
जब 10 साल के शाहरुख खान कलाकारों को परोसते थे समोसे: पंकज कपूर का दिलचस्प खुलासा
दिग्गज अभिनेता पंकज कपूर ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) के दिनों को याद करते हुए सुपरस्टार शाहरुख खान से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प किस्सा साझा किया है। उन्होंने बताया कि महज 10 साल की उम्र में शाहरुख खान एनएसडी की कैंटीन से कलाकारों को समोसे सप्लाई किया करते थे, जिसे शायद उनके परिवार का कोई सदस्य चलाता था।
खबर का निचोड़
दिग्गज अभिनेता पंकज कपूर ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) के दिनों को याद करते हुए सुपरस्टार शाहरुख खान से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प किस्सा साझा किया है। उन्होंने बताया कि महज 10 साल की उम्र में शाहरुख खान एनएसडी की कैंटीन से कलाकारों को समोसे सप्लाई किया करते थे, जिसे शायद उनके परिवार का कोई सदस्य चलाता था।
संघर्ष के दिनों की वो अनसुनी कहानी
बॉलीवुड के 'किंग खान' यानी शाहरुख खान आज जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने एक लंबा और प्रेरणादायक सफर तय किया है। दिल्ली की गलियों से निकलकर मायानगरी मुंबई के बेताज बादशाह बनने की उनकी कहानी में कई ऐसे पन्ने हैं, जो आज भी लोगों के सामने नहीं आए हैं। ऐसा ही एक बेहद दिलचस्प और भावुक कर देने वाला किस्सा सिनेमा जगत के दिग्गज अभिनेता पंकज कपूर ने साझा किया है, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है।
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के वो दिन
यह किस्सा उस दौर का है जब पंकज कपूर दिल्ली के मशहूर 'नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा' (NSD) में अभिनय के गुर सीख रहे थे और थिएटर की दुनिया में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। थियेटर के कलाकारों के लिए रिहर्सल के बीच कैंटीन ही एक ऐसी जगह होती थी, जहां चाय और स्नैक्स के साथ कला पर लंबी चर्चाएं चलती थीं। इसी कैंटीन की यादों को ताजा करते हुए पंकज कपूर ने शाहरुख खान के बचपन का एक ऐसा रूप सामने रखा है, जिसके बारे में शायद ही कोई जानता हो।
'जब 10 साल के शाहरुख लेकर आते थे समोसे'
पंकज कपूर ने बताया कि जब वे एनएसडी में थे, तब वहां एक 10 साल का छोटा बच्चा अक्सर कलाकारों के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता था। वह बच्चा कोई और नहीं बल्कि आज के सुपरस्टार शाहरुख खान थे। पंकज कपूर के मुताबिक, उस समय शाहरुख खान कई बार थियेटर के कलाकारों को कैंटीन से समोसे और चाय लाकर दिया करते थे। वह इतनी कम उम्र में भी बेहद फुर्तीले और मिलनसार थे।
कैंटीन से था शाहरुख का खास कनेक्शन
इस पुराने और यादगार वाकये को याद करते हुए पंकज कपूर ने शाहरुख के परिवार के इस संस्थान से जुड़ाव का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उस दौर में शायद शाहरुख खान के पिता या उनके चाचा एनएसडी की उस मशहूर कैंटीन को संचालित करते थे। यही वजह थी कि बचपन में शाहरुख का ज्यादातर समय एनएसडी के माहौल और वहां के कलाकारों के बीच बीतता था। कलाकारों को करीब से देखने और इस माहौल में सांस लेने ने शायद कहीं न कहीं अनजाने में ही सही, उनके भीतर के अभिनेता को भी तराशने का काम किया।
आज जब शाहरुख खान सफलता के शिखर पर हैं, तब अतीत की ये छोटी-छोटी बातें यह साबित करती हैं कि उनका जमीन से जुड़ाव और मेहनत करने का जज्बा बचपन से ही उनके व्यक्तित्व का हिस्सा रहा है। पंकज कपूर द्वारा साझा किया गया यह किस्सा न सिर्फ दोनों कलाकारों के पुराने जुड़ाव को दिखाता है, बल्कि यह भी बयां करता है कि वक्त का पहिया कैसे घूमता है।

