
दिल्ली का नया 'टाइम-बाउंड पब्लिक सर्विस डिलीवरी' विधेयक: सुशासन की ओर एक महत्वपूर्ण कदम
दिल्ली सरकार ने 'दिल्ली (नागरिकों का समयबद्ध और सुगम सेवा वितरण का अधिकार) विधेयक, 2026' को मंजूरी दी है। यह कानून 2011 के पुराने अधिनियम का स्थान लेगा। इसका उद्देश्य सरकारी सेवाओं को डिजिटल और समयबद्ध बनाना, प्रशासनिक जवाबदेही तय करना और नागरिकों को कानूनी अधिकार प्रदान करना है।
सारांश (Summary):
दिल्ली सरकार ने 'दिल्ली (नागरिकों का समयबद्ध और सुगम सेवा वितरण का अधिकार) विधेयक, 2026' को मंजूरी दी है। यह कानून 2011 के पुराने अधिनियम का स्थान लेगा। इसका उद्देश्य सरकारी सेवाओं को डिजिटल और समयबद्ध बनाना, प्रशासनिक जवाबदेही तय करना और नागरिकों को कानूनी अधिकार प्रदान करना है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis)
विधायी पृष्ठभूमि और उद्देश्य
दिल्ली मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत नया विधेयक, 'दिल्ली (नागरिकों का समयबद्ध और सुगम सेवा वितरण का अधिकार) विधेयक, 2026', सुशासन के क्षेत्र में एक व्यापक सुधार है। यह प्रस्तावित कानून 2011 के मौजूदा 'दिल्ली (समयबद्ध सेवा वितरण) अधिनियम' को प्रतिस्थापित करेगा। इसका प्राथमिक उद्देश्य सरकारी सेवाओं को केवल प्रशासनिक कार्य न मानकर, उन्हें नागरिकों के एक 'कानूनी अधिकार' के रूप में स्थापित करना है। सरकार का यह कदम प्रौद्योगिकी के माध्यम से प्रशासनिक तंत्र में पारदर्शिता लाने और नौकरशाही की जवाबदेही तय करने पर केंद्रित है।
कानून की मुख्य विशेषताएं
इस नए विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका पूरी तरह से 'डिजिटल-केंद्रित' होना है। सेवा वितरण की पूरी प्रक्रिया को तकनीकी रूप से सुव्यवस्थित किया जाएगा, जिससे मानवीय हस्तक्षेप कम होगा। यदि किसी सरकारी सेवा में निर्धारित समय से अधिक विलंब होता है, तो सिस्टम में 'स्वचालित वृद्धि तंत्र' (Automatic Escalation Mechanism) सक्रिय हो जाएगा, जिससे मामला स्वतः ही उच्च अधिकारियों के संज्ञान में आ जाएगा। यह तंत्र नागरिकों को बार-बार कार्यालयों के चक्कर काटने की मजबूरी से मुक्ति दिलाने का प्रयास करता है।
प्रशासनिक जवाबदेही और शिकायत निवारण
विधेयक में एक स्वतंत्र शिकायत निवारण प्रणाली का प्रस्ताव है। इसके तहत 'दिल्ली सेवा का अधिकार आयोग' (Delhi Right to Service Commission) की स्थापना की जाएगी। यह आयोग उन मामलों की निगरानी करेगा जहां सेवाओं में देरी हुई है या जहां नागरिकों को असुविधा का सामना करना पड़ा है। साथ ही, विधेयक में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों पर दंड लगाने का भी प्रावधान है, जो कार्य निष्पादन में कोताही बरतने वाले सरकारी सेवकों के लिए एक निवारक (deterrent) के रूप में कार्य करेगा।
ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और सेवा विस्तार
दिल्ली सरकार ने इस ढांचे को और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए हाल ही में 23 नई सेवाओं को इस दायरे में शामिल किया है, जिससे अब कुल सेवाओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इन सेवाओं में विशेष रूप से व्यापारिक और औद्योगिक सुगमता से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता दी गई है। उदाहरण के लिए, श्रम विभाग द्वारा फैक्ट्री योजनाओं को 15 दिनों के भीतर मंजूरी देना और दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम के तहत पंजीकरण को मात्र एक दिन के भीतर पूर्ण करना अनिवार्य बनाया गया है। इसके अलावा, जल बोर्ड द्वारा सीवरेज कनेक्शन की समयसीमा भी निर्धारित की गई है, जो आम नागरिकों के दैनिक जीवन में बड़े सकारात्मक बदलाव लाएगी।
