
कप्तानी की मांग पड़ी भारी, GT में हार्दिक की वापसी बंद
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई इंडियंस के कप्तान हार्दिक पंड्या की गुजरात टाइटंस में वापसी के दरवाजे पूरी तरह बंद हो गए हैं। वापसी के लिए हार्दिक द्वारा रखी गई कप्तानी की शर्त को फ्रैंचाइज़ी ने सिरे से खारिज कर दिया। इस फैसले ने आईपीएल के अगले सीजन के समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं।
खबर का निचोड़
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई इंडियंस के कप्तान हार्दिक पंड्या की गुजरात टाइटंस में वापसी के दरवाजे पूरी तरह बंद हो गए हैं। वापसी के लिए हार्दिक द्वारा रखी गई कप्तानी की शर्त को फ्रैंचाइज़ी ने सिरे से खारिज कर दिया। इस फैसले ने आईपीएल के अगले सीजन के समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं।
कप्तानी की शर्त पर अड़े हार्दिक
हार्दिक पंड्या की गुजरात टाइटंस (जीटी) में दोबारा एंट्री को लेकर चल रही तमाम अटकलों पर अब विराम लग गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, हार्दिक ने अपनी पुरानी फ्रैंचाइज़ी जीटी में लौटने की इच्छा तो जताई थी, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ी शर्त भी रख दी थी। उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि वे टीम में केवल तभी वापस आएंगे जब उन्हें कप्तानी की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।
हालांकि, गुजरात टाइटंस के मैनेजमेंट को हार्दिक की यह शर्त बिल्कुल पसंद नहीं आई और उन्होंने इसे तुरंत ठुकरा दिया।
फ्रैंचाइज़ी ने दिखाया सख्त रुख
गुजरात टाइटंस के इस फैसले से साफ है कि फ्रैंचाइज़ी अपने मौजूदा नेतृत्व और टीम के ताने-बाने के साथ कोई समझौता करने के मूड में नहीं है। टीम प्रबंधन ने यह संदेश दे दिया है कि किसी भी खिलाड़ी की व्यक्तिगत मांगें टीम के दीर्घकालिक हितों से बढ़कर नहीं हो सकतीं।
हार्दिक की मांग खारिज होने के साथ ही उनकी गुजरात टाइटंस में वापसी की बची-कुची उम्मीदें भी समाप्त हो गई हैं।
मुंबई इंडियंस के लिए बदला माहौल
मुंबई इंडियंस (एमआई) में पिछले सीजन के दौरान हार्दिक पंड्या का अनुभव मिला-जुला ही रहा था। रोहित शर्मा की जगह कप्तानी संभालने के बाद उन्हें फैंस के भारी विरोध और दबाव का सामना करना पड़ा था। जीटी में वापसी के दरवाजे बंद होने के बाद अब हार्दिक के लिए मुंबई इंडियंस में ही अपनी जगह मजबूत करना एकमात्र विकल्प नजर आ रहा है।
क्रिकेट गलियारों में नई हलचल
इस नए घटनाक्रम ने आगामी आईपीएल रिटेंशन और नीलामी से पहले क्रिकेट के गलियारों में चर्चाएं तेज कर दी हैं। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि मुंबई इंडियंस का थिंक-टैंक हार्दिक पंड्या की भूमिका और कप्तानी को लेकर क्या अंतिम फैसला लेता है।

CJP ने बार काउंसिल चेयरमैन मनन मिश्रा से मांगा इस्तीफा, NALSAR विवाद पर बढ़ा बवाल
बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा NALSAR के छात्रों के एनरोलमेंट पर रोक लगाने और फिर फैसला वापस लेने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने BCI चेयरमैन मनन मिश्रा के इस्तीफे की मांग की है। पार्टी ने काउंसिल के इस रवैये को छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ बताया है।
खबर का निचोड़
बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा NALSAR के छात्रों के एनरोलमेंट पर रोक लगाने और फिर फैसला वापस लेने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने BCI चेयरमैन मनन मिश्रा के इस्तीफे की मांग की है। पार्टी ने काउंसिल के इस रवैये को छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ बताया है।
विवाद की जड़ और BCI का रुख
NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के चयन को लेकर शुरू हुआ विवाद अब एक बड़े राजनीतिक और कानूनी मोर्चे में बदल चुका है। दीक्षांत समारोह में CJI सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने के विरोध में छात्रों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया था। इस विरोध प्रदर्शन से नाराज होकर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने एक कड़ा रुख अपनाया और NALSAR के लॉ ग्रैजुएट्स के वकालत एनरोलमेंट पर अस्थाई रोक लगाने का आदेश जारी कर दिया। BCI के इस अप्रत्याशित फैसले ने सैकड़ों युवा वकीलों के करियर पर अनिश्चितता के बादल मंडरा दिए थे।
चौतरफा दबाव के बाद फैसला वापस
BCI के इस आदेश के आते ही देशभर के कानूनी और शैक्षणिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। कानूनी विशेषज्ञों, छात्र संगठनों और नागरिक समाज ने इसे छात्रों के अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार पर हमला और उनके करियर के साथ खिलवाड़ करार दिया। चौतरफा बढ़ते दबाव और तीखी आलोचना को देखते हुए बार काउंसिल को आखिरकार अपना कदम पीछे खींचना पड़ा। BCI ने अपने निलंबन के फैसले को वापस तो ले लिया, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया ने संस्थान की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
CJP का हमला और इस्तीफे की मांग
फैसला वापस लिए जाने के बावजूद यह मामला शांत होता नजर नहीं आ रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर BCI नेतृत्व पर सीधा हमला बोला है। CJP ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन मिश्रा के तुरंत इस्तीफे की मांग की है। पार्टी के प्रवक्ताओं का कहना है कि BCI एक संवैधानिक और नियामक संस्था है, जिसका काम कानून की शिक्षा और वकीलों के हितों की रक्षा करना है। बिना सोचे-समझे इस तरह के मनमाने फैसले लेकर छात्रों को डराना BCI के अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग है।
भविष्य पर उठते सवाल
CJP के रुख के बाद यह विवाद अब सिर्फ छात्रों के एनरोलमेंट तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह संस्थागत जवाबदेही की लड़ाई बन चुका है। कानूनी जगत में भी यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या नियामक संस्थाओं को छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध के जवाब में इतना कठोर कदम उठाने का अधिकार होना चाहिए। फिलहाल BCI चेयरमैन के इस्तीफे की मांग ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है।

मेलोनी टिप्पणी विवाद: जेपी नड्डा का राहुल गांधी और कांग्रेस पर बड़ा प्रहार
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी की टिप्पणी पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा हमला बोला है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता और स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने राहुल गांधी के बयान की कड़े शब्दों में आलोचना करते हुए इसे कांग्रेस के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बताया। नड्डा के इस प्रहार से देश में राजनीतिक बयानबाजी और गर्मा गई है।
खबर का सार
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी की टिप्पणी पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा हमला बोला है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता और स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने राहुल गांधी के बयान की कड़े शब्दों में आलोचना करते हुए इसे कांग्रेस के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बताया। नड्डा के इस प्रहार से देश में राजनीतिक बयानबाजी और गर्मा गई है।
मेलोनी टिप्पणी पर नड्डा का तीखा हमला
