
राजनीतिक वित्तपोषण और पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल: चुनौतियाँ और सुधार
भारत में पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल (RUPPs) चुनावी लोकतंत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए थे, परंतु विधिक कमियों और कमजोर अनुपालन के कारण ये अपारदर्शी चंदे और कर छूट प्राप्त करने का जरिया बन चुके हैं। निर्वाचन आयोग को अधिक अधिकार देने और चंदे की कर छूट को एक तर्कसंगत वोट शेयर से जोड़ने की आवश्यकता है।
सारांश
भारत में पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल (RUPPs) चुनावी लोकतंत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए थे, परंतु विधिक कमियों और कमजोर अनुपालन के कारण ये अपारदर्शी चंदे और कर छूट प्राप्त करने का जरिया बन चुके हैं। निर्वाचन आयोग को अधिक अधिकार देने और चंदे की कर छूट को एक तर्कसंगत वोट शेयर से जोड़ने की आवश्यकता है।
भारतीय दलीय प्रणाली में राजनीतिक दलों का वर्गीकरण और RUPP की स्थिति
भारतीय चुनावी लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को मुख्य रूप से मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दलों, मान्यता प्राप्त राज्य दलों और पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (RUPPs) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत पंजीकृत होने वाले वे दल RUPP की श्रेणी में आते हैं, जो राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त करने के लिए आवश्यक मतों या सीटों के न्यूनतम मानदंडों को पूरा नहीं कर पाते। इन दलों की संख्या में पिछले कुछ दशकों में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है।
आरंभ में इस श्रेणी का उद्देश्य छोटे और नए राजनीतिक समूहों को चुनावी प्रक्रियाओं में भाग लेने और अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए एक मंच प्रदान करना था। हालांकि, समय के साथ यह व्यवस्था विधिक सरलता और कमजोर अनुपालन तंत्र के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। वर्तमान में बड़ी संख्या में ऐसे दल पंजीकृत हैं जो सक्रिय राजनीति या चुनावों से दूर रहकर केवल वित्तीय लाभ और विधिक संरक्षण प्राप्त करने का माध्यम बन चुके हैं।
RUPPs को मिलने वाले प्रशासनिक और वित्तीय विशेषाधिकार
पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद RUPPs को भारतीय निर्वाचन आयोग और आयकर कानूनों के अंतर्गत कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और वित्तीय विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। इन दलों को लोकसभा या राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान अपने उम्मीदवारों के लिए एक 'सामान्य प्रतीक' (Common Symbol) आवंटित कराने की सुविधा मिलती है, जिससे उनके लिए मतदाताओं के बीच पहचान बनाना आसान होता है। इसके अलावा, ये दल चुनाव प्रचार के लिए अपने स्टार प्रचारकों की सूची में अधिकतम 20 सदस्यों को शामिल कर सकते हैं।
वित्तीय मोर्चे पर, इन दलों को मिलने वाले चंदे पर आयकर कानूनों के तहत कर छूट का प्रावधान है। राजनीतिक दलों को मिलने वाला यह वित्तीय संरक्षण उन्हें अपने संसाधनों को बढ़ाने में सहायता करता है। यद्यपि कानून के अनुसार उन्हें 20,000 रुपये से अधिक के चंदे का हिसाब और दानदाताओं का विवरण निर्वाचन आयोग को देना होता है तथा 2,000 रुपये से अधिक का नकद चंदा स्वीकार करने पर प्रतिबंध है, परंतु अधिकांश स्तरों पर इसका कड़ाई से पालन नहीं होता है।
अपारदर्शी वित्तपोषण और कर छूट का दुरुपयोग
RUPPs के संदर्भ में सबसे गंभीर चिंता का विषय काले धन को सफेद करने और कर छूट प्राप्त करने के लिए इनका एक साधन के रूप में उपयोग किया जाना है। चूंकि भारत में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर कर में व्यापक छूट मिलती है, इसलिए कई संस्थाएं और व्यक्ति अपने अघोषित धन को राजनीतिक चंदे के रूप में इन दलों को हस्तांतरित कर देते हैं। इसके बदले में बड़ी मात्रा में धन अवैध माध्यमों से वापस प्राप्त कर लिया जाता है, जिससे यह व्यवस्था कर चोरी का एक समानांतर तंत्र बन जाती है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और अन्य विधिक निगरानी संस्थाओं की रिपोर्टों से यह बार-बार उजागर हुआ है कि एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे दलों का होता है जो या तो अपने वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट और अंशदान विवरण (Contribution Reports) समय पर दाखिल नहीं करते या फिर धरातल पर उनका कोई अस्तित्व ही नहीं होता। इसके बावजूद, वे आयकर अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत करोड़ों रुपये की कर छूट का लाभ उठाने में सफल रहते हैं।
निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र और विधिक विसंगतियां
भारतीय निर्वाचन आयोग के पास राजनीतिक दलों के पंजीकरण की शक्ति तो है, परंतु जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत एक बार किसी दल का पंजीकरण हो जाने के बाद आयोग के पास उसे सूची से हटाने (De-register) का कोई स्पष्ट और प्रभावी वैधानिक अधिकार नहीं है। आयोग राजनीतिक दलों के नाम, पते या पदाधिकारियों में बदलाव न होने पर कार्रवाई करने की कोशिश करता है, लेकिन कानूनी जटिलताओं के कारण यह प्रक्रिया बेहद धीमी और पेचीदा साबित होती है।
दूसरी मुख्य समस्या प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी है। निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों के रजिस्टर का रखरखाव करता है, जबकि वित्तीय लेन-देन और कर छूट का मामला आयकर विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है। दोनों संस्थाओं के बीच सूचनाओं और कार्रवाई के स्तर पर तालमेल के अभाव में एक एजेंसी द्वारा की गई कार्रवाई का स्वतः प्रभाव दूसरी एजेंसी पर नहीं पड़ता, जिसका लाभ उठाकर अनियमितताएं करने वाले दल कानून की पकड़ से बाहर बने रहते हैं।
प्रतीक आवंटन और चुनावी सहभागिता के मानदंड
चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के अंतर्गत RUPPs को सामान्य प्रतीक प्राप्त करने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी होती हैं। इसके तहत दलों को संबंधित राज्य विधानसभा चुनाव में कुल सीटों के कम से कम पांच प्रतिशत हिस्से पर अपने उम्मीदवार उतारने का आश्वासन या पूर्व प्रदर्शन दिखाना होता है। इसके अतिरिक्त, प्रतीक के निरंतर आवंटन के लिए पिछले चुनावों में एक निश्चित मत प्रतिशत प्राप्त करने की शर्त भी लागू होती है।
परंतु यह देखा गया है कि कई दल केवल सांकेतिक रूप से कुछ सीटों पर उम्मीदवार खड़े करके इन शर्तों को पूरा कर लेते हैं और चुनाव के बाद पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं। इससे चुनावी मैदान में अनावश्यक रूप से दलों की भीड़ बढ़ जाती है और वास्तविक रूप से सक्रिय दलों तथा मतदाताओं के लिए भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। टोकन उम्मीदवारी के इस चलन ने प्रतीक आवंटन और राजनीतिक मान्यता के मौजूदा मानदंडों की प्रभावशीलता को कमजोर कर दिया है।
कर छूट को चुनावी सफलता और मत प्रतिशत से जोड़ने की आवश्यकता
राजनीतिक वित्तपोषण में शुचिता लाने के लिए नीति निर्माताओं और निर्वाचन आयोग द्वारा यह सुधारात्मक सुझाव दिया गया है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाली कर छूट को उनके वास्तविक चुनावी प्रदर्शन से जोड़ा जाना चाहिए। वर्तमान में RUPPs को केवल कागजी पंजीकरण के आधार पर ही कर छूट मिल जाती है, भले ही वे किसी भी चुनाव में एक भी वोट हासिल करने में असफल क्यों न रहे हों।
इस दिशा में एक प्रभावी उपाय यह हो सकता है कि कर छूट की पात्रता के लिए एक निश्चित और तर्कसंगत वैध मत शेयर (Vote Share) या लोकसभा अथवा विधानसभा चुनावों में सीटों की जीत की शर्त को अनिवार्य बना दिया जाए। जिस प्रकार प्रतीक आवंटन के लिए 1% मत का प्रावधान आंशिक रूप से मौजूद है, उसी तर्ज पर कर लाभों को केवल उन्हीं दलों तक सीमित किया जाना चाहिए जो चुनाव में जनता का एक न्यूनतम समर्थन प्राप्त करने में सफल होते हैं। इससे केवल गंभीर और जन-सहभागिता वाले दल ही वित्तीय लाभ प्राप्त कर सकेंगे और गैर-गंभीर एवं मुखौटा दलों का प्रसार रुकेगा।
विधिक सुधार और जवाबदेही तय करने के उपाय
राजनीतिक वित्तपोषण के इस ढांचे को दुरुस्त करने के लिए जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में व्यापक संशोधन की आवश्यकता है। सबसे पहले, निर्वाचन आयोग को यह स्पष्ट विधिक अधिकार मिलना चाहिए कि यदि कोई राजनीतिक दल लगातार एक निश्चित अवधि तक किसी भी चुनाव में भाग नहीं लेता है या अपने वित्तीय रिटर्न दाखिल नहीं करता है, तो उसका पंजीकरण स्वतः समाप्त (Lapse) माना जाए।