अर्थव्यवस्था और नागरिक सहभागिता पर प्रभाव
यह पहल न केवल आम नागरिकों के लिए सहायक है, बल्कि यह पर्यटन, आतिथ्य (hospitality), निर्माण और अन्य सेवा क्षेत्रों के लिए भी महत्वपूर्ण है। विभिन्न विभागों द्वारा जारी किए जाने वाले अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) और लाइसेंसों के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित होने से निवेशकों और उद्यमियों में सरकारी तंत्र के प्रति विश्वास बढ़ेगा। इससे राज्य की 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' रैंकिंग में सुधार होने की संभावना है और आर्थिक विकास की गति को बल मिलेगा।
यूपीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
वैधानिक आधार: यह विधेयक 'सेवा के अधिकार' (Right to Service) की अवधारणा पर आधारित है, जिसका उद्देश्य लोक प्रशासन में पारदर्शिता और नागरिक-केंद्रित गवर्नेंस को बढ़ावा देना है।
ऐतिहासिक संदर्भ: मध्य प्रदेश (2010) भारत का पहला राज्य था जिसने 'सेवा का अधिकार अधिनियम' लागू किया था। दिल्ली में 2011 में इस दिशा में पहला कानून लाया गया था, जिसे अब 2026 के नए विधेयक द्वारा आधुनिक बनाया जा रहा है।
प्रशासनिक सुधार: यह कानून 'न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन' (Minimum Government, Maximum Governance) के दर्शन को मूर्त रूप देता है।
महत्वपूर्ण शब्दावली: इसमें 'स्वचालित वृद्धि तंत्र' (Automatic Escalation) और 'स्वतंत्र शिकायत निवारण' जैसे शब्द प्रशासनिक उत्तरदायित्व के कीवर्ड हैं, जो मुख्य परीक्षा (Mains) में उपयोगी हो सकते हैं।
उद्देश्य: प्रशासनिक कार्यों को विशेषाधिकार की जगह 'वैधानिक अधिकार' में बदलना, भ्रष्टाचार कम करना और सार्वजनिक सेवाओं में मानवीय विवेक (discretion) का दायरा सीमित करना।

'माय भारत' मंच: युवा सशक्तिकरण और विकसित भारत का रोडमैप
युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय के अंतर्गत 'माय भारत' (MY Bharat) मंच ने 'नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत अभियान' के तहत देश भर में युवा संसदों और मेलों का आयोजन किया है। यह डिजिटल प्लेटफॉर्म 15 से 29 वर्ष के युवाओं को कौशल विकास, नेटवर्किंग और सामुदायिक परिवर्तन का अवसर प्रदान करता है।
सारांश
युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय के अंतर्गत 'माय भारत' (MY Bharat) मंच ने 'नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत अभियान' के तहत देश भर में युवा संसदों और मेलों का आयोजन किया है। यह डिजिटल प्लेटफॉर्म 15 से 29 वर्ष के युवाओं को कौशल विकास, नेटवर्किंग और सामुदायिक परिवर्तन का अवसर प्रदान करता है।
परिचय एवं नवीनतम पहल
हाल ही में 'माय भारत' (MY Bharat) मंच द्वारा 'नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत अभियान' के अंतर्गत देश भर के 1,469 स्थानों पर पड़ोस युवा संसदों (Neighbourhood Youth Parliaments) और युवा मेलों का आयोजन किया गया है। यह पहल देश के युवाओं को सकारात्मक दिशा देने, नशा मुक्त समाज के निर्माण और जमीनी स्तर पर जनभागीदारी को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से संचालित की गई है।
संस्थागत ढांचा और उद्देश्य
यह मंच युवा मामलों के विभाग, युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय के तहत स्थापित एक स्वायत्त निकाय है। इसे भारत सरकार द्वारा सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम XXI, 1860 के तहत एक सोसाइटी के रूप में पंजीकृत किया गया है। इसका प्राथमिक उद्देश्य 15 से 29 वर्ष की आयु वर्ग के गतिशील युवाओं की आवश्यकताओं को पूरा करना और उन्हें 'विकसित भारत' के निर्माण में सक्रिय भागीदार बनने के लिए एक डिजिटल रूप से सशक्त मंच प्रदान करना है।
