
राजनीतिक वित्तपोषण और पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल: चुनौतियाँ और सुधार
भारत में पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल (RUPPs) चुनावी लोकतंत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए थे, परंतु विधिक कमियों और कमजोर अनुपालन के कारण ये अपारदर्शी चंदे और कर छूट प्राप्त करने का जरिया बन चुके हैं। निर्वाचन आयोग को अधिक अधिकार देने और चंदे की कर छूट को एक तर्कसंगत वोट शेयर से जोड़ने की आवश्यकता है।
सारांश
भारत में पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल (RUPPs) चुनावी लोकतंत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए थे, परंतु विधिक कमियों और कमजोर अनुपालन के कारण ये अपारदर्शी चंदे और कर छूट प्राप्त करने का जरिया बन चुके हैं। निर्वाचन आयोग को अधिक अधिकार देने और चंदे की कर छूट को एक तर्कसंगत वोट शेयर से जोड़ने की आवश्यकता है।
भारतीय दलीय प्रणाली में राजनीतिक दलों का वर्गीकरण और RUPP की स्थिति
भारतीय चुनावी लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को मुख्य रूप से मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दलों, मान्यता प्राप्त राज्य दलों और पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (RUPPs) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत पंजीकृत होने वाले वे दल RUPP की श्रेणी में आते हैं, जो राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त करने के लिए आवश्यक मतों या सीटों के न्यूनतम मानदंडों को पूरा नहीं कर पाते। इन दलों की संख्या में पिछले कुछ दशकों में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है।
आरंभ में इस श्रेणी का उद्देश्य छोटे और नए राजनीतिक समूहों को चुनावी प्रक्रियाओं में भाग लेने और अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए एक मंच प्रदान करना था। हालांकि, समय के साथ यह व्यवस्था विधिक सरलता और कमजोर अनुपालन तंत्र के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। वर्तमान में बड़ी संख्या में ऐसे दल पंजीकृत हैं जो सक्रिय राजनीति या चुनावों से दूर रहकर केवल वित्तीय लाभ और विधिक संरक्षण प्राप्त करने का माध्यम बन चुके हैं।
RUPPs को मिलने वाले प्रशासनिक और वित्तीय विशेषाधिकार
पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद RUPPs को भारतीय निर्वाचन आयोग और आयकर कानूनों के अंतर्गत कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और वित्तीय विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। इन दलों को लोकसभा या राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान अपने उम्मीदवारों के लिए एक 'सामान्य प्रतीक' (Common Symbol) आवंटित कराने की सुविधा मिलती है, जिससे उनके लिए मतदाताओं के बीच पहचान बनाना आसान होता है। इसके अलावा, ये दल चुनाव प्रचार के लिए अपने स्टार प्रचारकों की सूची में अधिकतम 20 सदस्यों को शामिल कर सकते हैं।
वित्तीय मोर्चे पर, इन दलों को मिलने वाले चंदे पर आयकर कानूनों के तहत कर छूट का प्रावधान है। राजनीतिक दलों को मिलने वाला यह वित्तीय संरक्षण उन्हें अपने संसाधनों को बढ़ाने में सहायता करता है। यद्यपि कानून के अनुसार उन्हें 20,000 रुपये से अधिक के चंदे का हिसाब और दानदाताओं का विवरण निर्वाचन आयोग को देना होता है तथा 2,000 रुपये से अधिक का नकद चंदा स्वीकार करने पर प्रतिबंध है, परंतु अधिकांश स्तरों पर इसका कड़ाई से पालन नहीं होता है।
