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गोमती नदी में बढ़ते जलस्तर से लखनऊ में बाढ़ की स्थिति

गोमती नदी में बढ़ते जलस्तर से लखनऊ में बाढ़ की स्थिति

Delight News
📅 09 Oct2026

उत्तर प्रदेश के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण राजधानी लखनऊ में गोमती नदी का जलस्तर खतरे के निशान के पास पहुँच गया है। इस कारण फैजुल्लागंज, दाऊदनगर और लोहारमऊ जैसे निचले इलाकों तथा तटीय बस्तियों में जलभराव एवं बाढ़ जैसी गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई है। गंगा की इस प्रमुख सहायक नदी का पारिस्थितिकी तंत्र और शहरी अपवाह प्रबंधन वर्तमान में प्रशासनिक चिंता का मुख्य विषय बना हुआ है।

गोमती नदी में बढ़ते जलस्तर से लखनऊ में बाढ़ की स्थिति
सारांश
उत्तर प्रदेश के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण राजधानी लखनऊ में गोमती नदी का जलस्तर खतरे के निशान के पास पहुँच गया है। इस कारण फैजुल्लागंज, दाऊदनगर और लोहारमऊ जैसे निचले इलाकों तथा तटीय बस्तियों में जलभराव एवं बाढ़ जैसी गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई है। गंगा की इस प्रमुख सहायक नदी का पारिस्थितिकी तंत्र और शहरी अपवाह प्रबंधन वर्तमान में प्रशासनिक चिंता का मुख्य विषय बना हुआ है।
हालिया संदर्भ और बाढ़ की स्थिति
सितंबर के अंतिम सप्ताह और अक्टूबर 2026 के प्रारंभ में गोमती नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों (कैचमेंट एरिया) में हुई मूसलाधार बारिश के चलते लखनऊ में गोमती नदी उफान पर आ गई है। नदी के बढ़ते जलस्तर से उत्तरी लखनऊ के कई रिहायशी इलाके, जैसे फैजुल्लागंज, दाऊदनगर और राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल परिसर जलमग्न हो गए हैं। जिला प्रशासन द्वारा राहत एवं बचाव कार्यों के लिए दर्जनों राष्ट्रीय व राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF/SDRF) की नावें और स्वास्थ्य टीमें तैनात की गई हैं।
गोमती नदी का उद्गम और मार्ग
गोमती नदी गंगा नदी की एक अत्यंत महत्वपूर्ण मैदानी (Plains-origin) सहायक नदी है। इसका उद्गम उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में स्थित पीलीभीत टाइगर रिजर्व के भीतर माधोटांडा के निकट 'गोमत ताल' (फुल्हर झील) से होता है। पीलीभीत से निकलकर यह नदी लगभग 940 किलोमीटर का सफर तय करते हुए उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से गुजरती है और अंत में गाजीपुर जिले के सैयदपुर/कैथी के पास गंगा नदी में मिल जाती है।
बेसिन की भूवैज्ञानिक संरचना और विशेषताएं
संपूर्ण गोमती बेसिन चतुर्थक कल्प (Quaternary Age) के मोटे जलोढ़ अवसादों (Alluvial Sediments) से आच्छादित है। इन अवसादों में कंकड़, बजरी, रेत, गाद और मिट्टी शामिल हैं। बेसिन को दो भागों में विभाजित किया गया है: 'नवीन जलोढ़' (Younger Alluvium), जो वर्तमान बाढ़ के मैदानों में स्थित है, और 'पुराना जलोढ़' (Older Alluvium), जो उच्च दोआब क्षेत्रों का निर्माण करता है। यह एक बारहमासी (Perennial) नदी है, हालांकि मानसून के अतिरिक्त अन्य मौसमों में इसका प्रवाह काफी धीमा (Sluggish) रहता है।
सहायक नदियाँ, प्रमुख शहर और पारिस्थितिक चुनौतियाँ
गोमती की प्रमुख सहायक नदियों में सई, चौका, कथिना और सरयू शामिल हैं। इसके तट पर लखनऊ के अलावा सुल्तानपुर, जौनपुर और लखीमपुर खीरी जैसे प्रमुख औद्योगिक एवं शहरी केंद्र बसे हुए हैं। अत्यधिक शहरीकरण, औद्योगिक कचरे के अनियोजित निस्तारण और जलीय प्रवाह में कमी के कारण गोमती उत्तर प्रदेश की सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में से एक बन गई है। वर्तमान बाढ़ की स्थिति अनियोजित शहरी विकास और नदी के बाढ़ के मैदानों (Floodplains) पर बढ़ते अतिक्रमण की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है।
'प्रशस्त' (PRASHAST) पोर्टल: समावेशी शिक्षा हेतु राष्ट्रव्यापी संवेदीकरण पहल