ओम पुरी के अफेयर से टूटा था सीमा कपूर का घर, बयां किया दर्दनाक सच
दिवंगत अभिनेता ओम पुरी की पहली पत्नी सीमा कपूर ने हाल ही में एक इंटरव्यू में अपनी शादीशुदा जिंदगी के सबसे काले अध्याय को उजागर किया है। सीमा ने बताया कि ओम पुरी के विवाहेतर संबंध (एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर) का पता चलने और उस सदमे के कारण उन्होंने अपना अजन्मा बच्चा खो दिया था।
दिवंगत अभिनेता ओम पुरी की पहली पत्नी सीमा कपूर ने हाल ही में एक इंटरव्यू में अपनी शादीशुदा जिंदगी के सबसे काले अध्याय को उजागर किया है। सीमा ने बताया कि ओम पुरी के विवाहेतर संबंध (एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर) का पता चलने और उस सदमे के कारण उन्होंने अपना अजन्मा बच्चा खो दिया था।
जब एक झटके में उजड़ गई हंसती-खेलती दुनिया
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता ओम पुरी अपनी बेमिसाल अदाकारी के लिए जाने जाते थे, लेकिन पर्दे के पीछे उनकी निजी जिंदगी काफी उथल-पुथल भरी रही। उनकी पहली पत्नी और मशहूर अभिनेता अन्नू कपूर की बहन सीमा कपूर ने सालों बाद उस गहरे दर्द को बयां किया है, जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल कर रख दी। सीमा ने खुलासा किया कि जब वे गर्भवती थीं, तब उन्हें पता चला कि ओम पुरी की जिंदगी में कोई और आ चुका है। इस खबर ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया था।
सदमे में खोया अजन्मा बच्चा, राजस्थान में काटी रातें
अफेयर की बात सामने आने के बाद सीमा कपूर पूरी तरह टूट चुकी थीं। उस तनावपूर्ण माहौल से दूर जाने के लिए वे गर्भवती होने के बावजूद मुंबई छोड़कर राजस्थान अपनी मां के पास चली गईं। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। इस गहरे मानसिक और भावनात्मक सदमे का असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ा और उन्होंने अपना होने वाला बच्चा हमेशा के लिए खो दिया। एक तरफ शादी टूटने का गम और दूसरी तरफ अजन्मे बच्चे को खोने का दर्द, सीमा के लिए यह वक्त किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था।
भाई अन्नू कपूर चाहते थे कानूनी लड़ाई
जब सीमा कपूर के भाई और अभिनेता अन्नू कपूर को इस पूरी स्थिति का पता चला, तो वे अपनी बहन के साथ खड़े हुए। अन्नू कपूर चाहते थे कि इस धोखे के खिलाफ कानूनी रास्ता अपनाया जाए और ओम पुरी के खिलाफ कोर्ट में लड़ाई लड़ी जाए। हालांकि, सीमा उस समय इस कदर टूट चुकी थीं कि उनमें किसी भी तरह की कानूनी जंग लड़ने की हिम्मत नहीं बची थी। उन्होंने अन्नू कपूर को कानूनी कार्रवाई करने से साफ मना कर दिया और शांति से इस रिश्ते से अलग होना बेहतर समझा।
अकेलेपन को चुना, नहीं की दूसरी शादी
ओम पुरी से अलग होने और अपनी जिंदगी के सबसे बड़े सदमे से उबरने के बाद सीमा कपूर ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपनी जिंदगी में फिर कभी किसी और को शामिल न करने की कसम खाई। सीमा ने बताया कि इस कड़वे अनुभव के बाद उनका दूसरी शादी करने का कोई इरादा नहीं था और उन्होंने ताउम्र अकेले रहने का फैसला किया। ओम पुरी ने बाद में नंदिता पुरी से शादी कर ली थी, लेकिन सीमा कपूर के जीवन पर लगा यह जख्म कभी नहीं भर पाया।

तेज प्रताप के घर बड़ी चोरी: ₹20 लाख कैश और 4 आईफोन गायब
