
आपदा में मुनाफाखोरी: नेपाली एयरलाइंस ने बढ़ाए किराए, सांसद भड़की
नेपाल में भीषण बाढ़ और आपदा के बीच घरेलू एयरलाइंस द्वारा हवाई किराए में बेताबी से बढ़ोतरी करने का मामला सामने आया है। बुद्धा एयर, येती और श्री एयरलाइंस पर संकट के समय लूट का आरोप लगा है। इस संवेदनहीनता पर नेपाली सांसद खुशबू ओली ने कड़ी नाराजगी जताई है।
खबर का निचोड़
नेपाल में भीषण बाढ़ और आपदा के बीच घरेलू एयरलाइंस द्वारा हवाई किराए में बेताबी से बढ़ोतरी करने का मामला सामने आया है। बुद्धा एयर, येती और श्री एयरलाइंस पर संकट के समय लूट का आरोप लगा है। इस संवेदनहीनता पर नेपाली सांसद खुशबू ओली ने कड़ी नाराजगी जताई है।
आपदा और अंधेरगर्दी का खेल
नेपाल इन दिनों कुदरत के कहर से जूझ रहा है। देश के कई हिस्से भीषण बाढ़ और भूस्खलन की चपेट में हैं। ऐसे समय में जब आम जनजीवन अस्त-व्यस्त है और लोग सुरक्षित ठिकानों की तलाश में हैं, देश की प्रमुख घरेलू एयरलाइंस ने अपनी तिजोरियां भरने का नापाक जरिया ढूंढ लिया है। संकट की इस घड़ी में इंसानियत की मदद करने के बजाय विमानन कंपनियों ने हवाई किराए में भारी उछाल कर दिया है, जिससे आम जनता पर दोहरी मार पड़ रही है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए सबूत
संकट के समय हुई इस मनमानी के सबूत अब सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहे हैं। बुद्धा एयर, येती एयरलाइंस और श्री एयरलाइंस के बढ़े हुए किरायों के स्क्रीनशॉट ऑनलाइन तेजी से वायरल हो रहे हैं। इन वायरल तस्वीरों और आंकड़ों ने एयरलाइंस कंपनियों की पोल खोलकर रख दी है। जहाँ एक तरफ सरकार और राहत एजेंसियां लोगों को बचाने में जुटी हैं, वहीं ये कंपनियां आपदा को अपने लिए एक शानदार बिजनेस डील बनाने में व्यस्त हैं।
सांसद खुशबू ओली का तीखा हमला
घरेलू एयरलाइंस की इस संवेदनहीन मुनाफाखोरी से नेपाली संसद में भी उबाल आ गया है। नेपाली सांसद खुशबू ओली ने इस पूरी घटना पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने एयरलाइंस कंपनियों की खिंचाई करते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि संकट के समय नागरिकों की मदद करने के बजाय किराया बढ़ाना एक बेहद गंभीर और शर्मनाक मामला है। उन्होंने साफ लहजे में चेतावनी दी कि राष्ट्रीय आपदा कभी भी मुनाफा कमाने का कोई अवसर नहीं हो सकती है।
प्रशासनिक कार्रवाई की उठ रही मांग
सांसद के तीखे तेवरों के बाद अब इस मामले में प्रशासनिक और नियामक कार्रवाई की मांग जोर पकड़ने लगी है। जनता और जनप्रतिनिधियों का मानना है कि आपातकाल के दौरान इस तरह की मनमानी करने वाली एयरलाइंस के खिलाफ तुरंत सख्त कदम उठाए जाने चाहिए। लाइसेंस रद्द करने से लेकर भारी जुर्माने तक की मांग की जा रही है, ताकि भविष्य में कोई भी कंपनी आपदा के वक्त इंसानी मजबूरियों का सौदा करने की हिम्मत न जुटा सके।

आठवें वेतन आयोग पर बड़ी मांगें: पेंशन और फिटमेंट फैक्टर पर टिकी नजरें
केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए आठवें वेतन आयोग के गठन के बाद से हलचल तेज हो गई है। कर्मचारी संगठनों ने सरकार के सामने कई बड़े प्रस्ताव रखे हैं, जिनमें पेंशन बहाली के नियमों में बदलाव से लेकर फिटमेंट फैक्टर में बढ़ोतरी तक के मुद्दे शामिल हैं। इन बदलावों से करोड़ों कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर सीधा असर पड़ने की उम्मीद है।
केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए आठवें वेतन आयोग के गठन के बाद से हलचल तेज हो गई है। कर्मचारी संगठनों ने सरकार के सामने कई बड़े प्रस्ताव रखे हैं, जिनमें पेंशन बहाली के नियमों में बदलाव से लेकर फिटमेंट फैक्टर में बढ़ोतरी तक के मुद्दे शामिल हैं। इन बदलावों से करोड़ों कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर सीधा असर पड़ने की उम्मीद है।
पेंशन कम्यूटेशन और बहाली के नियमों में बदलाव की मांग
कर्मचारी संगठनों की सबसे प्रमुख मांगों में पेंशन कम्यूटेशन की अवधि को कम करना शामिल है। वर्तमान नियमों के तहत कम्यूटेड पेंशन की बहाली 15 साल में होती है, जिसे घटाकर 11 साल करने का प्रस्ताव दिया गया है। यदि इस मांग पर विचार होता है, तो लाखों पेंशनभोगियों को वित्तीय रूप से बड़ा लाभ मिलेगा और उनकी पेंशन तय समय से पहले पूरी बहाल हो सकेगी।
फिटमेंट फैक्टर और सैलरी हाइक पर टिकी निगाहें
वेतन आयोग की सिफारिशों में फिटमेंट फैक्टर सबसे अहम कड़ी होता है। कर्मचारी संगठन इस बार फिटमेंट फैक्टर को बढ़ाकर 3.83 करने की जोरदार मांग कर रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार इसे बढ़ाकर 2.1 भी तय करती है, तो भी केंद्रीय कर्मचारियों के न्यूनतम मूल वेतन में एक बड़ा उछाल देखने को मिलेगा। इससे महंगाई के दौर में कर्मचारियों को राहत मिलने की उम्मीद है।
पुरानी पेंशन योजना और फैमिली यूनिट के दायरे पर चर्चा
चर्चा के केंद्र में पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली का मुद्दा भी बना हुआ है, जिसे लेकर कर्मचारी लंबे समय से मुखर हैं। इसके साथ ही फैमिली यूनिट के मौजूदा ढांचे में भी बदलाव की मांग उठ रही है। वर्तमान व्यवस्था में फैमिली यूनिट को 35 यूनिट माना जाता है, जिसे बढ़ाकर 5 यूनिट करने का सुझाव दिया गया है ताकि इसमें माता-पिता को भी शामिल किया जा सके।
हितधारकों से विचार-विमर्श और आगे की प्रक्रिया
आयोग इस समय विभिन्न कर्मचारी संगठनों और हितधारकों के साथ लगातार बैठकें कर रहा है। सभी पक्षों की दलीलों और वित्तीय पहलुओं का बारीकी से अध्ययन करने के बाद ही आयोग अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करेगा। इन प्रस्तावों पर सरकार का रुख क्या रहता है, इस पर देश भर के केंद्रीय कर्मचारियों की निगाहें टिकी हुई हैं।

AI का नया 'वर्कस्लॉप' ट्रेंड: कर्मचारियों के लिए सिरदर्द बनी आधी-अधूरी टेक रिपोर्ट
आधुनिक दफ्तरों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का 'वर्कस्लॉप' ट्रेंड कर्मचारियों के लिए नई मुसीबत बन चुका है। AI द्वारा तैयार किए जा रहे अधकचरे और गलत आंकड़ों वाले ड्राफ्ट्स को सुधारने में कर्मचारियों की रातें कट रही हैं। इससे काम में तेजी आने के बजाय उत्पादकता गिर रही है और वर्कप्लेस स्ट्रेस तेजी से बढ़ रहा है।