'प्रशस्त' (PRASHAST) पोर्टल: समावेशी शिक्षा हेतु राष्ट्रव्यापी संवेदीकरण पहल

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📅 09 Oct2026

शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग (DoSEL) ने 'प्रशस्त' (PRASHAST) पोर्टल के माध्यम से विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CwSN) के लिए 30 मिनट के संवेदीकरण और ओरिएंटेशन मॉड्यूल का राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन आयोजित किया है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act) 2016 के तहत समावेशी और सुलभ शिक्षा वातावरण तैयार करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

'प्रशस्त' (PRASHAST) पोर्टल: समावेशी शिक्षा हेतु राष्ट्रव्यापी संवेदीकरण पहल
सारांश
शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग (DoSEL) ने 'प्रशस्त' (PRASHAST) पोर्टल के माध्यम से विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CwSN) के लिए 30 मिनट के संवेदीकरण और ओरिएंटेशन मॉड्यूल का राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन आयोजित किया है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act) 2016 के तहत समावेशी और सुलभ शिक्षा वातावरण तैयार करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
हालिया संदर्भ और राष्ट्रव्यापी अभियान
अक्टूबर 2026 में, स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग (DoSEL) द्वारा देश भर के विद्यालयों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CwSN) के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने हेतु एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया गया। इसके तहत 'प्रशस्त' (PRASHAST) पोर्टल के माध्यम से 30 मिनट के ओरिएंटेशन मॉड्यूल का प्रसारण किया गया, जिसमें 60,000 से अधिक स्कूलों ने भाग लिया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों, प्राचार्यों तथा शिक्षणेत्तर कर्मचारियों (जैसे बस चालक, आया, और लिपिकीय कर्मचारी) को दिव्यांग बच्चों की विशिष्ट आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील बनाना है।
प्रशस्त (PRASHAST) पोर्टल का परिचय
'प्रशस्त' (Pre-Assessment Holistic Screening Tool) एक स्कूल-आधारित डिजिटल दिव्यांगता स्क्रीनिंग टूल है। इसे एनसीईआरटी (NCERT) और शिक्षा मंत्रालय द्वारा विकसित किया गया है। यह उपकरण दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act), 2016 के तहत मान्यता प्राप्त 21 प्रकार की संभावित दिव्यांगताओं की प्रारंभिक पहचान और संदर्भ (Referral) प्रणाली के रूप में कार्य करता है। यह नियमित शिक्षकों, विशेष शिक्षकों और विद्यालय प्रमुखों के लिए एक संरचित मंच प्रदान करता है।
कार्यप्रणाली एवं द्वि-स्तरीय स्क्रीनिंग प्रक्रिया
प्रशस्त पोर्टल की पहचान प्रणाली दो प्रमुख चरणों में विभाजित है। पहले चरण (Part-1) में, नियमित शिक्षक कक्षाओं, खेल के मैदानों और सह-पाठ्यचर्या गतिविधियों में 1 से 2 महीने तक छात्रों के व्यवहार का सूक्ष्म अवलोकन करते हैं। इसके पश्चात् द्वितीय चरण (Part-2) में, दर्ज किए गए प्रेक्षणों का सत्यापन विशेष शिक्षकों (Special Educators) या परामर्शदाताओं द्वारा किया जाता है। यदि किसी छात्र में संभावित दिव्यांगता के लक्षण पाए जाते हैं, तो उसे विस्तृत चिकित्सा मूल्यांकन और सरकारी प्रमाणपत्र हेतु संदर्भित किया जाता है।
नीतिगत महत्व और संस्थागत प्रभाव
यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के मूलभूत स्तंभों—समता, पहुंच और समावेशिता (Equity, Accessibility, and Inclusivity)—को व्यावहारिक रूप से लागू करने में सहायक है। शुरुआती स्तर पर ही दिव्यांगता का पूर्वाकलन होने से बच्चों के लिए शुरुआती हस्तक्षेप (Early Intervention), सुलभ पठन सामग्री और सहायक उपकरण उपलब्ध कराना सुगम हो जाता है। डिजिटल तकनीक का यह प्रयोग भारतीय स्कूली शिक्षा प्रणाली को अधिक संवेदनशील और बाधारहित (Barrier-free) बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
विस्तृत जानकारी और पोर्टल की उपयोगिता को बेहतर ढंग से समझने के लिए यह वीडियो देखें: Screening of Sensitization on Inclusive Education। यह वीडियो प्रशस्त (PRASHAST) पोर्टल के माध्यम से स्कूलों में आयोजित इस 30 मिनट के समावेशी शिक्षा संवेदीकरण मॉड्यूल की व्यावहारिक रूपरेखा और प्रशिक्षण प्रक्रिया को प्रदर्शित करता है।
नीलगिरि पहाड़ियों में वसंतपुच्छ (स्प्रिंगटेल्स) की दो नई प्रजातियों की खोज

