
बौद्ध धर्म का उद्भव, विकास और समकालीन वैश्विक प्रासंगिकता
बौद्ध धर्म भारतीय दर्शन और संस्कृति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है, जिसने न केवल प्राचीन भारत के सामाजिक-राजनीतिक ढांचे को प्रभावित किया, बल्कि वैश्विक स्तर पर शांति, अहिंसा और करुणा का प्रसार किया। यह छठी शताब्दी ईसा पूर्व की श्रमण परंपरा का परिणाम है, जिसने तत्कालीन वैदिक कर्मकांडों के विरुद्ध तर्क और नैतिक शुचिता पर बल दिया।
बौद्ध धर्म भारतीय दर्शन और संस्कृति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है, जिसने न केवल प्राचीन भारत के सामाजिक-राजनीतिक ढांचे को प्रभावित किया, बल्कि वैश्विक स्तर पर शांति, अहिंसा और करुणा का प्रसार किया। यह छठी शताब्दी ईसा पूर्व की श्रमण परंपरा का परिणाम है, जिसने तत्कालीन वैदिक कर्मकांडों के विरुद्ध तर्क और नैतिक शुचिता पर बल दिया।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उदय के कारक
छठी शताब्दी ईसा पूर्व का काल भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों का साक्षी था। इस समय गंगा के मैदानी इलाकों में द्वितीय नगरीकरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। लोहे के व्यापक उपयोग से कृषि में अधिशेष उत्पादन बढ़ा, जिसने व्यापारिक नगरों को जन्म दिया। इस बदलते समाज में वैश्य वर्ग आर्थिक रूप से सशक्त हो गया, लेकिन सामाजिक पदानुक्रम में उन्हें उपेक्षित रखा गया। बौद्ध धर्म ने इस वर्ग को एक ऐसे मंच की पेशकश की, जो जन्म के बजाय कर्म पर आधारित समानता का समर्थन करता था।
महात्मा बुद्ध का जीवन और शिक्षाएं
सिद्धार्थ गौतम का जन्म 563 ईसा पूर्व में लुम्बिनी में हुआ था। सांसारिक दुखों से विरक्ति के बाद उन्होंने सत्य की खोज की और 35 वर्ष की आयु में बोधगया में उन्हें ज्ञान (निर्वाण) प्राप्त हुआ। उनकी शिक्षाओं का मूल आधार 'चार आर्य सत्य' हैं:
1. संसार में दुख है।
2. दुख का कारण तृष्णा (आसक्ति) है।
3. दुख का निवारण संभव है।
4. दुख निवारण के लिए 'अष्टांगिक मार्ग' का अनुसरण आवश्यक है।
बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया, जो न तो अत्यधिक विलासिता और न ही अत्यधिक तपस्या का समर्थन करता है। उनकी भाषा जनसाधारण की भाषा 'पाली' थी, जिसने उनके विचारों को आम जनता तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बौद्ध दर्शन के प्रमुख आयाम
बौद्ध दर्शन की आधारशिला 'अनात्मवाद' और 'क्षणभंगुरता' (Anicca) के सिद्धांत हैं। बौद्ध धर्म आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता और मानता है कि संसार में सब कुछ परिवर्तनशील है। 'प्रतीत्यसमुत्पाद' का सिद्धांत कार्य-कारण संबंधों की व्याख्या करता है, जो बताता है कि हर घटना के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। 'अष्टांगिक मार्ग' (सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि) व्यक्ति के चरित्र निर्माण का एक मार्ग है।
बौद्ध संगीति और संप्रदायों का विकास
बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को सुरक्षित रखने और उनमें सामंजस्य बनाए रखने के लिए समय-समय पर चार प्रमुख बौद्ध संगीतियों का आयोजन किया गया:
प्रथम संगीति: राजगृह (महाकश्यप की अध्यक्षता में), बुद्ध की मृत्यु के तत्काल बाद।
द्वितीय संगीति: वैशाली (कालाशोक के शासनकाल में), जहाँ संघ में स्थविर और महासांघिक विभाजन की नींव पड़ी।
