
राष्ट्रीय डिजिटल टूरिज्म स्टैक और डेखो अपना देश 2.0
विश्व पर्यटन दिवस 2026 के अवसर पर केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय डिजिटल टूरिज्म स्टैक और 'डेखो अपना देश 2.0' अभियान के तहत राष्ट्रीय वैकल्पिक गंतव्य मिशन का शुभारंभ किया गया। यह पहल डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से पर्यटन क्षेत्र में पारदर्शिता, सुगमता और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए लाई गई है।
राष्ट्रीय डिजिटल टूरिज्म स्टैक और डेखो अपना देश 2.0
सारांश (Summary):
विश्व पर्यटन दिवस 2026 के अवसर पर केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय डिजिटल टूरिज्म स्टैक और 'डेखो अपना देश 2.0' अभियान के तहत राष्ट्रीय वैकल्पिक गंतव्य मिशन का शुभारंभ किया गया। यह पहल डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से पर्यटन क्षेत्र में पारदर्शिता, सुगमता और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए लाई गई है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
राष्ट्रीय डिजिटल टूरिज्म स्टैक की पृष्ठभूमि और परिचय
यह एक खुली डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पहल है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत में पर्यटन प्रस्तावों को अधिक खोज योग्य, सुलभ और विश्वसनीय बनाना है। इसका विकास ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स के सहयोग से तथा इंटरनेशनल सेंटर फॉर डीपीआई इनोवेशन एंड एडवांसमेंट के समर्थन से किया जा रहा है। यह प्रणाली पर्यटन सेवा प्रदाताओं को सत्यापित पहचान, क्रेडेंशियल्स, भुगतान प्रणाली और शिकायत निवारण तंत्र जैसी सुविधाओं से लैस करती है। इस कार्यक्रम को विभिन्न चरणों में लागू किया जा रहा है, जिसकी पहली प्रायोगिक शुरुआत जनवरी 2027 में प्रस्तावित है।
राष्ट्रीय वैकल्पिक गंतव्य मिशन का स्वरूप
डेखो अपना देश अभियान 2.0 के अंतर्गत शुरू किए गए इस मिशन का प्रमुख उद्देश्य पर्यटन की मांग को संतुलित करना और कम प्रसिद्ध स्थलों को बढ़ावा देना है। इसके तहत देश भर में पर्यटन के लिए तैयार और कम चर्चित स्थानों को बढ़ावा दिया जाता है ताकि घरेलू पर्यटकों के प्रवाह में विविधता आ सके और स्थानीय समुदायों के लिए आर्थिक अवसर पैदा हो सके। इसके अंतर्गत चार प्रमुख स्तंभों—गंतव्यों का चयन, प्रायोगिक थीम, उत्पादों की पैकेजिंग और संयुक्त संवर्द्धन—को शामिल किया गया है।
मिशन के चार प्रमुख स्तंभ और कार्यप्रणाली
इस मिशन के अंतर्गत पर्वतीय, तटीय, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय तीर्थ स्थलों जैसे चार प्रायोगिक विषयों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा नामांकित इन गंतव्यों को बोकेबल टूरिज्म उत्पादों और थीम आधारित यात्रा कार्यक्रमों के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसके साथ ही, स्थानीय कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों और गाइडों को पर्यटन मूल्य श्रृंखला से जोड़ा जाता है। गंतव्यों के प्रभावी प्रबंधन के लिए एक राष्ट्रीय पर्यटन निगरानी डैशबोर्ड भी स्थापित किया गया है, जो पर्यटकों की संख्या और वहन क्षमता की निरंतर निगरानी करता है।

तिंगोंग अंतरिक्ष स्टेशन: चीन की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षा और भारत-पड़ोस कूटनीति
चीन का तिंगोंग अंतरिक्ष स्टेशन लो अर्थ ऑर्बिट में स्थित एक स्थायी मानवयुक्त प्रयोगशाला है। हाल ही में पाकिस्तान के साथ अंतरिक्ष सहयोग समझौते के तहत एक पाकिस्तानी अंतरिक्ष यात्री के इस स्टेशन पर जाने की घोषणा की गई है, जो भू-राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।
तिंगोंग अंतरिक्ष स्टेशन: चीन की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षा और भारत-पड़ोस कूटनीति
सारांश (Summary):
