
SEBI का आईटी रेजिलिएंसी इंडेक्स: वित्तीय बाजार अवसंरचना हेतु एक नया मानक *
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा शुरू किया गया आईटी रेजिलिएंसी इंडेक्स (ITRI) बाजार अवसंरचना संस्थानों (MIIs) के लिए एक मात्रात्मक तकनीक स्वास्थ्य स्कोरकार्ड है। यह सूचकांक तकनीकी बुनियादी ढांचे की मजबूती, सुरक्षा और परिचालन स्थिरता का मूल्यांकन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा शुरू किया गया आईटी रेजिलिएंसी इंडेक्स (ITRI) बाजार अवसंरचना संस्थानों (MIIs) के लिए एक मात्रात्मक तकनीक स्वास्थ्य स्कोरकार्ड है। यह सूचकांक तकनीकी बुनियादी ढांचे की मजबूती, सुरक्षा और परिचालन स्थिरता का मूल्यांकन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
परिचय एवं पृष्ठभूमि
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने बाजार अवसंरचना संस्थानों (MIIs) के तकनीकी जोखिमों को कम करने और उनकी प्रणाली की विश्वसनीयता बढ़ाने के उद्देश्य से आईटी रेजिलिएंसी इंडेक्स (ITRI) की शुरुआत की है। स्टॉक एक्सचेंज, समाशोधन निगम और डिपॉजिटरी जैसे संस्थान वित्तीय प्रणाली के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, जिनमें किसी भी प्रकार की तकनीकी बाधा संपूर्ण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। इस सूचकांक का मुख्य उद्देश्य इन संस्थानों की आईटी क्षमताओं का पारदर्शी और मानकीकृत मूल्यांकन करना है।
कार्यप्रणाली और मूल्यांकन के आधार
यह सूचकांक विभिन्न संकेतकों के माध्यम से तकनीकी स्वास्थ्य की गणना करता है। इसमें मुख्य रूप से सिस्टम अपटाइम, आपदा पुनर्प्राप्ति (डिजास्टर रिकवरी) की तैयारी, साइबर सुरक्षा प्रोटोकॉल, घटना प्रतिक्रिया समय और बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण को शामिल किया जाता है। इसके तहत प्रत्येक संस्थान को उसके प्रदर्शन के आधार पर एक निश्चित स्कोर प्रदान किया जाता है, जिससे नियामक संस्था को उनकी तकनीकी कमजोरियों की पहचान करने में सहायता मिलती है।
महत्व और संभावित प्रभाव
इस स्कोरकार्ड के लागू होने से बाजार अवसंरचना संस्थानों में सुशासन और उत्तरदायित्व में वृद्धि होगी। यह निवेशकों के विश्वास को मजबूत करता है क्योंकि यह उच्च स्तर की तकनीकी सुरक्षा सुनिश्चित करता है। साथ ही, यह नियामकों को किसी भी संभावित तकनीकी खतरे या साइबर हमले से निपटने के लिए पूर्व-चेतावनी प्रणाली के रूप में कार्य करने में सक्षम बनाता है, जिससे वित्तीय बाजारों की स्थिरता दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित रहती है।

मूड ऑफ द नेशन सर्वे: पीएम पद की रेस में मोदी-राहुल के साथ नए चेहरों की चर्चा और चुनावी हलचल
इंडिया टुडे और सी-वोटर के 'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे ने देश की राजनीतिक सरगर्मी को अचानक एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया है। इस बार के सर्वे में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर पारंपरिक राजनीतिक चेहरों के साथ-साथ कुछ दिलचस्प और नए नाम भी सामने आए हैं, जिसने राजनीतिक गलियारों में बहस छेड़ दी है।
इंडिया टुडे और सी-वोटर के 'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे ने देश की राजनीतिक सरगर्मी को अचानक एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया है। इस बार के सर्वे में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर पारंपरिक राजनीतिक चेहरों के साथ-साथ कुछ दिलचस्प और नए नाम भी सामने आए हैं, जिसने राजनीतिक गलियारों में बहस छेड़ दी है।
सर्वे के नए समीकरण और सियासी चर्चा