तृतीय संगीति: पाटलिपुत्र (अशोक के संरक्षण में), इसमें 'अभिधम्म पिटक' का संकलन हुआ।
चतुर्थ संगीति: कुंडलवन, कश्मीर (कनिष्क के शासनकाल में), जहाँ बौद्ध धर्म स्पष्ट रूप से 'हीनयान' और 'महायान' में विभाजित हो गया।
महायान शाखा ने बुद्ध को देवता मानकर उनकी पूजा शुरू की और बोधिसत्व की अवधारणा को विकसित किया, जबकि हीनयान बुद्ध की मूल शिक्षाओं पर अडिग रहा। आगे चलकर वज्रयान शाखा का उदय हुआ, जिसने तंत्र-मंत्र और जादू-टोने को समाहित किया।
बौद्ध धर्म का प्रसार और संरक्षण
मौर्य सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को केवल एक संप्रदाय से हटाकर विश्व धर्म बनाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उन्होंने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा और धम्म महामात्रों की नियुक्ति की। बाद के काल में कनिष्क, हर्षवर्धन और पाल राजाओं ने बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसे शिक्षण संस्थान बौद्ध शिक्षा और दर्शन के वैश्विक केंद्र बनकर उभरे।
पतन के कारण
बौद्ध धर्म के पतन के पीछे कई कारक उत्तरदायी थे। संघ में बढ़ता भ्रष्टाचार और विलासिता, आम भाषा पाली के स्थान पर संस्कृत का प्रयोग, और हिंदू धर्म के भीतर सुधारवादी आंदोलनों (जैसे भक्ति आंदोलन) ने बौद्ध धर्म के आधार को कमजोर किया। साथ ही, विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा मठों का विनाश और कालांतर में राजकीय संरक्षण का अभाव इसके पतन के मुख्य कारण बने।
समकालीन प्रासंगिकता और भारत की सॉफ्ट पावर
वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में बौद्ध धर्म की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। जलवायु परिवर्तन, संघर्ष और सामाजिक असमानता जैसी चुनौतियों के बीच बुद्ध के शांति और करुणा के सिद्धांत विश्व को रास्ता दिखाते हैं। भारत सरकार अपनी 'एक्ट ईस्ट नीति' और 'बुद्ध सर्किट' के विकास के माध्यम से दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ अपने सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत कर रही है। 'इंटरनेशनल बुद्धिस्ट कन्फेडरेशन' जैसे मंच भारत के सॉफ्ट पावर को वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करने का माध्यम बने हैं।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु
बौद्ध ग्रंथों में 'त्रिपिटक' (सुत्त पिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक) का विशेष महत्व है।
बुद्ध के जीवन की प्रमुख घटनाओं के प्रतीक: जन्म (कमल और सांड), गृहत्याग (घोड़ा), ज्ञान प्राप्ति (पीपल/बोधि वृक्ष), प्रथम उपदेश (धर्मचक्र प्रवर्तन), मृत्यु (स्तूप)।
महायान परंपरा में 'मैत्रेय' को भविष्य का बुद्ध माना गया है।
'जातक कथाएं' बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियों का संग्रह हैं, जो कला और साहित्य का प्रमुख स्रोत रही हैं।
पाल वंश के शासकों को 'महायान बौद्ध धर्म' का महान संरक्षक माना जाता है, जिन्होंने विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे विश्वविद्यालयों की स्थापना की।

भुगतान संतुलन (BoP): भारतीय अर्थव्यवस्था का व्यापक विश्लेषण और महत्व
भुगतान संतुलन (BoP) किसी देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच एक निश्चित अवधि में किए गए सभी आर्थिक लेनदेन का व्यवस्थित लेखा-जोखा है। यह देश की बाहरी आर्थिक स्थिरता का सूचक है, जिसमें चालू खाता (Current Account) और पूंजी खाता (Capital Account) प्रमुख घटक होते हैं। भारत के लिए, विदेशी मुद्रा भंडार प्रबंधन और विनिमय दर स्थिरता में इसकी भूमिका सर्वोपरि है।