राजनीतिक गलियारों में बयानों के तीर लगातार तेज होते जा रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर की गई हालिया टिप्पणी पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने आक्रामक रुख अपना लिया है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता और स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने इस बयान पर कड़ा ऐतराज जताते हुए राहुल गांधी की परिपक्वता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नड्डा ने राहुल गांधी के बयान को भारतीय राजनीति के स्तर को गिराने वाला करार दिया। उन्होंने कहा कि देश में विपक्ष के नेता के पद पर बैठे व्यक्ति से ऐसी गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी की उम्मीद किसी को नहीं थी। अंतरराष्ट्रीय नेताओं के प्रति इस तरह का दृष्टिकोण कूटनीतिक और व्यक्तिगत दोनों लिहाज से अनुचित है।
कांग्रेस के नेतृत्व पर उठाए गंभीर सवाल
जेपी नड्डा यहीं नहीं रुके, उन्होंने राहुल गांधी के बहाने पूरी कांग्रेस पार्टी को कटघरे में खड़ा कर दिया। नड्डा ने तंज कसते हुए कहा कि ऐसा विपक्ष का नेता देखना ही बाकी रह गया था। उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस के लिए इससे दुख का क्या विषय होगा कि उन्हें राहुल गांधी को अपना नेता मानना पड़ रहा है।
बीजेपी नेता के इस बयान ने कांग्रेस के आंतरिक नेतृत्व और उसकी दूरदर्शिता पर सीधा हमला बोला है। नड्डा का मानना है कि पार्टी के पास अब नीतियों और विजन की कमी हो चुकी है, जिसके कारण उनके शीर्ष नेता लगातार गरिमा से परे बयानबाजी कर रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय गरिमा और भारतीय राजनीति का स्तर
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विदेशी नेताओं के संबंध में दी जाने वाली टिप्पणियां हमेशा संवेदनशील मानी जाती हैं। बीजेपी का आरोप है कि राहुल गांधी लगातार ऐसे बयान देकर देश की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं। पार्टी का कहना है कि विपक्ष के नेता का पद एक संवैधानिक और जिम्मेदार पद होता है, जहां हर शब्द का महत्व होता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग को तेज कर दिया है, बल्कि राजनीतिक शिष्टाचार और वैश्विक मंचों पर भारतीय नेताओं की भाषा शैली को लेकर भी एक नई बहस छेड़ दी है।

गंभीर दिल के साफ़, लोग कड़वा सच पचा नहीं पाते: हरभजन सिंह
भारतीय क्रिकेट टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर की कार्यशैली और कड़े स्वभाव को लेकर पूर्व दिग्गज स्पिनर हरभजन सिंह ने उनका पुरजोर समर्थन किया है। हरभजन ने कहा कि गंभीर बेहद पारदर्शी और साफ दिल इंसान हैं। उनकी बातें सच होती हैं, जिन्हें पचाना हर किसी के बस की बात नहीं होती।
गंभीर दिल के साफ़, लोग कड़वा सच पचा नहीं पाते: हरभजन सिंह
खबर का निचोड़:
भारतीय क्रिकेट टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर की कार्यशैली और कड़े स्वभाव को लेकर पूर्व दिग्गज स्पिनर हरभजन सिंह ने उनका पुरजोर समर्थन किया है। हरभजन ने कहा कि गंभीर बेहद पारदर्शी और साफ दिल इंसान हैं। उनकी बातें सच होती हैं, जिन्हें पचाना हर किसी के बस की बात नहीं होती।
मुख्य आर्टिकल:
गंभीर का सीधा अंदाज और सच कहने की हिम्मत
भारतीय क्रिकेट टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर मैदान पर अपनी आक्रामकता और मैदान के बाहर अपनी बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में पूर्व भारतीय क्रिकेटर हरभजन सिंह ने गंभीर के इसी व्यक्तित्व की जमकर सराहना की है। हरभजन का मानना है कि गंभीर उन गिने-चुने लोगों में से हैं जो बिना किसी लाग-लपेट के सच बोलने की हिम्मत रखते हैं।
कड़वी बातें और लोगों की मानसिकता