देश के सबसे बड़े राजनीतिक सर्वेक्षणों में शुमार 'मूड ऑफ द नेशन' (MOTN) ने एक बार फिर चुनावी पंडितों को माथापच्ची करने पर मजबूर कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की परंपरागत टक्कर के बीच, इस बार सर्वे में कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके का नाम भी चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि मुख्य मुकाबला एनडीए औरI.INDIA गठबंधन के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है, लेकिन ऐसे नए और अनोखे नाम राजनीतिक चर्चाओं को अधिक रोचक और अप्रत्याशित बना देते हैं।
2027 के आगामी विधानसभा चुनावों की बिसात
आने वाले समय में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब जैसे राज्यों के विधानसभा चुनाव देश की राजनीति की अगली दिशा तय करेंगे। इन सभी राज्यों में बेहद कड़े और कांटे के मुकाबले की उम्मीद जताई जा रही है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जहां सत्ता बनाए रखने और विपक्ष के हमलों से निपटने की चुनौती है, वहीं पंजाब का सियासी अखाड़ा हमेशा की तरह बहुकोणीय संघर्ष और स्थानीय मुद्दों से घिरा हुआ है। क्षेत्रीय दल इन चुनावों में अपनी पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में हैं।
सरकार की स्थिरता और राष्ट्रीय मुद्दे
एक अन्य हालिया सर्वे के आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा और एनडीए गठबंधन को बढ़त मिलने का अनुमान जताया गया है, जो केंद्र की मोदी सरकार की राजनीतिक स्थिति को मजबूत और स्थिर दर्शाता है। देश की जनता के बीच नीतियों और नेतृत्व को लेकर जो राय बन रही है, वह सत्ता पक्ष के लिए राहत की खबर है। हालांकि, दूसरी तरफ युवाओं से जुड़े गंभीर मुद्दे जैसे पेपर लीक और बेरोजगारी लगातार राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्ष के निशाने पर बने हुए हैं। ये मुद्दे आने वाले चुनावों में गेमचेंजर साबित हो सकते हैं और पार्टियों को अपनी रणनीतियों पर नए सिरे से विचार करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

बिहार शिक्षक भर्ती (TRE-4): अब एक ही परीक्षा से मिलेगी सफलता, नियमों में बड़ा बदलाव
बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा (TRE-4) के नियमों में बड़ा बदलाव हुआ है। छात्रों के उग्र विरोध के आगे झुकते हुए सरकार ने दो चरणों की परीक्षा को समाप्त कर एक ही परीक्षा कराने का फैसला लिया है। इसके साथ ही करीब दो हजार नई सीटें जुड़ने की संभावना है और शिकायतों के समाधान के लिए न्यायिक समिति बनेगी।
खबर का निचोड़
बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा (TRE-4) के नियमों में बड़ा बदलाव हुआ है। छात्रों के उग्र विरोध के आगे झुकते हुए सरकार ने दो चरणों की परीक्षा को समाप्त कर एक ही परीक्षा कराने का फैसला लिया है। इसके साथ ही करीब दो हजार नई सीटें जुड़ने की संभावना है और शिकायतों के समाधान के लिए न्यायिक समिति बनेगी।
छात्रों की जीत और सरकार का यू-टर्न
बिहार के लाखों बीएड और डीएलएड अभ्यर्थियों के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। लंबे समय से चल रहे विरोध प्रदर्शनों और छात्र आक्रोश के बाद आखिरकार सरकार ने TRE-4 के नियमों में बड़ा बदलाव करने का ऐलान कर दिया है। अब अभ्यर्थियों को दो-दो कठिन चरणों की वैतरणी पार नहीं करनी होगी, बल्कि चयन प्रक्रिया को पहले की तरह एकल चरण में समेट दिया गया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस अहम फैसले की घोषणा करते हुए साफ कर दिया है कि शासन प्रणाली छात्रों की वाजिब मांगों के प्रति संवेदनशील है।
एक परीक्षा से तय होगा शिक्षकों का भविष्य
पूर्व निर्धारित नियमों के अनुसार TRE-4 को दो अलग-अलग चरणों में आयोजित किया जाना था, जिसका छात्र लगातार पुरजोर विरोध कर रहे थे। उनका तर्क था कि दो चरणों की लंबी प्रक्रिया से न सिर्फ मानसिक तनाव बढ़ता है बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया में भी अनावश्यक देरी होती है। छात्रों के इस दबाव और सड़कों पर उतरे जनसैलाब के असर ने आखिरकार सत्ता के गलियारों तक अपनी गूंज पहुंचा दी। अब सरकार ने निर्णय लिया है कि परीक्षा का आयोजन केवल एक ही चरण में होगा, जिससे अभ्यर्थियों को राहत की सांस मिली है और असमंजस के बादल छंट गए हैं।