नीलगिरि पहाड़ियों में वसंतपुच्छ (स्प्रिंगटेल्स) की दो नई प्रजातियों की खोज

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📅 09 Oct2026

वैज्ञानिकों ने पश्चिमी घाट की नीलगिरि पहाड़ियों में मिट्टी में निवास करने वाले सूक्ष्म जीवों 'स्प्रिंगटेल्स' (Springtails) की दो नई प्रजातियों—'फॉल्सोमिया सीगा' (Folsomia ciega) और 'फॉल्सोमिया यूनियोकुलेटा' (Folsomia unioculata) की खोज की है। इस नई खोज के साथ ही भारत में 'फॉल्सोमिया' वंश की कुल प्रजातियों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है। जैव विविधता और पर्यावरण अध्ययन की दृष्टि से यह खोज महत्वपूर्ण है।

नीलगिरि पहाड़ियों में वसंतपुच्छ (स्प्रिंगटेल्स) की दो नई प्रजातियों की खोज
सारांश
वैज्ञानिकों ने पश्चिमी घाट की नीलगिरि पहाड़ियों में मिट्टी में निवास करने वाले सूक्ष्म जीवों 'स्प्रिंगटेल्स' (Springtails) की दो नई प्रजातियों—'फॉल्सोमिया सीगा' (Folsomia ciega) और 'फॉल्सोमिया यूनियोकुलेटा' (Folsomia unioculata) की खोज की है। इस नई खोज के साथ ही भारत में 'फॉल्सोमिया' वंश की कुल प्रजातियों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है। जैव विविधता और पर्यावरण अध्ययन की दृष्टि से यह खोज महत्वपूर्ण है।
हालिया संदर्भ और नई प्रजातियों की खोज
हाल ही में तमिलनाडु स्थित पश्चिमी घाट की नीलगिरि पहाड़ियों से मिट्टी और पत्तों के ढेर (Leaf Litter) के नमूनों के विश्लेषण के दौरान स्प्रिंगटेल्स की दो नई प्रजातियों की पहचान की गई। यह शोध ऊटी स्थित गवर्नमेंट आर्ट्स कॉलेज के मॉलिक्यूलर बायोडायवर्सिटी लैब द्वारा माइक्रोस्कोपिक जांच और डीएनए बारकोडिंग तकनीक के संयोजन से पूरा किया गया। इस खोज ने भारत में फॉल्सोमिया (Folsomia) जीनस के तहत ज्ञात प्रजातियों की कुल संख्या को 13 तक पहुंचा दिया है।
शारीरिक विशेषताएं और नामकरण
