
झारखंड में बड़ा फैसला: JSSC-CGL समेत सभी परीक्षाएं रद्द
युवाओं के भारी विरोध और आंदोलन के आगे आखिरकार झारखंड सरकार को झुकना पड़ा है। सरकार ने सोमवार देर रात JSSC-CGL समेत एजेंसी TDPL द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं को रद्द करने का बड़ा फैसला लिया। हालांकि, इस फैसले ने राज्य सरकार के सामने प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर एक नई मुश्किल खड़ी कर दी है।
खबर का निचोड़
युवाओं के भारी विरोध और आंदोलन के आगे आखिरकार झारखंड सरकार को झुकना पड़ा है। सरकार ने सोमवार देर रात JSSC-CGL समेत एजेंसी TDPL द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं को रद्द करने का बड़ा फैसला लिया। हालांकि, इस फैसले ने राज्य सरकार के सामने प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर एक नई मुश्किल खड़ी कर दी है।
युवाओं का आक्रोश और सरकार का फैसला
झारखंड में पिछले कई दिनों से जारी छात्रों और अभ्यर्थियों के आंदोलन ने राज्य की सियासत में गर्माहट बढ़ा दी थी। परीक्षाओं में धांधली और अनियमितताओं के आरोपों को लेकर सड़कों पर उतरे युवाओं की मांग को देखते हुए झारखंड सरकार ने सोमवार रात एक बड़ा कदम उठाया। सरकार ने JSSC-CGL समेत TDPL द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं को रद्द करने की घोषणा कर दी।
इस फैसले को आंदोलनकारी छात्रों की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से अभ्यर्थी परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और गड़बड़ियों की जांच की मांग कर रहे थे। राज्य भर में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार के पास परीक्षाओं को निरस्त करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचा था।
नई चुनौतियों के चक्रव्यूह में फंसी सरकार
परीक्षाएं रद्द कर युवाओं को शांत करने का दांव सरकार के लिए फिलहाल भले ही राहत भरा दिख रहा हो, लेकिन इसने प्रशासनिक महकमे के सामने परेशानियों का नया पहाड़ खड़ा कर दिया है। हजारों अभ्यर्थियों का भविष्य एक बार फिर अधर में लटक गया है, जिससे उनके भीतर अनिश्चितता का माहौल है।
दूसरी ओर, लाखों अभ्यर्थियों की दोबारा परीक्षा आयोजित कराना एक बहुत बड़ी लॉजिस्टिक और वित्तीय चुनौती होगी। नई एजेंसी का चयन, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली का निर्माण और समय पर परिणाम जारी करना सरकार के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।
परीक्षा एजेंसियों पर उठते गंभीर सवाल
TDPL द्वारा संचालित इन परीक्षाओं के रद्द होने से सरकारी तंत्र और परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों की साख पर गहरा दाग लगा है। लगातार लीक होते पेपर और धांधली के आरोपों ने यह साबित कर दिया है कि राज्य की चयन प्रक्रियाओं में बड़े पैमाने पर सुधार की आवश्यकता है।
अब देखना यह होगा कि सरकार इस प्रशासनिक संकट से कैसे निपटती है और अभ्यर्थियों का खोया हुआ भरोसा वापस जीतने के लिए क्या कड़े कदम उठाती है। परीक्षा प्रणाली की शुचिता बनाए रखना और आने वाले समय में एक निष्पक्ष परीक्षा का आयोजन करना ही अब सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी।

भारत-नीदरलैंड कृषि द्विपक्षीय वार्ता और रणनीतिक सहयोग
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री और नीदरलैंड के कृषि, मत्स्य पालन, खाद्य सुरक्षा एवं प्रकृति मंत्री के बीच नई दिल्ली में संपन्न द्विपक्षीय वार्ता में कृषि नवाचार, बागवानी और बीज क्षेत्र (Seed Sector) में आपसी सहयोग को सुदृढ़ करने पर सहमति बनी है। दोनों देशों ने भारत में स्थापित 25 उत्कृष्टता केंद्रों (Centres of Excellence) की प्रगति की समीक्षा करते हुए भविष्य के रोडमैप पर चर्चा की।
सारांश (Summary):