दूसरा, चंदे के प्रकटीकरण की सीमा और बैंकिंग चैनलों के माध्यम से होने वाले लेन-देन के नियमों को अधिक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। अनाम स्रोतों से मिलने वाले चंदे पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए और प्रत्येक प्राप्ति का अंकेक्षित विवरण समय पर सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध होना अनिवार्य किया जाना चाहिए। आयकर विभाग और निर्वाचन आयोग को एक साझा डिजिटल मंच पर लाकर सख्त मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करना होगा ताकि नियमों का उल्लंघन करने वाले दलों की पहचान तुरंत हो सके और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक तथा दंडात्मक कार्रवाई की जा सके।

राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के खिलाफ थीं सोनिया गांधी
कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने एक वीडियो में खुलासा किया है कि वह अपने दिवंगत पति राजीव गांधी के भारत का प्रधानमंत्री बनने के पूरी तरह खिलाफ थीं। अपनी आने वाली संस्मरण पुस्तक 'Belonging: A Journey of Love' पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि दशकों तक दूसरे लोग उनकी कहानी सुनाते रहे हैं और अब उनकी अपनी बारी है।
अपनी आने वाली पुस्तक 'Belonging: A Journey of Love' पर की बात
सोनिया गांधी ने अपनी आगामी संस्मरण पुस्तक 'Belonging: A Journey of Love' के बारे में खुलकर बात की है। उन्होंने बताया कि इस पुस्तक में उनके जीवन के कई अनछुए पहलू और महत्वपूर्ण घटनाएं सामने आएंगी। अपने संस्मरण के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि इतने दशकों तक दूसरे लोग उनकी 'कहानी' दुनिया को सुनाते रहे हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि वे खुद अपनी बात रखें क्योंकि अब उनकी अपनी बारी है।
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के विरोध का किया जिक्र
वीडियो में सोनिया गांधी ने स्पष्ट किया है कि वे अपने दिवंगत पति राजीव गांधी के प्रधानमंत्री पद संभालने के पूरी तरह खिलाफ थीं। परिवार पर आने वाले राजनीतिक दबाव और सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं के चलते वे इस पद से दूर रहना चाहती थीं। उनके इस संस्मरण के आने से राजनीतिक इतिहास के कई पन्नों पर नए सिरे से रोशनी पड़ने की उम्मीद जताई जा रही है।

उर्फी जावेद का सनसनीखेज आरोप: घर में लगा रही हैं पाबंदियां
अभिनेत्री उर्फी जावेद ने मुंबई की अपनी हाउसिंग सोसाइटी पर उन्हें परेशान करने और घर में कंटेंट शूट करने पर रोक लगाने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने दावा किया है कि 4 से 5 लोग उनकी पॉपुलैरिटी से जलते हैं, और उनके मेहमानों के बैग की भी तलाशी ली जा रही है।
हाउसिंग सोसाइटी पर लगाया शूटिंग रोकने का आरोप
अभिनेत्री उर्फी जावेद ने मुंबई की एक हाउसिंग सोसाइटी पर उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सोसाइटी के अधिकारियों ने उनके घर के अंदर किसी भी तरह का कंटेंट शूट करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। इसके अलावा, उनके घर आने वाले मेहमानों के साथ भी अनुचित व्यवहार किया जा रहा है और उनके बैग की तलाशी तक ली जा रही है।
पॉपुलैरिटी से जलने का किया दावा
उर्फी ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि सोसाइटी के कुछ 4 से 5 आदमी उनकी बढ़ती लोकप्रियता और पॉपुलैरिटी से जलते हैं, इसी वजह से उन्हें इस तरह की पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने दो टूक शब्दों में यह भी कहा है कि वे अपने घर के अंदर क्या करती हैं, यह पूरी तरह से उनका अपना निजी मसला है और इसमें किसी अन्य को दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।

केरलम कांग्रेस चीफ सनी जोसेफ ने बिना शर्त मांगी माफी
केरलम कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सनी जोसेफ ने सीजेआई सूर्यकांत पर किए गए आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्ट के मामले में बिना शर्त माफी मांग ली है। सुप्रीम कोर्ट के वकील मीनेश दुबे के कानूनी नोटिस के जवाब में जोसेफ ने यह भी कहा कि जिम्मेदार व्यक्ति को पद से हटा दिया गया है और उससे सार्वजनिक माफी मंगवाई गई है।
