
अभ्यास इबसामाआर IX: त्रिपक्षीय समुद्री सुरक्षा एवं सहयोग
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की नौसेनाओं के बीच द्विवार्षिक त्रिपक्षीय समुद्री अभ्यास इबसामाआर के नौवें संस्करण (IBSAMAR IX) 2026 का आयोजन दक्षिण अफ्रीका में किया जा रहा है। इसमें भारतीय नौसेना का अग्रणी गाइडेड-मिसाइल स्टील्थ फ्रिगेट आईएनएस तरकश (INS Tarkash) चेतक हेलीकॉप्टर के साथ भाग ले रहा है।
सारांश
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की नौसेनाओं के बीच द्विवार्षिक त्रिपक्षीय समुद्री अभ्यास इबसामाआर के नौवें संस्करण (IBSAMAR IX) 2026 का आयोजन दक्षिण अफ्रीका में किया जा रहा है। इसमें भारतीय नौसेना का अग्रणी गाइडेड-मिसाइल स्टील्थ फ्रिगेट आईएनएस तरकश (INS Tarkash) चेतक हेलीकॉप्टर के साथ भाग ले रहा है।
परिचय एवं पृष्ठभूमि
अक्टूबर 2026 में भारत-ब्राजील-दक्षिण अफ्रीका (IBSA) ढांचे के तहत त्रिपक्षीय समुद्री अभ्यास 'इबसामाआर' का नौवां संस्करण (IBSAMAR IX) दक्षिण अफ्रीका के साइमन्स टाउन (Simon's Town) में शुरू हुआ है। वर्ष 2008 से द्विवार्षिक रूप से आयोजित होने वाला यह अभ्यास तीनों देशों की नौसेनाओं के मध्य रक्षा सहयोग और समुद्री साझेदारी का एक प्रमुख स्तंभ है।
विषय वस्तु और मुख्य उद्देश्य
इबसामाआर IX की विषय वस्तु (Theme) 'Stronger Together Towards a Shared Future in the Maritime Domain' (समुद्री क्षेत्र में एक साझा भविष्य के लिए एक साथ मजबूत) रखी गई है। इस अभ्यास का प्राथमिक उद्देश्य सामूहिक समुद्री सुरक्षा को बढ़ावा देना, सर्वोत्तम अंतर-संचालनीयता (interoperability) स्थापित करना और हिंद महासागर व अटलांटिक महासागरीय क्षेत्रों में साझा समुद्री चुनौतियों से निपटना है।
भागीदार पोत और सैन्य संचालन
भारतीय नौसेना की ओर से रूस निर्मित क्रिवाक III श्रेणी का निर्देशित मिसाइल स्टील्थ फ्रिगेट 'आईएनएस तरकश' और एक एकीकृत चेतक हेलीकॉप्टर इस अभ्यास में भाग ले रहे हैं। अभ्यास में सतह युद्ध, पनडुब्बी रोधी युद्ध, वायु रक्षा संचालन, समुद्री डकैती रोधी अभियान, तथा खोज एवं बचाव (Search and Rescue) संचालन जैसी जटिल नौसैनिक गतिविधियों को शामिल किया गया है।
रणनीतिक एवं परीक्षाोपयोगी महत्व
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से इबसामाआर अभ्यास भारत की 'सागर' (SAGAR - Security and Growth for All in the Region) नीति और दक्षिण-दक्षिण सहयोग (South-South Cooperation) के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यह बहुपक्षीय मंच वैश्विक समुद्री सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की एक विश्वसनीय सुरक्षा प्रदाता (Net Security Provider) के रूप में भूमिका को सुदृढ़ करता है।

राहुल के SC मार्च के खिलाफ 200 वकील मुखर
INDIA ब्लॉक के सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए मार्च के विरोध में लगभग 200 वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) को एक ज्ञापन सौंपा है। वकीलों ने चेतावनी दी है कि यदि इसे अभी नहीं रोका गया, तो भविष्य में अन्य प्रभावशाली लोग भी भीड़ जुटाकर अदालत में शक्ति प्रदर्शन करेंगे, जो न्यायिक स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा है।
खबर का निचोड़ (Summary):
INDIA ब्लॉक के सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए मार्च के विरोध में लगभग 200 वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) को एक ज्ञापन सौंपा है। वकीलों ने चेतावनी दी है कि यदि इसे अभी नहीं रोका गया, तो भविष्य में अन्य प्रभावशाली लोग भी भीड़ जुटाकर अदालत में शक्ति प्रदर्शन करेंगे, जो न्यायिक स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा है।
मुख्य आर्टिकल:
देश की राजधानी दिल्ली में राजनीतिक हलचल के बीच न्यायपालिका और राजनीति के टकराव का एक नया मामला सामने आया है। विपक्षी दलों के गठबंधन 'INDIA' ब्लॉक द्वारा सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए मार्च को लेकर कानूनी बिरादरी में भारी रोष देखने को मिल रहा है। इस विरोध प्रदर्शन के खिलाफ देश के करीब 200 वकीलों ने लामबंद होकर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) को एक औपचारिक ज्ञापन सौंपा है। वकीलों का यह कदम अदालत परिसर के आसपास होने वाले राजनीतिक प्रदर्शनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
