
मनन मिश्रा विवाद: बार काउंसिल अध्यक्ष और सांसद के इस्तीफे की मांग तेज
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद मनन मिश्रा के एक हालिया आदेश ने कानूनी और प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। राजनीतिक विश्लेषक और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट अभिजीत दीपके द्वारा उनके इस्तीफे की मांग के बाद यह मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है।
खबर का निचोड़
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद मनन मिश्रा के एक हालिया आदेश ने कानूनी और प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। राजनीतिक विश्लेषक और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट अभिजीत दीपके द्वारा उनके इस्तीफे की मांग के बाद यह मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है।
विवाद का केंद्र बने मनन मिश्रा
कानूनी बिरादरी और सार्वजनिक मंचों पर इस समय देश की शीर्ष कानूनी संस्था, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनन मिश्रा के नाम की ही चर्चा है। उनके द्वारा जारी किए गए एक हालिया आदेश ने अचानक ऐसा बवंडर खड़ा कर दिया है कि चारों तरफ से विरोध के स्वर उठने लगे हैं। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक हलकों तक, इस फैसले की आलोचना हो रही है। इस विवाद में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब प्रमुख विश्लेषक अभिजीत दीपके ने सीधे तौर पर मनन मिश्रा से अपने पद से इस्तीफा देने की मांग कर दी। इस कदम ने मामले को और अधिक गरमा दिया है।
छात्र राजनीति से संसद भवन तक का सफर
बिहार के गोपालगंज जिले से ताल्लुक रखने वाले मनन मिश्रा भारतीय विधि व्यवस्था में एक जाना-पहचाना नाम हैं। उनकी प्रारंभिक कानूनी शिक्षा पटना लॉ कॉलेज से हुई, जहां से उन्होंने एलएलबी (LLB) की डिग्री हासिल की। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने पटना हाईकोर्ट में अपनी वकालत की शुरुआत की और अपनी तीक्ष्ण कानूनी समझ के दम पर देश की सर्वोच्च अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट के रूप में स्थापित हुए। कानूनी करियर के साथ-साथ उनका झुकाव राजनीति की तरफ भी रहा। साल 2010 में उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में बिहार की बैकुंठपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था। वर्तमान में वह भारतीय जनता पार्टी (BJP) से राज्यसभा सांसद हैं।
अभिजीत दीपके की तीखी प्रतिक्रिया
आदेश के सार्वजनिक होते ही अभिजीत दीपके ने खुलकर अपनी बात रखी और मनन मिश्रा के निर्णय पर सवाल उठाए। दीपके ने तर्क दिया कि कानून और न्याय की गरिमा बनाए रखने वाली संस्था के प्रमुख का यह आदेश निष्पक्षता और न्यायिक सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से मांग की कि मनन मिश्रा को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष पद से तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए। इस मांग के सामने आने के बाद कानूनी और राजनीतिक क्षेत्रों में बहस और तेज हो गई है।
आगे क्या होगा?
