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जंतर-मंतर पुलिस कार्रवाई: सुप्रीम कोर्ट ने बनाई 5 सदस्यीय कमेटी

जंतर-मंतर पुलिस कार्रवाई: सुप्रीम कोर्ट ने बनाई 5 सदस्यीय कमेटी

Delight News
📅 20 Aug2026

जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों पर पुलिस के कथित अत्यधिक बल प्रयोग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय हाई-पावर्ड जांच कमेटी का गठन किया है। यह कमेटी पेलेट गन्स और इलेक्ट्रिक बैटन्स के इस्तेमाल समेत सभी गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच करेगी।

जंतर-मंतर पुलिस कार्रवाई: सुप्रीम कोर्ट ने बनाई 5 सदस्यीय कमेटी
खबर का निचोड़
जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों पर पुलिस के कथित अत्यधिक बल प्रयोग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय हाई-पावर्ड जांच कमेटी का गठन किया है। यह कमेटी पेलेट गन्स और इलेक्ट्रिक बैटन्स के इस्तेमाल समेत सभी गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच करेगी।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए हालिया प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा किए गए बल प्रयोग का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। प्रदर्शनकारियों पर पुलिस के ज़रिए आवश्यकता से अधिक ताकत इस्तेमाल करने के गंभीर आरोपों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी जांच का आदेश दिया है। इस पूरे प्रकरण की तह तक जाने के लिए 5 सदस्यों वाली एक विशेष हाई-पावर्ड इंक्वायरी कमेटी का गठन किया गया है।
अदालत का यह कदम लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष पुलिसिया कार्रवाई पर कई सवाल उठाए थे, जिसके बाद शीर्ष अदालत ने हस्तक्षेप करते हुए यह स्वतंत्र जांच बिठाने का निर्देश दिया।
जांच कमेटी की कमान और मुख्य मुद्दे
इस हाई-पावर्ड इंक्वायरी कमेटी की अगुवाई सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर सुभाष रेड्डी करेंगे। उनके नेतृत्व में 5 सदस्यों की यह टीम पुलिसिया कार्रवाई के हर पहलू की बारीकी से पड़ताल करेगी। इस जांच का मुख्य दायरा यह तय करना होगा कि क्या मौके पर तैनात पुलिस बल ने हालात को संभालने के लिए तय मानकों का उल्लंघन किया या फिर वाकई सुरक्षा एजेंसियों ने जरूरत से ज्यादा सख्त कदम उठाए।
कमेटी मुख्य रूप से भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पेलेट गन्स (Pellet Guns) और इलेक्ट्रिक बैटन्स (Electric Batons) जैसे हथियारों के इस्तेमाल की जांच करेगी। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने अत्यधिक हिंसक और गैर-जरूरी तरीकों का सहारा लिया, जिससे कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए। कमेटी इन सभी डिजिटल सबूतों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और पुलिस रिकॉर्ड्स की जांच करके अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी।
क्या थे आरोप और क्यों हुआ विवाद?
जंतर-मंतर हमेशा से ही देश में शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने का प्रमुख केंद्र रहा है। हालांकि, हाल ही में हुए प्रदर्शन के दौरान हालात अचानक तनावपूर्ण हो गए। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि वे अपनी जायज मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से जमा हुए थे, लेकिन पुलिस ने बिना किसी ठोस उकसावे के उन पर हमला बोल दिया।
दूसरी ओर, पुलिस अधिकारियों का रुख यह रहा है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य था। अब जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाली यह 5 सदस्यीय कमेटी दोनों पक्षों के तर्कों को सुनेगी और अपनी निष्पक्ष रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी।
विराट कोहली को ₹5 करोड़ खर्च कर बुलाया गया; प्रेमानंद महाराज के आश्रम पर बड़ा आरोप

विराट कोहली को ₹5 करोड़ खर्च कर बुलाया गया; प्रेमानंद महाराज के आश्रम पर बड़ा आरोप

