
सिपाहीजाला वन्यजीव अभयारण्य: रॉयल बंगाल टाइगर का आगमन *
त्रिपुरा स्थित सिपाहीजाला वन्यजीव अभयारण्य के चिड़ियाघर में हाल ही में तीन नए रॉयल बंगाल टाइगर शावकों का जन्म हुआ है। इन नए शावकों के आगमन से इस चिड़ियाघर में बाघों की कुल संख्या बढ़कर सात हो गई है। यह विकास क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण और प्रजनन कार्यक्रमों की सफलता को रेखांकित करता है।
सारांश
त्रिपुरा स्थित सिपाहीजाला वन्यजीव अभयारण्य के चिड़ियाघर में हाल ही में तीन नए रॉयल बंगाल टाइगर शावकों का जन्म हुआ है। इन नए शावकों के आगमन से इस चिड़ियाघर में बाघों की कुल संख्या बढ़कर सात हो गई है। यह विकास क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण और प्रजनन कार्यक्रमों की सफलता को रेखांकित करता है।
अभयारण्य की भौगोलिक स्थिति एवं विशेषताएँ
सिपाहीजाला वन्यजीव अभयारण्य भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा के सिपाहीजाला जिले में स्थित एक प्रमुख संरक्षित क्षेत्र है। इस अभयारण्य के भीतर दो प्राकृतिक झीलें - 'अवसारिका' (Abasarika) और 'अमृत सागर' स्थित हैं, जो स्थानीय और प्रवासी पक्षियों के लिए एक आदर्श जल स्रोत और आवास प्रदान करती हैं। वर्ष 2007 में इस अभयारण्य के कोर क्षेत्र के भीतर 'क्लाउडेड लेपर्ड नेशनल पार्क' (Clouded Leopard National Park) की स्थापना की गई थी।
वनस्पति और पारिस्थितिकी तंत्र
अभयारण्य का अधिकांश क्षेत्र आर्द्र पर्णपाती वनों (Moist Deciduous Forests) से आच्छादित है। इस अभयारण्य में पौधों की लगभग 456 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें मुख्य रूप से साल (Sal), चामल, गर्जन और कनक जैसे महत्वपूर्ण वृक्ष शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, द्वितीयक प्रजातियों के रूप में पिछला, कुरचा, आंवला, बहेड़ा, हरगजा, बांस और विभिन्न प्रकार की घासों का समृद्ध आवरण मौजूद है, जो स्थानीय पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखता है।
जैव विविधता और प्राणिजात (Fauna)
सिपाहीजाला अभयारण्य प्राइमेट्स (Primates) की विभिन्न प्रजातियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ रीसस मैकाक, पिगटेल्ड मैकाक, कैप्ड लंगूर, चश्माधारी लंगूर (Spectacled Monkey) और स्लो लोरिस जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त, यह तेंदुए, क्लाउडेड लेपर्ड, जंगली मुर्गी, सिवेट, भौंकने वाले हिरण (Barking Deer) और जंगली सुअर का भी प्राकृतिक आवास है। यहाँ केकड़ा खाने वाले नेवले (Crab-eating Mongoose) का भी पुनरुद्धार देखा गया है।
पक्षी जीवन और संरक्षण महत्व
यह अभयारण्य पक्षी प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र है, जहाँ विभिन्न प्रकार के पंख वाले स्टॉर्क, व्हिसलिंग टील (Whistling Teal) और सफेद इबिस (White Ibis) जैसी एवियन प्रजातियाँ पाई जाती हैं। सिपाहीजाला ज़ूोलॉजिकल पार्क में पूर्वोत्तर भारत के वन्यजीवों के पूर्व-स्थाने संरक्षण (Ex-situ Conservation) और अनुसंधान गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रबंध किए गए हैं।

व्यापार और विकास रिपोर्ट 2026: मुख्य निष्कर्ष *
संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास (UNCTAD) द्वारा जारी 'व्यापार और विकास रिपोर्ट 2026' के अनुसार, वर्ष 2020-25 के दौरान वैश्विक ग्रीनफील्ड निवेश में भारत की हिस्सेदारी 5.7 प्रतिशत रही, जो चीन की हिस्सेदारी से दोगुनी से अधिक है। रिपोर्ट में भारत को 7.3 प्रतिशत की विकास दर के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बताया गया है।
सारांश
संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास (UNCTAD) द्वारा जारी 'व्यापार और विकास रिपोर्ट 2026' के अनुसार, वर्ष 2020-25 के दौरान वैश्विक ग्रीनफील्ड निवेश में भारत की हिस्सेदारी 5.7 प्रतिशत रही, जो चीन की हिस्सेदारी से दोगुनी से अधिक है। रिपोर्ट में भारत को 7.3 प्रतिशत की विकास दर के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बताया गया है।
रिपोर्ट की पृष्ठभूमि एवं परिचय
'व्यापार और विकास रिपोर्ट' संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास (UNCTAD) द्वारा वर्ष 1981 से प्रतिवर्ष जारी की जाने वाली एक प्रमुख रिपोर्ट है। यह वार्षिक प्रकाशन वैश्विक आर्थिक रुझानों, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नीति, वित्तीय संरचना और विकासशील देशों के सामने मौजूद चुनौतियों का व्यापक विश्लेषण प्रदान करता है।
वैश्विक आर्थिक रुझान एवं व्यापार परिदृश्य
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक आर्थिक विकास दर वर्ष 2026 में घटकर 2.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसके बावजूद, वर्ष 2026 में वैश्विक व्यापार में 4 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान व्यक्त किया गया है। वैश्विक विकास में एशिया की हिस्सेदारी सर्वाधिक 59 प्रतिशत रहने का अनुमान है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2024 के बाद से चीन और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार में 20 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है।
रणनीतिक क्षेत्र और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)
वर्ष 2020 से 2025 की अवधि में कुल वैश्विक ग्रीनफील्ड निवेश में रणनीतिक क्षेत्रों की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत से बढ़कर 44 प्रतिशत हो गई है। इन रणनीतिक क्षेत्रों में एआई (AI) अवसंरचना और संबंधित प्रौद्योगिकियों ने 12.4 प्रतिशत के साथ सबसे बड़ा योगदान आकर्षित किया है। इसके बाद सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन (8.1 प्रतिशत) और ऊर्जा संक्रमण प्रौद्योगिकियों (7.8 प्रतिशत) का स्थान रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरण वर्तमान में मर्चेंडाइज व्यापार के प्रमुख चालक के रूप में उभर रहे हैं।
भारत केंद्रित मुख्य निष्कर्ष
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020-25 के दौरान वैश्विक ग्रीनफील्ड निवेश में भारत की हिस्सेदारी 5.7 प्रतिशत रही, जबकि मलेशिया (4 प्रतिशत), इंडोनेशिया (3.8 प्रतिशत) और चीन (2.8 प्रतिशत) क्रमशः इसके बाद रहे। भारत मजबूत घरेलू मांग, बढ़ती विनिर्माण क्षमता और सार्वजनिक अवसंरचना कार्यक्रमों के बल पर 2026 में 7.3 प्रतिशत की अनुमानित जीडीपी वृद्धि दर के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है। औद्योगिक नीतियों के कार्यान्वयन में भी भारत शीर्ष देशों में शामिल रहा है।

प्लान बी प्रणाली: रेल-हाथी टकराव पर रोक *
पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (NFR) ने रेल पटरियों पर हाथियों की मौतों को रोकने के लिए 'प्लांट बी' (Plan Bee) प्रणाली, एआई-आधारित घुसपैठ पहचान प्रणाली (IDS), और गश्त के माध्यम से व्यापक कदम उठाए हैं। मधुमक्खियों की ध्वनि पर आधारित इस नवाचार ने हाथियों को दुर्घटनाओं से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सारांश
पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (NFR) ने रेल पटरियों पर हाथियों की मौतों को रोकने के लिए 'प्लांट बी' (Plan Bee) प्रणाली, एआई-आधारित घुसपैठ पहचान प्रणाली (IDS), और गश्त के माध्यम से व्यापक कदम उठाए हैं। मधुमक्खियों की ध्वनि पर आधारित इस नवाचार ने हाथियों को दुर्घटनाओं से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
प्लान बी प्रणाली का परिचय और कार्यप्रणाली