अपारदर्शी वित्तपोषण और कर छूट का दुरुपयोग
RUPPs के संदर्भ में सबसे गंभीर चिंता का विषय काले धन को सफेद करने और कर छूट प्राप्त करने के लिए इनका एक साधन के रूप में उपयोग किया जाना है। चूंकि भारत में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर कर में व्यापक छूट मिलती है, इसलिए कई संस्थाएं और व्यक्ति अपने अघोषित धन को राजनीतिक चंदे के रूप में इन दलों को हस्तांतरित कर देते हैं। इसके बदले में बड़ी मात्रा में धन अवैध माध्यमों से वापस प्राप्त कर लिया जाता है, जिससे यह व्यवस्था कर चोरी का एक समानांतर तंत्र बन जाती है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और अन्य विधिक निगरानी संस्थाओं की रिपोर्टों से यह बार-बार उजागर हुआ है कि एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे दलों का होता है जो या तो अपने वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट और अंशदान विवरण (Contribution Reports) समय पर दाखिल नहीं करते या फिर धरातल पर उनका कोई अस्तित्व ही नहीं होता। इसके बावजूद, वे आयकर अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत करोड़ों रुपये की कर छूट का लाभ उठाने में सफल रहते हैं।
निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र और विधिक विसंगतियां
भारतीय निर्वाचन आयोग के पास राजनीतिक दलों के पंजीकरण की शक्ति तो है, परंतु जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत एक बार किसी दल का पंजीकरण हो जाने के बाद आयोग के पास उसे सूची से हटाने (De-register) का कोई स्पष्ट और प्रभावी वैधानिक अधिकार नहीं है। आयोग राजनीतिक दलों के नाम, पते या पदाधिकारियों में बदलाव न होने पर कार्रवाई करने की कोशिश करता है, लेकिन कानूनी जटिलताओं के कारण यह प्रक्रिया बेहद धीमी और पेचीदा साबित होती है।
दूसरी मुख्य समस्या प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी है। निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों के रजिस्टर का रखरखाव करता है, जबकि वित्तीय लेन-देन और कर छूट का मामला आयकर विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है। दोनों संस्थाओं के बीच सूचनाओं और कार्रवाई के स्तर पर तालमेल के अभाव में एक एजेंसी द्वारा की गई कार्रवाई का स्वतः प्रभाव दूसरी एजेंसी पर नहीं पड़ता, जिसका लाभ उठाकर अनियमितताएं करने वाले दल कानून की पकड़ से बाहर बने रहते हैं।
प्रतीक आवंटन और चुनावी सहभागिता के मानदंड
चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के अंतर्गत RUPPs को सामान्य प्रतीक प्राप्त करने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी होती हैं। इसके तहत दलों को संबंधित राज्य विधानसभा चुनाव में कुल सीटों के कम से कम पांच प्रतिशत हिस्से पर अपने उम्मीदवार उतारने का आश्वासन या पूर्व प्रदर्शन दिखाना होता है। इसके अतिरिक्त, प्रतीक के निरंतर आवंटन के लिए पिछले चुनावों में एक निश्चित मत प्रतिशत प्राप्त करने की शर्त भी लागू होती है।
परंतु यह देखा गया है कि कई दल केवल सांकेतिक रूप से कुछ सीटों पर उम्मीदवार खड़े करके इन शर्तों को पूरा कर लेते हैं और चुनाव के बाद पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं। इससे चुनावी मैदान में अनावश्यक रूप से दलों की भीड़ बढ़ जाती है और वास्तविक रूप से सक्रिय दलों तथा मतदाताओं के लिए भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। टोकन उम्मीदवारी के इस चलन ने प्रतीक आवंटन और राजनीतिक मान्यता के मौजूदा मानदंडों की प्रभावशीलता को कमजोर कर दिया है।
