
BRICS Summit 2026 में छाई हिमालयी गुच्छी मशरूम, जानिए क्यों है इतनी खास
ग्लोबल मंच पर भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर एक बार फिर चमक उठी है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में हिमालय की गोद से निकलने वाली दुर्लभ गुच्छी मशरूम ने अपनी खास जगह बनाई है। अपनी अनूठी खूबियों, औषधीय गुणों और आसमान छूती कीमतों के चलते यह मशरूम पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गई है।
ग्लोबल मंच पर भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर एक बार फिर चमक उठी है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में हिमालय की गोद से निकलने वाली दुर्लभ गुच्छी मशरूम ने अपनी खास जगह बनाई है। अपनी अनूठी खूबियों, औषधीय गुणों और आसमान छूती कीमतों के चलते यह मशरूम पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गई है।
दुनिया की सबसे महंगी और दुर्लभ मशरूम
गुच्छी मशरूम, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'मोर्चेल्ला एस्कुलेंटा' कहा जाता है, अपनी विशिष्ट बनावट के कारण पहचानी जाती है। इसके स्पंजी और जालीदार (हनीकॉम्ब) कैप पीले से लेकर गहरे भूरे रंग के होते हैं, जबकि इसका तना खोखला और हल्का होता है। यह दुनिया की सबसे महंगी मशरूमों में गिनी जाती है, क्योंकि इसकी कीमत अच्छे-अच्छे विदेशी व्यंजनों और प्रीमियम उत्पादों को भी पीछे छोड़ देती है।
प्रकृति की गोद से थाली तक का रोमांचक सफर
इसकी खेती करना आज के समय में भी नामुमकिन के बराबर है, क्योंकि इसे प्रयोगशालाओं या खेतों में आसानी से उगाया नहीं जा सकता। यह मुख्य रूप से भारत के पहाड़ी राज्यों जैसे जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सर्द जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगती है। यह उन पहाड़ी कोनिफेरस जंगलों की मिट्टी, नमी और पिघलती बर्फ के बीच पनपती है जहां का मौसम और तापमान इसके अनुकूल होता है।
स्थानीय आदिवासियों की कड़ी मेहनत
गुच्छी को इकट्ठा करना कोई आसान काम नहीं है। स्थानीय पहाड़ी समुदायों के लोग दुर्गम और खतरनाक पहाड़ी रास्तों पर ट्रैकिंग करते हुए इसे अपने हाथों से चुनते हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह जरूरी नहीं कि जो मशरूम इस साल एक खास जगह पर उगी हो, वह अगले साल भी उसी स्थान पर मिले। यह अनिश्चितता इसके संग्रहण को और अधिक थकाऊ और चुनौतीपूर्ण बना देती है।
सेहत का खजाना और स्वाद का बेजोड़ संगम
ताजा गुच्छी में नमी की मात्रा बहुत अधिक होती है, इसलिए इसकी शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए इसे पारंपरिक तरीकों से धूप में सुखाया जाता है, जिससे इसका वजन काफी कम हो जाता है। स्वाद और सुगंध में लाजवाब होने के साथ-साथ यह सेहत के लिए भी वरदान है। इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन, डाइटरी फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन-डी पाया जाता है, जो इसे पोषण के मामले में भी सबसे आगे रखता है।

डायनासोर प्रेमियों के लिए बड़ी खबर: स्पेन में मिला ‘डिप्लोडोकस’ का पहला जीवाश्म!
जुरासिक काल के विशालकाय और शाकाहारी डायनासोर 'डिप्लोडोकस' के अवशेष पहली बार अमेरिका से बाहर स्पेन में खोजे गए हैं। लगभग 90 फीट लंबे और अनोखी विशेषताओं वाले इस जीव की इस नई खोज ने पैलियोन्टोलॉजी की दुनिया में एक बार फिर हलचल मचा दी है।
खबर का निचोड़
जुरासिक काल के विशालकाय और शाकाहारी डायनासोर 'डिप्लोडोकस' के अवशेष पहली बार अमेरिका से बाहर स्पेन में खोजे गए हैं। लगभग 90 फीट लंबे और अनोखी विशेषताओं वाले इस जीव की इस नई खोज ने पैलियोन्टोलॉजी की दुनिया में एक बार फिर हलचल मचा दी है।
जुरासिक काल का बेताज बादशाह
डायनासोर की दुनिया हमेशा से इंसानों को अपनी ओर खींचती रही है। अब इस रोमांचक सिलसिले में एक नया और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। अब तक अमेरिका के विभिन्न इलाकों तक सीमित रहने वाले मशहूर डायनासोर 'डिप्लोडोकस' के अवशेष आखिरकार यूरोप की धरती यानी स्पेन से बरामद कर लिए गए हैं। यह खोज विज्ञान जगत के लिए किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं है।
क्या है डिप्लोडोकस और उसकी खासियतें?
