
2 लाख का बॉन्ड भरकर छोड़ी सरकारी नौकरी, बोली- रोज रोती थी
31 वर्षीय मधुरिमा ने 70,000 रुपये मासिक वेतन वाली सरकारी बैंक की नौकरी 2 लाख रुपये का बॉन्ड भरकर छोड़ दी और आधी सैलरी पर प्राइवेट जॉब चुन ली। उन्होंने बताया कि टॉक्सिक वर्क कल्चर और अत्यधिक काम के दबाव के कारण उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ रहा था।
31 वर्षीय मधুরিমা ने 70,000 रुपये मासिक वेतन वाली सरकारी बैंक की नौकरी 2 लाख रुपये का बॉन्ड भरकर छोड़ दी और आधी सैलरी पर प्राइवेट जॉब चुन ली। उन्होंने बताया कि टॉक्सिक वर्क कल्चर और अत्यधिक काम के दबाव के कारण उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ रहा था।
सरकारी नौकरी का टॉक्सिक माहौल और प्रताड़ना
मधुरिमा ने अपने बैंक की नौकरी के कड़वे अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि वहाँ काम का दबाव असहनीय था। उन्हें रोज 12 घंटे से अधिक काम करना पड़ता था और बीमारी की हालत में भी छुट्टी नहीं दी जाती थी। स्थिति इतनी खराब थी कि काम के दौरान उन्हें वॉशरूम जाने तक की अनुमति नहीं मिलती थी, जिसके कारण उन्हें गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा।
स्वास्थ्य से समझौता न करने का कड़ा फैसला
लगातार बढ़ते मानसिक और शारीरिक तनाव के चलते मधुरिमा ने आखिरकार अपनी सेहत को प्राथमिकता दी। उन्होंने 2 लाख रुपये का भारी-भरकम बॉन्ड चुकाकर सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उनका कहना है कि पैसों से ज्यादा मानसिक शांति और स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है, और उस माहौल में रोज रोने से बेहतर था कि वह उस नौकरी को हमेशा के लिए अलविदा कह दें।
कम वेतन पर चुनी सुकून भरी प्राइवेट नौकरी
सरकारी नौकरी की मोटी सैलरी को छोड़कर मधुरिमा ने 35,000 रुपये प्रति माह वेतन वाली प्राइवेट नौकरी ज्वाइन कर ली है। उनका यह साहसी कदम सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है, जहाँ लोग आज के समय में कॉर्पोरेट और सरकारी दफ्तरों में बढ़ते वर्क-प्रेशर और टॉक्सिक वर्क कल्चर पर खुलकर बहस कर रहे हैं।

1 अक्टूबर से जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र के नियम बदले, अब कोर्ट की मंजूरी होगी जरूरी
1 अक्टूबर 2026 से जन्म और मृत्यु पंजीकरण के नियमों में बड़ा बदलाव हुआ है। निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बाद पंजीकरण कराने के लिए अब उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) या सिविल कोर्ट की अनुमति अनिवार्य कर दी गई है। फर्जीवाड़े को रोकने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए यह सख्त कदम उठाया गया है।
खबर का निचोड़
1 अक्टूबर 2026 से जन्म और मृत्यु पंजीकरण के नियमों में बड़ा बदलाव हुआ है। निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बाद पंजीकरण कराने के लिए अब उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) या सिविल कोर्ट की अनुमति अनिवार्य कर दी गई है। फर्जीवाड़े को रोकने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए यह सख्त कदम उठाया गया है।
नए नियमों का सीधा असर
जन्म और मृत्यु का समय पर पंजीकरण न कराने वालों के लिए अब प्रक्रिया पहले जैसी आसान नहीं रहेगी। नए दिशानिर्देशों के लागू होने के बाद, यदि तय समय सीमा के भीतर रजिस्ट्रेशन नहीं कराया जाता है, तो नागरिकों को प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा। अब तक जो काम स्थानीय निकायों या पंचायत स्तर पर एफिडेविट के जरिए हो जाता था, उसके लिए अब कोर्ट और एसडीएम कार्यालय के चक्कर काटने पड़ेंगे।
क्यों लागू की गई इतनी सख्ती
सरकार ने यह कदम फर्जी दस्तावेजों, पहचान पत्र की धोखाधड़ी और देर से होने वाले पंजीकरणों में बढ़ती गड़बड़ियों को रोकने के लिए उठाया है। पिछले कुछ वर्षों में बैकडेटेड प्रमाण पत्रों के जरिए नागरिकता, संपत्ति विवाद और सरकारी योजनाओं में धांधली के कई मामले सामने आए थे। नए नियम से डेटा की सटीकता बनी रहेगी और हर पंजीकरण की कानूनी वैधता सुनिश्चित की जा सकेगी।
समय पर पंजीकरण की समय सीमा
सामान्य प्रक्रिया के तहत जन्म या मृत्यु की घटना के 21 दिनों के भीतर रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य और निःशुल्क होता है। 21 दिन के बाद लेकिन 30 दिन के भीतर विलंब शुल्क के साथ रजिस्ट्रेशन किया जा सकता है। वहीं, 1 वर्ष से अधिक की देरी होने पर मामले को पूरी तरह से न्यायिक जांच और प्रशासनिक अनुमति के अधीन कर दिया गया है।
आम जनता के लिए मुख्य चुनौतियां
इस बदलाव से सबसे ज्यादा परेशानी ग्रामीण इलाकों और उन लोगों को हो सकती है जो अज्ञानता या किसी अन्य कारण से समय पर पंजीकरण नहीं करा पाते। अब उन्हें वकीलों, हलफनामों और अदालती सुनवाई का सामना करना पड़ेगा, जिससे समय और पैसे दोनों का खर्च बढ़ेगा। इसके अलावा, स्कूल एडमिशन, पासपोर्ट और संपत्ति के नामांतरण जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में प्रमाण पत्र की कमी के कारण देरी हो सकती है।

चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग: जंतर-मंतर से शिवाजी पार्क तक CJP का हल्लाबोल
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का विरोध प्रदर्शन देश की राजनीति में हलचल मचा रहा है। मुंबई के ऐतिहासिक शिवाजी पार्क और दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है। प्रदर्शन से ठीक पहले मुंबई पुलिस ने CJP संस्थापक अभिजीत दीपके को हिरासत में लिया, हालांकि बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। दिल्ली में अनुमति न मिलने के बावजूद पार्टी समर्थक सड़कों पर उतरने के लिए अड़े हुए हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का विरोध प्रदर्शन देश की राजनीति में हलचल मचा रहा है। मुंबई के ऐतिहासिक शिवाजी पार्क और दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है। प्रदर्शन से ठीक पहले मुंबई पुलिस ने CJP संस्थापक अभिजीत दीपके को हिरासत में लिया, हालांकि बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। दिल्ली में अनुमति न मिलने के बावजूद पार्टी समर्थक सड़कों पर उतरने के लिए अड़े हुए हैं।
सीजेपी का देशव्यापी प्रदर्शन
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी ने मोर्चा खोल दिया है। पार्टी आज मुंबई और दिल्ली के दो प्रमुख स्थलों पर समानांतर विरोध प्रदर्शन कर रही है। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा है। इसके साथ ही CJP मतदाता सूची की पूर्ण पारदर्शिता और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल करने की मांग पर अड़ी है।
हिरासत और रिहाई का ड्रामा
मुंबई में प्रदर्शन शुरू होने से ठीक पहले माहौल उस समय तनावपूर्ण हो गया जब पुलिस ने CJP संस्थापक अभिजीत दीपके को हिरासत में ले लिया। दीपके की हिरासत की खबर फैलते ही कार्यकर्ताओं का गुस्सा भड़क उठा। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए और बढ़ते जनदबाव के कारण मुंबई पुलिस ने कुछ ही समय बाद अभिजीत दीपके को छोड़ दिया। रिहा होते ही दीपके ने अपनी मांगों को और जोर-शोर से उठाते हुए शिवाजी पार्क पहुंचने का आह्वान किया।
जंतर-मंतर पर कड़ा पहरा
उधर राजधानी दिल्ली में सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह अलर्ट पर हैं। दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की लिखित अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया है। इसके बावजूद CJP आयोजक पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। पार्टी नेतृत्व लगातार सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से लोगों से जंतर-मंतर पहुंचने की अपील कर रहा है। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जंतर-मंतर के आसपास भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है और बैरिकेडिंग लगा दी गई है।
चुनावी प्रक्रिया में सुधार की मांग
CJP का तर्क है कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग की निष्पक्षता सबसे महत्वपूर्ण है। पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। साथ ही मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया में सिर्फ राजनीतिक वर्ग ही नहीं, बल्कि नागरिक समाज की भूमिका भी तय होनी चाहिए ताकि आम जनता का भरोसा प्रणाली पर बना रहे। दोनों शहरों में जारी यह गतिरोध अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का मुख्य विषय बन गया है।