शिकायतों के समाधान के लिए न्यायिक समिति का गठन
सिर्फ परीक्षा पैटर्न में बदलाव ही नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसी विसंगतियों और विवादों से बचने के लिए सरकार ने एक दूरगामी कदम उठाया है। परीक्षा सुधारों और छात्रों की समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त या सेवारत न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेष समिति का गठन किया जाएगा। यह कमेटी अभ्यर्थियों की हर छोटी-बड़ी शिकायत पर गौर करेगी और पारदर्शी तरीके से सुधार के सुझाव देगी। इससे प्रशासनिक तंत्र और छात्रों के बीच भरोसे की एक नई मजबूत नींव रखे जाने की उम्मीद है।
दो हजार नई सीटों का इजाफा और आगे की राह
इस पूरी उठापटक के बीच नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए एक और खुशखबरी सामने आ रही है। चर्चा है कि TRE-4 के तहत रिक्तियों की संख्या में लगभग दो हजार सीटों का इजाफा किया जा सकता है। सीटों के बढ़ने से प्रतिस्पर्धा का दायरा थोड़ा और व्यापक होगा और अधिक से अधिक योग्य युवाओं को सरकारी शिक्षक बनने का सुनहरा अवसर मिलेगा। बदलते नियमों और नई उम्मीदों के साथ अब प्रशासनिक मशीनरी परीक्षा की तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुट गई है।

22,000 करोड़ का कर्ज सिर्फ 6.5 करोड़ में साफ: सुभाष चंद्रा के सौदे ने हिलाया बैंकिंग सिस्टम
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने एस्सेल ग्रुप के प्रमोटर डॉ. सुभाष चंद्रा से जुड़े 22 हजार करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज को महज साढ़े छह करोड़ रुपये में निपटाने की मंजूरी दे दी है। इस भारी-भरकम 'हेयरकट' पर राजनीतिक घमासान मच गया है, जबकि बैंकों को इस सौदे से बड़ा झटका लगा है।
खबर का निचोड़
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने एस्सेल ग्रुप के प्रमोटर डॉ. सुभाष चंद्रा से जुड़े 22 हजार करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज को महज साढ़े छह करोड़ रुपये में निपटाने की मंजूरी दे दी है। इस भारी-भरकम 'हेयरकट' पर राजनीतिक घमासान मच गया है, जबकि बैंकों को इस सौदे से बड़ा झटका लगा है।
कर्ज का पहाड़ और चौंकाने वाला समझौता
भारतीय बैंकिंग इतिहास में एक ऐसा फैसला सामने आया है जिसने वित्तीय गलियारों में भूचाल ला दिया है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने एस्सेल ग्रुप के प्रमोटर डॉ. सुभाष चंद्रा से जुड़े 22,000 करोड़ रुपये से अधिक के भारी-भरकम कर्ज को सिर्फ 6.5 करोड़ रुपये के सेटलमेंट में मंजूरी दे दी है। यह मामला कंपनियों के लिए दी गई पर्सनल गारंटी से जुड़ा था, जिसे लेकर लंबे समय से खींचतान चल रही थी। बैंकों के कड़े विरोध के बावजूद लेनदारों की समिति में अधिकांश वोटिंग शेयर चंद्रा के पक्ष में होने के कारण इस समझौते पर मुहर लग गई।
राजनीतिक बयानबाजी और 'हेयरकट' पर तंज
इस चौंकाने वाले फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस पार्टी ने इस समझौते पर तीखा हमला बोलते हुए इसे 'हेयरकट नहीं, मुंडन' करार दिया है। विपक्षी दलों का कहना है कि यह देश के बैंकिंग सिस्टम और आम जनता के पैसों के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ है, जहां बड़े डिफॉल्टर्स को इस तरह की भारी राहत मिल जाती है। दूसरी ओर, भगोड़े उद्योगपति विजय माल्या ने भी इस पूरे मामले पर तंज कसते हुए अपनी प्रतिक्रिया दी है, जिससे यह मुद्दा और अधिक चर्चा में आ गया है।
डॉ. सुभाष चंद्रा का स्पष्टीकरण और बैंकों की लाचारी
विवाद बढ़ने के बाद डॉ. सुभाष चंद्रा की तरफ से भी स्थिति स्पष्ट की गई है। उनका कहना है कि यह मामला पूरी तरह से कंपनियों के लिए दी गई पर्सनल गारंटी का था, न कि उनका कोई व्यक्तिगत कर्ज जिसे उन्होंने निजी मौज-मस्ती के लिए लिया हो। हालांकि, बैंकों का तर्क था कि वे इस फैसले से बेहद असंतुष्ट हैं क्योंकि रिकवरी का यह आंकड़ा ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। कानूनी प्रक्रिया और मेजॉरिटी वोटिंग के नियमों के आगे बैंकों की आपत्तियां बेअसर साबित हुईं और ट्रिब्यूनल ने सेटलमेंट को हरी झंडी दिखा दी।