मंच की मुख्य विशेषताएं और कार्यप्रणाली
माय भारत प्लेटफॉर्म प्रौद्योगिकी आधारित एक संस्थागत तंत्र है जो युवाओं को सरकार, व्यवसाय और गैर-लाभकारी संगठनों के विभिन्न कार्यक्रमों व सीखने के अवसरों से जोड़ता है। यह मंच युवाओं को अपने कौशल-सेट और गतिविधियों को सूचीबद्ध करते हुए व्यक्तिगत प्रोफाइल बनाने की अनुमति देता है। इसके माध्यम से युवा एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं, संभावित मेंटर्स से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं तथा उद्योग जगत के साथ अपने पेशेवर नेटवर्क का विस्तार कर सकते हैं।
परीक्षाोपयोगी और प्रशासनिक महत्व
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से यह विषय सामाजिक न्याय, मानव संसाधन विकास और सुशासन के अंतर्गत अत्यंत प्रासंगिक है। देश के जनसांख्यिकी लाभांश (Demographic Dividend) का सही दिशा में उपयोग करने, कौशल उन्नयन और युवाओं को राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए इस प्रकार के तकनीकी प्लेटफॉर्म एक प्रभावी प्रशासनिक और नीतिगत उपकरण हैं।

सारस क्रेन: अखिल भारतीय जनगणना, पारिस्थितिकी और संरक्षण स्थिति
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) ने भारत के सबसे ऊंचे उड़ने वाले पक्षी 'सारस क्रेन' (Sarus Crane) की आबादी का आकलन करने के लिए राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण की घोषणा की है। आर्द्रभूमि (Wetlands) और कृषि-पारिस्थितिकी प्रणालियों के स्वास्थ्य के सूचक इस पक्षी को आवास विनाश, कीटनाशकों के उपयोग और बिजली की तारों से टकराने जैसे गंभीर खतरों का सामना करना पड़ रहा है।
सारांश
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) ने भारत के सबसे ऊंचे उड़ने वाले पक्षी 'सारस क्रेन' (Sarus Crane) की आबादी का आकलन करने के लिए राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण की घोषणा की है। आर्द्रभूमि (Wetlands) और कृषि-पारिस्थितिकी प्रणालियों के स्वास्थ्य के सूचक इस पक्षी को आवास विनाश, कीटनाशकों के उपयोग और बिजली की तारों से टकराने जैसे गंभीर खतरों का सामना करना पड़ रहा है।
परिचय एवं वर्तमान संदर्भ
अक्टूबर 2026 में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) ने देश भर में सारस क्रेन की जनसंख्या का सटीक अनुमान लगाने, उनके प्रजनन स्थलों का मानचित्रण करने और संरक्षण नीतियों के लिए एक नया राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने हेतु अखिल भारतीय सारस क्रेन सर्वेक्षण का आयोजन किया है। यह पहल विश्व प्रवासी पक्षी दिवस के अवसर पर शुरू की गई है, जिसका मुख्य उद्देश्य नागरिक वैज्ञानिकों, स्थानीय समुदायों और वन विभागों के सहयोग से डेटा अंतराल को भरना है।
प्रमुख शारीरिक विशेषताएं एवं व्यवहार
सारस क्रेन (Antigone antigone) दुनिया का सबसे ऊंचा उड़ने वाला पक्षी है, जिसकी ऊंचाई लगभग 1.5 से 1.8 मीटर तक होती है। यह भारत में पाई जाने वाली क्रेन की एकमात्र स्थायी निवासी (Resident Breeding) प्रजाति है। इसका शरीर मुख्य रूप से स्लेटी (धूसर) रंग का होता है, जबकि सिर और ऊपरी गर्दन पर लाल रंग की त्वचा होती है। यह पक्षी एकनिष्ठ (Monogamous) होता है और जीवनभर एक ही साथी के साथ जोड़ा बनाकर रहता है।
आवास एवं वितरण