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री और नीदरलैंड के कृषि, मत्स्य पालन, खाद्य सुरक्षा एवं प्रकृति मंत्री के बीच नई दिल्ली में संपन्न द्विपक्षीय वार्ता में कृषि नवाचार, बागवानी और बीज क्षेत्र (Seed Sector) में आपसी सहयोग को सुदृढ़ करने पर सहमति बनी है। दोनों देशों ने भारत में स्थापित 25 उत्कृष्टता केंद्रों (Centres of Excellence) की प्रगति की समीक्षा करते हुए भविष्य के रोडमैप पर चर्चा की।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
द्विपक्षीय वार्ता और प्रमुख क्षेत्र
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और नीदरलैंड के कृषि मंत्री सिल्वियो एर्केन्स (Silvio Erkens) के मध्य हुई उच्चस्तरीय बैठक में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय कृषि संबंधों को नई ऊँचाइयाँ देने पर जोर दिया गया। इस दौरान कृषि क्षेत्र में तकनीकी हस्तांतरण, उत्पादकता में वृद्धि और ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए एक समर्पित 'बीज-क्षेत्र कार्य योजना' (Seed-Sector Work Plan) तैयार करने पर सहमति व्यक्त की गई। इसके अलावा, दोनों पक्षों ने भारत में सफलतापूर्वक चल रहे 25 उत्कृष्टता केंद्रों की कार्यप्रणाली की समीक्षा की, जो बागवानी और आधुनिक कृषि तकनीकों के प्रसार में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
नीदरलैंड की भौगोलिक एवं भू-राजनीतिक स्थिति
उत्तर-पश्चिमी यूरोप में स्थित नीदरलैंड अपनी अनूठी भौगोलिक विशेषताओं के लिए जाना जाता है। इसकी सीमाएँ पूर्व में जर्मनी और दक्षिण में बेगम से मिलती हैं, जबकि उत्तर और पश्चिम में यह उत्तरी सागर से घिरा हुआ है। इसकी राजधानी एम्स्टर्डम है। यहाँ की जलवायु समशीतोष्ण (temperate) है, जिसमें हल्की सर्दियाँ, ठंडे ग्रीष्मकाल और वर्ष भर वर्षा होती है। भौगोलिक रूप से यह मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों—तटीय निचले इलाकों (Lowlands), वेलुवे और उट्रेच हिल रिज तथा लिम्बर्ग पहाड़ियों में विभाजित है। देश की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील 'इज्जेलमीर' (Ijsselmeer) है, और राइन, मूस (मास) तथा शेल्ड यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं।
आर्थिक और रणनीतिक महत्व
नीदरलैंड अपनी उन्नत कृषि-प्रौद्योगिकी, डेयरी फार्मिंग और विश्व स्तरीय बागवानी के लिए वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध है। क्षेत्रफल में अपेक्षाकृत छोटा होने के बावजूद यह दुनिया के सबसे बड़े कृषि निर्यातकों में शामिल है। देश का सर्वोच्च बिंदु 'वाल्सेरबर्ग' (Vaalserberg) है। प्राकृतिक संसाधनों के मामले में यहाँ दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस भंडारों में से एक के साथ-साथ जस्ता (zinc) और मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। भारत और नीदरलैंड के बीच यह रणनीतिक कृषि साझेदारी खाद्य सुरक्षा, जलवायु-अनुकूल कृषि और सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में मील का पत्थर साबित हो रही है।

उजानी बांध क्षेत्र में आक्रामक प्रजातियों के नियंत्रण हेतु सामुदायिक पहल
महाराष्ट्र के सोलापुर और पुणे जिलों में फैले उजानी बांध के जलग्रहण क्षेत्र को आक्रामक मछली प्रजातियों से मुक्त कराने और स्वदेशी मछलियों को पुनर्जीवित करने के लिए एक विशेष समुदाय-संचालित परियोजना शुरू की गई है। यह पहल स्थानीय जैव विविधता और पारंपरिक आजीविका की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सारांश (Summary):
महाराष्ट्र के सोलापुर और पुणे जिलों में फैले उजानी बांध के जलग्रहण क्षेत्र को आक्रामक मछली प्रजातियों से मुक्त कराने और स्वदेशी मछलियों को पुनर्जीवित करने के लिए एक विशेष समुदाय-संचालित परियोजना शुरू की गई है। यह पहल स्थानीय जैव विविधता और पारंपरिक आजीविका की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
परिचय एवं अवस्थिति