बैंकिंग व्यवस्था पर गहराता संकट
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर से भारत के दिवालिया और शोधन अक्षमता कानून की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब हजारों करोड़ रुपये का कर्ज चंद रुपयों में चुकता हो जाता है, तो वित्तीय संस्थानों की जोखिम उठाने की क्षमता और रिकवरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। भविष्य में इस तरह के फैसले अन्य बड़े डिफॉल्टर्स के लिए भी एक मिसाल बन सकते हैं, जिससे बैंकों के नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स से निपटने के तरीकों पर नए सिरे से मंथन शुरू हो गया है।

रक्षाबंधन पर यूपी-बिहार का तोहफा: महिलाओं के लिए मुफ्त बस सफर और करोड़ों की सौगात
रक्षाबंधन का पावन पर्व इस बार देश की करोड़ों महिलाओं के लिए दोहरे जश्न का मौका लेकर आया है। उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारों ने इस खास अवसर पर महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और स्वावलंबन को मजबूती देने के लिए बड़े ऐतिहासिक ऐलान किए हैं। जहां यूपी में योगी सरकार ने यातायात को सुगम बनाया है, वहीं बिहार सरकार ने महिलाओं के खातों में सीधी आर्थिक सहायता भेजकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है।
रक्षाबंधन का पावन पर्व इस बार देश की करोड़ों महिलाओं के लिए दोहरे जश्न का मौका लेकर आया है। उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारों ने इस खास अवसर पर महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और स्वावलंबन को मजबूती देने के लिए बड़े ऐतिहासिक ऐलान किए हैं। जहां यूपी में योगी सरकार ने यातायात को सुगम बनाया है, वहीं बिहार सरकार ने महिलाओं के खातों में सीधी आर्थिक सहायता भेजकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है।
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार का ट्रिपल तोहफा
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रक्षाबंधन के पावन पर्व पर प्रदेश की आधी आबादी को बड़ा उपहार दिया है। राज्य सरकार ने महिलाओं को सुगम और सुरक्षित सफर का तोहफा देते हुए उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा प्रदान की है। यह सुविधा तयशुदा समय सीमा के भीतर लागू रही, जिससे करोड़ों बहनों को अपने भाइयों के घर आने-जाने में किसी भी प्रकार की आर्थिक या व्यावहारिक असुविधा का सामना नहीं करना पड़ा।
मुफ्त बस यात्रा के अलावा, सरकार ने महिला सुरक्षा और उनके सम्मान को प्राथमिकता देते हुए कई अन्य प्रशासनिक कदम भी उठाए हैं। त्योहार के दिनों में भीड़भाड़ वाले बाजारों और बस अड्डों पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया ताकि बहनें पूरी तरह सुरक्षित महसूस कर सकें। सरकार का यह कदम केवल एक रियायत नहीं, बल्कि महिलाओं को समाज में विशेष सम्मान और प्राथमिकता देने का एक मजबूत संदेश है।
बिहार में 'समृद्ध बिहार समृद्ध महिला' अभियान का कमाल
बिहार में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की पहल पर 'समृद्ध बिहार समृद्ध महिला' अभियान के तहत रक्षाबंधन के मौके पर एक ऐतिहासिक आर्थिक सौगात दी गई। सरकार ने राज्य की करीब 5 लाख जीविका दीदियों के बैंक खातों में डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के माध्यम से कुल 600 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि ट्रांसफर की है।