हरभजन सिंह ने गंभीर के आलोचकों को जवाब देते हुए कहा कि गौतम गंभीर एक बेहतरीन इंसान हैं। वे जब भी कोई बात कहते हैं, तो उसमें सच्चाई होती है। हालांकि, समाज में अक्सर सीधे और सच्चे जवाबों को लोग आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते। यही वजह है कि कई लोगों को उनकी बातें कड़वी लगती हैं और वे उन्हें पचा नहीं पाते।
सख्त लहजे के पीछे की असलियत
अक्सर गंभीर के चेहरे के हाव-भाव और बात करने के तरीके को देखकर उन्हें एक सख्त और कठोर इंसान मान लिया जाता है। इस पर बात करते हुए हरभजन ने स्पष्ट किया कि शायद उनके बोलने के लहजे की वजह से लोगों के मन में ऐसी धारणा बन जाती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि वे दिल के बेहद साफ हैं और उनके मन में जो होता है, वही उनकी ज़ुबान पर आता है।
ड्रेसिंग रूम में स्पष्टता और पारदर्शिता
भारतीय टीम के हेड कोच के रूप में गंभीर का रुख एकदम स्पष्ट रहा है। वे टीम में अनुशासन, कड़ी मेहनत और परिणाम को प्राथमिकता देते हैं। क्रिकेट के जानकारों का मानना है कि ड्रेसिंग रूम का माहौल बेहतर बनाने के लिए एक ऐसे कोच की जरूरत होती है जो खिलाड़ियों को उनकी वास्तविक स्थिति का आईना दिखा सके। हरभजन का यह बयान दर्शाता है कि गंभीर का यह कड़ा रवैया टीम के हित में ही काम कर रहा है।
भारतीय क्रिकेट में गंभीर की भूमिका
गौतम गंभीर का करियर हमेशा से चुनौतियों से भरा रहा है, चाहे वह एक खिलाड़ी के रूप में हो या फिर एक मेंटॉर और कोच के रूप में। हरभजन सिंह जैसे दिग्गज खिलाड़ी का उनके पक्ष में खुलकर सामने आना यह साबित करता है कि गंभीर की कार्यप्रणाली को क्रिकेट बिरादरी में बेहद सम्मान की नजर से देखा जाता है।

सफेद बालों वाले कहाँ गए?': सोनिया गांधी जब भूलीं पवन खेड़ा का नाम
संसद परिसर में मीडिया के सवालों का सामना करते हुए कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा का नाम भूल गईं। बाधित सत्र पर जवाब देने के लिए उन्होंने पूछा, "वो सफेद बालों वाले कहां हैं?" इस हल्के-फुल्के लम्हे का वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है।
खबर का निचोड़
संसद परिसर में मीडिया के सवालों का सामना करते हुए कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा का नाम भूल गईं। बाधित सत्र पर जवाब देने के लिए उन्होंने पूछा, "वो सफेद बालों वाले कहां हैं?" इस हल्के-फुल्के लम्हे का वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है।
संसद में मीडिया से सामना और एक दिलचस्प लम्हा
संसद के हर सत्र में मीडिया और नेताओं के बीच तल्ख सवाल-जवाब और राजनीतिक बयानबाजी होना एक आम बात है। लेकिन कभी-कभी ऐसे क्षण भी सामने आ जाते हैं, जो गंभीर राजनीतिक माहौल के बीच हल्की मुस्कान बिखेर देते हैं। ऐसा ही एक वाकया संसद परिसर के बाहर देखने को मिला, जब कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी मीडिया के तीखे सवालों का जवाब देने के लिए अपनी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता का नाम ही भूल गईं।
'सफेद बालों वाले कहां हैं जो जवाब देते हैं?'
संसद परिसर में मीडियाकर्मी लगातार देश के ज्वलंत मुद्दों और संसद में जारी गतिरोध पर सोनिया गांधी से प्रतिक्रिया मांगने की कोशिश कर रहे थे। सवालों की बौछार के बीच सोनिया गांधी रुकीं और अपने आसपास देखा। वह चाहती थीं कि पार्टी का आधिकारिक पक्ष रखने के लिए प्रवक्ता आगे आए।
इसी दौरान, पवन खेड़ा का नाम तुरंत याद न आने पर सोनिया गांधी ने बेहद स्वाभाविक अंदाज में पूछा, "वो सफेद बालों वाले कहां हैं जो जवाब देते हैं?" उनका इशारा साफ तौर पर पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया अध्यक्ष और वरिष्ठ प्रवक्ता पवन खेड़ा की तरफ था। यह सुनते ही वहां मौजूद नेता और मीडियाकर्मी अपनी हंसी नहीं रोक पाए।
सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ वीडियो