वकीलों का कड़ा विरोध और चेतावनी
ज्ञापन सौंपने वाले वकीलों ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि न्याय के मंदिरों के पास इस तरह के राजनीतिक मार्च निकालना न्यायपालिका की गरिमा के अनुकूल नहीं है। उनका स्पष्ट कहना है कि यदि इस प्रवृत्ति को समय रहते नहीं रोका गया, तो इसके दूरगामी और घातक परिणाम हो सकते हैं। भविष्य में देश के अन्य प्रभावशाली लोग या राजनीतिक दल भी इसी तरह भीड़ जुटाकर सीधे अदालतों के सामने शक्ति प्रदर्शन करने का रास्ता अपना सकते हैं।
न्यायिक स्वतंत्रता पर मंडराता खतरा
वकीलों के इस समूह का तर्क है कि अदालतें किसी भी राजनीतिक अखाड़े या शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं बन सकतीं। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन को सौंपे गए ज्ञापन में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि इस तरह की गतिविधियां सीधे तौर पर देश की न्यायिक स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा खतरा पैदा करती हैं। जब अदालत परिसरों के बाहर राजनीतिक भीड़ जुटती है, तो न्याय प्रक्रिया पर अनुचित दबाव पड़ने की आशंका बढ़ जाती है, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
भविष्य की व्यवस्था और चिंताएं
कानूनी विशेषज्ञों और वकीलों का यह प्रतिनिधिमंडल इस बात को लेकर बेहद चिंतित है कि यदि इस तरह की संस्कृति को बढ़ावा मिला, तो न्यायपालिका की निष्पक्षता और पवित्रता प्रभावित होगी। अदालतें कानून के शासन के तहत काम करती हैं न कि भीड़तंत्र या राजनीतिक प्रदर्शनों के दबाव में। वकीलों द्वारा उठाया गया यह कदम आने वाले समय में राजनीतिक दलों और न्यायपालिका के बीच के संबंधों को लेकर एक नई बहस छेड़ सकता है।

खैबर पख्तूनख्वा में इमरजेंसी और तेल-खनिजों का विवाद *
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने खैबर पख्तूनख्वा में इमरजेंसी लगाने के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पार्टी का दावा है कि प्रांत में मौजूद तेल, गैस और खनिजों के कारण यह कदम उठाया गया है, क्योंकि वहां की चुनी हुई सरकार इन संसाधनों को बेचने के रास्ते में रुकावट बन रही थी।
खबर का निचोड़ (Summary):
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने खैबर पख्तूनख्वा में इमरजेंसी लगाने के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पार्टी का दावा है कि प्रांत में मौजूद तेल, गैस और खनिजों के कारण यह कदम उठाया गया है, क्योंकि वहां की चुनी हुई सरकार इन संसाधनों को बेचने के रास्ते में रुकावट बन रही थी।
मुख्य आर्टिकल:
पाकिस्तान की राजनीति में खैबर पख्तूनख्वा प्रांत को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने प्रांतीय प्रशासन और केंद्रीय व्यवस्था पर तीखा हमला बोला है। पार्टी का आरोप है कि खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल (इमरजेंसी) लगाने का फैसला पूरी तरह से सोची-समझी रणनीति के तहत लिया गया है। इस सियासी उठापटक से देश में प्रशासनिक और राजनीतिक तनाव काफी बढ़ गया है।
संसाधनों पर कब्जे का आरोप
PTI ने दावा किया है कि इस इमरजेंसी के पीछे असली वजह वहां के प्राकृतिक संसाधन हैं। पार्टी के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में तेल, गैस और बहुमूल्य खनिजों के विशाल भंडार मौजूद हैं। सरकार पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि इन बेशकीमती संसाधनों के दोहन और उनके व्यापार का रास्ता साफ करने के लिए ही इस प्रकार की आपातकालीन परिस्थितियां पैदा की गई हैं।
चुनी हुई सरकार को दरकिनार करने की कोशिश
पार्टी के नेताओं का कहना है कि प्रांत की चुनी हुई सरकार इन तमाम संसाधनों को मनमाने तरीके से बेचने या सौंपने के अनुबंधों के आड़े आ रही थी। जनता द्वारा चुनी गई सरकार इन बहुमूल्य संपत्तियों के हितों की रक्षा कर रही थी, जिसे प्रशासन की राह का कांटा माना जा रहा था। PTI का यह भी मानना है कि राजनीतिक विरोध को कुचलने और प्रांतीय अधिकारों पर कब्जा करने के लिए ही इस कदम का इस्तेमाल किया गया है।