इस विशेष अभियान के तहत लगभग 4 लाख महिलाओं को रोजगार और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए 10-10 हजार रुपये की पहली किस्त सीधे उनके खातों में पहुंचाई गई है। यह राशि महिलाओं को छोटे स्तर पर बिजनेस शुरू करने, अपनी आजीविका को बेहतर बनाने और आर्थिक रूप से मजबूत होने में सीधे तौर पर मदद करेगी। बिहार सरकार की इस पहल ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली जीविका दीदियों के हौसलों को नई उड़ान दी है।
महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की नई इबारत
उत्तर प्रदेश और बिहार के इन कदमों ने साबित कर दिया है कि त्योहार केवल मेल-मिलाप का जरिया नहीं हैं, बल्कि जन कल्याणकारी नीतियों को धरातल पर उतारने का बेहतरीन अवसर भी हैं। जब एक तरफ मुफ्त यात्रा से बहनों की राह आसान हुई, तो दूसरी तरफ आर्थिक सहायता से उनके सपनों को पंख मिले। इस रक्षाबंधन पर मिले इन उपहारों ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारें अब महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि देश के विकास की धुरी मानकर नीतिगत फैसले ले रही हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति के आयाम: CPI, WPI और कोर मुद्रास्फीति का विश्लेषण
मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य मूल्य स्तर में होने वाली निरंतर वृद्धि को दर्शाती है। यह क्रय शक्ति को कम करती है। मौद्रिक नीति का प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए विकास को बढ़ावा देना है।
मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य मूल्य स्तर में होने वाली निरंतर वृद्धि को दर्शाती है। यह क्रय शक्ति को कम करती है। मौद्रिक नीति का प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए विकास को बढ़ावा देना है।
मुद्रास्फीति के प्रकार और उनका माप
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) खुदरा स्तर पर उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं के औसत मूल्य बदलाव को मापता है। भारत में CPI का संकलन सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के अंतर्गत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा किया जाता है। यह सूचकांक ग्रामीण, शहरी और संयुक्त (Combined) स्तर पर जारी किया जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मौद्रिक नीति समिति (MPC) के लिए मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के वास्ते मुख्य बेंचमार्क के रूप में 'CPI-संयुक्त' को अपनाया है, जिसका लक्ष्य 4% ( +/- 2% की सहिष्णुता बैंड के साथ) है।
थोक मूल्य सूचकांक (WPI) उत्पादन और थोक स्तर पर एक व्यापारिक समूह से दूसरे समूह में होने वाले लेनदेन के दौरान कीमतों के बदलाव को ट्रैक करता है। इसे वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार कार्यालय द्वारा जारी किया जाता है। WPI में प्राथमिक वस्तुओं, ईंधन और विनिर्मित उत्पादों को शामिल किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से वस्तुओं (Goods) का समावेश होता है और सेवाओं को शामिल नहीं किया जाता है। WPI का उपयोग व्यापक आर्थिक स्तर पर मुद्रास्फीति के दबावों का आकलन करने के लिए किया जाता है।
कोर मुद्रास्फीति और इसका महत्व
कोर मुद्रास्फीति (Core Inflation) कुल मुद्रास्फीति से अत्यधिक अस्थिर घटकों जैसे कि खाद्य पदार्थों और ऊर्जा (ईंधन एवं बिजली) की कीमतों को निकालकर निकाली जाती है। चूँकि खाद्य और ईंधन की कीमतें मौसम, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति-शृंखला की बाधाओं के कारण तेजी से उतार-चढ़ाव करती हैं, इसलिए कोर मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था में अंतर्निहित मूल्य दबावों का अधिक सटीक संकेत देती है। मौद्रिक प्राधिकरण ब्याज दरों में समायोजन करते समय कोर मुद्रास्फीति के रुझानों पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हैं क्योंकि यह मांग-जनित मुद्रास्फीति को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करती है।
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