
तमिलनाडु में नवजात बच्चों को मिलेगी 1 ग्राम सोने की अंगूठी, CM विजय ने शुरू की योजना
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने चुनावी वादा पूरा करते हुए 'थाईमामन थंगा मोथिरम थिट्टम' योजना का शुभारंभ किया। मदुरै के सरकारी राजाजी अस्पताल से शुरू हुई इस योजना के तहत सरकारी अस्पतालों में जन्मे पात्र नवजात शिशुओं को 22 कैरेट की 1 ग्राम सोने की अंगूठी दी जाएगी। इसके लिए ₹755.83 करोड़ बजट आवंटित हुआ है।
खबर का निचोड़
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने चुनावी वादा पूरा करते हुए 'थाईमामन थंगा मोथिरम थिट्टम' योजना का शुभारंभ किया। मदुरै के सरकारी राजाजी अस्पताल से शुरू हुई इस योजना के तहत सरकारी अस्पतालों में जन्मे पात्र नवजात शिशुओं को 22 कैरेट की 1 ग्राम सोने की अंगूठी दी जाएगी। इसके लिए ₹755.83 करोड़ बजट आवंटित हुआ है।
चुनावी वादा पूरा: नवजात शिशुओं के लिए सोने का तोहफा
तमिलनाडु की राजनीति और जनकल्याणकारी योजनाओं का रिश्ता हमेशा से गहरा रहा है। इसी कड़ी में राज्य के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने जनता से किया अपना एक बड़ा चुनावी वादा धरातल पर उतार दिया है। मदुरै के प्रतिष्ठित सरकारी राजाजी अस्पताल में एक भव्य कार्यक्रम के दौरान उन्होंने 'थाईमामन थंगा मोथिरम थिट्टम' (मामा का सोने की अंगूठी उपहार) योजना की आधिकारिक शुरुआत की। इस योजना के शुरू होते ही राज्यभर के सरकारी अस्पतालों में खुशी की लहर दौड़ गई है।
क्या है 'थाईमामन थंगा मोथिरम थिट्टम' योजना?
तमिल संस्कृति में नवजात शिशु के जन्म पर मामा द्वारा सोने का उपहार देने की एक बेहद पुरानी और पवित्र परंपरा रही है। सरकार ने इसी सांस्कृतिक भावना को ध्यान में रखते हुए इस सामाजिक कल्याणकारी योजना का खाका तैयार किया है। इस पहल के तहत राज्य के सरकारी अस्पतालों में जन्म लेने वाले सभी पात्र नवजात बच्चों को 22 कैरेट शुद्धता वाली 1 ग्राम सोने की अंगूठी भेंट की जाएगी। यह कदम न केवल गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के चेहरे पर मुस्कान लाएगा, बल्कि जन्म के समय ही बच्चे के भविष्य के लिए एक प्रतीकात्मक वित्तीय सुरक्षा भी प्रदान करेगा।
₹755.83 करोड़ का भारी-भरकम बजट
राज्य सरकार ने इस महत्वाकांक्षी योजना को सुचारू रूप से लागू करने के लिए वित्तीय संसाधनों की कोई कमी नहीं छोड़ी है। योजना के क्रियान्वयन के लिए ₹755.83 करोड़ की भारी-भरकम राशि आवंटित की गई है। मदुरै में आयोजित उद्घाटन समारोह में मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने खुद कई माताओं को उनके नवजात बच्चों के लिए सोने की अंगूठियां सौंपी। इस दौरान अस्पताल परिसर का माहौल काफी भावुक और उत्साहजनक नजर आया।
सरकारी अस्पतालों में बढ़ेगा विश्वास
विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना का दोहरा फायदा देखने को मिलेगा। पहला, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सरकार की तरफ से सीधा संबल मिलेगा। दूसरा, इस तरह के आकर्षक प्रोत्साहन से राज्य के लोग प्रसव (डिलीवरी) के लिए निजी अस्पतालों के भारी-भरकम खर्च से बचकर सरकारी अस्पतालों का रुख करेंगे। इससे राज्य में संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery) की दर में और अधिक बढ़ोतरी होगी, जिससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने में मदद मिलेगी।