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आधुनिक दफ्तरों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का 'वर्कस्लॉप' ट्रेंड कर्मचारियों के लिए नई मुसीबत बन चुका है। AI द्वारा तैयार किए जा रहे अधकचरे और गलत आंकड़ों वाले ड्राफ्ट्स को सुधारने में कर्मचारियों की रातें कट रही हैं। इससे काम में तेजी आने के बजाय उत्पादकता गिर रही है और वर्कप्लेस स्ट्रेस तेजी से बढ़ रहा है।
ऑटोमेशन का भ्रम और 'वर्कस्लॉप' की एंट्री
कॉर्पोरेट जगत में AI को काम की गति बढ़ाने वाले एक जादुई उपकरण के रूप में पेश किया गया था, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है। हाल के महीनों में 'वर्कस्लॉप' का चलन तेजी से बढ़ा है। आसान शब्दों में कहें तो 'वर्कस्लॉप' AI द्वारा तैयार की गई वह सामग्रियां, रिपोर्ट्स या कोड हैं, जो पहली नजर में तो पूरी और पेशेवर लगती हैं, लेकिन गहराई में जाने पर उनमें भारी गलतियां, भ्रामक आंकड़े और छूटे हुए तथ्य पाए जाते हैं।
वरिष्ठ अधिकारियों और टीमों द्वारा बिना जांच-परख के AI-जनरेटेड कंटेंट को आगे बढ़ा दिया जाता है। इसके बाद उस कच्ची सामग्री को दुरुस्त करने की पूरी जिम्मेदारी निचले स्तर के कर्मचारियों पर आ गिरती है। जिस काम को चुटकियों में खत्म होना चाहिए था, वह अब घंटों का सिरदर्द बन चुका है।
काम घटा नहीं, दोगुना हो गया
प्रौद्योगिकी का प्राथमिक उद्देश्य इंसानी मेहनत को कम करना था, मगर वर्कस्लॉप ने दफ्तरों के काम करने के ढर्रे को और जटिल बना दिया है। कर्मचारियों को अब शून्य से कोई नया प्रोजेक्ट शुरू करने में उतना समय नहीं लगता, जितना AI की फैलाई गड़बड़ियों को ढूंढने और उन्हें सुधारने में लग रहा है।
गलत तथ्यों को सही करने, गैर-मौजूद संदर्भों (हैलुसिनेशन) को हटाने और भाषा को प्रासंगिक बनाने के चक्कर में कर्मचारियों का मूल काम पिछड़ रहा है। कंपनियां सोच रही हैं कि उनकी टीम तेजी से काम निपटा रही है, जबकि हकीकत में कर्मचारी बस AI के छोड़े कचरे की सफाई में व्यस्त हैं।
मानसिक सेहत पर बढ़ता दबाव
काम के इस बढ़ते बोझ का सीधा असर कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। लगातार डेडलाइंस का दबाव, ऊपर से AI की गलतियों को पकड़ने की जिम्मेदारी ने वर्क-लाइफ बैलेंस को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। कर्मचारी बिना किसी अतिरिक्त श्रेय के ओवरटाइम करने को मजबूर हैं।
कई मामलों में AI जनरेटेड ड्राफ्ट में छुपी गलतियों की गाज भी अंततः इंसानी कर्मचारियों पर ही गिरती है। इससे दफ्तरों में निराशा, तनाव और बर्नआउट की शिकायतें तेजी से सामने आ रही हैं।
उत्पादकता के नाम पर गिरती गुणवत्ता
मात्रात्मक रूप से भले ही AI बहुत सारा डेटा पलक झपकते ही पैदा कर रहा हो, लेकिन गुणवत्ता के पैमाने पर यह बेहद कमजोर साबित हो रहा है। दफ्तरों में जब वास्तविक शोध और गहराई की जगह AI के सतही आउटपुट ले लेते हैं, तो पूरे प्रोजेक्ट की साख खतरे में पड़ जाती है।