बिहार के पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव के पटना स्थित सरकारी आवास में एक बड़ी चोरी की वारदात सामने आई है। अलमारी में रखे करीब ₹20 लाख कैश के साथ 4 आईफोन 17 प्रो मैक्स, मैकबुक, आईपैड और सोने के जेवरात गायब हैं। इस हाई-प्रोफाइल चोरी का आरोप तेज प्रताप के निजी सहायक (PA) मोतीलाल राय पर लगा है।
खबर का निचोड़ (Summary)
बिहार के पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव के पटना स्थित सरकारी आवास में एक बड़ी चोरी की वारदात सामने आई है। अलमारी में रखे करीब ₹20 लाख कैश के साथ 4 आईफोन 17 प्रो मैक्स, मैकबुक, आईपैड और सोने के जेवरात गायब हैं। इस हाई-प्रोफाइल चोरी का आरोप तेज प्रताप के निजी सहायक (PA) मोतीलाल राय पर लगा है।
हाई-प्रोफाइल बंगले में बड़ी सेंधमारी
बिहार की राजनीति के सबसे चर्चित चेहरों में से एक और पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव के पटना स्थित सरकारी आवास से सुरक्षा व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए लाखों की चोरी को अंजाम दिया गया है। राजधानी के पॉश इलाके में स्थित इस हाई-प्रोफाइल बंगले में हुई इस घटना ने प्रशासनिक महकमे से लेकर राजनीतिक गलियारों तक में खलबली मचा दी है। चोरों ने किसी बाहरी दीवार को नहीं फांदा, बल्कि सीधे उस अलमारी तक पहुंच बनाई जहां कीमती सामान और नकदी रखी हुई थी।
₹20 लाख कैश, आईफोन और सोने पर हाथ साफ
चोरी गए सामानों की लिस्ट काफी लंबी और चौंकाने वाली है। मिली जानकारी के मुताबिक, तेज प्रताप यादव के आवास से करीब ₹20,000,000 (20 लाख रुपये) की भारी-भरकम नकदी गायब है। इसके अलावा चोरों ने आधुनिक गैजेट्स और कीमती गहनों पर भी हाथ साफ किया है। गायब होने वाले सामानों में 4 आईफोन 17 प्रो मैक्स, 1 मैकबुक और 1 आईपैड जैसे महंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शामिल हैं। गहनों की बात करें तो अलमारी में रखी 2 तोला सोने की चेन और 1 सोने की अंगूठी भी गायब है।
डेटा चोरी होने का भी खतरा
इस पूरी वारदात में जो सबसे ज्यादा चिंताजनक बात है, वो है 2 हार्ड डिस्क का गायब होना। डिजिटल दौर में हार्ड डिस्क के भीतर बेहद संवेदनशील और निजी जानकारियां हो सकती हैं। एक पूर्व मंत्री और रसूखदार राजनीतिक परिवार के सदस्य के घर से हार्ड डिस्क का चोरी होना महकमे के लिए बड़ा सिरदर्द बन गया है। कयास लगाए जा रहे हैं कि इस डेटा का गलत इस्तेमाल भी हो सकता है, यही वजह है कि जांच एजेंसियां इस बिंदु को बेहद गंभीरता से देख रही हैं।
अपनों पर ही लगा दगाबाजी का आरोप
इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया जब शक की सुई किसी बाहरी अपराधी पर नहीं, बल्कि घर के ही एक बेहद करीबी शख्स पर जाकर टिकी। तेज प्रताप यादव के निजी सहायक (PA) मोतीलाल राय पर इस पूरी चोरी को अंजाम देने का सीधा आरोप लगा है। मोतीलाल राय काफी समय से तेज प्रताप के साथ जुड़े हुए थे और उन्हें घर की हर छोटी-बड़ी व्यवस्था की जानकारी थी। पुलिस अब इस मामले की गहराई से तफ्तीश कर रही है और आरोपी की तलाश में लगातार छापेमारी की जा रही है। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कभी-कभी सबसे बड़ा खतरा बेहद करीबी बनकर ही घर में दाखिल होता है।

NEET परीक्षा में 'मुन्ना भाई' स्टाइल: असली छात्रों की जगह परीक्षा देते 9 सॉल्वर गिरफ्तार