विधानसभा चुनाव के दौरान जोसेफ विजय ने जनता से यह वादा किया था। सरकार बनने के बाद इतने बड़े पैमाने पर इस योजना को लागू करके उन्होंने यह संदेश दे दिया है कि उनकी सरकार जन कल्याण और लोक-लुभावन वादों को धरातल पर भुनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ मुंबई में संग्राम: पुलिस का झटका, दीपके की 'जेल भरो' चेतावनी
मुंबई पुलिस ने 2 अक्टूबर को शिवाजी पार्क में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके द्वारा आयोजित इस विरोध प्रदर्शन को बॉम्बे हाईकोर्ट के 2013 के आदेश का हवाला देकर रोका गया, जिसके तहत पार्क को 'साइलेंस जोन' घोषित किया गया था। इस फैसले के बाद दीपके ने 'जेल भरो आंदोलन' की चेतावनी दी है।
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मुंबई पुलिस ने 2 अक्टूबर को शिवाजी पार्क में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके द्वारा आयोजित इस विरोध प्रदर्शन को बॉम्बे हाईकोर्ट के 2013 के आदेश का हवाला देकर रोका गया, जिसके तहत पार्क को 'साइलेंस जोन' घोषित किया गया था। इस फैसले के बाद दीपके ने 'जेल भरो आंदोलन' की चेतावनी दी है।
शिवाजी पार्क में प्रदर्शन पर ब्रेक
गांधी जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर को मुंबई का ऐतिहासिक शिवाजी पार्क एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक विरोध प्रदर्शन का गवाह बनने वाला था। सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर इस पार्क में एक विशाल प्रोटेस्ट का आह्वान किया था। हालांकि, मुंबई पुलिस ने अंतिम समय में इस आयोजन की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया है। इस फैसले ने आयोजकों की तैयारियों पर पानी फेर दिया है और राज्य में सियासी पारे को अचानक बढ़ा दिया है।
हाईकोर्ट के पुराने आदेश का हवाला
मुंबई पुलिस ने अनुमति न देने के पीछे बॉम्बे हाईकोर्ट के 2013 के एक ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि अदालत ने शिवाजी पार्क और उसके आसपास के इलाके को 'साइलेंस जोन' (शांत क्षेत्र) घोषित किया हुआ है। नियमों के मुताबिक, इस क्षेत्र में भारी भीड़ जुटाने, लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करने और किसी भी प्रकार के सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जा सकती। कानून-व्यवस्था और ध्वनि प्रदूषण के नियमों का पालन कराने के लिए पुलिस ने यह कदम उठाना अनिवार्य बताया है।
आर-पार के मूड में अभिजीत दीपके
पुलिस के इस इनकार के बाद CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके का रुख और भी आक्रामक हो गया है। उन्होंने प्रशासन के इस रवैये पर कड़ा एतराज जताते हुए साफ कर दिया है कि वह अपने कदम पीछे नहीं खींचेंगे। दीपके ने बयान जारी कर कहा कि जनता की आवाज को इस तरह कानूनी पचड़ों में दबाया नहीं जा सकता। उन्होंने घोषणा की है कि यदि पुलिस उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने की अनुमति नहीं देती, तो वे और उनके समर्थक पीछे नहीं हटेंगे बल्कि 'जेल भरो आंदोलन' की शुरुआत करेंगे।
बढ़ता राजनीतिक तनाव
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस तरह के तीखे प्रदर्शन और अब पुलिस के बैन के बाद मुंबई का राजनीतिक माहौल गरमा गया है। 2 अक्टूबर की तारीख जैसे-जैसे करीब आ रही है, शिवाजी पार्क और उसके आसपास सुरक्षा व्यवस्था सख्त किए जाने की संभावना है। एक तरफ जहां पुलिस मुस्तैद है, वहीं दूसरी तरफ दीपके की 'जेल भरो' की चेतावनी ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है। अब देखना यह होगा कि 2 अक्टूबर को मुंबई की सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन होता है या पुलिस आंदोलनकारियों को रोकने में कामयाब रहती है।