कर छूट को चुनावी सफलता और मत प्रतिशत से जोड़ने की आवश्यकता
राजनीतिक वित्तपोषण में शुचिता लाने के लिए नीति निर्माताओं और निर्वाचन आयोग द्वारा यह सुधारात्मक सुझाव दिया गया है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाली कर छूट को उनके वास्तविक चुनावी प्रदर्शन से जोड़ा जाना चाहिए। वर्तमान में RUPPs को केवल कागजी पंजीकरण के आधार पर ही कर छूट मिल जाती है, भले ही वे किसी भी चुनाव में एक भी वोट हासिल करने में असफल क्यों न रहे हों।
इस दिशा में एक प्रभावी उपाय यह हो सकता है कि कर छूट की पात्रता के लिए एक निश्चित और तर्कसंगत वैध मत शेयर (Vote Share) या लोकसभा अथवा विधानसभा चुनावों में सीटों की जीत की शर्त को अनिवार्य बना दिया जाए। जिस प्रकार प्रतीक आवंटन के लिए 1% मत का प्रावधान आंशिक रूप से मौजूद है, उसी तर्ज पर कर लाभों को केवल उन्हीं दलों तक सीमित किया जाना चाहिए जो चुनाव में जनता का एक न्यूनतम समर्थन प्राप्त करने में सफल होते हैं। इससे केवल गंभीर और जन-सहभागिता वाले दल ही वित्तीय लाभ प्राप्त कर सकेंगे और गैर-गंभीर एवं मुखौटा दलों का प्रसार रुकेगा।
विधिक सुधार और जवाबदेही तय करने के उपाय
राजनीतिक वित्तपोषण के इस ढांचे को दुरुस्त करने के लिए जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में व्यापक संशोधन की आवश्यकता है। सबसे पहले, निर्वाचन आयोग को यह स्पष्ट विधिक अधिकार मिलना चाहिए कि यदि कोई राजनीतिक दल लगातार एक निश्चित अवधि तक किसी भी चुनाव में भाग नहीं लेता है या अपने वित्तीय रिटर्न दाखिल नहीं करता है, तो उसका पंजीकरण स्वतः समाप्त (Lapse) माना जाए।
दूसरा, चंदे के प्रकटीकरण की सीमा और बैंकिंग चैनलों के माध्यम से होने वाले लेन-देन के नियमों को अधिक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। अनाम स्रोतों से मिलने वाले चंदे पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए और प्रत्येक प्राप्ति का अंकेक्षित विवरण समय पर सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध होना अनिवार्य किया जाना चाहिए। आयकर विभाग और निर्वाचन आयोग को एक साझा डिजिटल मंच पर लाकर सख्त मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करना होगा ताकि नियमों का उल्लंघन करने वाले दलों की पहचान तुरंत हो सके और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक तथा दंडात्मक कार्रवाई की जा सके।

उत्तराखंड: पूर्व सीएम के पीए पर ईडी का शिकंजा, कैश और घड़ियां बरामद
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के पूर्व पीए चंदन सिंह जीना के आवास पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बड़ी कार्रवाई की है। इस छापेमारी में 32 लाख रुपये नकद, भारी मात्रा में सोना और लग्जरी घड़ियां बरामद हुई हैं।
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के पूर्व पीए चंदन सिंह जीना के आवास पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बड़ी कार्रवाई की है। इस छापेमारी में 32 लाख रुपये नकद, भारी मात्रा में सोना और लग्जरी घड़ियां बरामद हुई हैं।
ईडी की बड़ी कार्रवाई और बरामदगी
प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी जांच का दायरा बढ़ाते हुए ताबड़तोड़ छापे मारे हैं। यह कार्रवाई राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के पूर्व निजी सचिव चंदन सिंह जीना के ठिकानों पर की गई है। जांच एजेंसी को छापेमारी के दौरान मौके से करीब 32 लाख रुपये नकद बरामद हुए हैं। इसके अलावा अकूत संपत्ति का खुलासा करते हुए भारी मात्रा में सोने के सिक्के और आभूषण भी हाथ लगे हैं।