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के इतिहास में मनन मिश्रा लगातार कई बार अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। लेकिन इस मौजूदा विवाद ने उनकी प्रशासनिक कार्यप्रणाली और राजनीतिक निष्पक्षता पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। एक तरफ जहां उनके समर्थक इसे एक प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी और कानूनी बिरादरी के कुछ वर्ग इस फैसले को लेकर लगातार दबाव बना रहे हैं। फिलहाल यह मामला शांत होता नहीं दिख रहा है।

सुधर जाओ वरना...' स्वतंत्रता दिवस पर बाबा रामदेव का सरकार को कड़ा अल्टीमेटम
सरकारी नौकरियों में कथित धांधली और भ्रष्टाचार के खिलाफ योगगुरु रामदेव ने मोर्चा खोल दिया है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर तंत्र में सुधार नहीं हुआ, तो उन्हें एक बार फिर देशव्यापी आंदोलन के रास्ते पर उतरना पड़ेगा।
सरकारी नौकरियों में कथित धांधली और भ्रष्टाचार के खिलाफ योगगुरु रामदेव ने मोर्चा खोल दिया है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर तंत्र में सुधार नहीं हुआ, तो उन्हें एक बार फिर देशव्यापी आंदोलन के रास्ते पर उतरना पड़ेगा।
रामदेव का अल्टीमेटम: नौकरियों में धांधली पर फूटा गुस्सा
देश के 78वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जहां पूरा राष्ट्र जश्न में डूबा था, वहीं योगगुरु रामदेव के एक बयान ने राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल मचा दी है। रामदेव ने सरकारी नौकरियों में हो रही कथित गड़बड़ियों और रिश्वतखोरी के दीमक पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ और व्यवस्था में फैला भ्रष्टाचार बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है। अगर समय रहते प्रशासनिक कमियों को दुरुस्त नहीं किया गया, तो देश में असंतोष की ज्वाला भड़क सकती है।
'रामदेव को फिर न उतरना पड़े मैदान में': आंदोलन की चेतावनी
वर्ष 2011 के काले धन विरोधी आंदोलन की याद ताजा करते हुए बाबा रामदेव ने कहा, "देश में चारों तरफ हंगामा मचा है। ऐसे में अगर बार-बार आंदोलन करने पड़े तो देश की प्रगति की रफ्तार कैसे बनी रहेगी? इसीलिए सुधर जाओ, नहीं तो देश में और बड़े आंदोलन देखने को मिल सकते हैं।"
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि व्यवस्था को ऐसी नौबत नहीं आने देनी चाहिए कि रामदेव को दोबारा सड़क पर उतरकर आंदोलन की कमान संभालनी पड़े। उनका इशारा साफ था कि देश का युवा आज हताश है और पारदर्शी व्यवस्था की मांग कर रहा है।
प्रशासनिक पारदर्शिता और युवाओं का भविष्य
रामदेव ने जोर देकर कहा कि स्वतंत्रता का असली मतलब तब तक अधूरा है, जब तक आम नागरिक को बिना रिश्वत और सिफारिश के उसका हक न मिले। भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, फर्जीवाड़े और रिश्वतखोरी जैसी घटनाओं ने योग्य अभ्यर्थियों के मनोबल को तोड़ा है।
उन्होंने सरकार से मांग की कि पूरी भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाए और दोषियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि युवाओं का व्यवस्था पर भरोसा कायम रह सके।
सियासी गलियारों में गर्माहट
स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर योगगुरु का यह सख्त रुख कई मायनों में अहम माना जा रहा है। रामदेव के इस अल्टीमेटम के बाद प्रशासनिक महकमे और सियासी हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। अब देखना यह होगा कि सरकार इस चेतावनी को किस तरह लेती है और पारदर्शी व्यवस्था बनाने के लिए क्या कदम उठाती है।

वंदे मातरम विवाद: बीजेपी का राहुल-सोनिया पर बड़ा आरोप, कांग्रेस की सफाई
स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में ध्वजारोहण के दौरान 'वंदे मातरम' राष्ट्रगीत को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने आरोप लगाया है कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने पूरा वंदे मातरम गाने से रोका। वहीं, कांग्रेस ने इस आरोप को खारिज करते हुए इसे गलतफहमी करार दिया है।