Delight News
📅 05 Oct2026

​श्रीकृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश शर्मा फलाहारी ने आरोप लगाया है कि प्रेमानंद महाराज के आश्रम में भू-माफिया और बिल्डर लॉबी गुट सक्रिय है। उन्होंने दावा किया है कि माफिया ने निजी हित और पीआर के लिए ₹5 करोड़ खर्च कर विराट कोहली को पहली बार आश्रम बुलाया था।

विराट कोहली को ₹5 करोड़ खर्च कर बुलाया गया; प्रेमानंद महाराज के आश्रम पर बड़ा आरोप
खबर का निचोड़ (Summary)
श्रीकृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश शर्मा फलाहारी ने आरोप लगाया है कि प्रेमानंद महाराज के आश्रम में भू-माफिया और बिल्डर लॉबी गुट सक्रिय है। उन्होंने दावा किया है कि माफिया ने निजी हित और पीआर के लिए ₹5 करोड़ खर्च कर विराट कोहली को पहली बार आश्रम बुलाया था।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के अध्यक्ष का सनसनीखेज दावा
वृंदावन स्थित संत प्रेमानंद महाराज के आश्रम को लेकर एक नया और बड़ा विवाद सामने आया है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश शर्मा फलाहारी ने आश्रम की आंतरिक व्यवस्थाओं और प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कई बड़े दावे किए हैं।
आश्रम में भू-माफिया और बिल्डर लॉबी के सक्रिय होने का आरोप
फलाहारी महाराज ने आरोप लगाया है कि वर्तमान में प्रेमानंद महाराज के आश्रम के भीतर भू-माफिया और बिल्डर लॉबी का गुट पूरी तरह से सक्रिय हो चुका है। उनके मुताबिक ये लोग आश्रम की आड़ में अपने निजी हितों को साधने का काम कर रहे हैं।
विराट कोहली के दौरे पर ₹5 करोड़ खर्च करने का दावा
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा दावा यह किया गया है कि माफिया ने अपने निजी स्वार्थ और पीआर (PR) के तहत भारी-भरकम रकम खर्च की है। आरोप के अनुसार, विराट कोहली को पहली बार आश्रम बुलाने के लिए करीब ₹5 करोड़ खर्च किए गए थे, जबकि कोहली और अनुष्का शर्मा पहले भी कई बार आश्रम जा चुके हैं।
IOCL में 335 पदों पर भर्ती, बिना परीक्षा मिलेगी एंट्री

IOCL में 335 पदों पर भर्ती, बिना परीक्षा मिलेगी एंट्री

Delight News
📅 05 Oct2026

इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) ने वेस्टर्न रीजन में टेक्नीशियन, ट्रेड और ग्रेजुएट अप्रेंटिस के 335 पदों पर आवेदन मंगाए हैं। उम्मीदवारों का चयन बिना किसी परीक्षा के, केवल मेरिट लिस्ट के आधार पर होगा। इसके लिए 5 अक्टूबर से 4 नवंबर तक नि:शुल्क आवेदन किया जा सकता है।