सोने के सिक्के और लग्जरी घड़ियों का जखीरा
छापेमारी के दौरान ईडी की टीम को चंदन सिंह जीना के घर से सिर्फ नकदी ही नहीं, बल्कि बेशकीमती सामान भी मिला है। अधिकारियों ने मौके से 13 गोल्ड कॉइन यानी सोने के सिक्के और 7 सोने की चेन अपने कब्जे में ली हैं। शौक और रसूख का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां से रोलेक्स और राडो जैसे बड़े ब्रांड्स की कुल 12 लग्जरी घड़ियां भी बरामद हुई हैं। इन सभी की कीमत बाजार में काफी अधिक आंकी जा रही है।
परीक्षा घोटाले से जुड़ा है पूरा मामला
यह पूरी कार्रवाई उत्तराखंड ग्राम पंचायत विकास अधिकारी परीक्षा-2016 में हुई कथित गड़बड़ियों और धांधलियों के मामले से जुड़ी हुई है। इसी मामले की गहराई से जांच करने के लिए ईडी ने यह कदम उठाया है। शुरुआती जांच और दस्तावेजों की पड़ताल में यह भी सामने आया है कि जीना के परिवारवालों के बैंक खातों में 52.16 लाख रुपये की संदिग्ध रकम मिली है। जांच एजेंसियां अब इन खातों और संपत्तियों के स्रोतों की कड़ियां जोड़ने में जुटी हुई हैं।

पुतिन ने की महिंद्रा की तारीफ, ब्रिक्स मंच पर बजा भारत का डंका
ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारतीय कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा की जमकर सराहना की है। पुतिन ने आईटी-आई सेक्टर में महिंद्रा के शानदार योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि ब्रिक्स देशों की कंपनियां अब पश्चिमी कंपनियों को कड़ी टक्कर दे रही हैं।
ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारतीय कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा की जमकर सराहना की है। पुतिन ने आईटी-आई सेक्टर में महिंद्रा के शानदार योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि ब्रिक्स देशों की कंपनियां अब पश्चिमी कंपनियों को कड़ी टक्कर दे रही हैं।
ब्रिक्स मंच पर महिंद्रा की बड़ी सफलता
ब्रिक्स सम्मेलन के वैश्विक मंच पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन द्वारा भारतीय कॉरपोरेट जगत की दिग्गज कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा की प्रशंसा करना एक ऐतिहासिक पल है। पुतिन ने विशेष रूप से आईटी-आई सेक्टर में महिंद्रा के उत्कृष्ट कार्यों और योगदान की सराहना की। इस मंच से उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि अब उभरती हुई भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजार में अपनी धाक जमाने लगी हैं।
पश्चिमी कंपनियों को कड़ी टक्कर देते भारतीय ब्रांड
रूसी राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि ब्रिक्स देशों की कंपनियां अब तकनीकी और व्यावसायिक क्षमताओं के मामले में पश्चिमी कंपनियों से किसी भी तरह पीछे नहीं हैं। महिंद्रा एंड महिंद्रा का उदाहरण देते हुए उन्होंने यह साबित किया कि कैसे ये कंपनियां ग्लोबल मार्केट में उतनी ही सक्षम और मजबूत हो चुकी हैं जितनी पारंपरिक पश्चिमी दिग्गज कंपनियां हैं।
वैश्विक मंच पर भारत का बढ़ता हुआ दबदबा