सारस क्रेन मुख्य रूप से आर्द्रभूमियों, दलदलों, उथले जल निकायों, घास के मैदानों और सिंचित कृषि क्षेत्रों (विशेषकर धान के खेतों) में निवास करते हैं। भारत में इनका मुख्य वितरण गंगा के मैदानी भागों, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा में है। इनमें से सर्वाधिक आबादी उत्तर प्रदेश में पाई जाती है, जहां इसे आधिकारिक राज्य पक्षी (State Bird) का दर्जा प्राप्त है।
प्रमुख खतरे एवं संरक्षण स्थिति
यह प्रजाति मुख्य रूप से आर्द्रभूमि के क्षरण, कृषि भूमि के उपयोग में परिवर्तन, रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग, हाई-टेंशन बिजली लाइनों से टकराकर करंट लगने, तथा आवारा कुत्तों द्वारा अंडों व चूजों के शिकार जैसे खतरों का सामना कर रही है। संरक्षण की दृष्टि से इसे आईयूसीएन (IUCN) की रेड लिस्ट में 'सुभेद्य' (Vulnerable) श्रेणी में रखा गया है। इसके अतिरिक्त, यह साइट्स (CITES) के परिशिष्ट-II और भारत के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत उच्च स्तरीय कानूनी सुरक्षा प्राप्त है।
परीक्षाोपयोगी एवं प्रशासनिक महत्व
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से यह विषय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता संरक्षण के अंतर्गत अत्यंत प्रासंगिक है। सारस क्रेन कृषि-आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण इंडिकेटर स्पीशीज (Indicator Species) है। स्थानीय किसानों के साथ मिलकर सामुदायिक संरक्षण (Community Conservation) को बढ़ावा देना तथा ओवरहेड पावर लाइनों का सुरक्षित प्रबंधन करना प्रशासनिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण उपाय प्रस्तुत करता है।

विश्व आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट: भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर और वैश्विक परिदृश्य
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अपनी प्रमुख फ्लैगशिप रिपोर्ट 'वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक' (WEO) के अक्टूबर 2026 संस्करण में भारत की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। मजबूत घरेलू मांग, सेवाओं में गति और ढांचागत सुधारों के बल पर भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है।
सारांश
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अपनी प्रमुख फ्लैगशिप रिपोर्ट 'वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक' (WEO) के अक्टूबर 2026 संस्करण में भारत की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। मजबूत घरेलू मांग, सेवाओं में गति और ढांचागत सुधारों के बल पर भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है।
परिचय एवं पृष्ठभूमि
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा वर्ष में दो बार (अप्रैल और अक्टूबर में) 'वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक' (WEO) रिपोर्ट जारी की जाती है। यह रिपोर्ट वैश्विक उत्पादन, मुद्रास्फीति, वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP), चालू खाता संतुलन और बेरोजगारी दर जैसे प्रमुख संकेतकों पर आंकड़े तथा पूर्वानुमान प्रदान करती है। हाल ही में अक्टूबर 2026 में जारी रिपोर्ट में आईएमएफ ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास अनुमान में उल्लेखनीय सुधार किया है।
भारत हेतु मुख्य आर्थिक अनुमान
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया है, जो पूर्व अनुमानों से अधिक है। आईएमएफ के अनुसार, भारत में उपभोग मांग, निजी निवेश में उछाल तथा जीवंत सेवा क्षेत्र के कारण यह मजबूत आर्थिक गति बनी हुई है। रिपोर्ट में भारत की उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति 2026 में 5 प्रतिशत रहने तथा चालू खाता घाटा (CAD) जीडीपी के 1.5 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान जताया गया है।