चीन का तिंगोंग अंतरिक्ष स्टेशन लो अर्थ ऑर्बिट में स्थित एक स्थायी मानवयुक्त प्रयोगशाला है। हाल ही में पाकिस्तान के साथ अंतरिक्ष सहयोग समझौते के तहत एक पाकिस्तानी अंतरिक्ष यात्री के इस स्टेशन पर जाने की घोषणा की गई है, जो भू-राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
तिंगोंग अंतरिक्ष स्टेशन की पृष्ठभूमि और संरचना
तिंगोंग का शाब्दिक अर्थ 'स्वर्गीय पैलेस' है। यह चीन के मानवयुक्त अंतरिक्ष कार्यक्रम का तीसरा और अंतिम चरण है। इसके प्रथम मॉड्यूल 'तियान्हे' का प्रक्षेपण अप्रैल 2021 में किया गया था। वर्तमान में इस स्टेशन में तियान्हे कोर मॉड्यूल के साथ दो विज्ञान मॉड्यूल 'वेंटियन' और 'मेंगतियन' जुड़े हुए हैं। इसके अतिरिक्त, भविष्य में एक विशाल 'क्सुनतियान' अंतरिक्ष दूरबीन को भी इसके साथ जोड़े जाने की योजना है, जो हबल टेलीस्कोप के समान कार्य करेगी।
तिंगोंग और अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की तुलना
तिंगोंग अंतरिक्ष स्टेशन पृथ्वी से लगभग 340 से 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर परिक्रमा करता है, जो अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) के कक्षीय क्षितिज के समान है। आकार और द्रव्यमान के मामले में यह आईएसएस की तुलना में काफी छोटा और हल्का है। आईएसएस में जहां 16 मॉड्यूल हैं, वहीं तिंगोंग में केवल तीन मॉड्यूल हैं और इसका वजन आईएसएस का लगभग 20 प्रतिशत है। हालांकि, आईएसएस के विपरीत, तिंगोंग का संचालन पूरी तरह से एक एकल राष्ट्र द्वारा किया जाता है।
वैज्ञानिक उद्देश्य और प्रयोग
यह अंतरिक्ष स्टेशन अंतरिक्ष में दीर्घकालिक मानव निवास और सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए स्थापित किया गया है। इसमें 23 बंद प्रयोग रैक शामिल हैं, जो अंतरिक्ष जीवन विज्ञान, माइक्रोग्रैविटी द्रव भौतिकी, सामग्री विज्ञान और मौलिक भौतिक जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान के लिए मंच प्रदान करते हैं। इसके अलावा, यह बाहरी और बिना दबाव वाले प्रयोगों के लिए विशेष प्लेटफॉर्म भी उपलब्ध कराता है।
भू-राजनीतिक और रणनीतिक निहितार्थ
चीन अपने इस अंतरिक्ष स्टेशन के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष सहयोग को बढ़ावा दे रहा है। पाकिस्तान के साथ हुए नवीनतम समझौते के तहत पाकिस्तानी अंतरिक्ष यात्री का पेलोड विशेषज्ञ के रूप में तिंगोंग जाना इस दिशा में एक बड़ा कदम है। यह अंतरिक्ष कूटनीति के जरिए क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की चीन की रणनीति का हिस्सा है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और सामरिक मामलों के अंतर्गत महत्वपूर्ण है।

प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना: प्रावधान एवं मुख्य विशेषताएं
प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना मत्स्य संपदा योजना के तहत एक केंद्रीय क्षेत्र उप-योजना है। इसका उद्देश्य मत्स्य पालन क्षेत्र का औपचारिकीकरण करना, सूक्ष्म उद्यमों को वित्तीय सहायता प्रदान करना और एक्वाकल्चर बीमा को बढ़ावा देना है। यह योजना वित्त वर्ष 2023-24 से 2026-27 तक कार्यान्वित की जा रही है।
सारांश (Summary):
प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना मत्स्य संपदा योजना के तहत एक केंद्रीय क्षेत्र उप-योजना है। इसका उद्देश्य मत्स्य पालन क्षेत्र का औपचारिकीकरण करना, सूक्ष्म उद्यमों को वित्तीय सहायता प्रदान करना और एक्वाकल्चर बीमा को बढ़ावा देना है। यह योजना वित्त वर्ष 2023-24 से 2026-27 तक कार्यान्वित की जा रही है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
परिचय एवं पृष्ठभूमि
