
वंदे मातरम पर घमासान: कांग्रेस सांसद राजमोहन उन्नीथन का विवादित बयान
राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक 2026 के संसद से पास होने के बाद राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। इसी बीच कांग्रेस सांसद राजमोहन उन्नीथन ने एक ऐसा बयान दिया है जिससे देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि गोली मार दी जाए तब भी वे वंदे मातरम नहीं गाएंगे।
राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक 2026 के संसद से पास होने के बाद राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। इसी बीच कांग्रेस सांसद राजमोहन उन्नीथन ने एक ऐसा बयान दिया है जिससे देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि गोली मार दी जाए तब भी वे वंदे मातरम नहीं गाएंगे।
बयान ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल
संसद से पारित हुए नए संशोधनों और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को लेकर चल रही बहसों के बीच केरल से आने वाले कांग्रेस सांसद राजमोहन उन्नीथन की यह टिप्पणी सामने आई है। उनके इस बयान के बाद विपक्षी दलों और सत्ता पक्ष के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। राजमोहन उन्नीथन ने अपने संबोधन में राष्ट्रगीत को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए विवादित टिप्पणी की, जिसने मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक हलचल मचा दी है।
बिल पास होने के बाद गरमाया माहौल
यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक 2026 को मंजूरी मिली। इस विधेयक का उद्देश्य देश के राष्ट्रीय प्रतीकों, गान और संविधान के प्रति सम्मान सुनिश्चित करना और उनके अपमान पर सख्त कार्रवाई करना है। ऐसे समय में एक जनप्रतिनिधि द्वारा इस तरह का बयान देना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में संसद के अंदर और बाहर एक बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।
नेताओं और दलों की तीखी प्रतिक्रियाएं
सांसद उन्नीथन के इस बयान के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। आलोचकों का कहना है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को राष्ट्र के प्रतीकों का सम्मान करना चाहिए, जबकि समर्थकों का तर्क अपने-अपने तरीके से दिया जा रहा है। इस बयान ने एक बार फिर देश में राष्ट्रवाद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय प्रतीकों की अनिवार्यता पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। स्थिति पर नजर बनाए रखते हुए विभिन्न राजनीतिक दल इस पर अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।

क्या है प्रधानमंत्री मोदी का नया सियासी हथियार 'दिमागी नक्सल'?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से 'दिमागी नक्सल' का जिक्र कर देश की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है। सशस्त्र हिंसा का दौर भले ही सिमट रहा हो, लेकिन वैचारिक रूप से सक्रिय इस नए खतरे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से 'दिमागी नक्सल' का जिक्र कर देश की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है। सशस्त्र हिंसा का दौर भले ही सिमट रहा हो, लेकिन वैचारिक रूप से सक्रिय इस नए खतरे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं।
स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री का बड़ा हमला
इस बार के स्वतंत्रता दिवस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन के दौरान एक ऐसा बयान दिया, जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर बौद्धिक हलकों तक हलचल मचा दी है। उन्होंने देश को आगाह करते हुए कहा कि हथियारों के दम पर चलने वाला नक्सलवाद अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है और लगभग समाप्त हो चुका है।