कानूनी नोटिस के बाद सामने आया जवाब
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के वकील मीनेश दुबे की ओर से एक कानूनी नोटिस भेजा गया था। इस नोटिस के जवाब में केरलम कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सनी जोसेफ ने अपनी सफाई पेश करते हुए बिना शर्त माफी मांगी है। उनके इस कदम को विवाद को शांत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
जिम्मेदार व्यक्ति पर भी की गई कार्रवाई
कानूनी नोटिस का जवाब देते हुए सनी जोसेफ ने स्पष्ट किया है कि इस विवादित पोस्ट के लिए जो व्यक्ति सीधे तौर पर जिम्मेदार था, उसे उसके पद से हटा दिया गया है। इसके साथ ही, उस संबंधित व्यक्ति से सार्वजनिक रूप से माफी भी मंगवाई गई है, ताकि यह संदेश स्पष्ट हो सके कि अदालत और न्यायपालिका के सम्मान के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा।

अभिषेक शर्मा का अनोखा रिकॉर्ड: टी20I में जड़े सबसे ज्यादा अर्धशतक
भारतीय ओपनर अभिषेक शर्मा ने टी20I क्रिकेट में 20 या उससे कम गेंदों में 9 अर्धशतक जड़कर इतिहास रच दिया है, जो दुनिया भर के किसी भी बल्लेबाज द्वारा सर्वाधिक हैं। मंगलवार को न्यूजीलैंड के खिलाफ मुकाबले में उन्होंने 15 गेंदों पर अर्धशतक और 35 गेंदों पर शतक पूरा किया।
टी20I क्रिकेट में बनाए सबसे ज्यादा तेज अर्धशतक
अभिषेक शर्मा ने टी20I फॉर्मेट में एक ऐसा अनोखा रिकॉर्ड अपने नाम किया है जिसे तोड़ना किसी भी खिलाड़ी के लिए बेहद कठिन होगा। उन्होंने अपने करियर में अब तक 20 या उससे कम गेंदों में कुल 9 अर्धशतक जड़ने का कारनामा किया है। क्रिकेट इतिहास में यह किसी भी बल्लेबाज द्वारा बनाए गए सबसे ज्यादा तेज अर्धशतक हैं। खास बात यह है कि दुनिया के किसी अन्य क्रिकेटर ने अपने टी20 करियर में ऐसे 5 अर्धशतक भी नहीं लगाए हैं, जो अभिषेक की काबिलियत को पूरी तरह स्पष्ट करता है।
न्यूजीलैंड के खिलाफ खेली तूफानी पारी
इस रिकॉर्ड में और इजाफा करते हुए मंगलवार को न्यूजीलैंड के खिलाफ खेले गए टी20I मुकाबले में अभिषेक ने एक बार फिर अपनी धाक दिखाई। उन्होंने मैदान पर उतरते ही चौकों और छक्कों की बरसात कर दी और मात्र 15 गेंदों में ही अपना अर्धशतक पूरा कर लिया। इसके बाद उन्होंने अपनी इस शानदार पारी को आगे बढ़ाते हुए मात्र 35 गेंदों में ही इसे शानदार शतक में तब्दील कर दिया। उनकी इस आक्रामक पारी के बदौलत भारतीय टीम ने श्रृंखला में अपनी मजबूत स्थिति और दबदबा कायम रखा है।

अभिजीत दीपके को एनडीए में शामिल होने का मिला खुला न्योता
केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीजीपी फाउंडर अभिजीत दीपके को आरपीआई (ए) और एनडीए में शामिल होने का आमंत्रण दिया है। आठवले का कहना है कि बाबासाहेब की राजनीतिक पार्टी को मजबूत करने के लिए युवाओं की जरूरत है, हालांकि दीपके ने फिलहाल इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है।
रामदास आठवले ने दिया आरपीआई में शामिल होने का आमंत्रण
केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान खुलकर अभिजीत दीपके को अपनी पार्टी RPI(A) में शामिल होने का न्योता दिया। आठवले ने अपने बयान में कहा कि उन्होंने दीपके से बातचीत के दौरान यह बात रखी थी कि बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की राजनीतिक पार्टी को और अधिक मजबूत बनाने के लिए देश के ऊर्जावान युवाओं की बेहद आवश्यकता है। उनका मानना है कि यदि दीपके जैसे युवा नेता उनके साथ जुड़ते हैं, तो इससे पार्टी को एक नई ताकत और दिशा मिलेगी।
अभिजीत दीपके ने फिलहाल ठुकराया प्रस्ताव
हालांकि केंद्रीय मंत्री की ओर से यह खुला और बड़ा आमंत्रण दिया गया है, लेकिन शुरुआती खबरों के मुताबिक अभिजीत दीपके ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस पेशकश के बाद आने वाले दिनों में राज्य और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में नए समीकरण देखने को मिल सकते हैं, क्योंकि युवाओं को अपने पाले में लाने के लिए तमाम दल लगातार प्रयास कर रहे हैं।
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