महिंद्रा ने खुद को ब्रिक्स देशों के भीतर एक अत्यंत तेजी से बढ़ने वाली और प्रभावशाली कंपनी के रूप में सफलतापूर्वक स्थापित किया है। पुतिन की ओर से मिली इस सराहना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय व्यापारिक क्षमता का लोहा मनवा दिया है। यह बयान न केवल महिंद्रा समूह के लिए बल्कि पूरे भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है जो दुनिया भर में भारत के मजबूत होते आर्थिक भविष्य की ओर इशारा करती है।

पीएम मोदी संग फोटो के लिए मची होड़, ब्रिक्स में दिखा क्रेज
दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स बिजनेस फोरम 2026 के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए महिला प्रतिनिधियों में जबरदस्त होड़ मच गई। एक महिला डेलीगेट के अनुरोध पर शुरू हुआ यह सिलसिला देखते ही देखते भीड़ में बदल गया, जहां सभी खुद को बेहद लकी मान रहे थे।
दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स बिजनेस फोरम 2026 के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए महिला प्रतिनिधियों में जबरदस्त होड़ मच गई। एक महिला डेलीगेट के अनुरोध पर शुरू हुआ यह सिलसिला देखते ही देखते भीड़ में बदल गया, जहां सभी खुद को बेहद लकी मान रहे थे।
ब्रिक्स फोरम में पीएम मोदी की लोकप्रियता
राजधानी दिल्ली में शुक्रवार को आयोजित ब्रिक्स बिजनेस फोरम का माहौल उस वक्त पूरी तरह बदल गया जब मुख्य संबोधन के बाद एक अनूठा नज़रा देखने को मिला। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है, लेकिन इस बार इसका सीधा असर बिजनेस फोरम के भीतर मौजूद महिला डेलीगेट्स के उत्साह में साफ तौर पर देखा गया। उनके संबोधन के तुरंत बाद वहां मौजूद एक महिला प्रतिनिधि ने खुद आगे बढ़कर उनके साथ तस्वीर खिंचवाने की इच्छा जताई।
फोटो खिंचवाने की मची होड़
जैसे ही प्रधानमंत्री मोदी ने मुस्कुराते हुए उस महिला डेलीगेट के साथ फोटो खिंचवाई, वैसे ही वहां मौजूद अन्य महिला प्रतिनिधियों में भी उनके साथ तस्वीर लेने की होड़ सी मच गई। एक के बाद एक कई डेलिगेट्स प्रधानमंत्री के पास पहुंच गईं और हर कोई इस पल को अपने कैमरे में कैद करने के लिए उत्सुक दिखाई दिया। इस दौरान पूरा माहौल बेहद उत्साहपूर्ण और खुशनुमा हो गया, जहां वैश्विक स्तर के नेता के प्रति निवेशकों और प्रतिनिधियों का सहज लगाव स्पष्ट झलक रहा था।
हम बहुत लकी हैं - डेलीगेट्स
प्रधानमंत्री के साथ तस्वीर मिलने के बाद महिला प्रतिनिधियों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इस खास पल का आनंद लेते हुए एक डेलीगेट ने बेहद उत्साहित होकर कहा कि वे सब खुद को बहुत लकी मानती हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ यह यादगार लम्हा साझा करने का अवसर मिला। यह वाकया एक बार फिर साबित कर गया कि कूटनीतिक और व्यावसायिक बैठकों से इतर वैश्विक मंचों पर पीएम मोदी का व्यक्तिगत करिश्मा लोगों के दिलों पर किस कदर असर छोड़ता है।

फोल्डेबल आईफोन से पहले ही कैसे जीत गई सैमसंग?
एप्पल के पहले फोल्डेबल आईफोन के बाजार में आने से पहले ही सैमसंग ने एक बड़ी व्यावसायिक बाजी मार ली है। आईफोन के हर फोल्डेबल डिस्प्ले पैनल के लिए एप्पल को सैमसंग को भारी रकम चुकानी होगी, जिससे दक्षिण कोरियाई दिग्गज को तगड़ा मुनाफा होना तय है।
एप्पल के पहले फोल्डेबल आईफोन के बाजार में आने से पहले ही सैमसंग ने एक बड़ी व्यावसायिक बाजी मार ली है। आईफोन के हर फोल्डेबल डिस्प्ले पैनल के लिए एप्पल को सैमसंग को भारी रकम चुकानी होगी, जिससे दक्षिण कोरियाई दिग्गज को तगड़ा मुनाफा होना तय है।
फोल्डेबल बाजार में सैमसंग की बड़ी बढ़त