प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना को वर्ष 2024 में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत एक केंद्रीय क्षेत्र उप-योजना के रूप में लॉन्च किया गया था। इस योजना का मुख्य फोकस असंगठित मत्स्य पालन क्षेत्र का क्रमिक औपचारिकीकरण करना और मत्स्य पालन से जुड़े सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को सुदृढ़ बनाना है। इसके लिए 6,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया गया है, जिसे वित्त वर्ष 2023-24 से वित्त वर्ष 2026-27 तक चार वर्षों की अवधि के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया गया है।
योजना के प्रमुख उद्देश्य
इस योजना के उद्देश्यों में असंगठित मत्स्य पालन क्षेत्र को औपचारिक रूप देना और मत्स्य क्षेत्र के सूक्ष्म तथा लघु उद्यमों को संस्थागत वित्तपोषण तक आसान पहुंच प्रदान करना शामिल है। इसके अतिरिक्त, यह योजना एक्वाकल्चर बीमा खरीदने के लिए लाभार्थियों को एकमुश्त प्रोत्साहन राशि देती है, मत्स्य पालन सूक्ष्म उद्यमों को प्रदर्शन अनुदान के माध्यम से प्रोत्साहित करती है, तथा मछली एवं मत्स्य उत्पादों की सुरक्षा और गुणवत्ता आश्वासन प्रणालियों के विस्तार पर जोर देती है।
लक्षित लाभार्थी
इस योजना के अंतर्गत मछुआरे, जलीय कृषि (एक्वाकल्चर) किसान, मत्स्य श्रमिक, मछली विक्रेता और मूल्य श्रृंखला से सीधे जुड़े अन्य व्यक्ति आते हैं। इसके दायरे में सूक्ष्म एवं लघु उद्यम, सहकारी समितियां, महासंघ, स्वसहायता समूह और फिश फार्मर्स प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन शामिल हैं। इसके अलावा, मत्स्य पालन विभाग द्वारा निर्धारित किए जाने वाले अन्य लक्षित समूह भी इसके पात्र हैं।
कार्यान्वयन रणनीति एवं घटक
योजना के पहले घटक के तहत राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का निर्माण किया गया है, जिस पर सभी हितधारकों का पंजीकरण किया जाता है। यह प्लेटफ़ॉर्म वित्तीय प्रोत्साहन वितरण, प्रशिक्षण और वित्तीय साक्षरता में सुधार का कार्य करता है। दूसरे उप-घटक के तहत एक्वाकल्चर बीमा अपनाने को बढ़ावा दिया जाता है, जिसके अंतर्गत कम से कम एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करने का लक्ष्य है। इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला लाभार्थियों के लिए सामान्य श्रेणी की तुलना में अतिरिक्त प्रोत्साहन का प्रावधान है। अन्य घटकों में मूल्य श्रृंखला की दक्षता में सुधार, गुणवत्ता आश्वासन प्रणालियों का विस्तार और परियोजना प्रबंधन शामिल है।

यूपीएससी परीक्षा के लिए भीमा नदी का विस्तृत भौगोलिक और पर्यावरणीय विश्लेषण
भीमा नदी कृष्णा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है, जो महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना से होकर बहती है। हाल ही में औद्योगिक प्रदूषण के कारण चर्चा में आई यह नदी अपने धार्मिक महत्व और घनी आबादी वाले बेसिन के लिए जानी जाती है।
सारांश (Summary):
भीमा नदी कृष्णा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है, जो महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना से होकर बहती है। हाल ही में औद्योगिक प्रदूषण के कारण चर्चा में आई यह नदी अपने धार्मिक महत्व और घनी आबादी वाले बेसिन के लिए जानी जाती है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
भौगोलिक स्थिति एवं उद्गम
भीमा नदी महाराष्ट्र के पुणे जिले में पश्चिमी घाट की भीमेश्वर पहाड़ियों में स्थित भीमाशंकर मंदिर के निकट से निकलती है। यह महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना राज्यों से प्रवाहित होती है और अंततः कर्नाटक के रायचूर जिले में कृष्णा नदी में मिल जाती है। इस नदी की कुल लंबाई 861 किलोमीटर है, जिसमें से लगभग 450 किलोमीटर का मार्ग महाराष्ट्र राज्य के अंतर्गत आता है।
प्रवाह मार्ग एवं द्रोणी क्षेत्र