स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में ध्वजारोहण के दौरान 'वंदे मातरम' राष्ट्रगीत को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने आरोप लगाया है कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने पूरा वंदे मातरम गाने से रोका। वहीं, कांग्रेस ने इस आरोप को खारिज करते हुए इसे गलतफहमी करार दिया है।
स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में राष्ट्रगीत पर सियासी घमासान
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम के बाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस आमने-सामने आ गए हैं। बीजेपी प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा करते हुए दावा किया कि ध्वजारोहण के समय जब वंदे मातरम गाया जा रहा था, तब राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने उसे पूरा गाने से रोकने का इशारा किया। बीजेपी का कहना है कि यह राष्ट्रगीत का अनादर है और कांग्रेस नेतृत्व की मानसिकता को उजागर करता है।
बीजेपी का तीखा हमला
बीजेपी ने इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पर चौतरफा हमला बोला है। बीजेपी नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस हमेशा से राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रगीत के प्रति उदासीन रही है। पार्टी के अनुसार, वीडियो में स्पष्ट दिख रहा है कि वंदे मातरम के दौरान बीच में ही रोकने का प्रयास किया गया, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और देश भावना के खिलाफ है।
कांग्रेस की ओर से आई सफाई
इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने बीजेपी के दावों को पूरी तरह से मनगढ़ंत और भ्रामक बताया। जयराम रमेश के अनुसार, वीडियो में दिख रहा सोनिया गांधी का इशारा राष्ट्रगीत को रोकने के लिए नहीं था, बल्कि वे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बैठने के लिए सही स्थान या कुर्सी का प्रबंध करने का आग्रह कर रही थीं।
वीडियो क्लिप पर बढ़ा विवाद
घटना से जुड़ा वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। बीजेपी समर्थक इसे कांग्रेस की संकीर्ण सोच का सबूत बताकर प्रसारित कर रहे हैं, जबकि कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी मामले को राजनीतिक रूप देने के लिए एक सामान्य से दृश्य को तोड़-मरोड़कर पेश कर रही है। दोनों ही पार्टियां इस मुद्दे पर अपने-अपने तर्कों के साथ डटी हुई हैं।

लाल किले के जश्न से फिर दूर रहे राहुल गांधी
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और विपक्ष के नेता राहुल गांधी लगातार दूसरे साल लाल किले पर आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल नहीं हुए। साल 2024 में राहुल गांधी को पांचवीं पंक्ति में बैठाए जाने पर भारी विवाद हुआ था, जिसके बाद से दोनों शीर्ष नेताओं की गैरमौजूदगी ने सियासी हलचल तेज कर दी है।
खबर का निचोड़
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और विपक्ष के नेता राहुल गांधी लगातार दूसरे साल लाल किले पर आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल नहीं हुए। साल 2024 में राहुल गांधी को पांचवीं पंक्ति में बैठाए जाने पर भारी विवाद हुआ था, जिसके बाद से दोनों शीर्ष नेताओं की गैरमौजूदगी ने सियासी हलचल तेज कर दी है।
लाल किले पर विपक्ष की गैरमौजूदगी और सियासी गरमाहट
देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से जब तिरंगा फहराया जा रहा था, तब दर्शक दीर्घा में विपक्ष की दो सबसे प्रमुख आवाजों की अनुपस्थिति ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार दूसरे साल इस राष्ट्रीय उत्सव से दूर रहे। स्वतंत्रता दिवस जैसे ऐतिहासिक और औपचारिक मौके पर देश के प्रमुख विपक्षी नेताओं का शामिल न होना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है।