स्मार्टफोन बाजार की बादशाहत की जंग में हर कोई आगे रहना चाहता है, लेकिन तकनीकी साझेदारी कई बार खेल को पूरी तरह बदल देती है। एप्पल अपने पहले फोल्डेबल आईफोन को उतारने की तैयारी में जुटा है, लेकिन इस डिवाइस के सबसे अहम और महंगे हिस्से के लिए उसे अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी सैमसंग पर पूरी तरह निर्भर रहना पड़ेगा। यह स्थिति दिखाती है कि कैसे हार्डवेयर निर्माण के मामले में सैमसंग अभी भी बाजार में सबसे मजबूत स्थिति पर काबिज है।
तीन साल का एक्सक्लूसिव सप्लाई समझौता
न्यूज़ 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, एप्पल अपने आगामी 'आईफोन डुओ' में इस्तेमाल होने वाले प्रत्येक फोल्डेबल डिस्प्ले पैनल के एवज में सैमसंग को करीब 250 डॉलर यानी लगभग 24,000 रुपये का भुगतान करेगा। यह डिस्प्ले पैनल इस प्रीमियम फोन के सबसे महंगे घटकों में से एक है। इस बड़े व्यावसायिक सौदे को सुनिश्चित करने के लिए दोनों कंपनियों के बीच तीन साल का एक एक्सक्लूसिव सप्लाई समझौता हुआ है।
एप्पल की मजबूरी और सैमसंग का मुनाफा
नवाचार और डिजाइन के मामले में एप्पल भले ही अपनी अलग पहचान रखता हो, लेकिन फोल्डेबल स्क्रीन जैसी अत्याधुनिक डिस्प्ले तकनीक के उत्पादन में सैमसंग की महारत का मुकाबला करना फिलहाल आसान नहीं है। यही वजह है कि आईफोन की हर यूनिट बिकने पर भी उसका एक बड़ा हिस्सा मुनाफे के रूप में सैमसंग की झोली में जाएगा। एप्पल की इस मजबूरी ने सैमसंग को बिना फोन बेचे ही पहले से ही इस तकनीकी मुकाबले का विजेता बना दिया है।

संत तिरुवल्लुवर और तिरुकुरल: यूपीएससी परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को संत तिरुवल्लुवर की प्राचीन तमिल कृति 'तिरुकुरल' का रूसी अनुवाद भेंट किया गया है। यह कृति सदाचार, शासन, और नैतिकता पर आधारित है, जो भारतीय सांस्कृतिक कूटनीति और दक्षिण भारतीय साहित्य के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करती है।
सारांश (Summary): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को संत तिरुवल्लुवर की प्राचीन तमिल कृति 'तिरुकुरल' का रूसी अनुवाद भेंट किया गया है। यह कृति सदाचार, शासन, और नैतिकता पर आधारित है, जो भारतीय सांस्कृतिक कूटनीति और दक्षिण भारतीय साहित्य के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करती है।
संत तिरुवल्लुवर का परिचय
संत तिरुवल्लुवर तमिल संस्कृति के महान कवि और दार्शनिक माने जाते हैं। उनका जीवनकाल और सटीक जन्मतिथि को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है, परंतु तमिल साहित्य और समाज पर उनका प्रभाव अत्यंत गहरा और अकाट्य रहा है। उन्हें दक्षिण भारत के सबसे सम्मानित मनीषियों में गिना जाता है।
तिरुकुरल की विषयवस्तु और महत्व
उनकी प्रसिद्ध रचना 'तिरुकुरल' में कुल 1330 दोहे संकलित हैं। यह ग्रंथ मुख्य रूप से सदाचार, सुशासन, धन, सामाजिक ज़िम्मेदारी और प्रेम जैसे सार्वभौमिक विषयों पर आधारित है। इस साहित्यिक कृति को 'तमिल वेद' या 'पांचवां वेद' भी कहा जाता है, जो मानव जीवन के हर पहलू का मार्गदर्शन करती है।
सांस्कृतिक कूटनीति और वैश्विक प्रसार
ब्रिक्स समिट से पहले भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा इस ग्रंथ का रूसी अनुवाद रूस के राष्ट्रपति को भेंट किया जाना सांस्कृतिक कूटनीति का एक अनूठा उदाहरण है। इसके माध्यम से प्राचीन भारतीय दर्शन, तमिल साहित्य और वैश्विक मंच पर भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूती मिलती है।
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