महात्मा गांधी 5 बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए हुए थे नॉमिनेट; फिर भी क्यों नहीं मिला?
महात्मा गांधी को जीवन में 5 बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया गया था, लेकिन कई कारणों और नियमों के चलते उन्हें यह प्रतिष्ठित पुरस्कार नहीं मिल सका था。
महात्मा गांधी को जीवन में 5 बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया गया था, लेकिन कई कारणों और नियमों के चलते उन्हें यह प्रतिष्ठित पुरस्कार नहीं मिल सका था。
पांच बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन
इतिहास के महानतम नेताओं में शुमार महात्मा गांधी को शांति के सबसे बड़े वैश्विक सम्मान यानी नोबेल शांति पुरस्कार के लिए कुल पांच बार नॉमिनेट किया गया था。 उन्हें वर्ष 1937, 1938, 1939, 1947 और अंत में 1948 में इस पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था。 देश और दुनिया में उनके शांतिपूर्ण अहिंसक आंदोलनों के प्रभाव को देखते हुए हर बार उनकी उम्मीदवारी पर चर्चा होती थी。
समिति के सदस्यों की शुरुआती आपत्तियां
नोबेल समिति के सदस्यों का शुरुआती दौर में यह मानना था कि महात्मा गांधी किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन या संस्था से नहीं जुड़े हुए थे。 इसके अलावा, समिति का यह भी दृष्टिकोण था कि उनका मुख्य संघर्ष और आंदोलन क्षेत्र मुख्य रूप से भारतीय स्वतंत्रता तक ही सीमित था, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रभाव को लेकर अलग-अलग राय थी。
साल 1948 का दुखद मोड़ और नोबेल का नियम
वर्ष 1948 में एक बार फिर प्रबल संभावना थी कि यह पुरस्कार महात्मा गांधी को दिया जाएगा और इस पर गंभीरता से विचार भी किया जा रहा था。 परंतु दुर्भाग्यवश, 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या कर दी गई。 नोबेल फाउंडेशन के नियमों के अनुसार मरणोपरांत (death after) किसी भी व्यक्ति को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जा सकता है, जिसके कारण वह इस ऐतिहासिक सम्मान से चूक गए。

पुतिन ने की पीएम मोदी की तारीफ, बोले- युद्ध खत्म करने के हैं अच्छे आइडिया
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस-यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा है कि उनके पास ऐसे अच्छे विचार हैं जो दोनों पक्षों को स्वीकार्य हो सकते हैं।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस-यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा है कि उनके पास ऐसे अच्छे विचार हैं जो दोनों पक्षों को स्वीकार्य हो सकते हैं।
पीएम मोदी के प्रयासों की सराहना
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे लंबे संघर्ष के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का एक बड़ा बयान सामने आया है। पुतिन ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस युद्ध को समाप्त करने के लिए किए जा रहे प्रयासों की खुलकर सराहना की है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी इस संघर्ष को सुलझाने में गहरी रुचि ले रहे हैं और शांति स्थापित करने के प्रति उनकी यह प्रतिबद्धता बेहद सराहनीय है।
संघर्ष समाप्त करने के लिए अच्छे विचार
रूसी राष्ट्रपति ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के पास इस गंभीर संकट को हल करने के लिए कुछ ऐसे बेहतरीन और रचनात्मक विचार हैं जो दोनों पक्षों के लिए अनुकूल और स्वीकार्य हो सकते हैं। पुतिन ने इस बात पर जोर दिया कि वह रूस-संघर्ष को शांतिपूर्ण तरीके से और जल्द से जल्द समाप्त करने के लिए पीएम मोदी की सक्रिय इच्छा और उनके द्वारा दिखाए गए इनिशिएटिव के लिए पूरी तरह आभारी हैं।

₹30,000 के जूते पहनता हूं: अभिजीत दीपके का फंडिंग पर बेबाक जवाब
सीजीपी फाउंडर अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर मुंबई में होने वाले आंदोलन और अपनी फंडिंग से जुड़े सवालों पर तीखा पलटवार करते हुए कहा है कि वह ₹30,000 के जूते पहनने में पूरी तरह सक्षम हैं।
सीजीपी फाउंडर अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर मुंबई में होने वाले आंदोलन और अपनी फंडिंग से जुड़े सवालों पर तीखा पलटवार करते हुए कहा है कि वह ₹30,000 के जूते पहनने में पूरी तरह सक्षम हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ मुंबई में आंदोलन
सीजीपी फाउंडर अभिजीत दीपके इन दिनों मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर काफी मुखर नजर आ रहे हैं। इसी सिलसिले में वह मुंबई में एक बड़ा आंदोलन करने की तैयारी कर रहे हैं। अपने बयानों और विरोध प्रदर्शन के तरीकों को लेकर वह लगातार मीडिया की सुर्खियों में बने हुए हैं, जिससे राजनीतिक गलियारों में भी चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।
फंडिंग के सवाल पर भड़के अभिजीत दीपके
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब पत्रकारों ने उनकी संस्था की फंडिंग और पैसों के स्रोतों को लेकर सवाल पूछा, तो अभिजीत दीपके काफी नाराज नजर आए। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि इस तरह के सवालों में कोई तार्किक आधार नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि उनकी फंडिंग का चुनाव आयोग में कथित धांधली से आखिर क्या लेना-देना है और इस प्रकार के मुद्दों को आपस में क्यों जोड़ा जा रहा है।
महंगे जूतों की वायरल फोटो पर दो टूक सफाई
अपनी जीवनशैली और महंगे जूतों की सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों पर खुलकर बात करते हुए अभिजीत ने बेबाकी से जवाब दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके जूतों की फोटो वायरल हो चुकी है और वह गर्व से ₹30,000 के जूते पहनते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इन महंगी चीजों को खरीदने और पहनने के लिए आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम हैं, इसलिए इस पर सवाल उठाने का कोई औचित्य नहीं बनता है।
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