IOCL में 335 पदों पर भर्ती, बिना परीक्षा मिलेगी एंट्री
खबर का निचोड़
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) ने वेस्टर्न रीजन में टेक्नीशियन, ट्रेड और ग्रेजुएट अप्रेंटिस के 335 पदों पर आवेदन मंगाए हैं। उम्मीदवारों का चयन बिना किसी परीक्षा के, केवल मेरिट लिस्ट के आधार पर होगा। इसके लिए 5 अक्टूबर से 4 नवंबर तक नि:शुल्क आवेदन किया जा सकता है।
इंडियन ऑयल में करियर बनाने का सुनहरा मौका
सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं और तकनीकी क्षेत्र में ट्रेनिंग की चाह रखने वाले अभ्यर्थियों के लिए एक बेहतरीन अवसर सामने आया है। महारत्न कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) के मार्केटिंग डिवीज़न ने वेस्टर्न रीजन के तहत 335 अप्रेंटिस पदों के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। इस भर्ती प्रक्रिया के तहत चुने गए उम्मीदवारों को 12 महीने की अवधि के लिए स्टाइपेंड के साथ अप्रेंटिसशिप ट्रेनिंग दी जाएगी।
पदों का विवरण और श्रेणियां
इस भर्ती अभियान के माध्यम से अलग-अलग योग्यता वाले उम्मीदवारों के लिए अवसर उपलब्ध कराए गए हैं। कुल 335 पदों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
टेक्नीशियन अप्रेंटिस
ट्रेड अप्रेंटिस
ग्रेजुएट अप्रेंटिस
अलग-अलग स्ट्रीम्स और ट्रेड्स के लिए पदों की संख्या निर्धारित की गई है, जिससे डिप्लोमा, आईटीआई और डिग्री धारक उम्मीदवार अपनी योग्यता के अनुसार आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।
बिना लिखित परीक्षा के चयन, मेरिट से बनेगी बात
इस भर्ती की सबसे खास बात यह है कि उम्मीदवारों को किसी भी प्रकार की लिखित परीक्षा या कठिन इंटरव्यू दौर से नहीं गुजरना पड़ेगा। चयन प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और मेरिट आधारित रखी गई है। अभ्यर्थियों द्वारा उनकी शैक्षणिक योग्यता (क्वालिफाइंग परीक्षा) में प्राप्त अंकों के आधार पर एक मेरिट सूची तैयार की जाएगी। इसी मेरिट लिस्ट के जरिए योग्य उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट करके सीधे ट्रेनिंग के लिए चुना जाएगा।
आवेदन प्रक्रिया और महत्वपूर्ण तिथियां
इच्छुक और योग्य उम्मीदवार IOCL के आधिकारिक पोर्टल पर जाकर ऑनलाइन माध्यम से अपना फॉर्म जमा कर सकते हैं। आवेदन प्रक्रिया 5 अक्टूबर से शुरू हो चुकी है और फॉर्म भरने की अंतिम तिथि 4 नवंबर रखी गई है।
आवेदकों के लिए एक राहत की बात यह भी है कि इस भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने के लिए कोई आवेदन शुल्क नहीं रखा गया है। सभी वर्गों के उम्मीदवार बिना किसी शुल्क के इसके लिए आवेदन कर सकते हैं।
12 महीने की ट्रेनिंग से संवरेगा भविष्य
चयनित उम्मीदवारों को 12 महीने की अप्रेंटिसशिप ट्रेनिंग के दौरान कोर इंडस्ट्री का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त होगा। देश की सबसे बड़ी तेल कंपनियों में से एक में काम करने का यह अनुभव युवाओं के भविष्य के करियर के लिए बेहद मददगार साबित होगा। आवेदकों को सलाह दी जाती है कि वे अंतिम तारीख का इंतजार किए बिना समय रहते अपना आवेदन पूरा कर लें।
वैध वीजा और भारत में प्रवेश के अधिकार पर दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय

वैध वीजा और भारत में प्रवेश के अधिकार पर दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय

Delight News
📅 05 Oct2026

दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि वैध वीजा होने मात्र से किसी विदेशी नागरिक को भारत में प्रवेश का कोई अंतर्निहित या कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार नहीं मिल जाता। यह निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के आधार पर तुर्कमेनिस्तान की नागरिक की याचिका खारिज करते हुए दिया गया।