पेपर लीक रोकने के लिए तकनीक का इस्तेमाल जरूरी, नंदन नीलेकणी का सुझाव
इन्फोसिस के को-फाउंडर और परीक्षा सुधार टास्क फोर्स के प्रमुख नंदन नीलेकणी ने पेपर लीक रोकने के लिए अहम उपाय सुझाए हैं। उन्होंने परीक्षा के दिन AI की मदद से बड़े प्रश्न बैंक से पेपर तैयार करने, सभी परीक्षाएं कंप्यूटर आधारित करने और 1.5 लाख केंद्रों का नेटवर्क बढ़ाने की सलाह दी है।
खबर का निचोड़ (Summary):
इन्फोसिस के को-फाउंडर और परीक्षा सुधार टास्क फोर्स के प्रमुख नंदन नीलेकणी ने पेपर लीक रोकने के लिए अहम उपाय सुझाए हैं। उन्होंने परीक्षा के दिन AI की मदद से बड़े प्रश्न बैंक से पेपर तैयार करने, सभी परीक्षाएं कंप्यूटर आधारित करने और 1.5 लाख केंद्रों का नेटवर्क बढ़ाने की सलाह दी है।
मुख्य आर्टिकल:
देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं में सामने आने वाली पेपर लीक जैसी गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए अब तकनीकी समाधानों पर जोर दिया जा रहा है। इन्फोसिस के सह-संस्थापक और परीक्षा सुधार टास्क फोर्स के प्रमुख नंदन नीलेकणी ने इस दिशा में एक प्रभावी और आधुनिक रोडमैप पेश किया है। उनका मानना है कि पारंपरिक व्यवस्थाओं में बदलाव करके ही इस तरह की धांधलियों पर पूरी तरह से लगाम लगाई जा सकती है।
AI और प्रश्न बैंक का उपयोग
नंदन नीलेकणी का सुझाव है कि परीक्षा से काफी पहले प्रश्न पत्र तैयार करके सुरक्षित रखने की पुरानी पद्धति को अब बदल देना चाहिए। इसके स्थान पर एक बहुत बड़ा प्रश्न बैंक (Question Bank) तैयार किया जाना चाहिए। परीक्षा के ठीक दिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से उसी प्रश्न बैंक से ऑटोमैटिक तरीके से नया प्रश्न पत्र तैयार किया जाना चाहिए। इससे पेपर लीक होने की संभावनाओं को काफी हद तक नगण्य किया जा सकता है।
कंप्यूटर आधारित परीक्षाएं और बुनियादी ढांचा
पेपर लीक और नकल जैसी गड़बड़ियों को रोकने के लिए उन्होंने परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह से डिजिटल बनाने पर जोर दिया है। नीलेकणी ने सुझाव दिया है कि देश में आयोजित होने वाली सभी प्रमुख परीक्षाएं पूरी तरह से कंप्यूटर आधारित (Computer-Based) होनी चाहिए। इसके अलावा, परीक्षा प्रक्रिया को सुचारू और सुरक्षित बनाने के लिए देश में ऐसे डिजिटल केंद्रों का नेटवर्क बढ़ाकर लगभग 1.5 लाख तक करने की आवश्यकता है।
व्यवस्था में पारदर्शिता लाने की पहल
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीकी मॉडल को धरातल पर उतारा जाता है, तो परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं की विश्वसनीयता में भारी सुधार होगा। परीक्षा सुधार टास्क फोर्स के इन सुझावों से आने वाले समय में छात्र-छात्राओं के भविष्य को सुरक्षित करने और पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने में बड़ी मदद मिल सकती है।

संत प्रेमानंद महाराज की स्वतंत्रता और आश्रम को लेकर सेवादारों का बड़ा बयान
संत प्रेमानंद महाराज की स्वतंत्रता छिनने और उनके आश्रम में दो गुट बनने की अटकलों पर सेवादारों ने सफाई दी है। सेवादारों ने स्पष्ट किया है कि महाराज जी पूरी तरह स्वतंत्र हैं और स्वास्थ्य कारणों से दूसरे स्थान पर रह रहे हैं। साथ ही, आश्रम में किसी भी तरह के दो गुट बनने की बात को खारिज किया गया है।
खबर का निचोड़ (Summary):
संत प्रेमानंद महाराज की स्वतंत्रता छिनने और उनके आश्रम में दो गुट बनने की अटकलों पर सेवादारों ने सफाई दी है। सेवादारों ने स्पष्ट किया है कि महाराज जी पूरी तरह स्वतंत्र हैं और स्वास्थ्य कारणों से दूसरे स्थान पर रह रहे हैं। साथ ही, आश्रम में किसी भी तरह के दो गुट बनने की बात को खारिज किया गया है।
मुख्य आर्टिकल:
वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज को लेकर हाल ही में कई तरह की चर्चाएं और अटकलें सोशल मीडिया पर तैर रही थीं। उनकी स्वतंत्रता पर सवाल उठाए जा रहे थे और यह दावा किया जा रहा था कि उनके आश्रम में दो अलग-अलग गुट बन चुके हैं। इन सभी अटकलों और अफवाहों पर विराम लगाते हुए, 'हिन्दुस्तान' अखबार से बातचीत के दौरान उनके सेवादारों ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है।