डिप्लोडोकस दुनिया के सबसे बड़े और विशालकाय सौरोपॉड (Sauropod) समूह का हिस्सा रहा है। ये जीव अपने भारी-भरकम शरीर, चार खंभे जैसे पैरों और बेहद लंबी गर्दन के लिए जाने जाते हैं। वैज्ञानिक इतिहास में इसे सबसे लंबे पूर्ण डायनासोर के रूप में दर्ज किया गया है। आज से करीब 155 से 145 मिलियन वर्ष पहले लेट जुरासिक काल के दौरान यह धरती पर राज करता था। इसका मुख्य ठिकाना घने जंगलों और पेड़ों के किनारे वाले मैदानी इलाके हुआ करते थे।
हैरान कर देने वाले शारीरिक आंकड़े
इस डायनासोर का आकार जितना विशाल था, उसका वजन उतना ही हैरान करने वाला था। डिप्लोडोकस की लंबाई करीब 90 फीट और कूल्हों के पास इसकी ऊंचाई लगभग 15 फीट थी। हालांकि यह विशालकाय था, लेकिन सौरोपॉड परिवार में इसे हल्का माना जाता था, जिसका वजन करीब 30 टन था। इसके पीछे इसकी रीढ़ की हड्डियों की अनूठी और खोखली संरचना थी, जो इसे हल्का रखने में मदद करती थी।
अजीब बनावट और 'डबल बीम' का रहस्य
डिप्लोडोकस का सिर घोड़े की तरह छोटा था और इसका दिमाग भी काफी छोटा होता था। इसके मुंह के अगले हिस्से में नुकीले, खूंटे जैसे दांत थे। इसके पिछले पैर आगे के पैरों से थोड़े लंबे थे, जिससे इसका शरीर कूल्हों से सिर की ओर ढलान लिए रहता था। इसके पैर हाथियों जैसे थे और पिछले पैरों में तीन-तीन पंजे होते थे। दिलचस्प बात यह है कि इसका नाम 'डिप्लोडोकस' यानी 'डबल बीम' इसकी पूंछ की हड्डियों के आधार पर रखा गया है, जो रक्त वाहिकाओं और ऊतकों की रक्षा करती थीं।

पंगवाला जनजाति: समय और आधुनिकता की आंधी में भी अटूट है इनकी अनूठी विरासत
हिमाचल प्रदेश की दुर्गम पांगी घाटी की पंगवाला जनजाति अपनी अनूठी संस्कृति और खान-पान के लिए जानी जाती है। हालिया वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि शहरी जीवन अपनाने के बाद भी इस समुदाय के लोगों का गट माइक्रोबायोम अपनी मूल जड़ों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
खबर का निचोड़:
हिमाचल प्रदेश की दुर्गम पांगी घाटी की पंगवाला जनजाति अपनी अनूठी संस्कृति और खान-पान के लिए जानी जाती है। हालिया वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि शहरी जीवन अपनाने के बाद भी इस समुदाय के लोगों का गट माइक्रोबायोम अपनी मूल जड़ों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
पांगी घाटी के पहरेदार और अनूठा जीवन
हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले की पीर पंजाल पर्वतमाला के बीच बसी पांगी घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के लिए भी पहचानी जाती है। लंबी और सर्द सर्दियां, उबड़-खाबड़ रास्ते और दुर्गम ढलानें इस क्षेत्र को बाहरी दुनिया से अलग-थलग रखती आई हैं। इसी एकांत ने पंगवाला जनजाति को उनकी सदियों पुरानी भाषा, विशिष्ट रीति-रिवाजों और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को संजोए रखने में मदद की है। यहां का जनजीवन हिमालयी परंपराओं और आसपास के हिंदू व बौद्ध प्रभावों का एक खूबसूरत मिश्रण प्रस्तुत करता है।
संघर्षों के बीच पनपी मजबूत आजीविका