लेकिन इसके साथ ही उन्होंने एक नए और सूक्ष्म खतरे की ओर इशारा किया, जिसे उन्होंने 'दिमागी नक्सल' का नाम दिया। प्रधानमंत्री के अनुसार, यह विचारधारा भले ही प्रत्यक्ष हिंसा के रास्ते पर न हो, लेकिन यह समाज में अराजकता फैलाने और देश की जड़ों को खोखला करने के हरसंभव मौके तलाश रही है।
'दिमागी नक्सल' को पहचान कर अलग-थलग करने की जरूरत
पीएम मोदी ने अपने भाषण में स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस वैचारिक और मानसिक आतंकवाद के पैरोकारों को पहचानना और समाज से उन्हें आइसोलेट करना अब वक्त की सबसे बड़ी मांग बन गया है। सरकार का मानना है कि यह वर्ग शहरी इलाकों में बैठकर, संस्थाओं को प्रभावित कर और विघटनकारी नैरेटिव गढ़कर देश की सुरक्षा और स्थिरता के लिए एक छिपा हुआ संकट पैदा कर रहा है।
इस बयान के आते ही राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। जहां एक तरफ सत्ता पक्ष इसे वैचारिक राष्ट्रवाद और आंतरिक सुरक्षा की दिशा में एक बेहद जरूरी कदम बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों और आलोचकों ने इस पर तीखे सवाल खड़े किए हैं।
विपक्षी दलों और आलोचकों के तीखे सवाल
विपक्ष का आरोप है कि 'दिमागी नक्सल' जैसे अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल करके सरकार असहमति की हर आवाज और वैचारिक विरोध का गला घोंटना चाहती है। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह के व्यापक और बिना स्पष्ट परिभाषा वाले शब्दों के दायरे में सरकार अपने हर आलोचक, मानवाधिकार कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी को खड़ा कर सकती है जो नीतियों पर सवाल उठाता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़क तक एक बड़ा वैचारिक संघर्ष बनने वाला है। एक तरफ जहां सरकार इसे आंतरिक सुरक्षा का नया मोर्चा मान रही है, वहीं विपक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक और बड़ा प्रहार बता रहा है।

दिमागी नक्सल पर रार चिदंबरम के बयान पर बीजेपी का पलटवार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 'दिमागी नक्सल' शब्द के इस्तेमाल के बाद देश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के इस पर दिए बयान के जवाब में बीजेपी ने तीखा हमला बोला है। बीजेपी नेताओं का मानना है कि बंदूकों वाला नक्सलवाद अब अंतिम सांसें गिन रहा है, लेकिन विचारों के जरिए पनप रहा यह 'दिमागी नक्सलवाद' समाज और युवाओं के लिए कहीं अधिक खतरनाक साबित हो रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 'दिमागी नक्सल' शब्द के इस्तेमाल के बाद देश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के इस पर दिए बयान के जवाब में बीजेपी ने तीखा हमला बोला है। बीजेपी नेताओं का मानना है कि बंदूकों वाला नक्सलवाद अब अंतिम सांसें गिन रहा है, लेकिन विचारों के जरिए पनप रहा यह 'दिमागी नक्सलवाद' समाज और युवाओं के लिए कहीं अधिक खतरनाक साबित हो रहा है।
शब्द युद्ध और बयानों की सियासत
'दिमागी नक्सल' शब्द के सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में बयानों की बाढ़ आ गई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने इस शब्दावली पर तंज कसते हुए प्रतिक्रिया दी, जिसे बीजेपी ने तत्काल लपक लिया और कड़ा पलटवार किया। बीजेपी का कहना है कि विपक्ष ऐसे संवेदनशील मुद्दों और शब्दावलियों का बचाव करके अपनी विचारधारात्मक सोच को उजागर कर रहा है।
शिक्षा क्षेत्र और एनजीओ पर निशाने का तर्क
इस विवाद को आगे बढ़ाते हुए बीजेपी सांसद बृजलाल ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कुछ प्रोफेसरों, शिक्षकों और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, ये वर्ग 'दिमागी नक्सल' के रूप में काम करते हुए शिक्षण संस्थानों और सामाजिक मंचों के माध्यम से युवाओं के मन में हिंसक और राष्ट्र-विरोधी विचारधारा का बीज बो रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि बंदूक उठाने वाले उग्रवादियों से निपटना आसान है, लेकिन वैचारिक रूप से जहर घोलने वाले ये तत्व समाज को अंदर से खोखला करते हैं।