भुगतान संतुलन (BoP) किसी देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच एक निश्चित अवधि में किए गए सभी आर्थिक लेनदेन का व्यवस्थित लेखा-जोखा है। यह देश की बाहरी आर्थिक स्थिरता का सूचक है, जिसमें चालू खाता (Current Account) और पूंजी खाता (Capital Account) प्रमुख घटक होते हैं। भारत के लिए, विदेशी मुद्रा भंडार प्रबंधन और विनिमय दर स्थिरता में इसकी भूमिका सर्वोपरि है।
भुगतान संतुलन की संरचना
भुगतान संतुलन मुख्य रूप से दो खातों में विभाजित होता है। चालू खाता वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार, निवेश आय और हस्तांतरण भुगतानों को दर्ज करता है। इसके विपरीत, पूंजी खाता विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI), विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI), बाहरी वाणिज्यिक उधार (ECB) और विदेशी सहायता जैसे वित्तीय प्रवाहों को ट्रैक करता है। जब किसी देश का कुल व्यय उसकी कुल आय से अधिक होता है, तो उसे BoP घाटा कहा जाता है, जिसे विदेशी मुद्रा भंडार के माध्यम से संतुलित किया जाता है।
आर्थिक महत्व और प्रभाव
BoP की स्थिति किसी देश की मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों को प्रभावित करती है। भारत के संदर्भ में, चालू खाता घाटा (CAD) अक्सर व्यापारिक वस्तुओं के आयात और निर्यात के बीच अंतर से संचालित होता है। यदि CAD सीमा से अधिक हो जाता है, तो यह घरेलू मुद्रा पर दबाव डालता है, जिससे रुपए के मूल्य में गिरावट हो सकती है। इसके विपरीत, पूंजी खाते में मजबूत प्रवाह भारत को अपनी विकास संबंधी जरूरतों के लिए आवश्यक धन जुटाने में मदद करता है।
नीतिगत ढांचा और वर्तमान परिदृश्य
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और वित्त मंत्रालय समय-समय पर आयात शुल्क, निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं और पूंजी प्रवाह नियमों के माध्यम से BoP को प्रबंधित करते हैं। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें, फेडरल रिजर्व की ब्याज दरें और भू-राजनीतिक अस्थिरता BoP को सीधे प्रभावित करते हैं। वर्तमान में, सेवा निर्यात और प्रेषण (Remittances) भारत के चालू खाते को सहारा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जो एक लचीली अर्थव्यवस्था का प्रमाण है।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
लेखांकन मानक: भुगतान संतुलन हमेशा शून्य पर संतुलित (Zero Balance) होना चाहिए; यदि यह नहीं है, तो त्रुटियां और चूक (Errors and Omissions) का उपयोग किया जाता है।
व्यापार संतुलन: यह केवल वस्तुओं के निर्यात और आयात का अंतर है।
दृश्य और अदृश्य मदें: वस्तुओं को दृश्य (Visible) और सेवाओं, आय तथा अंतरण को अदृश्य (Invisible) मदों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
विदेशी मुद्रा भंडार (Forex): भुगतान संतुलन का घाटा अक्सर विदेशी मुद्रा भंडार के कम होने के रूप में प्रकट होता है।
पूंजी खाता परिवर्तनीयता: भारत वर्तमान में केवल पूंजी खाते पर आंशिक रूप से परिवर्तनीय है, जिसका अर्थ है कि विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह और प्रवाह पर कुछ नियामक नियंत्रण लागू हैं।

भारतीय मानसून: भौगोलिक तंत्र, अद्यतन स्थिति एवं रणनीतिक महत्व