बिहार के लखीसराय में NEET-UG री-एग्ज़ाम के दौरान एक बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हुआ है, जहां असली परीक्षार्थियों की जगह परीक्षा देने पहुंचे 9 फर्जी कैंडिडेट (सॉल्वर) रंगे हाथों पकड़े गए। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इस रैकेट से जुड़े 5 मेडिकल छात्रों और बायोमेट्रिक कंपनी के कर्मियों सहित कुल 24 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।
बिहार के लखीसराय में NEET-UG री-एग्ज़ाम के दौरान एक बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हुआ है, जहां असली परीक्षार्थियों की जगह परीक्षा देने पहुंचे 9 फर्जी कैंडिडेट (सॉल्वर) रंगे हाथों पकड़े गए। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इस रैकेट से जुड़े 5 मेडिकल छात्रों और बायोमेट्रिक कंपनी के कर्मियों सहित कुल 24 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।
परीक्षा केंद्र पर 'मुन्ना भाई' पार्ट-3: ऐसे हुआ पर्दाफाश
बिहार का लखीसराय जिला रविवार को उस वक्त सुर्खियों में आ गया, जब NEET-UG की दोबारा आयोजित हो रही परीक्षा के दौरान सुरक्षा और जांच एजेंसियों ने हाई-टेक मुन्ना भाइयों को दबोच लिया। यह पूरा घटनाक्रम किसी बॉलीवुड फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा नजर आता है। परीक्षा केंद्रों पर जब परीक्षार्थियों के बायोमेट्रिक मिलान की प्रक्रिया शुरू हुई, तो तकनीक और मुस्तैद अधिकारियों ने इन जालसाजों की चालाकी को पकड़ लिया।
जैसे ही फिंगरप्रिंट और चेहरे का डेटा असली आवेदक से मेल नहीं खाया, केंद्र पर हड़कंप मच गया। कड़ाई से पूछताछ करने पर यह साफ हो गया कि कमरे में बैठे छात्र वो नहीं हैं, जिन्होंने फॉर्म भरा था, बल्कि वे किसी और के भविष्य का सौदा करने आए भाड़े के 'सॉल्वर' थे।
मेडिकल स्टूडेंट से लेकर बायोमेट्रिक कर्मी तक: बड़ा नेक्सस बेनकाब
इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पुलिस ने अब तक कुल 24 शातिरों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है। जांच में जो खुलासा हुआ है, वह बेहद चौंकाने वाला है। पकड़े गए आरोपियों में 5 ऐसे छात्र शामिल हैं जो खुद विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे हैं। चंद रुपयों के लालच और मोटे कमीशन के चक्कर में इन मेधावी छात्रों ने दूसरों की जगह परीक्षा देने का जोखिम उठाया।
इतना ही नहीं, परीक्षा की शुचिता बनाए रखने के लिए जिस बायोमेट्रिक कंपनी को जिम्मेदारी दी गई थी, उसके कर्मचारी भी इस काली कमाई के खेल में शामिल पाए गए। इन कर्मियों की मिलीभगत से ही फर्जी छात्रों को सिस्टम में एंट्री दिलाने की नाकाम कोशिश की जा रही थी।
जांच का दायरा बढ़ा: खंगाले जा रहे हैं तार
लखीसराय पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की कुंडली खंगालने में जुट गई है। शुरुआती तफ्तीश से संकेत मिले हैं कि यह केवल एक जिले तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि इसके तार अंतरराज्यीय सॉल्वर गैंग से जुड़े हो सकते हैं। पुलिस इस बात का पता लगा रही है कि प्रति कैंडिडेट कितने लाख रुपये की डील हुई थी और इस रैकेट का मुख्य सरगना कौन है।
गिरफ्तार किए गए आरोपियों के मोबाइल फोन, बैंक खातों और कॉल डिटेल्स को स्कैन किया जा रहा है ताकि इस सिंडिकेट के बाकी चेहरों को भी बेनकाब किया जा सके। इस बड़ी कार्रवाई ने एक बार फिर देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा की सुरक्षा व्यवस्था और उस पर मंडराते खतरों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

लखनऊ अग्निकांड: 10 साल पहले ही तय थी बर्बादी की इबारत!
लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में भीषण आग लगने से 15 मासूम जिंदगियां असमय काल के गाल में समा गईं। हैरान करने वाली बात यह है कि जिस अवैध इमारत में यह हादसा हुआ, उसे साल 2016 में ही ध्वस्त करने का सरकारी आदेश जारी हो चुका था। महज दो महीने के भीतर इस आदेश को रहस्यमयी ढंग से निरस्त कर दिया गया, जिसने आज इस बड़े हादसे की नींव रख दी।
खबर का निचोड़
लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में भीषण आग लगने से 15 मासूम जिंदगियां असमय काल के गाल में समा गईं। हैरान करने वाली बात यह है कि जिस अवैध इमारत में यह हादसा हुआ, उसे साल 2016 में ही ध्वस्त करने का सरकारी आदेश जारी हो चुका था। महज दो महीने के भीतर इस आदेश को रहस्यमयी ढंग से निरस्त कर दिया गया, जिसने आज इस बड़े हादसे की नींव रख दी।
मौत की इमारत: जहां नियमों को ताक पर रखकर लिखी गई बर्बादी
लखनऊ की यह बहुमंजिला इमारत आज चीख-पुकार और मातम का मरघट बन चुकी है। लेकिन इस तबाही की शुरुआत आज नहीं, बल्कि पूरे एक दशक पहले हुई थी। जब इस सरकारी फाइल पर धूल जम रही थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि भ्रष्टाचार और अनदेखी की यह इमारत एक दिन 15 लोगों की चिता बन जाएगी। आग की लपटों ने न सिर्फ मासूमों की जान ली, बल्कि सिस्टम के उस खोखलेपन को भी बेनकाब कर दिया जो चंद रुपयों और रसूख के आगे घुटने टेक देता है।
कागजों पर घर, जमीन पर 'मौत का कुआं'
इस पूरी त्रासदी की सबसे डरावनी कड़ाई इसकी बनावट और इसके इस्तेमाल से जुड़ी है। इस बहुमंजिला इमारत का नक्शा पास कराते समय इसे एक 'रिहायशी इमारत' (Residential Building) के तौर पर दिखाया गया था। नियम कहते हैं कि रिहायशी इलाकों और इमारतों के सुरक्षा मानक पूरी तरह अलग होते हैं। लेकिन नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए इस इमारत के भीतर एक कमर्शियल कोचिंग सेंटर का संचालन धड़ल्ले से किया जा रहा था। तंग गलियां, वेंटिलेशन की कमी और सैकड़ों बच्चों की मौजूदगी ने इस जगह को एक टाइम बम में तब्दील कर दिया था, जो आखिरकार ब्लास्ट हो गया।
2016 का वह आदेश और सिस्टम का यू-टर्न
मामला सिर्फ एक अवैध कोचिंग चलने भर का नहीं है, बल्कि यह सीधे-सीधे प्रशासनिक मिलीभगत का जीता-जागता सबूत है। साल 2016 में इस इमारत के अवैध निर्माण को लेकर बाकायदा जांच हुई थी और इसे पूरी तरह ध्वस्त (Demolish) करने का कड़ा सरकारी आदेश भी जारी किया गया था। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह भारतीय प्रशासनिक लूपहोल की बानगी है। महज दो महीने के भीतर ऐसा क्या बदला कि मौत की इस इमारत को ढहाने का आदेश ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और उसे निरस्त कर दिया गया? यह सवाल आज 15 परिवारों के उजड़े हुए चराग पूछ रहे हैं।
अनदेखी की कीमत: 15 जिंदगियां खाक
जब यह आग भड़की, तो बच्चों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। रिहायशी नक्शे पर बनी इस व्यावसायिक इमारत में आपातकालीन निकास (Emergency Exit) जैसी बुनियादी सुविधाएं भी सिर्फ कागजों तक सीमित थीं। अगर 10 साल पहले प्रशासन अपने ही दिए गए ध्वस्तीकरण के आदेश पर अड़ा रहता और इस अवैध निर्माण को मलबे में तब्दील कर देता, तो आज लखनऊ की सड़कों पर एम्बुलेंस के सायरन नहीं गूंज रहे होते और न ही अपनों को खोने का यह अंतहीन दर्द होता। सरकारी फाइलों का वह एक निरस्त आदेश, आज 15 परिवारों के लिए जिंदगी का अंत साबित हुआ है।
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