वर्कस्लॉप के इस दौर ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिना इंसानी समझ और कड़ी निगरानी के इस्तेमाल किया गया AI उत्पादकता बढ़ाने के बजाय संस्थानों के लिए भारी नुकसान का सौदा साबित हो रहा है।

फर्जी लोन ऐप्स पर सरकार का बड़ा प्रहार, 3 ऐप होंगे बैन
गृह मंत्रालय की साइबर अपराध एजेंसी (I4C) ने गूगल को प्ले स्टोर से तीन नए फर्जी लोन ऐप्स तुरंत हटाने का आदेश दिया है। त्वरित लोन के नाम पर डेटा चोरी और भारी ब्याज वसूलने वाले इन ऐप्स के हटने से आम लोगों को बड़ी राहत मिलेगी। इस महीने बैन ऐप्स की कुल संख्या 9 हो गई है।
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गृह मंत्रालय की साइबर अपराध एजेंसी (I4C) ने गूगल को प्ले स्टोर से तीन नए फर्जी लोन ऐप्स तुरंत हटाने का आदेश दिया है। त्वरित लोन के नाम पर डेटा चोरी और भारी ब्याज वसूलने वाले इन ऐप्स के हटने से आम लोगों को बड़ी राहत मिलेगी। इस महीने बैन ऐप्स की कुल संख्या 9 हो गई है।
गृह मंत्रालय का बड़ा एक्शन
डिजिटल धोखाधड़ी और साइबर अपराध के खिलाफ केंद्र सरकार ने रुख बेहद सख्त कर लिया है। गृह मंत्रालय की भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) संस्था ने गूगल को प्ले स्टोर से 3 फर्जी लोन ऐप्स को तुरंत प्रभाव से हटाने का सख्त निर्देश दिया है। टेक दिग्गज गूगल को स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इन ऐप्स की मौजूदगी उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता और वित्तीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है।
इन ऐप्स पर गिरी गाज
कार्रवाई की जद में आए ऐप्स के नाम Horizon Cash Service, Money Score Monitor और Zelicredit हैं। जांच में सामने आया है कि ये ऐप्स आसान और बिना किसी कागजी कार्रवाई के तुरंत लोन देने का लालच देकर स्मार्टफोन यूजर्स को अपने जाल में फंसाते थे। इसके बाद यूजर्स के फोन का निजी डेटा, जैसे कॉन्टैक्ट लिस्ट, फोटो और लोकेशन की जानकारी चुरा ली जाती थी। डेटा हाथ में आते ही ये ऐप्स मनमाना और अत्यधिक ब्याज वसूलने के लिए ब्लैकमेलिंग का सहारा लेते थे।
इस महीने बैन होने वाले ऐप्स की संख्या हुई 9
डिजिटल सुरक्षा के लिहाज से यह कार्रवाई बेहद अहम मानी जा रही है। इन 3 नए ऐप्स पर शिकंजा कसने के साथ ही इस चालू महीने में बैन किए गए फर्जी लोन ऐप्स की कुल संख्या बढ़कर 9 हो गई है। साइबर सुरक्षा एजेंसियों की लगातार निगरानी और उपयोगकर्ताओं की शिकायतों के आधार पर ऐसे ठग प्लेटफॉर्म्स की पहचान कर उन पर तुरंत डिजिटल स्ट्राइक की जा रही है।
प्ले स्टोर से पूरी तरह हटेंगे प्लेटफॉर्म्स
I4C के इस आदेश के बाद गूगल ने भी इन संदिग्ध ऐप्स को प्ले स्टोर से हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। एजेंसियों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी नया यूजर इन भ्रामक और अनधिकृत प्लेटफॉर्म्स का शिकार न बने। आने वाले दिनों में कई अन्य संदिग्ध वित्तीय ऐप्स पर भी इसी तरह की सख्त कार्रवाई देखने को मिल सकती है।

नेपाल में तिब्बत से आई बाढ़ का कहर, टिमुरे बाजार तबाह