उज्जानी बांध (जिसे भीमा बांध या भीमा सिंचाई परियोजना भी कहा जाता है) महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के उज्जानी गाँव के पास भीमा नदी पर स्थित है। यह भीमा नदी पर बने कुल 22 बांधों में अंतिम और भीमा बेसिन का सबसे बड़ा बांध है। यह एक मिट्टी और चिनाई वाला गुरुत्वीय बांध (earth-fill cum masonry gravity dam) है, जिसका निर्माण क्षेत्र के लिए सिंचाई का पानी और जलविद्युत ऊर्जा प्रदान करने के उद्देश्य से 1977 से 1980 के बीच किया गया था। यह विशाल जलाशय भूवैज्ञानिक रूप से मजबूत बेसाल्ट चट्टानों पर आधारित है और इसकी कुल लंबाई 2,534 मीटर है।
पारिस्थितिक संकट और आक्रामक प्रजातियाँ
हाल के वर्षों में उजानी जलाशय गंभीर पारिस्थितिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिसमें आक्रामक और विदेशी मछली प्रजातियों (जैसे सकरमाउथ कैटफिश और तिलापिया) का अत्यधिक प्रसार शामिल है। एक्वेरियम व्यापार के माध्यम से पहुँची इन आक्रामक प्रजातियों ने स्थानीय जैव विविधता को भारी नुकसान पहुँचाया है और स्वदेशी मछलियों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। इसके अलावा, पुणे और अन्य शहरी केंद्रों से आने वाले प्रदूषकों के कारण इस बांध की जल गुणवत्ता भी काफी प्रभावित हुई है।
समुदाय-संचालित पुनर्स्थापना परियोजना
इन गंभीर पारिस्थितिक और आजीविका संकटों से निपटने के लिए, स्थानीय मछुआरों, पर्यावरणविदों और प्रशासन के सहयोग से देश की पहली समुदाय-संचालित आक्रामक प्रजाति निष्कासन और स्वदेशी पुनरुद्धार परियोजना शुरू की गई है। इस पहल के तहत हानिकारक विदेशी मछलियों को हटाने के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं और जलाशय में स्वदेशी मछली प्रजातियों के लाखों जीरा (फिंगरलिंग्स) छोड़े जा रहे हैं, ताकि जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के प्राकृतिक संतुलन को पुनः स्थापित किया जा सके।
Maharashtra's Ujani Reservoir Sees 12.2 Million Native Fish Release
इस वीडियो में उजानी जलाशय के पारिस्थितिक तंत्र को बहाल करने और आक्रामक प्रजातियों के प्रभाव को कम करने के लिए चलाए गए बड़े पैमाने पर स्वदेशी मछली संरक्षण प्रयासों को दर्शाया गया है।

भारतीय निर्यातकों के लिए RELIEF योजना और इसके घटकों का विस्तार
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा खाड़ी और पश्चिम एशिया क्षेत्र में समुद्री मार्ग की बाधाओं से जूझ रहे भारतीय निर्यातकों को राहत देने के लिए 'RELIEF' (Resilience & Logistics Intervention for Export Facilitation) योजना के तहत महत्वपूर्ण घटकों के परिचालन समय को बढ़ा दिया गया है।
सारांश (Summary):
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा खाड़ी और पश्चिम एशिया क्षेत्र में समुद्री मार्ग की बाधाओं से जूझ रहे भारतीय निर्यातकों को राहत देने के लिए 'RELIEF' (Resilience & Logistics Intervention for Export Facilitation) योजना के तहत महत्वपूर्ण घटकों के परिचालन समय को बढ़ा दिया गया है। यह योजना उच्च माल ढुलाई (freight), बीमा प्रीमियम और युद्ध संबंधी जोखिमों से निपटने के लिए ईसीजीसी (ECGC) के माध्यम से वित्तीय और बीमा सुरक्षा प्रदान करती है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
परिचय एवं योजना की पृष्ठभूमि
RELIEF (Resilience & Logistics Intervention for Export Facilitation) योजना को केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत 'निर्यात संवर्धन मिशन' (Export Promotion Mission - EPM) के तहत लॉन्च किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य खाड़ी और पश्चिम एशिया के समुद्री गलियारों में भू-राजनीतिक और तार्किक (logistical) व्यवधानों के कारण उत्पन्न होने वाली माल ढुलाई लागत में वृद्धि, उच्च बीमा प्रीमियम और युद्ध-संबंधित जोखिमों के प्रभावों को कम करना है। यह एक समय-बद्ध और लक्षित हस्तक्षेप है, जो भारतीय निर्यातकों की वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी स्थिति को बनाए रखने में मदद करता है।