पंगवाला समुदाय की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कठिन पहाड़ी कृषि और पशुपालन के इर्द-गिर्द घूमती है। यहां के लोग सीढ़ीनुमा खेतों (टेरेंस फार्मिंग) में जौ, गेहूं, मक्का, आलू और मटर जैसी ठंडे मौसम की फसलों का उत्पादन करते हैं। इसके अलावा, ऊंचे पहाड़ों पर भेड़-बकरियां चराना और पारंपरिक व्यापारिक मार्गों का उपयोग करना इनकी जीवनशैली का अहम हिस्सा रहा है। सर्दियों के कड़े मौसम में जीवित रहने के लिए परिवार आपसी सहयोग और मजबूत पारिवारिक ताने-बाने पर निर्भर रहते हैं। इनके पारंपरिक घर पत्थर और लकड़ी से इस तरह बनाए जाते हैं जो कड़ाके की ठंड और ढलान वाले इलाके का आसानी से सामना कर सकें।
आस्था, संस्कृति और लोक परंपराएं
पंगवाला जनजाति के धार्मिक जीवन में हिंदू मान्यताओं के साथ-साथ स्थानीय हिमालयी लोक विश्वासों की गहरी छाप देखने को मिलती है। देवी-देवताओं की आराधना, पारंपरिक अनुष्ठान, मंदिर पूजा और कृषि चक्र से जुड़े उत्सव इस समुदाय के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत बनाते हैं। साल भर मनाए जाने वाले लोक नृत्य, पारंपरिक संगीत और मौसमी त्यौहार इनकी जीवंत संस्कृति की पहचान हैं, जो हर परिस्थिति में इनके आपसी जुड़ाव को बनाए रखते हैं।
आंत के सूक्ष्मजीवों में छिपा प्राचीन रहस्य
इस जनजाति से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प वैज्ञानिक तथ्य सामने आया है। पंगवाला समुदाय के गट माइक्रोबायोम पर किए गए एक विस्तृत अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जो लोग अब भी दूरदराज की पांगी घाटी में रह रहे हैं और जो लोग शहर की दौड़भाग भरी जिंदगी में पलायन कर चुके हैं, दोनों के जैविक सूक्ष्मजीवों (कोर माइक्रोबायोम) में एक अद्भुत समानता है। भले ही उनके खान-पान, रहन-सहन और पर्यावरण में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका हो, लेकिन उनका यह जैविक डीएनए और आंतरिक स्वास्थ्य अपनी मूल विरासत से मजबूती से जुड़ा हुआ है।

हिमाचल की बर्फीली चोटियों पर केरल के पर्वतारोहियों का तिरंगा
लाहौल की दुर्गम वादियों में स्थित 6,318 मीटर ऊंची रामजोक चोटी पर केरल के चार पर्वतारोहियों ने ऐतिहासिक फतह हासिल की है। बेहद तकनीकी और खतरनाक माने जाने वाले इस मार्ग पर चढ़ाई कर इस साहसी दल ने देश का नाम रोशन किया है। यह उपलब्धि भारतीय पर्वतारोहण के इतिहास में एक नया मील का पत्थर साबित हो रही है।
लाहौल की दुर्गम वादियों में स्थित 6,318 मीटर ऊंची रामजोक चोटी पर केरल के चार पर्वतारोहियों ने ऐतिहासिक फतह हासिल की है। बेहद तकनीकी और खतरनाक माने जाने वाले इस मार्ग पर चढ़ाई कर इस साहसी दल ने देश का नाम रोशन किया है। यह उपलब्धि भारतीय पर्वतारोहण के इतिहास में एक नया मील का पत्थर साबित हो रही है।
रामजोक चोटी: दुर्गम और खतरनाक सफर
हिमाचल प्रदेश के सुदूर लाहौल क्षेत्र में समुद्र तल से 20,728 फीट की ऊंचाई पर खड़ी रामजोक चोटी किसी भी पर्वतारोही के लिए अग्निपरीक्षा जैसी है। शिन्गो ला के पास स्थित यह चोटी अपनी नुकीली बर्फीली चोटियों और बेहद कठिन रास्तों के लिए जानी जाती है। यहां तक पहुंचना और फिर शिखर पर तिरंगा फहराना मामूली बात नहीं है।
मौत को चुनौती देता कठिन रास्ता
इस पर्वत का भूभाग बड़े-बड़े ग्लेशियरों, खड़ी चट्टानों, अंतहीन बर्फ के मैदानों और गहरे खड्डों से अटा पड़ा है। कदम-कदम पर छिपे क्रीवासे और गिरते हुए सेरेक पर्वतारोहियों के लिए मौत का बुलावा साबित हो सकते हैं। ढलानों की फिसलन और बर्फीले तूफान इस रोमांचक सफर को और अधिक घातक बना देते हैं।
क्या है इस चोटी का इतिहास