खोज की गई पहली प्रजाति 'फॉल्सोमिया सीगा' (Folsomia ciega) का नाम स्पैनिश शब्द 'सीगा' (जिसका अर्थ 'अंधा' होता है) के आधार पर रखा गया है, क्योंकि इसमें आंखों का पूर्णतः अभाव होता है। यह लगभग 1 मिमी आकार का पीला और लंबा सूक्ष्म जीव है। दूसरी प्रजाति 'फॉल्सोमिया यूनियोकुलेटा' (Folsomia unioculata) का नाम लैटिन शब्द 'यूनियोकुलेटा' ('एक आंख वाली') पर आधारित है, जिसके सिर के दोनों ओर केवल एक-एक आंख होती है और यह 1.3 मिमी तक बढ़ती है।
स्प्रिंगटेल्स का परिचय और शारीरिक संरचना
स्प्रिंगटेल्स (Collembola) पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे सूक्ष्म आर्थ्रोपोड्स (Arthropods) में से एक हैं। इनका आकार आमतौर पर 0.2 मिमी से लेकर अधिकतम 10 मिमी तक होता है। ये पंखहीन कीट-सदृश जीव होते हैं, जिनका शरीर तीन भागों (सिर, वक्ष और उदर) में विभाजित होता है। इनकी त्वचा पर षट्कोणीय या वर्गाकार दानेदार संरचनाएं होती हैं जो जल-विरोधी (Water-repellent) और स्व-सफाई (Self-cleaning) की क्षमता रखती हैं।
पारिस्थितिक महत्व और भूमिका
स्प्रिंगटेल्स मुख्य रूप से नम मिट्टी, सड़ने वाली वनस्पतियों और जैविक कचरे के भीतर निवास करते हैं। ये सूक्ष्मजीव मृदा पारिस्थितिकी तंत्र में अपघटक (Decomposers) के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये कार्बनिक पदार्थों को तोड़कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं और पोषक तत्वों के चक्रण (Nutrient Cycling) को सुगम बनाते हैं। इसके अलावा, ये मृदा खाद्य जाल (Soil Food Web) का एक आवश्यक घटक हैं, जो सूक्ष्म कवक और बैक्टीरिया की आबादी को नियंत्रित रखते हैं।
असम के नामेरी टाइगर रिजर्व को मिला वैश्विक CA|TS मान्यता दर्जा

असम के नामेरी टाइगर रिजर्व को मिला वैश्विक CA|TS मान्यता दर्जा

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📅 09 Oct2026

असम के नामेरी टाइगर रिजर्व को 'संरक्षण आश्वस्त | बाघ मानक' (CA|TS) का अनुमोदित दर्जा प्राप्त हुआ है। इसके साथ ही असम के सभी चार टाइगर रिजर्व (काजीरंगा, मानस, ओरांग और नामेरी) अब CA|TS से मान्यता प्राप्त हो गए हैं। CA|TS एक वैश्विक तंत्र है जो बाघ संरक्षण क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन, आवास रखरखाव, सामुदायिक भागीदारी और वन्यजीव निगरानी के मानकों का आकलन करता है।