नेपाल के रसुवा जिले में तिब्बत से भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। इस आपदा में टिमुरे बाजार पूरी तरह तहस-नहस हो गया है। अब तक 7 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और एक हजार लोगों के बहने की आशंका जताई जा रही है। कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट और पुल बह गए हैं।
नेपाल के रसुवा जिले में तिब्बत से भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। इस आपदा में टिमुरे बाजार पूरी तरह तहस-नहस हो गया है। अब तक 7 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और एक हजार लोगों के बहने की आशंका जताई जा रही है। कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट और पुल बह गए हैं।
खौफनाक मंज़र और तबाही का दायरा
हिमालयी क्षेत्रों में प्रकृति का एक बार फिर भयंकर रूप देखने को मिला है। नेपाल के संवेदनशील रसुवा जिले में तिब्बत की सीमा से लगे इलाकों में तबाही का ऐसा मंज़र उभरा जिसने सबको झकझोर कर रख दिया है। भोटेकोशी नदी में अचानक आए उफान ने देखते ही देखते विकराल रूप धारण कर लिया। जलप्रलय की इस रफ्तार ने टिमुरे बाजार को अपनी आगोश में ले लिया, जिससे ऐतिहासिक और व्यापारिक रूप से महत्वपूर्ण यह क्षेत्र मलबे के ढेर में तब्दील हो गया। नदी के वेग के आगे बड़े-बड़े निर्माण तिनके की तरह बिखर गए।
जिंदगी और मौत का संघर्ष
आपदा का यह दौर अपने पीछे अनगिनत सिसकियां और आंसू छोड़ गया है। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक 7 लोगों की जान चली गई है, लेकिन असली चिंता उन 1,000 लोगों को लेकर है जिनके बहने की आशंका जताई जा रही है। अचानक आई इस जल-आपदा ने स्थानीय लोगों को संभलने का मौका तक नहीं दिया। कई वाहन, जरूरी बुनियादी ढांचे और पावर प्रोजेक्ट्स इस बहाव में नेस्तनाबूद हो चुके हैं। स्थानीय प्रशासन और राहत टीमों के सामने सबसे बड़ी चुनौती लापता लोगों की तलाश करना और बचे हुए लोगों तक सुरक्षित पहुंचना है।
प्रशासन की नींद टूटी और रेस्क्यू ऑपरेशन
हालात की नजाकत को देखते हुए काठमांडू में बैठकों का दौर शुरू हो गया है। गृह मंत्री की सीधी निगरानी में एक आपातकालीन उच्चस्तरीय बैठक बुलाई गई, जिसमें हालात से निपटने के लिए तुरंत रणनीति तैयार की गई। प्रभावित इलाकों में युद्ध स्तर पर राहत और बचाव कार्य शुरू कर दिए गए हैं। सेना के विशेष हेलीकॉप्टरों को आसमान में उतार दिया गया है ताकि दुर्गम इलाकों में फंसे लोगों को निकाला जा सके और राहत सामग्री पहुंचाई जा सके।
हाई अलर्ट पर नदियां और तटीय इलाके
खतरे की घंटी केवल रसुवा तक सीमित नहीं है, बल्कि भोटेकोशी और उससे जुड़ी अन्य नदियों के किनारे बसे इलाकों में भी खौफ का माहौल है। प्रशासन ने निचले और तटीय क्षेत्रों में रहने वाले सभी नागरिकों को सख्त चेतावनी जारी की है। लोगों से अपील की गई है कि वे बिना देर किए सुरक्षित स्थानों की तरफ रुख करें और नदी के जलस्तर पर पैनी नजर रखें। प्रकृति के इस प्रलयकारी तांडव ने एक बार फिर पर्वतीय क्षेत्रों में विकास और सुरक्षा के मॉडलों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
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