रांका को छोड़ो वरना असम आएंगे': अभिजीत दीपके की हिमंता को चुनौती
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को खुली चुनौती दी है। दीपके ने चेतावनी दी कि यदि हिरासत में लिए गए पार्टी सदस्य आशुतोष रांका और उनकी टीम को तुरंत रिहा नहीं किया गया, तो वे अपने समर्थकों के साथ असम कूच करेंगे।
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कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को खुली चुनौती दी है। दीपके ने चेतावनी दी कि यदि हिरासत में लिए गए पार्टी सदस्य आशुतोष रांका और उनकी टीम को तुरंत रिहा नहीं किया गया, तो वे अपने समर्थकों के साथ असम कूच करेंगे।
असम में गरमाई सियासत
असम के सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत का जायजा लेने पहुंचे कॉकरोच जनता पार्टी के नेता आशुतोष रांका की गिरफ्तारी के बाद राजनीतिक पारा चढ़ गया है। गुवाहाटी में रांका और उनकी टीम को बिना किसी स्पष्ट आरोप के हिरासत में लिए जाने की खबर आते ही पार्टी समर्थकों और प्रशासन के बीच तनाव बढ़ गया है। इस घटनाक्रम ने राज्य में शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक कार्रवाई पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
अभिजीत दीपके का कड़ा रुख
पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके ने असम सरकार के इस कदम को सीधे तौर पर लोकतंत्र पर हमला करार दिया है। उन्होंने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को आड़े हाथों लेते हुए स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि सरकार अपनी तानाशाही रवैये से सच को दबा नहीं सकती। दीपके ने कहा कि यदि आशुतोष रांका और उनके साथियों पर लगाए गए निराधार आरोपों को वापस लेकर उन्हें तुरंत रिहा नहीं किया गया, तो CJP कार्यकर्ता भारी संख्या में असम पहुंचकर विरोध प्रदर्शन दर्ज कराएंगे।
गुवाहाटी में बिना आरोप हिरासत
प्राप्त ब्यौरे के मुताबिक, आशुतोष रांका अपनी टीम के साथ गुवाहाटी के स्थानीय स्कूलों की स्थिति और वहां मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं का जायजा लेने के लिए एक अध्ययन दौरे पर थे। स्थानीय पुलिस ने उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना या लिखित आरोप के हिरासत में ले लिया। इस कार्रवाई के बाद से ही रांका के समर्थक और अन्य सामाजिक संगठन असम सरकार की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि राज्य सरकार शिक्षा क्षेत्र की कमियों को उजागर होने से रोकने के लिए इस तरह के कठोर कदम उठा रही है।
शिक्षा पर सवाल और भावी रणनीति
यह पूरा विवाद अब सिर्फ एक गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसने असम की सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली और पारदर्शी शासन के दावों की पोल खोल दी है। कॉकरोच जनता पार्टी ने साफ कर दिया है कि वे इस मामले में पीछे हटने वाले नहीं हैं। अगर प्रशासनिक स्तर पर कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया, तो यह मामला आने वाले दिनों में एक बड़े राष्ट्रीय विरोध प्रदर्शन का रूप ले सकता है।

दिल्ली में सितंबर का सबसे कम तापमान: 18 साल का रिकॉर्ड टूटा
दिल्ली में रविवार को सितंबर महीने का पिछले 18 वर्षों में सबसे कम न्यूनतम तापमान 21°C दर्ज किया गया, जो सामान्य से करीब 3°C कम है। मौसम विभाग के मुताबिक आने वाले दिनों में तापमान में धीरे-धीरे बढ़ोतरी होगी।