भारतीय मानसून केवल एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि एक जटिल वायुमंडलीय प्रक्रिया है जो हिंद महासागर और तिब्बती पठार के तापीय विरोधाभासों पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन के कारण इसके पैटर्न में बदलाव आया है, जिससे 'क्लाउडबर्स्ट' और अनिश्चित वर्षा की घटनाएं बढ़ी हैं, जो भारत की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
खबर का निचोड़
भारतीय मानसून केवल एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि एक जटिल वायुमंडलीय प्रक्रिया है जो हिंद महासागर और तिब्बती पठार के तापीय विरोधाभासों पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन के कारण इसके पैटर्न में बदलाव आया है, जिससे 'क्लाउडबर्स्ट' और अनिश्चित वर्षा की घटनाएं बढ़ी हैं, जो भारत की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
विस्तृत विश्लेषण
मानसून की उत्पत्ति का भौगोलिक तंत्र
भारतीय मानसून की उत्पत्ति मुख्य रूप से ग्रीष्मकाल में स्थलीय और जलीय भागों के असमान तापन के कारण होती है। मई-जून के महीनों में, तिब्बती पठार का अत्यधिक गर्म होना और उसके ऊपर एक 'लो प्रेशर सेल' का निर्माण मानसून को आकर्षित करने वाला प्राथमिक कारक है। इसके अतिरिक्त, जेट स्ट्रीम का विस्थापन और 'इंटर-ट्रॉपिकल कन्वर्जेंस जोन' (ITCZ) का उत्तर की ओर खिसकना मानसूनी हवाओं को भारतीय उपमहाद्वीप की ओर मोड़ देता है, जिसे दक्षिण-पश्चिमी मानसून कहा जाता है।
मानसून को प्रभावित करने वाले कारक
हालिया शोधों के अनुसार, 'एल नीनो दक्षिणी दोलन' (ENSO) और 'हिंद महासागर द्विध्रुव' (IOD) मानसून की तीव्रता को निर्धारित करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। सकारात्मक IOD हिंद महासागर के पश्चिमी भाग को गर्म करता है, जो भारत में सामान्य से अधिक वर्षा का कारण बनता है। इसके विपरीत, नकारात्मक IOD और एल नीनो की स्थिति अक्सर मानसून को कमजोर कर देती है। साथ ही, अरब सागर के तापमान में हो रही असामान्य वृद्धि ने चक्रवातों की आवृत्ति को बढ़ाया है, जिससे तटीय क्षेत्रों में मानसून के दौरान भारी वर्षा की घटनाएं बढ़ी हैं।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का 'समय चक्र' और 'वितरण' प्रभावित हुआ है। मानसून की शुरुआत और वापसी की तिथियों में अनिश्चितता देखी जा रही है। वर्तमान में मानसून की लंबी अवधि के बजाय कम समय में अत्यधिक वर्षा होने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह स्थिति कृषि उत्पादकता के लिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यह या तो सूखे की स्थिति पैदा करती है या अचानक आई बाढ़ (Flash Floods) के कारण फसलों को नुकसान पहुँचाती है।
प्रशासनिक एवं रणनीतिक महत्व
भारत की कृषि अर्थव्यवस्था आज भी मानसून पर अत्यधिक निर्भर है। मानसून का पूर्वानुमान न केवल 'खरीफ' फसलों की बुवाई के लिए आवश्यक है, बल्कि जलाशयों में जल स्तर को बनाए रखने और ऊर्जा सुरक्षा (जलविद्युत) के लिए भी अनिवार्य है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा उपयोग किए जाने वाले 'डायनेमिक प्रेडिक्शन मॉडल' अब अधिक सटीक डेटा प्रदान कर रहे हैं, जो आपदा प्रबंधन और नीतिगत निर्णय लेने में प्रशासनिक तंत्र की सहायता करते हैं।

चोल साम्राज्य: मध्यकालीन भारत का गौरवशाली समुद्री और प्रशासनिक इतिहास