साल 2002 में भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन के एक अभियान ने संगय दोरजे शेरपा के नेतृत्व में पहली बार इस पर विजय प्राप्त की थी। इससे पहले कई जाने-माने पर्वतारोही दल इस पर चढ़ाई करने की असफल कोशिश कर चुके थे। केरल के इस नए दल की सफलता ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पक्के इरादों के आगे बड़े से बड़े पहाड़ भी झुक जाते हैं।

रक्षा पेंशनभोगियों के लिए बड़ी राहत, SPARSH पोर्टल ने तय किया एक और नया मील का पत्थर
स्पर्श पेंशन प्रणाली ने त्रुटिपूर्ण मामलों के समाधान में बड़ी सफलता हासिल की है। रक्षा लेखा विभाग के इस अभिनव और केंद्रित प्रयास से देश के लाखों पूर्व सैनिकों और रक्षा कर्मियों की पेंशन से जुड़ी जटिलताएं तेजी से सुलझ रही हैं, जिससे पूरी प्रक्रिया में अभूतपूर्व पारदर्शिता और गति आई है।
स्पर्श पेंशन प्रणाली ने त्रुटिपूर्ण मामलों के समाधान में बड़ी सफलता हासिल की है। रक्षा लेखा विभाग के इस अभिनव और केंद्रित प्रयास से देश के लाखों पूर्व सैनिकों और रक्षा कर्मियों की पेंशन से जुड़ी जटिलताएं तेजी से सुलझ रही हैं, जिससे पूरी प्रक्रिया में अभूतपूर्व पारदर्शिता और गति आई है।
रक्षा पेंशन का सबसे बड़ा डिजिटल कवच
रक्षा मंत्रालय की एक दूरदर्शी पहल के रूप में शुरू की गई 'स्पर्श' (System for Pension Administration – Raksha) प्रणाली आज दुनिया की सबसे बड़ी रक्षा पेंशन व्यवस्था बन चुकी है। यह अनूठा प्लेटफॉर्म थल सेना, नौसेना, वायुसेना और रक्षा से जुड़े सभी नागरिकों की पेंशन की मंजूरी से लेकर उसके वितरण तक की हर जरूरत को एक ही छत के नीचे पूरा करता है।
बिना किसी बिचौलिए के सीधे बैंक खातों में पहुंचती है राशि
इस पूरी प्रणाली का संचालन रक्षा लेखा विभाग द्वारा प्रधान नियंत्रक रक्षा लेखा (पेंशन), प्रयागराज के माध्यम से किया जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह से वेब-आधारित और केंद्रीकृत व्यवस्था है। यह किसी भी तीसरे पक्ष के मध्यस्थ पर निर्भर हुए बिना सीधे रक्षा पेंशनभोगियों के बैंक खातों में पेंशन राशि जमा करती है। इसके जरिए पेंशनर्स खुद अपने डेटा का सत्यापन और सुधार कर सकते हैं।
डिजिटल जीवन प्रमाण पत्र से बार-बार के चक्करों से मुक्ति
पारंपरिक पेंशन व्यवस्थाओं में जीवित प्रमाण पत्र और अन्य दस्तावेजों के लिए कार्यालयों के चक्कर काटने की मजबूरी हुआ करती थी। इस डिजिटल प्रणाली ने उस परेशानी को पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब पेंशनर डिजिटल माध्यम से अपनी पहचान का सत्यापन कर सकते हैं, जिससे उनका समय और ऊर्जा दोनों बचते हैं।
हर एक पल का पूरा हिसाब और पारदर्शिता
यह प्लेटफॉर्म हर रक्षा पेंशनभोगी को उनके पेंशन खाते का एक बिल्कुल पारदर्शी और स्पष्ट दृश्य प्रदान करता है। पेंशन शुरू होने की तारीख से लेकर अंतिम पात्र लाभार्थी तक पेंशन के Cessation (समाप्ति) की तारीख तक, यह सिस्टम हर एक घटना और पात्रता के पूरे इतिहास को सुरक्षित रखता है। इसी मजबूत तकनीकी ढांचे और लगातार हो रहे सुधारों के दम पर आज विसंगत मामलों को चुटकियों में हल किया जा रहा है।
Delight News
निष्पक्ष पत्रकारिता, सटीक विश्लेषण
Delight News परिवार से जुड़ें
ताजा खबरों के सबसे तेज नोटिफिकेशन और शानदार यूज़र इंटरफेस के साथ देश-दुनिया के लाइव अपडेट्स सीधे अपने mobile पर पाने के लिए हमारा Delight News Android App डाउनलोड करें।
📥 Download Android App