वैश्विक आर्थिक रुझान
वैश्विक स्तर पर आर्थिक वृद्धि दर 2026 में 3.1 प्रतिशत और 2027 में 3.4 प्रतिशत रहने का पूर्वानुमान है। उभरते और विकासशील एशियाई देशों की वृद्धि दर 2026 में 5.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि ऊर्जा लागत में वृद्धि, भू-राजनीतिक तनाव और व्यापारिक अनिश्चितताओं के कारण वैश्विक आर्थिक स्थिति खंडित और दबाव में है।
परीक्षाोपयोगी एवं प्रशासनिक महत्व
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से यह रिपोर्ट भारतीय अर्थव्यवस्था, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और वैश्विक आर्थिक गतिशीलता के अंतर्गत महत्वपूर्ण है। वैश्विक मंदी और अनिश्चितता के दौर में भारत की 7 प्रतिशत की स्थिर वृद्धि दर देश की रणनीतिक स्वायत्तता, व्यापक आंतरिक बाजार और आर्थिक नीतियों की सुदृढ़ता को रेखांकित करती है।

अनुसंधान, विकास और नवाचार कोष: निजी क्षेत्र में अनुसंधान का सशक्तिकरण
भारत सरकार की प्रमुख पहल अनुसंधान, विकास और नवाचार कोष (RDIF) ने 19 द्वितीय-स्तरीय कोष प्रबंधकों (SLFMs) के पहले समूह की घोषणा की है। 1 लाख करोड़ रुपये के कॉर्पस वाले इस फंड का उद्देश्य अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए शून्य या कम ब्याज दरों पर दीर्घकालिक पूंजी उपलब्ध कराना है।
सारांश
भारत सरकार की प्रमुख पहल अनुसंधान, विकास और नवाचार कोष (RDIF) ने 19 द्वितीय-स्तरीय कोष प्रबंधकों (SLFMs) के पहले समूह की घोषणा की है। 1 लाख करोड़ रुपये के कॉर्पस वाले इस फंड का उद्देश्य अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए शून्य या कम ब्याज दरों पर दीर्घकालिक पूंजी उपलब्ध कराना है।
परिचय एवं पृष्ठभूमि
अक्टूबर 2026 में अनुसंधान, विकास और नवाचार कोष (RDIF) ने 19 द्वितीय-स्तरीय फंड मैनेजरों के पहले समूह की स्वीकृति के साथ अपनी परिचालन प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। यह पहल भारत में अनुसंधान और विकास क्षेत्र में वित्तीय अंतर को दूर करने और उच्च-जोखिम वाले नवाचारों के लिए पेशेंट कैपिटल (दीर्घकालिक पूंजी) उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई है।
प्रशासनिक एवं शासी संरचना
इस योजना का नोडल विभाग विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) है। इसका संचालन अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) के तहत गठित एक विशेष उद्देश्य कोष (Special Purpose Fund) और स्वतंत्र व्यावसायिक इकाई द्वारा किया जा रहा है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाला ANRF शासी बोर्ड इस योजना को रणनीतिक दिशा प्रदान करता है।
कार्यान्वयन और वित्तपोषण ढांचा
RDIF की कुल बजटीय निधि 1 लाख करोड़ रुपये है। फंड सीधे उद्योगों या स्टार्टअप्स में निवेश न करके द्वितीय-स्तरीय फंड मैनेजरों (SLFMs) के माध्यम से पूंजी का वितरण करेगा। ये SLFMs वैकल्पिक निवेश कोष (AIF), विकास वित्त संस्थान (DFI) और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFC) हो सकते हैं, जो आरडीआई योगदान के बराबर निजी पूंजी जुटाने में भी मदद करेंगे।
मुख्य उद्देश्य और लक्षित क्षेत्र
इस फंड का मुख्य लक्ष्य सनराइज क्षेत्रों तथा रणनीतिक और आर्थिक सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में निजी अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना है। यह उच्च प्रौद्योगिकी तत्परता स्तरों (TRL) वाले परिवर्तनकारी प्रोजेक्ट्स का वित्तपोषण करने, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के अधिग्रहण और डीप-टेक फंड ऑफ फंड्स की स्थापना को सुविधाजनक बनाने पर केंद्रित है।
