह महीनों के भीतर मोबाइल रिचार्ज प्लान्स में 10 से 12 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। एयरटेल के हालिया फैसलों और बाजार विशेषज्ञों के आकलन से साफ है कि यह बोझ जल्द ही उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने वाला है।
खबर का निचोड़
भारतीय टेलीकॉम ग्राहक एक बार फिर महंगे रिचार्ज टैरिफ के लिए तैयार हो जाएं। अगले तीन से छह महीनों के भीतर मोबाइल रिचार्ज प्लान्स में 10 से 12 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। एयरटेल के हालिया फैसलों और बाजार विशेषज्ञों के आकलन से साफ है कि यह बोझ जल्द ही उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने वाला है।
रिचार्ज का नया झटका
देश भर के करोड़ों मोबाइल उपभोक्ताओं के लिए आने वाले दिन थोड़े महंगे साबित हो सकते हैं। भारती एयरटेल, रिलायंस जियो और वोडाफोन-आइडिया जैसी प्रमुख टेलीकॉम कंपनियां एक बार फिर अपने टैरिफ प्लान्स की कीमतें बढ़ाने की तैयारी में हैं। वित्तीय संस्था ऐक्सिस कैपिटल के आंकड़ों के अनुसार, आने वाले 3 से 6 महीनों के भीतर मोबाइल रिचार्ज 10 से 12 प्रतिशत तक महंगा हो सकता है।
विशेषज्ञ की राय और आंकड़े
ऐक्सिस कैपिटल के एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर गौरव मल्होत्रा का मानना है कि टेलीकॉम कंपनियां अपने एवरेज रेवेन्यू पर यूज़र (ARPU) को सुधारने के लिए यह कदम उठा रही हैं। कंपनियों का मुख्य ध्यान अपने नेटवर्क विस्तार और 5G इंफ्रास्ट्रक्चर से कमाई बढ़ाने पर है। इसके लिए टैरिफ हाइक सबसे सीधा और असरदार रास्ता दिखाई दे रहा है।
एयरटेल ने दी शुरुआती झलक
टैरिफ में इस अप्रत्यक्ष बढ़ोतरी का ट्रेलर एयरटेल पहले ही दिखा चुका है। कंपनी ने हाल ही में अपने लोकप्रिय ₹299 वाले बेस प्लान को बंद कर दिया है। इसकी जगह अब ग्राहकों को न्यूनतम ₹349 का रिचार्ज कराना पड़ रहा है। इस एक बदलाव से एयरटेल के इस प्लान में करीब 16 प्रतिशत की सीधी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर असर
सस्ते प्लान बंद करने का सीधा असर कंपनियों के राजस्व पर दिखता है, हालांकि गौरव मल्होत्रा के मुताबिक इसका पूरा वित्तीय प्रभाव कंपनियों की बैलेंस शीट और तिमाही नतीजों में दिखने में कम से कम एक तिमाही से ज़्यादा का वक्त लगेगा। जब एक कंपनी अपने एंट्री-लेवल या बेस प्लान की कीमतें बढ़ाती है, तो पूरे बाजार में प्रतिस्पर्धी कंपनियां भी इसी राह पर चलने लगती हैं।
उपभोक्ताओं पर पड़ेगा चौतरफा दबाव
डेटा और कॉलिंग की बढ़ती निर्भरता के बीच रिचार्ज महंगा होने से आम जनता का बजट प्रभावित होना तय है। औसतन एक परिवार में 3 से 4 मोबाइल कनेक्शन होते हैं, ऐसे में 10 से 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हर महीने के घरेलू खर्च को बढ़ाएगी। आने वाले कुछ महीनों में अन्य टेलीकॉम कंपनियां भी अपने मौजूदा प्लान्स में इसी तरह के बदलाव लागू कर सकती हैं।

फांसी की सजा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, खारिज हुई याचिका
सुप्रीम कोर्ट ने देश में फांसी के जरिए मौत की सजा देने के कानूनी प्रावधान को बरकरार रखा है। अदालत ने घातक इंजेक्शन जैसे कम दर्दनाक विकल्पों की मांग करने वाली याचिका को खारिज करते हुए इसे संवैधानिक माना। इस बीच, राज्यों की हाईकोर्ट्स में गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों पर सुनवाई जारी है।
खबर का निचोड़:
सुप्रीम कोर्ट ने देश में फांसी के जरिए मौत की सजा देने के कानूनी प्रावधान को बरकरार रखा है। अदालत ने घातक इंजेक्शन जैसे कम दर्दनाक विकल्पों की मांग करने वाली याचिका को खारिज करते हुए इसे संवैधानिक माना। इस बीच, राज्यों की हाईकोर्ट्स में गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों पर सुनवाई जारी है।
मृत्युदंड पर सुप्रीम कोर्ट का रुख स्पष्ट
देश में मौत की सजा के लिए फांसी की व्यवस्था जारी रहेगी। शीर्ष अदालत ने फांसी को चुनौती देने वाली और घातक इंजेक्शन या गोली मारने जैसे विकल्पों की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि वर्तमान कानूनी ढांचे के तहत फांसी देना असंवैधानिक नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश भर की अदालतों में मृत्युदंड से जुड़े कई संवेदनशील और जघन्य अपराधों के मामलों पर सुनवाई चल रही है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सजा का यह तरीका क्रूर या अमानवीय श्रेणी में नहीं आता।
विभिन्न अदालतों में जारी है सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही देश भर के उच्च न्यायालयों में फांसी की सजा से जुड़ी याचिकाओं पर फैसले सामने आ रहे हैं। कई मामलों में निचली अदालतों द्वारा दी गई फांसी की सजा को उच्च न्यायालयों ने बरकरार रखा है, तो वहीं कुछ अन्य मामलों में अपराध की प्रकृति, परिस्थितियों और साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए सजा को आजीवन कारावास में बदला गया है।
न्यायपालिका का ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' (दुर्लभ से दुर्लभतम) मामलों के सिद्धांत का कड़ाई से पालन हो, ताकि केवल सबसे गंभीर अपराधों में ही यह अंतिम सजा दी जाए।
पालघर में मौत की सजा तो छत्तीसगढ़ में राहत
हाल ही में महाराष्ट्र के पालघर में हुए एक जघन्य अपराध के मामले में सेशन कोर्ट ने दोषी को फांसी की सजा सुनाई। इस मामले में अपराध की बर्बरता को देखते हुए अदालत ने कड़ी से कड़ी सजा देना ही न्यायसंगत समझा।
दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक ट्रिपल मर्डर केस की सुनवाई के दौरान अदालत ने निचली अदालत के फैसले को बदल दिया। हाईकोर्ट ने तीनों हत्याओं के आरोपी की फांसी की सजा को रद्द करते हुए उसे बिना किसी छूट के आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया। अदालत ने माना कि मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और सुधार की गुंजाइश को देखते हुए मौत की सजा को उम्रकैद में बदलना उचित होगा।
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