2024 का 'सीटिंग प्रोटोकॉल' विवाद
इस पूरी दूरी की जड़ें साल 2024 के स्वतंत्रता दिवस समारोह से जुड़ी मानी जा रही हैं। 2024 में जब राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभालने के बाद पहली बार लाल किले पहुंचे थे, तब उन्हें मुख्य मंच के सामने पांचवीं पंक्ति में सीट आवंटित की गई थी। आमतौर पर नेता प्रतिपक्ष को कैबिनेट मंत्रियों के समकक्ष अगली पंक्तियों में जगह दी जाती है। इस व्यवस्था पर कांग्रेस पार्टी ने कड़ा ऐतराज जताया था और इसे लोकतंत्र व विपक्ष के पद का अपमान करार दिया था।
सरकार की सफाई और कांग्रेस का पलटवार
तत्कालीन विवाद पर रक्षा मंत्रालय और सरकारी अधिकारियों की तरफ से सफाई दी गई थी कि ओलंपिक पदक विजेताओं को अग्रिम पंक्तियों में सम्मान देने के लिए सीटिंग प्लान में बदलाव किया गया था। हालांकि, कांग्रेस ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया था। पार्टी नेताओं का कहना था कि राष्ट्रीय आयोजनों में प्रोटोकॉल का पालन करना सरकार की जिम्मेदारी होती है और विपक्ष के संवैधानिक पद की गरिमा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
लगातार दूसरी बार दूरी के मायने
2024 के इस बड़े विवाद के बाद, 2025 में भी दोनों नेताओं ने समारोह से दूरी बनाए रखी थी और अब 2026 में भी यह सिलसिला जारी रहा। इस बार भी लाल किले की प्राचीर के सामने विपक्षी खेमे की अग्रिम कुर्सियां खाली नजर आईं। रक्षा मंत्रालय द्वारा तय प्रोटोकॉल और विपक्षी नेताओं के आत्मसम्मान के बीच खींचतान ने यह साफ कर दिया है कि दो साल पहले शुरू हुआ यह विवाद अब एक बड़ी सियासी खाई का रूप ले चुका है।

लाल किले से पीएम मोदी का बड़ा संदेश: 75 मिनट में समेटा 80वां स्वतंत्रता दिवस संबोधन
80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से 75 मिनट का देश के नाम संबोधन दिया। यह पिछले 4 वर्षों में उनका सबसे छोटा भाषण रहा। पिछले वर्ष 103 मिनट के रिकॉर्ड भाषण के बाद, इस बार उन्होंने कम समय में अपनी बात रखते हुए देश के प्राथमिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया।
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80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से 75 मिनट का देश के नाम संबोधन दिया। यह पिछले 4 वर्षों में उनका सबसे छोटा भाषण रहा। पिछले वर्ष 103 मिनट के रिकॉर्ड भाषण के बाद, इस बार उन्होंने कम समय में अपनी बात रखते हुए देश के प्राथमिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया।
ऐतिहासिक संबोधन और समय का गणित
भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया और राष्ट्र को संबोधित किया। इस वर्ष उनका भाषण 75 मिनट तक चला, जो पिछले चार वर्षों में उनका सबसे छोटा स्वतंत्रता दिवस संबोधन दर्ज किया गया है।
समय के इस बदलाव ने राजनीतिक और सार्वजनिक हलकों में ध्यान आकर्षित किया है। यह भाषण उनके पूरे कार्यकाल का चौथा सबसे छोटा स्वतंत्रता दिवस भाषण भी बन गया है।
भाषणों का इतिहास: 2017 से 2025 तक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषणों की अवधि में हमेशा विविधता देखने को मिली है। उनके कार्यकाल का सबसे छोटा भाषण वर्ष 2017 में आया था, जब उन्होंने मात्र 56 मिनट में अपना संबोधन समाप्त किया था।
इसके ठीक विपरीत, पिछले वर्ष यानी 2025 में उन्होंने लाल किले से 103 मिनट का ऐतिहासिक और अपना सबसे लंबा भाषण दिया था। 2025 के लंबे और विस्तृत संबोधन के बाद इस साल 75 मिनट का भाषण एक बड़ा बदलाव दर्शाता है, जहां उन्होंने बात को अधिक सटीक और केंद्रित रखा।
संक्षिप्त संबोधन के मायने
लाल किले से अपने भाषणों में प्रधानमंत्री अक्सर अपनी सरकार की उपलब्धियों, भावी योजनाओं और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का खाका पेश करते हैं। इस बार 75 मिनट के दायरे में उन्होंने देश के मुख्य विकास लक्ष्यों, सुरक्षा और आम नागरिकों से जुड़े विषयों को प्रमुखता से शामिल किया।