असम के नामेरी टाइगर रिजर्व को मिला वैश्विक CA|TS मान्यता दर्जा
सारांश
असम के नामेरी टाइगर रिजर्व को 'संरक्षण आश्वस्त | बाघ मानक' (CA|TS) का अनुमोदित दर्जा प्राप्त हुआ है। इसके साथ ही असम के सभी चार टाइगर रिजर्व (काजीरंगा, मानस, ओरांग और नामेरी) अब CA|TS से मान्यता प्राप्त हो गए हैं। CA|TS एक वैश्विक तंत्र है जो बाघ संरक्षण क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन, आवास रखरखाव, सामुदायिक भागीदारी और वन्यजीव निगरानी के मानकों का आकलन करता है।
हालिया अद्यतन और नामेरी का उपलब्धि
हाल ही में असम के शोणितपुर जिले में स्थित नामेरी टाइगर रिजर्व को अंतर्राष्ट्रीय कार्यकारी समिति द्वारा CA|TS (Conservation Assured | Tiger Standards) स्वीकृत दर्जा प्रदान किया गया। इस मान्यता के साथ ही असम राज्य अपने सभी चारों घोषित टाइगर रिजर्व (काजीरंगा, मानस, ओरांग और नामेरी) को अंतर्राष्ट्रीय CA|TS प्रमाणन दिलाने वाला अग्रणी राज्य बन गया है। नामेरी का यह दर्जा वन्यजीव सुरक्षा, वैज्ञानिक निगरानी, और स्थानीय समुदायों के सहयोग से चलाए जा रहे संरक्षण प्रयासों का परिणाम है।
CA|TS की संरचना और कार्यान्वयन
संरक्षण आश्वस्त | बाघ मानक (CA|TS) की शुरुआत वर्ष 2013 में जापान में आयोजित प्रथम एशियाई पार्क कांग्रेस में की गई थी। यह बाघ सीमा वाले देशों में संरक्षण क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन का आकलन करने वाला एक वैश्विक प्रमाणन ढांचा है। भारत में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के अंतर्गत ग्लोबल टाइगर फोरम (GTF) और WWF-इंडिया इसके प्रमुख कार्यान्वयन भागीदार के रूप में कार्य करते हैं। यह ढांचा 7 स्तंभों (Pillars) और 17 तत्वों पर आधारित है, जिनमें महत्व, प्रबंधन, समुदाय, पर्यटन, सुरक्षा, आवास प्रबंधन और बाघ आबादी शामिल हैं।
भारत में मान्यता प्राप्त अन्य टाइगर रिजर्व
नामेरी के अतिरिक्त भारत के कई अन्य प्रमुख टाइगर रिजर्वों ने CA|TS मान्यता प्राप्त की है। इनमें असम के काजीरंगा, मानस और ओरांग के अलावा पश्चिम बंगाल का सुंदरबन; बिहार का वाल्मीकि; उत्तर प्रदेश का दुधवा; मध्य प्रदेश के कान्हा, पन्ना और सतपुड़ा; महाराष्ट्र का पेंच; तमिलनाडु के अनामलाई और मुदुमलाई; केरल का परम्बिकुलम; तथा कर्नाटक का बांदीपुर टाइगर रिजर्व शामिल हैं। ये सभी रिजर्व वैश्विक मानकों के अनुरूप बाघ संरक्षण का निष्पादन कर रहे हैं।
नामेरी का भौगोलिक एवं पारिस्थितिक महत्व
नामेरी टाइगर रिजर्व असम के शोणितपुर जिले में ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर स्थित है। यह जिया भोरली नदी से जुड़ा हुआ है और अरुणाचल प्रदेश के पाके टाइगर रिजर्व के साथ सटा हुआ एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक गलियारा बनाता है। यह क्षेत्र न केवल बाघों के लिए, बल्कि एशियाई हाथियों, तेंदुए, क्लाउडेड लेपर्ड और दुर्लभ पक्षी प्रजातियों के लिए एक सुरक्षित प्राकृतिक आवास प्रदान करता है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट: स्लेटी एग्रेट और पारिस्थितिकी परिवर्तन

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट: स्लेटी एग्रेट और पारिस्थितिकी परिवर्तन