चोल साम्राज्य (9वीं-13वीं शताब्दी) मध्यकालीन भारत की सबसे शक्तिशाली राजधानियों में से एक था। हाल ही में नीदरलैंड से 'लीडेन प्लेट्स' (Leiden Plates) की भारत वापसी और तमिलनाडु में चोलकालीन स्वर्ण मुद्राओं की खोज ने इस साम्राज्य के प्रशासनिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक वैभव को फिर से चर्चा में ला दिया है।
खबर का निचोड़ (Summary)
चोल साम्राज्य (9वीं-13वीं शताब्दी) मध्यकालीन भारत की सबसे शक्तिशाली राजधानियों में से एक था। हाल ही में नीदरलैंड से 'लीडेन प्लेट्स' (Leiden Plates) की भारत वापसी और तमिलनाडु में चोलकालीन स्वर्ण मुद्राओं की खोज ने इस साम्राज्य के प्रशासनिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक वैभव को फिर से चर्चा में ला दिया है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis)
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विस्तार
चोलों का उदय 9वीं शताब्दी में विजयलय द्वारा तंजावुर (तंजौर) को राजधानी बनाकर हुआ था। राजराज प्रथम और राजेंद्र प्रथम के शासनकाल में यह साम्राज्य अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचा। चोलों ने न केवल दक्षिण भारत को एकीकृत किया, बल्कि श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्वी एशिया (श्रीविजया साम्राज्य) तक अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उनकी नौसैनिक शक्ति इतनी सुदृढ़ थी कि बंगाल की खाड़ी को 'चोल झील' के रूप में जाना जाता था।
प्रशासनिक उत्कृष्ट और स्थानीय स्वशासन
चोलों की सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी अत्यधिक संगठित प्रशासनिक प्रणाली थी। संपूर्ण साम्राज्य 'मंडलम' (प्रांतों) में विभाजित था, जो आगे 'वलनाडु' और 'नाडु' (जिलों) में बंटे हुए थे। चोल प्रशासन अपनी स्वायत्त ग्राम सभाओं (उर और सभा) के लिए विश्व प्रसिद्ध है। 'उत्तरमेरूर शिलालेख' से स्थानीय स्वशासन और 'कुडावोलई' (लॉटरी द्वारा चयन) प्रणाली के साक्ष्य मिलते हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रारंभिक उदाहरण माने जाते हैं।
आर्थिक और समुद्री व्यापार
चोल शासकों ने विदेशी व्यापार के लिए एक व्यापक नेटवर्क तैयार किया था। नागपट्टिनम और कावेरीपट्टिनम जैसे बंदरगाह व्यापारिक गतिविधियों के केंद्र थे। चोलों के संबंध चीन, अरब जगत और दक्षिण-पूर्वी एशिया के साथ गहरे थे। हाल ही में नीदरलैंड से वापस लाई गई लीडेन ताम्रपत्र (Leiden Plates) इस बात का प्रमाण है कि चोल राजाओं ने नागपट्टिनम में 'चूड़ामणि विहार' जैसे बौद्ध केंद्रों को दान देकर धार्मिक सहिष्णुता और कूटनीतिक संबंध स्थापित किए थे।
कला, वास्तुकला और नवीनतम पुरातात्विक साक्ष्य
चोल वास्तुकला द्रविड़ शैली का चरमोत्कर्ष है। तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर और गंगईकोंडचोलपुरम इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। चोलकालीन कांस्य मूर्तियां (विशेषकर नटराज की प्रतिमा) अपनी धातु-ढलाई तकनीक के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। हाल ही में तमिलनाडु के जाव्वदु हिल्स के पास एक शिव मंदिर में 103 स्वर्ण मुद्राएं मिली हैं, जो चोलकालीन अर्थव्यवस्था की समृद्धि और मंदिर-केंद्रित व्यापारिक नेटवर्क को पुष्ट करती हैं।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण फैक्ट्स (UPSC/SSC)
संस्थापक: विजयलय (850 ईस्वी)।
प्रमुख शासक: राजराज प्रथम (बृहदेश्वर मंदिर निर्माता) और राजेंद्र प्रथम (गंगा की विजय और नौसैनिक अभियान)।