सोशल मीडिया पर व्यंग्य और बढ़ती चर्चा
यह बहस केवल बयानों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी तेजी से ट्रेंड करने लगी है। इंटरनेट पर 'दिमागी नक्सल जनता पार्टी' जैसे व्यंग्यात्मक अकाउंट्स और मीम्स की बाढ़ आ गई है, जो इस मुद्दे पर अलग-अलग दृष्टिकोण से चुटकी ले रहे हैं। आम लोग और विश्लेषक भी इस नए वैचारिक युद्ध पर खुलकर अपनी राय रख रहे हैं, जिससे यह विषय डिजिटल स्पेस में मुख्य चर्चा का केंद्र बन चुका है।
बंदूकों से ज्यादा खतरनाक वैचारिक हमला
भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष और क्षेत्रीय नेताओं का एक सुर में मानना है कि जमीनी स्तर पर बंदूक वाले नक्सलवाद को सुरक्षा बलों ने काफी हद तक ध्वस्त कर दिया है। हालांकि, उनका तर्क है कि अब जंग विचारों के स्तर पर लड़ी जा रही है। बीजेपी का स्पष्ट संदेश है कि जब तक इस 'दिमागी नक्सलवाद' का जड़ से सफाया नहीं होता, तब तक देश की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने को लगातार खतरा बना रहेगा।

अशोकधाम मंदिर में नागपंचमी पर भारी भगदड़, 7 श्रद्धालुओं की मौत
नागपंचमी और सावन के तीसरे सोमवार के पावन अवसर पर बिहार के लखीसराय स्थित प्रसिद्ध अशोकधाम मंदिर में एक बड़ा हादसा हो गया। अफवाह और बेकाबू भीड़ के कारण मची भगदड़ में 7 महिला श्रद्धालुओं की जान चली गई, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल हैं। राहत और बचाव कार्य जारी है।
नागपंचमी और सावन के तीसरे सोमवार के पावन अवसर पर बिहार के लखीसराय स्थित प्रसिद्ध अशोकधाम मंदिर में एक बड़ा हादसा हो गया। अफवाह और बेकाबू भीड़ के कारण मची भगदड़ में 7 महिला श्रद्धालुओं की जान चली गई, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल हैं। राहत और बचाव कार्य जारी है।
भक्ति के बीच अचानक पसरा मातम
लखीसराय के प्रसिद्ध अशोकधाम मंदिर में सावन के तीसरे सोमवार और नागपंचमी के दुर्लभ संयोग के कारण सुबह से ही भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ा था। चारों तरफ हर-हर महादेव के जयकारे गूंज रहे थे और श्रद्धालु जल चढ़ाने के लिए कतारों में खड़े थे। इसी बीच अचानक एक अफवाह फैली कि बिजली का पोल गिर गया है और उसमें करंट फैल रहा है। इस खबर के फैलते ही मंदिर परिसर में मौजूद श्रद्धालुओं में अफरा-तफरी मच गई और लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे।
ट्रेनों की आवाजाही और टूटी बैरिकेडिंग
घटना की सूचना मिलते ही जिला प्रशासन और पुलिस बल मौके पर पहुंचे। लखीसराय के जिलाधिकारी (DM) ने स्थिति का जायजा लेते हुए बताया कि तड़के कई प्रमुख ट्रेनों के स्टेशन पर पहुंचते ही श्रद्धालुओं की भारी संख्या एक साथ मंदिर परिसर में प्रवेश कर गई। अचानक बढ़ी इस बेकाबू भीड़ के दबाव को संभालना मुश्किल हो गया, जिससे मंदिर मार्ग पर लगी बैरिकेडिंग टूट गई। बैरिकेडिंग टूटने और अफवाह के कारण स्थिति बेहद भयावह हो गई, जिससे कई श्रद्धालु नीचे गिर गए और भीड़ उन्हें कुचलते हुए आगे निकल गई।
प्रशासन की सफाई: करंट नहीं, दबने से हुई मौतें
हादसे को लेकर फैली भ्रांतियों पर विराम लगाते हुए प्रशासनिक अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि किसी भी श्रद्धालु की मौत करंट लगने से नहीं हुई है। सभी मौतें भगदड़, दम घुटने और भीड़ के नीचे दबने के कारण हुई हैं। घायलों को तुरंत स्थानीय अस्पताल और सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां डॉक्टरों की टीम उनका इलाज कर रही है। प्रशासन ने पूरे मंदिर क्षेत्र को नियंत्रण में लेकर स्थिति को संभालने का प्रयास किया है।