महाराज जी की स्वतंत्रता पर सफाई
सेवादारों ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि संत प्रेमानंद महाराज जी पर किसी भी तरह की पाबंदी नहीं है। वे पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। सेवादारों के अनुसार, वर्तमान में वे स्वास्थ्य संबंधी कुछ विशेष कारणों के चलते दूसरे स्थान पर निवास कर रहे हैं। उनके स्वास्थ्य और दिनचर्या को ध्यान में रखकर ही यह व्यवस्था की गई है, इसलिए उनकी स्वतंत्रता छिनने जैसी बातें पूरी तरह बेबुनियाद हैं।
आश्रम में गुटबाजी की खबरों का खंडन
आश्रम के भीतर दो गुट बनने की अफवाहों पर भी सेवादारों ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि आश्रम के अंदर ऐसी कोई भी स्थिति नहीं है। उनका यह भी कहना था कि पूरा आश्रम और वहां की व्यवस्थाएं किसी व्यक्ति विशेष के चाहने से नहीं, बल्कि तयशुदा नियमों और अनुशासन के तहत संचालित होती हैं।
बच्चों और नियमों को लेकर स्पष्ट निर्देश
बातचीत के दौरान सेवादारों ने यह भी साफ किया कि आश्रम की अपनी एक मर्यादा और अनुशासन है। किसी भी बाहरी या आंतरिक विषय पर बात करते हुए उन्होंने जोर दिया कि संस्थान पूरी तरह से पारंपरिक नियमों का पालन करते हुए अपनी सेवा और साधना के मार्ग पर अग्रसर है। भक्तजनों से भी अपील की गई है कि वे ऐसी किसी भी प्रकार की भ्रामक खबरों या अफवाहों पर ध्यान न दें।

दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा कदम, जंटर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति वाली याचिका पर 16 अक्टूबर को होगी सुनवाई
दिल्ली हाईकोर्ट जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति मांगने वाली जनहित याचिका पर 16 अक्टूबर को सुनवाई करेगा। याचिका में प्रदर्शन के अधिकार को अभिव्यक्ति की आजादी का हिस्सा घोषित करने की मांग की गई है। अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में चल रही ऐसी ही याचिका की कॉपी दी जाए ताकि अलग-अलग आदेश न आएं।
खबर का निचोड़ (Summary):
दिल्ली हाईकोर्ट जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति मांगने वाली जनहित याचिका पर 16 अक्टूबर को सुनवाई करेगा। याचिका में प्रदर्शन के अधिकार को अभिव्यक्ति की आजादी का हिस्सा घोषित करने की मांग की गई है। अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में चल रही ऐसी ही याचिका की कॉपी दी जाए ताकि अलग-अलग आदेश न आएं।
मुख्य आर्टिकल:
राजधानी दिल्ली में प्रदर्शनों और धरनों के लिए चर्चित जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति से जुड़ा मामला अब अदालत के दरवाजे पर पहुंच गया है। दिल्ली हाईकोर्ट इस महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर आगामी 16 अक्टूबर को सुनवाई करने जा रहा है। इस मामले को लेकर कानूनी गलियारों में चर्चा तेज हो गई है, क्योंकि यह सीधे तौर पर नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों और स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है।
प्रदर्शन के अधिकार की मांग
दाखिल की गई इस जनहित याचिका में मुख्य रूप से यह मांग की गई है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के अधिकार को संविधान के तहत अभिव्यक्ति की आजादी का एक अनिवार्य हिस्सा घोषित किया जाए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि नागरिकों को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताने का पूरा अधिकार मिलना चाहिए, जो कि एक मजबूत लोकतंत्र की पहचान है।
अदालत का सतर्क रुख
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझते हुए एक अहम निर्देश दिया है। अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा है कि वे सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही लंबित इसी तरह की अन्य याचिका की एक प्रति अदालत को उपलब्ध कराएं। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के अलग-अलग न्यायालयों में चल रहे इस विषय से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार के परस्पर विरोधी या अलग-अलग आदेश पारित न हों।
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