योजना के प्रमुख घटक और संरचना
इस योजना के अंतर्गत मुख्य रूप से तीन प्रमुख घटक शामिल हैं जो विभिन्न श्रेणियों के निर्यातकों को कवर करते हैं:
घटक I: ऐसे निर्यातक जिनके पास पहले से ईसीजीसी (ECGC) बीमा कवर मौजूद है, उन्हें पात्र शिपमेंट के लिए बिना किसी अतिरिक्त लागत के 100% तक जोखिम कवरेज प्रदान किया जाता है।
घटक II: आगामी शिपमेंट की योजना बनाने वाले निर्यातकों के लिए, जो ईसीजीसी कवर प्राप्त करते हैं, उन्हें सरकारी सहायता के साथ 95% तक जोखिम कवरेज उपलब्ध कराया जाता है। हालिया संशोधनों के तहत इस घटक के समय-चक्र को आगे बढ़ाया गया है ताकि निरंतर व्यापार प्रवाह सुनिश्चित हो सके।
घटक III (MSMEs के लिए राहत): व्यवधान अवधि के दौरान बिना ईसीजीसी कवर वाले छोटे निर्यातकों (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) को बढ़े हुए माल ढुलाई और बीमा लागत के 50% तक आंशिक प्रतिपूर्ति का प्रावधान किया गया है, जिसकी अधिकतम सीमा प्रति निर्यातक 50 लाख रुपये है।
भौगोलिक कवरेज और कार्यान्वयन एजेंसी
इस योजना का दायरा पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों के प्रमुख गंतव्यों तक विस्तारित है। इसमें संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, ओमान, कुवैत, बहरीन, इराक, ईरान, इजराइल और यमन जैसे देश शामिल हैं। इस संपूर्ण योजना के सुचारू क्रियान्वयन, दस्तावेज़ सत्यापन, दावा प्रसंस्करण (claim processing), संवितरण और निगरानी के लिए 'एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया' (ECGC Limited) को नोडल एजेंसी के रूप में नामित किया गया है।

यूरोप की प्रमुख पार-सीमा नदी 'डनिप्रो' और इसके सामरिक महत्व
डनिप्रो (Dnieper) नदी यूरोप की चौथी सबसे लंबी और यूक्रेन की सबसे लंबी नदी है, जो रूस के वल्दाई पहाड़ियों से निकलकर बेलारूस और यूक्रेन होते हुए काला सागर में गिरती है। हाल ही में रूसी ड्रोन हमलों द्वारा कीव में इस नदी पर बने प्रमुख पुलों को निशाना बनाए जाने के बाद यह नदी एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गई है।
सारांश (Summary):
डनिप्रो (Dnieper) नदी यूरोप की चौथी सबसे लंबी और यूक्रेन की सबसे लंबी नदी है, जो रूस के वल्दाई पहाड़ियों से निकलकर बेलारूस और यूक्रेन होते हुए काला सागर में गिरती है। हाल ही में रूसी ड्रोन हमलों द्वारा कीव में इस नदी पर बने प्रमुख पुलों को निशाना बनाए जाने के बाद यह नदी एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गई है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
भौगोलिक मार्ग और प्रवाह प्रणाली
डनिप्रो नदी पूर्वी यूरोप की एक प्रमुख पार-सीमा (transboundary) नदी है, जो बेलारूस और यूक्रेन के एक बड़े भूभाग को जलित करती है। यह रूस में मास्को से लगभग 240 किलोमीटर पश्चिम में स्थित कम ऊँचाई वाली वल्दाई पहाड़ियों से निकलती है। अपने कुल 1,368 मील (लगभग 2,200 किमी) लंबे मार्ग में से लगभग 300 मील रूस में, 430 मील बेलारूस में और 680 मील यूक्रेन के भीतर प्रवाहित होती हुई यह काला सागर के एक लंबे मुहाने (Dnieper Liman) में जाकर विलीन हो जाती है। यह स्मोलेंस्क, मोगिलेव, कीव, चेर्कासी, डनिप्रो और ज़ापोरिजिया जैसे प्रमुख शहरी केंद्रों से होकर गुजरती है।
आर्थिक और नौवहन महत्व
यह नदी यूक्रेन की अर्थव्यवस्था के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण नौवहन जलमार्ग (navigable waterway) है। इसे डनिप्रो-बग नहर (Dnieper–Bug Canal) के माध्यम से यूरोप के अन्य जलमार्गों से जोड़ा गया है। मैदानी इलाकों की नदी होने के कारण इसका ढाल मंद है और पानी का प्रवाह धीमा रहता है। इसमें लगभग 32,000 सहायक नदियाँ आकर मिलती हैं, जिनमें सोझ, डेस्ना, ट्रुबिझ, प्रिप्यात और ब्रेजेना प्रमुख हैं। कृषि, परिवहन और ऊर्जा उत्पादन के मामले में यह यूक्रेन की जीवन रेखा मानी जाती है।