उपमुख्यमंत्री का दौरा और उच्चस्तरीय जांच
घटना की संवेदनशीलता को देखते हुए बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने तुरंत अशोकधाम मंदिर का दौरा किया। उन्होंने अस्पताल जाकर घायलों का हाल जाना और परिजनों को हर संभव मदद का भरोसा दिया। सरकार ने इस पूरे हादसे की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं। जांच टीम यह पता लगाएगी कि सुरक्षा व्यवस्था में कहां चूक हुई और अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

झारखंड में छात्रों की भूख हड़ताल रंग लाई, सरकार ने बातचीत के लिए बुलाया
झारखंड में जारी छात्र आंदोलन के बीच भूख हड़ताल पर बैठे छात्र नेता देवेंद्र महतो को सरकार ने बातचीत के लिए आमंत्रित किया है। इस सकारात्मक पहल के बाद महतो ने उम्मीद जताई है कि संवाद से शिक्षा व्यवस्था में सुधारात्मक बदलाव आएंगे, ताकि भविष्य की पीढ़ी को संघर्ष न करना पड़े।
खबर का निचोड़
झारखंड में जारी छात्र आंदोलन के बीच भूख हड़ताल पर बैठे छात्र नेता देवेंद्र महतो को सरकार ने बातचीत के लिए आमंत्रित किया है। इस सकारात्मक पहल के बाद महतो ने उम्मीद जताई है कि संवाद से शिक्षा व्यवस्था में सुधारात्मक बदलाव आएंगे, ताकि भविष्य की पीढ़ी को संघर्ष न करना पड़े।
गतिरोध के बीच राहत की किरण
झारखंड में लंबे समय से जारी छात्र आंदोलन अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। राज्य की चरमराती शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे छात्र नेता देवेंद्र महतो के आंदोलन का असर आखिरकार शासन के गलियारों तक पहुंच ही गया। राज्य सरकार ने मामले की गंभीरता को समझते हुए आंदोलनकारी छात्रों को सोमवार को औपचारिक बातचीत के लिए आमंत्रित किया है। इस बुलावे के बाद से ही लंबे समय से सड़कों पर डटे युवाओं के बीच एक नई उम्मीद जागी है।
वार्ता से सकारात्मक बदलाव की उम्मीद
सरकार की ओर से आए इस बुलावे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए छात्र नेता देवेंद्र महतो ने स्पष्ट किया कि उनका मकसद केवल विरोध प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि व्यवस्था में ठोस सुधार लाना है। महतो ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इस वार्ता का परिणाम बेहद सकारात्मक रहेगा। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि यह लड़ाई किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि राज्य के हर उस युवा के लिए है जो वर्षों से सही नीति और पारदर्शी प्रणाली के अभाव में अपना कीमती समय और भविष्य गंवा रहा है।
भावी पीढ़ियों के लिए जारी है संघर्ष
अपने संदेश में देवेंद्र महतो ने युवाओं के दर्द को सामने रखते हुए कहा कि आज झारखंड का युवा जिस पीड़ा, संघर्ष और कठिनाइयों के दौर से गुजर रहा है, वह आने वाली पीढ़ियों को न झेलना पड़े। शिक्षा प्रणाली में सुधार की यह मांग राज्य के उन लाखों अभ्यर्थियों की आवाज बन चुकी है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, समय पर नियुक्तियों और पारदर्शी नीतियों का इंतजार कर रहे हैं। छात्रों का मानना है कि यदि आज इस व्यवस्था को नहीं बदला गया, तो आने वाले समय में स्थितियां और भी विकराल हो सकती हैं।
सरकार के रुख पर टिकी सबकी नजरें
सोमवार को होने वाली इस उच्चस्तरीय बैठक पर अब पूरे झारखंड के छात्रों और आम नागरिकों की नजरें टिक गई हैं। आंदोलनकारियों का साफ कहना है कि बातचीत केवल आश्वासन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि टेबल पर ठोस नीतियां और समाधान निकलकर सामने आने चाहिए। अब यह देखना बेहद अहम होगा कि सरकार छात्रों की जायज मांगों पर क्या रुख अपनाती है और शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए क्या कदम उठाती है।
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