'प्लांट बी' पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (NFR) द्वारा विकसित एक अभिनव ध्वनि निवारक प्रणाली (Acoustic Deterrent System) है। यह प्रणाली मधुमक्खियों के भिनभिनाने की तीव्र ध्वनि प्रसारित करती है। हाथी अपनी संवेदनशील सूंड और कानों को डंक से बचाने के लिए स्वभावतः मधुमक्खियों से दूर भागते हैं। यह उपकरण लगभग 400 मीटर की दूरी तक ध्वनि उत्पन्न करता है, जिससे हाथी पटरियों के समीप आने से कतराते हैं।
तकनीकी एकीकरण और एआई की भूमिका
वन्यजीव सुरक्षा को अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए इस ध्वनि प्रणाली को एआई-आधारित घुसपैठ पहचान प्रणाली (IDS) और 'गजराज एआई' तकनीक से जोड़ा गया है। यह तकनीक ऑप्टिकल फाइबर केबल और डिस्ट्रीब्यूटेड एकॉस्टिक सेंसिंग (DAS) के माध्यम से हाथियों के पैरों से होने वाले कंपन को पहचानकर लोको पायलटों और स्टेशन मास्टर को वास्तविक समय (Real-Time) में सतर्क करती है।
कार्यान्वयन और क्षेत्रीय प्रसार
पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे ने इस तकनीक को अपने अधिकार क्षेत्र के उन संवेदनशील गलियारों में लागू किया है जहाँ रेल मार्ग घने जंगलों से गुजरते हैं। एनएफआर का मुख्यालय मालीगांव (गुवाहाटी, असम) में स्थित है और यह उत्तर-पूर्वी राज्यों के अलावा पश्चिम बंगाल के सात तथा उत्तर बिहार के पांच जिलों में रेल संचालन का प्रबंधन करता है। विभिन्न मंडलों जैसे लमडिंग, अलीपुरद्वार, तिनसुकिया और रंगिया में इसके प्रभावी क्रियान्वयन से सैकड़ों हाथियों को सुरक्षित निकाला गया है।
वन्यजीव संरक्षण का बहु-आयामी दृष्टिकोण
ध्वनि निवारक और एआई अलर्ट के अतिरिक्त, रेलवे द्वारा अन्य एहतियाती उपाय भी अपनाए जा रहे हैं। इनमें संवेदनशील खंडों में गति सीमा निर्धारित करना, रात्रिकालीन गश्त बढ़ाना, पटरियों के किनारे की वनस्पतियों को हटाना, अंडरपास का निर्माण करना और पटरियों के पास खाद्य अपशिष्ट फेंकने पर प्रतिबंध लगाना शामिल है, जिससे भोजन की तलाश में हाथियों का पटरियों पर आगमन रोका जा सके।

बाइसेफालिक डायमंडबैक टेरापिन: दुर्लभ खोज
संयुक्त राज्य अमेरिका के मैसाचुसेट्स स्थित केप कोड में 'डायमंडबैक टेरापिन' (Diamondback Terrapin) प्रजाति का दो सिर वाला (Bicephalic) अत्यंत दुर्लभ नवजात कछुआ खोजा गया है। दो सिर होने की यह स्थिति एक दुर्लभ विकासात्मक असामान्यता (Developmental Abnormality) के कारण उत्पन्न होती है।
सारांश
संयुक्त राज्य अमेरिका के मैसाचुसेट्स स्थित केप कोड में 'डायमंडबैक टेरापिन' (Diamondback Terrapin) प्रजाति का दो सिर वाला (Bicephalic) अत्यंत दुर्लभ नवजात कछुआ खोजा गया है। दो सिर होने की यह स्थिति एक दुर्लभ विकासात्मक असामान्यता (Developmental Abnormality) के कारण उत्पन्न होती है।
प्रजाति की शारीरिक विशेषताएँ एवं आवास
डायमंडबैक टेरापिन (Malaclemys terrapin) खारे पानी और तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों में रहने वाली एक प्रमुख प्रजाति है। इसके खोल (Shell) पर हीरे जैसी विशिष्ट संरचना और त्वचा पर काली धारियों के पैटर्न पाए जाते हैं। यह प्रजाति मुख्य रूप से अमेरिका के उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी तटीय क्षेत्रों, लैगून, खारी नलिकाओं और मैंग्रोव आवासों में पाई जाती है। इसके पैर जालदार (Webbed Feet) होते हैं, जो इसे एक कुशल तैराक बनाते हैं।
व्यवहार एवं भोजन पद्धतियाँ
यह प्रजाति अपना अधिकांश जीवन जल में व्यतीत करती है, लेकिन धूप सेकने और अंडे देने के लिए भूमि पर आती है। ठंड के मौसम में वयस्क टेरापिन नालों और दलदलों के कीचड़ में निष्क्रिय (Hibernate) हो जाते हैं। पोषण के दृष्टिकोण से ये मुख्य रूप से मांसाहारी होते हैं, जिनका आहार मुख्य रूप से छोटी मछलियों, घोंघों, सीपियों और अन्य मोलस्क जीवों पर निर्भर करता है।
संरक्षण स्थिति एवं संकट
अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में डायमंडबैक टेरापिन को 'संवेदनशील' (Vulnerable) श्रेणी में रखा गया है। तटीय विकास, प्राकृतिक आवास का विनाश, जलवायु परिवर्तन से समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, सड़कों पर वाहनों से दुर्घटनाएं और मछली पकड़ने के जालों में फंसना इस प्रजाति के अस्तित्व के समक्ष मुख्य खतरे हैं।
बाइसेफली का जैविक महत्व
केप वाइल्डलाइफ सेंटर के विशेषज्ञों के अनुसार, दो सिर वाले जीवों का जन्म एक भ्रूणीय असामान्यता के कारण होता है, जिसे बाइसेफली (Bicephaly) कहा जाता है। यह खोज शोधकर्ताओं और पशु चिकित्सकों को सरीसृपों के शारीरिक और तंत्रिका संबंधी विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

राष्ट्रीय समुद्री खोज और बचाव अभ्यास: SAREX 2026 *
भारतीय तटरक्षक बल द्वारा ओडिशा के पारादीप तट पर 12वें राष्ट्रीय समुद्री खोज और बचाव अभ्यास (SAREX-2026) का आयोजन किया गया। "प्रौद्योगिकी के उपयोग से SAR तैयारी और समुद्री सुरक्षा को सुदृढ़ करना" विषय पर आधारित यह अभ्यास भारत के 'सागर' (SAGAR) दृष्टिकोण के अनुरूप है।
सारांश
भारतीय तटरक्षक बल द्वारा ओडिशा के पारादीप तट पर 12वें राष्ट्रीय समुद्री खोज और बचाव अभ्यास (SAREX-2026) का आयोजन किया गया। "प्रौद्योगिकी के उपयोग से SAR तैयारी और समुद्री सुरक्षा को सुदृढ़ करना" विषय पर आधारित यह अभ्यास भारत के 'सागर' (SAGAR) दृष्टिकोण के अनुरूप है।
अभ्यास की पृष्ठभूमि और मुख्य उद्देश्य
भारतीय तटरक्षक बल (ICG) द्वारा आयोजित SAREX-2026 बहु-एजेंसी समन्वय और अंतर-संचालनीयता (interoperability) को बढ़ाने के लिए एक प्रमुख राष्ट्रीय अभ्यास है। इसका मुख्य उद्देश्य समुद्री खोज एवं बचाव (SAR) क्षमताओं का परीक्षण करना, नई तकनीकों को एकीकृत करना और आपातकालीन स्थितियों में प्रतिक्रिया समय को कम करना है। यह पहल अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के 1979 के खोज और बचाव सम्मेलन के प्रावधानों के अनुपालन में आयोजित की जाती है।
वैश्विक भागीदारी और रणनीतिक महत्व
इस 12वें संस्करण में 30 देशों के 32 अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने भाग लिया। यह व्यापक भागीदारी वैश्विक स्तर पर सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के साथ-साथ हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में एक विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार के रूप में भारत की भूमिका को पुनः रेखांकित करती है। यह अभ्यास भारत के 'SAGAR' (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और वृद्धि) और 'महासागर' दृष्टिकोण को मजबूत करता है।
परिचालन परिसंपत्तियाँ और बल नियोजन
सामरिक तत्परता प्रदर्शित करने के लिए बहु-एजेंसी बलों की विस्तृत तैनाती की गई। अभ्यास में तटरक्षक बल के 15 जहाजों, डोर्नियर विमानों, उन्नत हल्के हेलीकॉप्टरों (ALH), और चेतक हेलीकॉप्टरों ने हिस्सा लिया। इसके साथ ही भारतीय वायु सेना के C-130J और Mi-17 विमान, भारतीय नौसेना के दो जहाज, और नागरिक तथा राज्य-स्तरीय सहायता इकाइयाँ भी इस ड्रिल का हिस्सा थीं।
सिम्युलेटेड अभ्यास और तकनीकी प्रदर्शन
समुद्री अभ्यास में एक साथ दो आपातकालीन स्थितियों (विमान दुर्घटना और पोत क्षति) के बाद बड़े पैमाने पर बचाव कार्य (Mass Rescue Operation) का अनुकरण किया गया। इस दौरान इंसीडेंट कमांड पोस्ट की सक्रियता, अग्निशमन, हेलीकॉप्टर निकासी, लाइफ राफ्ट की तैनाती, और जेसन क्रैडल रिकवरी जैसे परिदृश्यों का अभ्यास किया गया। अभ्यास के दौरान रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (ROV) जैसी आधुनिक तकनीकों की क्षमता का भी प्रदर्शन किया गया।
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