परीक्षाोपयोगी एवं प्रशासनिक महत्व
प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से यह विषय भारतीय अर्थव्यवस्था, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीतियों, और 'आत्मनिर्भर भारत' के संकल्प से सीधे तौर पर जुड़ा है। यह व्यवस्था सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से भारत को वैश्विक अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए एक आधुनिक प्रशासनिक मॉडल प्रस्तुत करती है।

भारतीय तटरक्षक बल द्वारा माउंट मुकुट का सफल आरोहण और भूगोल
भारतीय तटरक्षक बल (ICG) के 17 सदस्यीय पर्वतारोहण दल ने उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में स्थित 7,045 मीटर ऊंची चोटी 'माउंट मुकुट' पर सफलतापूर्वक तिरंगा फहराया है। 'तट से पर्वत' (Tat Se Parwat) अभियान के तहत यह उपलब्धि वर्ष 2027 में तटरक्षक बल की स्वर्ण जयंती पर प्रस्तावित माउंट एवरेस्ट अभियान की तैयारियों का हिस्सा है।
सारांश
भारतीय तटरक्षक बल (ICG) के 17 सदस्यीय पर्वतारोहण दल ने उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में स्थित 7,045 मीटर ऊंची चोटी 'माउंट मुकुट' पर सफलतापूर्वक तिरंगा फहराया है। 'तट से पर्वत' (Tat Se Parwat) अभियान के तहत यह उपलब्धि वर्ष 2027 में तटरक्षक बल की स्वर्ण जयंती पर प्रस्तावित माउंट एवरेस्ट अभियान की तैयारियों का हिस्सा है।
परिचय एवं अभियान की पृष्ठभूमि
हाल ही में भारतीय तटरक्षक बल के 17 सदस्यीय पर्वतारोहण दल ने दार्जिलिंग स्थित हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट (HMI) के मार्गदर्शन में 7,045 मीटर ऊंचे माउंट मुकुट पर विजय प्राप्त की है। यह अभियान बल के 18 महीने लंबे कठोर प्रशिक्षण कार्यक्रम का पांचवां और अंतिम चरण था, जिसका उद्देश्य तटरक्षक कर्मियों को अत्यधिक ऊंचाई की विषम परिस्थितियों और दुर्गम भू-भाग के लिए तैयार करना है।
भौगोलिक स्थिति और बनावट
माउंट मुकुट भारत के उत्तराखंड राज्य में गढ़वाल हिमालय के ज़ास्कर श्रेणी (Zaskar Range) में माउंट कामेट के निकट स्थित एक उच्च तुंगता वाली चोटी है। यह गंगोत्री समूह की चोटियों का हिस्सा है और नंदा देवी अभयारण्य क्षेत्र के अंतर्गत आती है। इस चोटी का नाम इसके मुकुट के समान दिखने वाले विशिष्ट आकार के कारण 'मुकुट' पड़ा है, जो गढ़वाल की हरी-भरी घाटियों और तिब्बती पठार के शुष्क परिदृश्य के बीच एक संक्रमण क्षेत्र का निर्माण करती है।
गढ़वाल हिमालय की मुख्य विशेषताएं
गढ़वाल हिमालय मध्य हिमालय का पश्चिमी भाग बनाता है, जो मुख्य रूप से उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में विस्तृत है। यह पश्चिम में टोंस नदी से लेकर पूर्व में काली नदी तक फैला हुआ है। इसकी उत्तरी सीमा तिब्बत (चीन) से तथा दक्षिणी सीमा शिवालिक पहाड़ियों से मिलती है। इस क्षेत्र में भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी और यमुना जैसी प्रमुख नदियां प्रवाहित होती हैं, तथा यहां चीड़, बांज, देवदार और रोडोडेंड्रोन के घने वन पाए जाते हैं।
सामरिक एवं परीक्षाोपयोगी महत्व
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से यह विषय भूगोल, पर्यावरण विज्ञान और राष्ट्रीय सुरक्षा बलों की गतिविधियों से जुड़ा है। समुद्र तट पर सुरक्षा दायित्वों का निर्वहन करने वाले बल द्वारा उच्च हिमालयी शिखरों को फतह करना सैनिकों के मानसिक दृढ़, शारीरिक सहनशक्ति और सामरिक उच्च-तुंगता दक्षता (High-Altitude Preparedness) को प्रदर्शित करता है।
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