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दिल्ली में रविवार को सितंबर महीने का पिछले 18 वर्षों में सबसे कम न्यूनतम तापमान 21°C दर्ज किया गया, जो सामान्य से करीब 3°C कम है। मौसम विभाग के मुताबिक आने वाले दिनों में तापमान में धीरे-धीरे बढ़ोतरी होगी।
दिल्ली में टूटा 18 साल का ठंडक का रिकॉर्ड
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मौसम ने एक नया मोड़ ले लिया है, जिससे लोगों को अचानक सुहावने मौसम का अहसास हुआ है। रविवार को शहर में सितंबर महीने का पिछले 18 सालों का सबसे कम न्यूनतम तापमान दर्ज किया गया है। इस दौरान न्यूनतम तापमान गिरकर 21 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया, जो इस इस मौसम के सामान्य तापमान से लगभग 3 डिग्री सेल्सियस कम है। इस अचानक आई गिरावट ने मौसम को काफी खुशनुमा बना दिया है।
2008 के बाद दूसरा सबसे कम तापमान
आंकड़ों के लिहाज से देखें तो साल 2001 के बाद से सितंबर महीने में यह दूसरा सबसे कम न्यूनतम तापमान रिकॉर्ड किया गया है। इससे पहले सितंबर 2008 में सबसे कम तापमान 20.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। इस तरह इतने लंबे अंतराल के बाद सितंबर के महीने में इतनी ज्यादा ठंडक महसूस की गई है, जिसने पिछले कई सालों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है।
आने वाले दिनों में तापमान में होगी बढ़ोतरी
मौसम विभाग की जानकारी के अनुसार यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहने वाली नहीं है। विभाग का कहना है कि आने वाले दिनों में न्यूनतम और अधिकतम दोनों तापमानों में धीरे-धीरे वृद्धि देखने को मिलेगी। यानी जल्द ही मौसम में गर्माहट दोबारा लौट सकती है और तापमान सामान्य स्तर की ओर वापस बढ़ेगा।

सुकुमार सेन: क्यों हटाए गए थे 28 लाख महिलाओं के नाम?
भारत के प्रथम आम चुनाव से पहले लगभग 28 लाख महिलाओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने हर मतदाता का व्यक्तिगत नाम दर्ज करना अनिवार्य करते हुए यह सख्त कदम उठाया था।
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भारत के प्रथम आम चुनाव से पहले लगभग 28 लाख महिलाओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने हर मतदाता का व्यक्तिगत नाम दर्ज करना अनिवार्य करते हुए यह सख्त कदम उठाया था।
सामाजिक परंपराएं बनी थीं बड़ी वजह
आजादी के बाद जब भारत अपने पहले लोकतांत्रिक चुनावों की तैयारी कर रहा था, तब मतदाता सूची तैयार करना एक बेहद जटिल और चुनौती भरा काम था। उस दौर की सामाजिक परंपराओं के कारण कई महिलाएं अपना व्यक्तिगत नाम लिखाने के बजाय खुद को किसी की पत्नी या मां के रूप में दर्ज करा रही थीं। चुनावी प्रक्रिया में इस तरह की अनाम प्रविष्टियां नियमों के खिलाफ थीं।
सुकुमार सेन का ऐतिहासिक और कड़ा फैसला
भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने स्पष्ट निर्देश दिए कि मतदाता सूची में हर एक नागरिक का व्यक्तिगत और वास्तविक नाम दर्ज होना अनिवार्य है। नियमों की इस पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग ने बिना झिझक के लगभग 28 लाख महिलाओं के ऐसे नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए।
लोकतांत्रिक शुचिता के लिए उठाया गया कदम
भले ही इस फैसले से लाखों महिलाओं के नाम उस समय सूची से कट गए थे, लेकिन इसके पीछे का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी बनाना था। इस सख्त कदम ने भारतीय लोकतंत्र की नींव को मजबूत करने में एक बड़ी भूमिका निभाई, जिससे आगे चलकर हर मतदाता की स्वतंत्र पहचान सुनिश्चित हो सकी।
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