शीर्षक (Title): वैध वीजा और भारत में प्रवेश के अधिकार पर दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय
सारांश (Summary):
दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि वैध वीजा होने मात्र से किसी विदेशी नागरिक को भारत में प्रवेश का कोई अंतर्निहित या कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार नहीं मिल जाता। यह निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के आधार पर तुर्कमेनिस्तान की नागरिक की याचिका खारिज करते हुए दिया गया।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
मामला एवं कानूनी पृष्ठभूमि
यह विवाद तब उत्पन्न हुआ जब तुर्कमेनिस्तान की एक नागरिक को वैध बिजनेस वीजा होने के बावजूद नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर प्रवेश से रोक दिया गया और उसे उसी दिन वापस लौटना पड़ा। याचिकाकर्ता ने अपने पति, जो समान श्रेणी के वीजा पर आए थे और जिन्हें प्रवेश की अनुमति दी गई थी, के साथ हुए कथित भेदभाव और बिना कारण बताए प्रवेश अस्वीकार किए जाने को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया था।
न्यायालय का केंद्रीय तर्क और संप्रभु शक्ति
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वीजा जारी करना, प्रवेश से इनकार करना और आव्रजन (इमिग्रेशन) मंजूरी देना राज्य के संप्रभु कार्य हैं, जिनमें राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और प्रशासनिक विवेक जैसे गंभीर पहलू शामिल होते हैं। अदालत ने रेखांकित किया कि वीजा की आवश्यकताओं को पूरा करना और देश में वास्तविक प्रवेश पाना दोनों अलग-अलग विषय हैं। वैधानिक ढांचा यह मानता है कि केवल वीजा होने मात्र से भारत में प्रवेश का कोई पूर्ण और अशर्त अधिकार स्वतः सृजित नहीं होता।
समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) पर निर्णय
न्यायालय ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि उसके पति को अनुमति मिलना और उसे रोका जाना अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है। अदालत के अनुसार, चूंकि याचिकाकर्ता के संबंध में विशिष्ट 'प्रतिकूल इनपुट्स' (Adverse Inputs) प्राप्त हुए थे, इसलिए दोनों मामलों को एक समान नहीं माना जा सकता। राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में सक्षम प्राधिकारियों द्वारा लिए गए निर्णयों के आधार पर याचिका को खारिज कर दिया गया।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर का तीसरा चरण और नवीकरणीय ऊर्जा निकासी की चुनौतियाँ

ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर का तीसरा चरण और नवीकरणीय ऊर्जा निकासी की चुनौतियाँ

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📅 05 Oct2026

केंद्र सरकार ने 1.86 लाख करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर (GEC) के तीसरे चरण को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य 135 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा की निकासी को सुगम बनाना है। इसमें पहली बार बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) को शामिल किया गया है।

शीर्षक (Title): ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर का तीसरा चरण और नवीकरणीय ऊर्जा निकासी की चुनौतियाँ
सारांश (Summary):
केंद्र सरकार ने 1.86 लाख करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर (GEC) के तीसरे चरण को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य 135 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा की निकासी को सुगम बनाना है। इसमें पहली बार बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) को शामिल किया गया है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर और उसका महत्व
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर बड़े पैमाने पर सौर और पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा को राष्ट्रीय पावर ग्रिड में एकीकृत करने के लिए समर्पित ट्रांसमिशन बुनियादी ढांचा तैयार करने का एक प्रमुख सरकारी कार्यक्रम है। जैसे-जैसे भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता तेजी से विस्तार कर रही है, वैसे-वैसे ग्रिड में बिजली के संप्रेषण और संतुलन की चुनौती भी बढ़ रही है। 'ऊर्जा निकासी' (Evacuation) से तात्पर्य नवीकरणीय स्रोतों से उत्पन्न बिजली को उन स्थानों तक स्थानांतरित करना है जहाँ इसकी वास्तव में खपत होती है।
तीसरे चरण की मुख्य विशेषताएँ और बैटरी स्टोरेज
जीईसी के तीसरे चरण में पहली बार एक समर्पित बैटरी ऊर्जा भंडारण घटक को शामिल किया गया है, जिसमें 50 गीगावाट-घंटे (GWh) के बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) की तैनाती का प्रावधान है। ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ उच्च उत्पादन अवधि के दौरान अतिरिक्त नवीकरणीय बिजली का भंडारण करती हैं और मांग बढ़ने तथा उत्पादन कम होने पर इसे डिस्चार्ज करती हैं। यह प्रणाली नवीकरणीय ऊर्जा को सुरक्षित रखने और ग्रिड की अस्थिरता को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
ट्रांसमिशन बाधाएँ और वित्तीय आवंटन
विशेष रूप से दिन के समय उच्च सौर उत्पादन के दौरान ट्रांसमिशन बाधाएँ और ग्रिड की भीड़भाड़ के कारण नवीकरणीय ऊर्जा की निकासी बाधित होती है। इस समस्या से निपटने के लिए स्वीकृत 1.86 लाख करोड़ रुपये में से 1.36 लाख करोड़ रुपये से अधिक अंतर-राज्यीय ट्रांसमिशन सिस्टम (InSTS) के लिए, 50,000 करोड़ रुपये 50 GWh BESS के लिए और 54,082 करोड़ रुपये केंद्रीय वित्तीय सहायता (CFS) के रूप में आवंटित किए गए हैं। केंद्रीय वित्तीय सहायता का उद्देश्य अंतर-राज्यीय ट्रांसमिशन शुल्कों को ऑफसेट करना और उपभोक्ताओं के लिए बिजली की लागत को कम रखना है।
केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल संवर्ग बनाम आईपीएस प्रतिनियुक्ति विवाद और विधायी टकराव

केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल संवर्ग बनाम आईपीएस प्रतिनियुक्ति विवाद और विधायी टकराव

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📅 05 Oct2026

उच्चतम न्यायालय में अवमानना याचिकाओं की सुनवाई से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के वरिष्ठ कमांड पदों पर भारतीय पुलिस सेवा (IPS) की प्रतिनियुक्ति को लेकर पुराना संस्थागत विवाद फिर से गहरा गया है। यह विवाद संवर्ग प्रबंधन, पदोन्नति में ठहराव और न्यायिक निर्देशों बनाम विधायी कार्रवाइयों के बीच संतुलन से जुड़ा है।

शीर्षक (Title): केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल संवर्ग बनाम आईपीएस प्रतिनियुक्ति विवाद और विधायी टकराव
सारांश (Summary):
उच्चतम न्यायालय में अवमानना याचिकाओं की सुनवाई से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के वरिष्ठ कमांड पदों पर भारतीय पुलिस सेवा (IPS) की प्रतिनियुक्ति को लेकर पुराना संस्थागत विवाद फिर से गहरा गया है। यह विवाद संवर्ग प्रबंधन, पदोन्नति में ठहराव और न्यायिक निर्देशों बनाम विधायी कार्रवाइयों के बीच संतुलन से जुड़ा है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
हालिया विवाद और न्यायिक पृष्ठभूमि
शीर्ष अदालत ने 23 मई 2025 के अपने ऐतिहासिक फैसले (संजय प्रकाश बनाम भारत संघ) के अनुपालन न होने पर दायर अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की है। इस फैसले में न्यायालय ने सीएपीएफ के ग्रुप-ए कार्यपालिका संवर्गों को 'संगठित ग्रुप-ए सेवा' (OGAS) के रूप में मान्यता दी थी और वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड (एसएजी) तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति को दो साल की समय सीमा के भीतर क्रमिक रूप से कम करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद सरकार द्वारा 46 आईपीएस अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर लाए जाने के बाद यह कानूनी और प्रशासनिक टकराव उत्पन्न हुआ है।
अंतर्निहित विवाद और संवर्ग ठहराव की समस्या
सीएपीएफ (सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी) के अपने स्वयं के ग्रुप-ए अधिकारी होते हैं जो सहायक कमांडेंट के रूप में शामिल होते हैं। पारंपरिक रूप से डीआईजी के 20% और आईजी के 50% पद आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के लिए आरक्षित रहे हैं। संवर्ग अधिकारियों का तर्क है कि उच्च पदों पर बाहरी प्रतिनियुक्ति से गंभीर पदोन्नति अवरोध (स्टैग्नेशन) उत्पन्न होता है, जिससे वर्षों की उत्कृष्ट सेवा के बाद भी उन्हें उच्च कमान पद नहीं मिल पाते और उनका मनोबल प्रभावित होता है।
नया सीएपीएफ अधिनियम और संवैधानिक प्रश्न
न्यायालय के 2025 के आदेश के प्रभाव को निष्प्रभावी करने के उद्देश्य से सरकार ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम पारित किया है। नए कानून में 50 प्रतिशत आईजी पद, कम से कम 67 प्रतिशत एडीजी पद और सभी स्पेशल डीजी तथा डीजी पद प्रतिनियुक्ति के माध्यम से भरने का प्रावधान किया गया है। साथ ही, इसमें यह भी प्रावधान है कि इसके तहत बनाए गए नियम न्यायालयों के किसी भी असंगत आदेश या निर्णय के बावजूद प्रभावी होंगे। वर्तमान में यह मामला इस बात पर केंद्रित है कि क्या यह विधायी ढांचा न्यायिक समीक्षा और शक्तियों के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है।

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