भीमा नदी का द्रोणी क्षेत्र पश्चिम में पश्चिमी घाट, उत्तर में बालाघाट श्रेणी और दक्षिण में महादेव पहाड़ियों से घिरा हुआ है। यह नदी एक सुदृढ़ रूप से कटी हुई घाटी में प्रवाहित होती है, जिसके दोनों तटों पर घनी आबादी निवास करती है। मानसून के दौरान भारी वर्षा के कारण इस नदी में अक्सर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
प्रमुख सहायक नदियाँ
भीमा नदी की जल निकासी प्रणाली में कई महत्वपूर्ण सहायक नदियाँ शामिल हैं। इसके दाहिने तट पर मिलने वाली प्रमुख नदियों में इंद्रायणी, मुूला, मुठा और पावना नदियाँ शामिल हैं। वहीं, बाएं तट पर मिलने वाली प्रमुख सहायक नदियों में सीना और नीरा नदियाँ प्रमुख हैं।
ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व
यह बेसिन प्रागैतिहासिक काल से ही मानव बस्तियों का केंद्र रहा है। यहाँ सातवाहन, चालुक्य, राष्ट्रकूट और यादव जैसे प्राचीन राजवंशों का शासनकाल फला-फूलला है। पंढरपुर इस नदी के दाहिने तट पर स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थ केंद्र है, जहाँ इसे चंद्रमा के आकार जैसा दिखने के कारण 'चंद्रभागा' नदी के नाम से भी जाना जाता है। इसके अतिरिक्त, भीमाशंकर मंदिर भगवान शिव के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जो इसी नदी के उद्गम स्थल के समीप स्थित है।

कदलुंडी-वल्लीकुन्नू समुदाय रिजर्व में यूरेशियन व्हिमब्रल का दुर्लभ आगमन
केरल के कदलुंडी-वल्लीकुन्नू कम्युनिटी रिजर्व में यूरेशियन व्हिमब्रल (न्यूमेनियस फीओपस) की हालिया सिटिंग दर्ज की गई है। स्कॉलोपैसिडे परिवार का यह प्रवासी वेंडिंग पक्षी उपआर्कटिक क्षेत्रों से शीतकालीन प्रवास के दौरान भारत के तटीय क्षेत्रों और आद्रभूमि में पहुंचता है, जो देश के जैव विविधता संरक्षण और पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित करता है।
कदलुंडी-वल्लीकुन्नू समुदाय रिजर्व में यूरेशियन व्हिमब्रल का दुर्लभ आगमन
सारांश (Summary):
केरल के कदलुंडी-वल्लीकुन्नू कम्युनिटी रिजर्व में यूरेशियन व्हिमब्रल (न्यूमेनियस फीओपस) की हालिया सिटिंग दर्ज की गई है। स्कॉलोपैसिडे परिवार का यह प्रवासी वेंडिंग पक्षी उपआर्कटिक क्षेत्रों से शीतकालीन प्रवास के दौरान भारत के तटीय क्षेत्रों और आद्रभूमि में पहुंचता है, जो देश के जैव विविधता संरक्षण और पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित करता है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
भौगोलिक उपस्थिति और प्रवास पैटर्न
यूरेशियन व्हिमब्रल (न्यूमेनियस फीओपस) स्कॉलोपैसिडे कुल का एक प्रमुख वेंडिंग पक्षी है। इसका भौगोलिक विस्तार पांच महाद्वीपों—उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, एशिया, अफ्रीका और यूरोप तक फैला हुआ है। ग्रीष्मकाल के दौरान यह साइबेरिया और अलास्का के उपआर्कटिक क्षेत्रों में प्रजनन करता है तथा ठंड के मौसम में दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण एशिया (सहित नेपाल और भारत) के तटीय क्षेत्रों की ओर प्रवास करता है। केरल के कदलुंडी-वल्लीकुन्नू कम्युनिटी रिजर्व में इसका पहुंचना इसके शीतकालीन प्रवास मार्गों की पुष्टि करता है।
प्राकृतिक आवास और पारिस्थितिकी
यह पक्षी मुख्य रूप से समुद्री तटों, तटीय आद्रभूमि, मैंग्रोव वनों, दलदलों और बड़ी नदियों के किनारों को अपना शीतकालीन आवास बनाता है। प्रजनन काल के दौरान यह सामान्यतः एकांतप्रिय रहता है, परंतु प्रवास और शीतकाल के दौरान यह झुंड में रहने वाला (ग्रेगोरियस) स्वभाव प्रदर्शित करता है। इसकी पहचान इसके विशिष्ट उच्च-पिच वाले कॉल से होती है, जिसमें सात नोट्स की एक पुनरावृत्ति श्रृंखला शामिल होती है।
शारीरिक विशेषताएँ और आहार
यूरेशियन व्हिमब्रल एक मध्यम से बड़े आकार का सलेटी-भूरे रंग का पक्षी है। इसकी सबसे प्रमुख विशेषता इसका लंबा, नीचे की ओर मुका हुआ (डिकर्व्ड) चोंच है, जिसमें एक हल्का सा मोड़ होता है। इसके सिर पर गहरे रंग की आई-स्ट्राइप्स और क्राउन-साइड्स का अनूठा पैटर्न होता है। ऊपरी हिस्सा गहरे भूरे रंग के धब्बों से युक्त तथा निचला हिस्सा हल्का होता है, जिसमें गले और छाती पर भूरे रंग की धारियां पाई जाती हैं। इसका मुख्य आहार नरम कीचड़ में प्रोब करके निकाले गए छोटे अकशेरुकी जीव और सतह से पकड़े गए छोटे केकड़े हैं।