ऐतिहासिक विभाजन और सामरिक संदर्भ
ऐतिहासिक रूप से, डनिप्रो नदी ने यूक्रेन को भौगोलिक और राजनीतिक रूप से दो हिस्सों—'राइट बैंक' (दायां तट) और 'लेफ्ट बैंक' (बायां तट) में विभाजित करने वाली एक प्राकृतिक बाधा के रूप में कार्य किया है। वर्तमान भू-राजनीतिक संघर्ष के संदर्भ में, यह नदी और इस पर बने प्रमुख पुल कीव शहर के दोनों किनारों के बीच संपर्क और परिवहन का मुख्य साधन हैं। हालिया संघर्षों और ड्रोन हमलों के दौरान इन रणनीतिक पुलों के प्रभावित होने से यूक्रेनी राजधानी की परिवहन व्यवस्था और आंतरिक आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।

निर्यात संवर्धन हेतु RoDTEP योजना का 31 दिसंबर 2026 तक विस्तार
वाणिज्य मंत्रालय ने भारतीय निर्यात को वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए 'निर्यातित उत्पादों पर शुल्क और करों की छूट' (RoDTEP) योजना को 31 दिसंबर 2026 तक बढ़ा दिया है। इस विस्तार के तहत मौजूदा कर छूट दरें और मूल्य सीमाएं बिना किसी परिवर्तन के लागू रहेंगी।
सारांश (Summary):
वाणिज्य मंत्रालय ने भारतीय निर्यात को वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए 'निर्यातित उत्पादों पर शुल्क और करों की छूट' (RoDTEP) योजना को 31 दिसंबर 2026 तक बढ़ा दिया है। इस विस्तार के तहत मौजूदा कर छूट दरें और मूल्य सीमाएं बिना किसी परिवर्तन के लागू रहेंगी।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
योजना का परिचय और पृष्ठभूमि
RoDTEP (Remission of Duties and Taxes on Exported Products) योजना को विदेश व्यापार नीति (2015-20) में संशोधन के माध्यम से 1 जनवरी 2021 से प्रभावी किया गया था। इसने पूर्ववर्ती 'मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स फ्रॉम इंडिया स्कीम' (MEIS) का स्थान लिया। इस योजना का मुख्य उद्देश्य विनिर्माण और निर्यात श्रृंखला के दौरान लगने वाले उन केंद्रीय, राज्य और स्थानीय शुल्कों व करों को वापस (रिफ़ंड) करना है, जो अन्य किसी माध्यम से प्रतिपूर्ति या रिफंड नहीं होते हैं। यह पूरी तरह से विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के अनुकूल है और इसे ICEGATE पोर्टल के माध्यम से पूरी तरह डिजिटल रूप से संचालित किया जाता है।
प्रमुख उद्देश्य और कवर किए जाने वाले कर
इस योजना का प्राथमिक लक्ष्य भारत से होने वाले निर्यात को बढ़ावा देना और घरेलू करों के बोझ को कम करके निर्यातकों को वैश्विक स्तर पर एक समान अवसर (Level Playing Field) प्रदान करना है। इसके तहत उत्पादों पर लगने वाले अप्रत्यक्ष करों, जैसे- परिवहन लागत पर लगने वाले कर, मंडियों के कर (Mandi Tax), बिजली शुल्क, ईंधन पर लगने वाले केंद्रीय उत्पाद शुल्क और पूर्व-चरण के संचयी अप्रत्यक्ष करों की प्रतिपूर्ति की जाती है। यह योजना निर्यातकों को इलेक्ट्रॉनिक स्क्रिप (e-scrip) के रूप में लाभ प्रदान करती है, जिसका उपयोग सीमा शुल्क भुगतान के लिए किया जा सकता है।
पात्रता मानदंड और वर्तमान विस्तार
RoDTEP योजना के दायरे में घरेलू टैरिफ क्षेत्र (DTA) की इकाइयां, अग्रिम प्राधिकरण (Advance Authorisation) धारक, विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) की इकाइयां और निर्यात उन्मुख इकाइयां (EOUs) शामिल हैं। इसके अलावा, मर्चेंट और मैन्युफैक्चरर दोनों प्रकार के निर्यातक इसके पात्र हैं बशर्ते निर्यातित उत्पादों का मूल देश (Country of Origin) भारत हो [cite: हालिया अधिसूचना के अनुसार, सरकार ने इस योजना की निरंतरता बनाए रखते हुए इसे 31 दिसंबर 2026 तक विस्तारित किया है, जिसमें पूर्व निर्धारित दरें और मूल्य सीमाएं यथावत रखी गई हैं।
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