अवधि भले ही पिछले साल की तुलना में कम रही हो, लेकिन संबोधन का प्रभाव और संदेश की गंभीरता पूरी तरह से कायम रही। यह बदलाव दिखाता है कि रणनीतिक संदेश देने के लिए समय की लंबाई नहीं, बल्कि विषय-वस्तु की स्पष्टता मायने रखती है।

सोशल मीडिया पर भिड़े 'कॉकरोच', CJP का इंस्टा हैंडल डिलीट होने पर मचा बवाल
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दीपके ने CJP का ऑफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट ब्लॉक होने पर तीखा हमला बोला। उन्होंने विरोधियों को 'डरपोक' बताते हुए X पर स्क्रीनशॉट शेयर किया। हालांकि, बाद में टेक टीम की मदद से CJP ने अपने अकाउंट को सफलतापूर्वक रिकवर कर लेने का दावा भी किया।
खबर का निचोड़
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दीपके ने CJP का ऑफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट ब्लॉक होने पर तीखा हमला बोला। उन्होंने विरोधियों को 'डरपोक' बताते हुए X पर स्क्रीनशॉट शेयर किया। हालांकि, बाद में टेक टीम की मदद से CJP ने अपने अकाउंट को सफलतापूर्वक रिकवर कर लेने का दावा भी किया।
CJP का इंस्टाग्राम हैंडल गायब, सोशल मीडिया पर छिड़ी जुबानी जंग
डिजिटल स्पेस में राजनीतिक और व्यंग्यात्मक कंटेंट को लेकर अक्सर खींचतान देखने को मिलती है, लेकिन इस बार मामला कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ऑफिशियल इंस्टाग्राम हैंडल के अचानक गायब हो जाने से गरमा गया है। CJP के फाउंडर अभिजीत दीपके ने दावा किया कि उनके आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट को निशाना बनाकर ब्लॉक कराया गया है।
अकाउंट हटने की खबर सामने आते ही अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) का रुख किया। उन्होंने ब्लॉक किए गए अकाउंट का स्क्रीनशॉट पोस्ट करते हुए विरोधियों पर सीधे तीर चलाए। दीपके ने अपनी भड़ास निकालते हुए लिखा कि उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी का ऑफिशियल इंस्टाग्राम हैंडल हटा दिया है और सवाल उठाया कि आखिर लोग इतने बड़े डरपोक क्यों हैं। उनकी यह पोस्ट तेजी से वायरल हो गई और समर्थकों ने इस पर अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दीं।
डर या टेक्निकल ग्लिच? स्क्रीनशॉट शेयर कर उठाए गंभीर सवाल
अभिजीत दीपके का सीधा आरोप था कि पार्टी के बढ़ते प्रभाव और तीखे कंटेंट से घबराकर यह कार्रवाई करवाई गई है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अक्सर मास रिपोर्टिंग या कम्युनिटी गाइडलाइन्स के उल्लंघन के नाम पर अकाउंट्स को सस्पेंड या डिलीट कर दिया जाता है। दीपके के तेवरों से साफ था कि वह इसे महज एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति मान रहे थे।
सोशल मीडिया पर इस दावों के बाद बहस छिड़ गई कि क्या वाकई किसी व्यंग्यात्मक या राजनीतिक पेज को इस तरह सेंसर किया जाना चाहिए। देखते ही देखते X पर CJP के समर्थकों ने इस कदम का विरोध करना शुरू कर दिया।
अकाउंट वापस मिलते ही राहत, CJP ने किया रिकवरी का दावा
अकाउंट डिलीट होने के इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के कुछ समय बाद ही स्थिति बदल गई। कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से यह जानकारी दी गई कि उनके इंस्टाग्राम हैंडल को फिर से रिकवर कर लिया गया है। तकनीकी प्रक्रियाओं और अपील के बाद अकाउंट की सफल बहाली हो गई।
अकाउंट रिकवर होने के बाद CJP ने राहत की सांस ली, लेकिन इस पूरी घटना ने एक बार फिर सोशल मीडिया पर डिजिटल सेंसरशिप, मास रिपोर्टिंग और अकाउंट सिक्योरिटी के मुद्दों को बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। दीपके और उनकी टीम का मानना है कि डिजिटल मंचों पर आवाज दबाने की कोशिशें पहले भी होती रही हैं, लेकिन सही समय पर उठाए गए कदमों से अकाउंट वापस हासिल कर लिया गया।
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