संरक्षण स्थिति
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीवों के संरक्षण का मूल्यांकन करने वाली संस्थाओं के अनुसार, इस प्रजाति को आईयूसीएन (IUCN) रेड लिस्ट में 'Least Concern' (न्यूनतम चिंताजनक) श्रेणी के अंतर्गत रखा गया है। इसके बावजूद, तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण और जलवायु परिवर्तन के कारण इसके पारंपरिक प्रवास मार्गों पर मंडराने वाले खतरे पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं।

केरल में विकसित डेंगी अर्ली वॉर्निंग सिस्टम और परीक्षापयोगी आयाम
केरल के वैज्ञानिकों द्वारा मशीन लर्निंग और मौसम डेटा आधारित डेंगी अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (DEWS) का विकास किया गया है, जो जिला-स्तरीय डेंगी प्रवृत्तियों का पूर्वानुमान लगाकर स्वास्थ्य अधिकारियों को समय रहते महामारी से निपटने में सक्षम बनाता है।
केरल के वैज्ञानिकों द्वारा मशीन लर्निंग और मौसम डेटा आधारित डेंगी अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (DEWS) का विकास किया गया है, जो जिला-स्तरीय डेंगी प्रवृत्तियों का पूर्वानुमान लगाकर स्वास्थ्य अधिकारियों को समय रहते महामारी से निपटने में सक्षम बनाता है।
डेंगी संक्रमण और वैश्विक प्रसार
डेंगी (ब्रीक-बोन फीवर) एक मच्छर जनित वायरल संक्रमण है जो डेंगी वायरस (DENV) के कारण होता है। यह संक्रमण अधिकांश मामलों में स्पर्शोन्मुख या हल्के लक्षणों वाला होता है, किंतु गंभीर मामलों में यह घातक सिद्ध हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में इसका प्रसार सर्वाधिक देखा जाता है। इसके संक्रमण का मुख्य कारण संक्रमित एडीज मच्छरों का काटना है, जो चार अलग-अलग प्रकार के डेंगी वायरस (DENV-1, DENV-2, DENV-3, और DENV-4) वाहक होते हैं। यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सीधे तौर पर नहीं फैलती है, सिवाय इसके कि गर्भवती महिला से उसके बच्चे में संक्रमण संचरित हो सके। वैश्विक स्तर पर प्रतिवर्ष लगभग 40 करोड़ डेंगी संक्रमण दर्ज किए जाते हैं, जिनमें से 96 मिलियन लोग चिकित्सीय रूप से बीमार पड़ते हैं।
संक्रमण चक्र और लक्षण
डेंगी के सामान्य लक्षणों में तेज बुखार, गंभीर सिरदर्द, बदन दर्द, मितली और त्वचा पर चकत्ते शामिल हैं। अधिकांश रोगी एक से दो सप्ताह में स्वस्थ हो जाते हैं। हालांकि, संक्रमण की पुनरावृत्ति होने पर स्थिति गंभीर हो सकती है, क्योंकि दूसरी बार संक्रमित होने वाले व्यक्तियों में गंभीर डेंगी होने का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है। गंभीर अवस्था को डेंगी हेमरेजिक फीवर (DHF) कहा जाता है, जिसमें रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त होकर रिसने लगती हैं और रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से गिर जाती है। इसके परिणामस्वरूप आंतरिक रक्तस्राव, अंगों की विफलता और शॉक जैसी जीवनघाती स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।
प्रबंधन और उपचार के उपाय
वर्तमान चिकित्सा विज्ञान में डेंगी के उपचार के लिए कोई विशिष्ट एंटीवायरल औषधि उपलब्ध नहीं है। इसके प्रबंधन का मुख्य आधार लक्षणात्मक उपचार और सहायक देखभाल (सपोर्टिव केयर) है। इसमें पर्याप्त तरल पदार्थों का सेवन, पूर्ण बेड रेस्ट और चिकित्सीय देखरेख में दर्द निवारक दवाओं का उपयोग शामिल है। केरल का नया मॉडल पूर्वानुमान आधारित नियंत्रण रणनीतियों को मजबूत करके स्वास्थ्य तंत्र पर पड़ने वाले इस दबाव को कम करने में सहायक होगा।
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