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📅 09 Oct2026

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, बोत्सवाना के ओकावांगो डेल्टा में पाई जाने वाली दुर्लभ जलपक्षी प्रजाति 'स्लेटी एग्रेट' (Slaty Egret) के व्यवहार और प्रजनन स्थलों में महत्वपूर्ण बदलाव दर्ज किए गए हैं। यह बदलाव अफ्रीकी आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे व्यापक बदलावों का स्पष्ट संकेत प्रस्तुत करता है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट: स्लेटी एग्रेट और पारिस्थितिकी परिवर्तन
सारांश
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, बोत्सवाना के ओकावांगो डेल्टा में पाई जाने वाली दुर्लभ जलपक्षी प्रजाति 'स्लेटी एग्रेट' (Slaty Egret) के व्यवहार और प्रजनन स्थलों में महत्वपूर्ण बदलाव दर्ज किए गए हैं। यह बदलाव अफ्रीकी आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे व्यापक बदलावों का स्पष्ट संकेत प्रस्तुत करता है।
हालिया संदर्भ और व्यवहारिक परिवर्तन
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) तथा अफ्रीकी-यूरेशियाई प्रवासी जलपक्षी समझौते (AEWA) के अधिकारियों ने स्लेटी एग्रेट (Egretta vinaceigula) के बदलते व्यवहार पर ध्यान आकर्षित किया है। वैश्विक स्तर पर केवल 3,000 से 5,000 की सीमित आबादी वाले इस जलपक्षी के स्थापित प्रजनन स्थल दावानल और हाथियों की गतिविधियों के कारण नष्ट हो रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप पक्षी नए और अप्रत्याशित क्षेत्रों में अपने घोंसले बना रहे हैं, जिसे वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन का प्रत्यक्ष संकेतक मान रहे हैं।
भौगोलिक वितरण और प्राकृतिक आवास
स्लेटी एग्रेट मुख्य रूप से दक्षिण-मध्य अफ्रीका के सीमित भौगोलिक क्षेत्रों में पाया जाता है। इसकी वैश्विक आबादी का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बोत्सवाना के ओकावांगो डेल्टा में केंद्रित है, जबकि कुछ छोटी आबादी ज़ाम्बिया और पड़ोसी देशों के प्लाडप्लेन्स (बाढ़ के मैदानों) में पाई जाती है। यह शर्मीली प्रकृति का पक्षी मौसमी आर्द्रभूमियों, दलदली भूभागों और घनी जलीय वनस्पतियों वाले द्वीपों में रहना और प्रजनन करना पसंद करता है।
शारीरिक विशेषताएं और शिकार तकनीक
स्लेटी एग्रेट एक छोटा और दुबला-पतला जलपक्षी है, जिसकी लंबी टांगें और लंबी गर्दन बगुला (Egret) प्रजाति की विशिष्ट पहचान दर्शाती हैं। इसके पंखों का रंग हल्का बैंगनी झांई वाला सलेटी-धूसर (Slaty Gray) होता है। शिकार के लिए यह पक्षी 'फुट-रफ्लिंग' (Foot-Ruffling) तकनीक का उपयोग करता है, जिसमें वह अपने पैरों से पानी में हलचल पैदा करके मछलियों, उभयचरों और जलीय अकशेरुक जीवों (Invertebrates) को बाहर निकालकर उनका शिकार करता है।
संकट के कारक और संरक्षण स्थिति
यह प्रजाति अपनी जीवन शैली के लिए आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र पर पूर्णतः निर्भर है, जिससे यह पर्यावास विनाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है। कृषि विस्तार, जल प्रबंधन नीतियों में बदलाव, और जलवायु परिवर्तन से ओकावांगो डेल्टा के वार्षिक जल प्रवाह में अनिश्चितता इसके मुख्य खतरे हैं। अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में स्लेटी एग्रेट को 'असुरक्षित' (Vulnerable - VU) श्रेणी में रखा गया है।

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