जैसे ही यह घटना घटी, इसका वीडियो सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से वायरल होने लगा। नेटिज़ेंस और राजनीतिक विश्लेषक इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। कुछ लोग इसे सोनिया गांधी का एक सहज और मानवीय पहलू बता रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीति के गंभीर माहौल में एक राहत भरा पल मान रहे हैं।
मीडिया प्रबंधन और प्रवक्ताओं की भूमिका
संसद सत्र के दौरान राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं पर अक्सर बयानों को लेकर काफी दबाव रहता है। ऐसे में मीडिया को संभालने और नीतिगत मुद्दों पर सटीक जवाब देने के लिए प्रवक्ताओं की मौजूदगी बेहद अहम होती है। सोनिया गांधी का पवन खेड़ा को ढूंढना यह दर्शाता है कि मीडिया के जटिल सवालों का सामना करने के लिए शीर्ष नेतृत्व भी अपने अनुभवी प्रवक्ताओं पर काफी भरोसा करता है। नाम भले ही भूल गया हो, लेकिन उनकी पहचान और काम का संदर्भ एकदम सटीक था।

CAG रिपोर्ट: ग्रीन इंडिया मिशन में भारी विफलताओं का खुलासा
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट के अनुसार, नेशनल मिशन फॉर ए ग्रीन इंडिया (GIM) में वन आवरण विस्तार लक्ष्य का लगभग 98 प्रतिशत shortfall दर्ज किया गया है। वर्ष 2015-16 से 2024-25 के दौरान वित्त पोषण की कमी, कुप्रबंधन और लचर प्रशासनिक निगरानी के कारण यह राष्ट्रीय महत्व की महत्वाकांक्षी योजना गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।
CAG रिपोर्ट: ग्रीन इंडिया मिशन में भारी विफलताओं का खुलासा
सारांश (Summary)
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट के अनुसार, नेशनल मिशन फॉर ए ग्रीन इंडिया (GIM) में वन आवरण विस्तार लक्ष्य का लगभग 98 प्रतिशत shortfall दर्ज किया गया है। वर्ष 2015-16 से 2024-25 के दौरान वित्त पोषण की कमी, कुप्रबंधन और लचर प्रशासनिक निगरानी के कारण यह राष्ट्रीय महत्व की महत्वाकांक्षी योजना गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis)
राष्ट्रीय हरित भारत मिशन का परिचय
राष्ट्रीय एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज (NAPCC) के तहत शुरू किया गया नेशनल मिशन फॉर ए ग्रीन इंडिया (GIM) भारत के वन और वृक्ष आवरण को बढ़ाने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने का एक प्रमुख केंद्र प्रायोजित कार्यक्रम है। इसका मुख्य उद्देश्य देश में घटते वन क्षेत्र को पुनर्जीवित करना और पारिस्थितिक संतुलन स्थापित करना था।
निष्पादन में भारी विसंगतियां और शार्टफॉल
CAG द्वारा हाल ही में प्रस्तुत किए गए परफॉर्मेंस ऑडिट के अनुसार, समीक्षाधीन अवधि (2015-16 से 2024-25) के दौरान मिशन अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में बुरी तरह विफल रहा है। इस समयावधि में वन-आवरण विस्तार के तय लक्ष्यों में लगभग 98 प्रतिशत की भारी कमी पाई गई, जो सरकारी स्तर पर नीतिगत क्रियान्वयन की विफलता को उजागर करती है।
वित्तीय कुप्रबंधन और धन का उपयोग
ऑडिट में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि आवंटित फंड का समय पर और उचित उपयोग नहीं किया गया। राज्यों को मिलने वाले वित्तीय संसाधनों में देरी, बजट कटौती और फंड का डायवर्जन इस विफलता के मुख्य कारण रहे। वित्तीय वर्ष के अंत में भारी मात्रा में धन का अप्रयुक्त रहना प्रशासनिक अकुशलता को दर्शाता है।
निगरानी और समन्वय का अभाव
केन्द्र और राज्य स्तर की एजेंसियों के बीच आपसी समन्वय की भारी कमी देखी गई है। जमीनी स्तर पर वनीकरण कार्यों के मूल्यांकन के लिए कोई मजबूत और पारदर्शी मैकेनिज्म मौजूद नहीं था। जिला और स्थानीय स्तर पर वन समितियों की निष्क्रियता के कारण पौधे लगाने के बाद उनके रख-रखाव पर कोई ध्यान नहीं दिया गया, जिससे रोपे गए पौधों का जीवित रहना सुनिश्चित नहीं हो सका।
Delight News
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