प्रशासनिक इकाई: मंडलम > वलनाडु > नाडु > ग्राम (उर/सभा)।
कुडावोलई (Kudavolai): चोल प्रशासन में स्थानीय सभा के सदस्यों को चुनने की चुनावी प्रणाली।
साहित्य: तमिल साहित्य का स्वर्ण युग, 'कंबन' (रामायण के रचयिता) इसी काल में हुए।
लीडेन ताम्रपत्र: इसमें राजराज प्रथम और राजेंद्र प्रथम द्वारा बौद्ध विहार को दिए गए अनुदान का विवरण है; यह 160 वर्षों बाद भारत लौटा है।
राजस्व: मुख्य स्रोत भू-राजस्व था, जिसे 'कडामई' (Kadamai) कहा जाता था।

दिल्ली सल्तनत का ऐतिहासिक उद्भव और क्रमिक राजवंशों का विश्लेषण
दिल्ली सल्तनत (1206-1526) भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसने उत्तर भारत में केंद्रीय सत्ता की नींव रखी। पांच क्रमिक राजवंशों—गुलाम, खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी—के शासनकाल में प्रशासनिक एकीकरण, वास्तुकला में इंडो-इस्लामिक शैली का समावेश और सैन्य अभियानों के माध्यम से दिल्ली एक प्रमुख राजनीतिक केंद्र के रूप में स्थापित हुई।
दिल्ली सल्तनत का संस्थागत विकास
1206 ईस्वी में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा स्थापित गुलाम वंश (मामलुक) ने दिल्ली को अपनी राजधानी बनाकर सल्तनत की शुरुआत की। इल्तुतमिश ने 'इक्ता' प्रणाली की शुरुआत की और प्रशासन को सुदृढ़ किया। इसके बाद खिलजी वंश ने विस्तारवादी नीति अपनाई, जिसके अंतर्गत अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत तक सैन्य अभियान चलाए और बाजार नियंत्रण नीति जैसी आर्थिक सुधार लागू किए।
तुगलक, सैयद और लोदी काल
गयासुद्दीन तुगलक द्वारा स्थापित तुगलक वंश ने साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार किया, परंतु मोहम्मद बिन तुगलक के प्रतीकात्मक निर्णयों और राजधानी स्थानांतरण ने सत्ता को कमजोर किया। फिरोज शाह तुगलक ने लोक निर्माण कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया। इसके उपरांत सैयद वंश का शासनकाल राजनीतिक अस्थिरता का दौर रहा। अंतिम राजवंश, लोदी वंश, अफगान मूल का था, जिसने बहलोल लोदी से लेकर इब्राहिम लोदी तक शासन किया। 1526 में पानीपत की प्रथम लड़ाई में बाबर द्वारा इब्राहिम लोदी की पराजय के साथ ही सल्तनत काल समाप्त हुआ और मुगल साम्राज्य का उदय हुआ।
प्रशासन और वास्तुकला का प्रभाव
सल्तनत काल के दौरान फारसी भाषा, प्रशासनिक शब्दावली और वास्तुकला की नई तकनीकें भारत में विकसित हुईं। कुतुब मीनार, अलाई दरवाजा और तुगलकाबाद का किला इस काल की स्थापत्य कला के प्रमुख उदाहरण हैं। इक्तादारी व्यवस्था ने भूमि राजस्व प्रशासन में केंद्रीय नियंत्रण को बढ़ावा दिया, जो बाद में मुगल प्रशासन का आधार बनी।
प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
सल्तनत काल से संबंधित महत्वपूर्ण परीक्षा-उपयोगी तथ्यों में इब्न बतूता का यात्रा वृत्तांत 'रिहला', अमीर खुसरो का साहित्य में योगदान और जियाउद्दीन बरनी की रचनाएं 'तारीख-ए-फिरोजशाही' अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसके अतिरिक्त, सैन्य सुधार, मुद्रा प्रणाली (टंका और जीतल) और राजस्व सुधारों से संबंधित प्रश्न यूपीएससी की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा में निरंतर पूछे जाते रहे हैं। केंद्रीय सत्ता का विस्तार, सामंती व्यवस्था का ह्रास और प्रशासनिक केंद्रीकरण इस कालखंड के प्रमुख घटक हैं।
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