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दिल्ली बनी ई-मोबिलिटी की सरताज, नीति आयोग की रिपोर्ट में देश के राज्यों का हाल बेहाल

दिल्ली बनी ई-मोबिलिटी की सरताज, नीति आयोग की रिपोर्ट में देश के राज्यों का हाल बेहाल

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📅 18 Sep2026

नीति आयोग द्वारा जारी इंडिया इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इंडेक्स 2025 में दिल्ली ने देश भर में पहला स्थान हासिल किया है। इस रिपोर्ट ने भारत के राज्यों में इलेक्ट्रिक वाहनों की रफ्तार, चार्जिंग स्टेशनों की स्थिति और तकनीक के मोर्चे पर चल रही रेस की पूरी तस्वीर साफ कर दी है।

दिल्ली बनी ई-मोबिलिटी की सरताज, नीति आयोग की रिपोर्ट में देश के राज्यों का हाल बेहाल
नीति आयोग द्वारा जारी इंडिया इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इंडेक्स 2025 में दिल्ली ने देश भर में पहला स्थान हासिल किया है। इस रिपोर्ट ने भारत के राज्यों में इलेक्ट्रिक वाहनों की रफ्तार, चार्जिंग स्टेशनों की स्थिति और तकनीक के मोर्चे पर चल रही रेस की पूरी तस्वीर साफ कर दी है।
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की नई दौड़ और नीति आयोग की रिपोर्ट
नीति आयोग ने डब्ल्यूआरआई इंडिया (WRI India) के साथ मिलकर देश का पहला कंप्रिहेंसिव इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इंडेक्स (IEMI) 2025 जारी किया है। इस इंडेक्स का मकसद भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ई-मोबिलिटी की नीतियों और उनके जमीनी क्रियान्वयन का सटीक आकलन करना है। इस पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया में कुल 16 संकेतकों को आधार बनाया गया है, जिन्हें मांग, चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर और अनुसंधान जैसे तीन मुख्य स्तंभों पर परखा गया है।
दिल्ली ने मारी बाजी, महाराष्ट्र और कर्नाटक भी आगे
इस इंडेक्स में राजधानी दिल्ली ने 84 का शानदार स्कोर हासिल करते हुए देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पीछे छोड़ दिया है। दिल्ली के बाद महाराष्ट्र 78 अंकों के साथ दूसरे और कर्नाटक 73 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर काबिज है। इसके अलावा, चंडीगढ़ ने 71 और गोवा ने 65 अंक प्राप्त कर अपनी मजबूत स्थिति दर्ज कराई है। खास बात यह है कि मध्य प्रदेश ने इस बार जबरदस्त छलांग लगाते हुए 23वें स्थान से सीधे सातवें पायदान पर जगह बनाई है।
चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसर्च में किसका जलवा
इंडेक्स के आंकड़ों पर गौर करें तो चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामले में कर्नाटक ने बाजी मारते हुए 97 का सर्वोच्च स्कोर हासिल किया है, जिसके बाद गोवा और महाराष्ट्र का नंबर आता है। वहीं, ईवी रिसर्च और इनोवेशन के मोर्चे पर भी दिल्ली ने 94 अंक प्राप्त कर अपनी बादशाहत कायम रखी है। देश भर के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का कुल स्कोर 10 से 84 के बीच दर्ज किया गया है, जिसका औसत या मीडियन स्कोर 40 रहा है।
फ्रंटरनर और एस्परेंट राज्यों की स्थिति
रिपोर्ट के आधार पर राज्यों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे आठ बड़े राज्यों ने 'फ्रंटरनर' श्रेणी में जगह बनाई है। वहीं, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार, केरल, झारखंड, पंजाब और गुजरात जैसे राज्य 'इमर्जिंग परफॉर्मर' की सूची में शामिल रहे हैं, जिनका स्कोर 35 से 49 के बीच रहा है। यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि भारत का ऑटोमोबाइल सेक्टर अब इलेक्ट्रिक भविष्य की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है।
सिनेमा जगत का सबसे बड़ा सम्मान: दिग्गज अभिनेता अनंत नाग को दादा साहब फाल्के पुरस्कार

सिनेमा जगत का सबसे बड़ा सम्मान: दिग्गज अभिनेता अनंत नाग को दादा साहब फाल्के पुरस्कार

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📅 18 Sep2026

अनंत नाग को भारतीय सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए वर्ष 2024 के प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। हिंदी और कन्नड़ सिनेमा में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले इस दिग्गज अभिनेता की यह उपलब्धि भारतीय फिल्म उद्योग के लिए गर्व का क्षण है।

सिनेमा जगत का सबसे बड़ा सम्मान: दिग्गज अभिनेता अनंत नाग को दादा साहब फाल्के पुरस्कार
अनंत नाग को भारतीय सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए वर्ष 2024 के प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। हिंदी और कन्नड़ सिनेमा में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले इस दिग्गज अभिनेता की यह उपलब्धि भारतीय फिल्म उद्योग के लिए गर्व का क्षण है।
भारतीय सिनेमा की दुनिया में सर्वोच्च मान्यता प्राप्त 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' की घोषणा होते ही कला जगत में खुशी की लहर दौड़ गई है। कन्नड़ और हिंदी फिल्मों के दिग्गज अभिनेता अनंत नाग को वर्ष 2024 के इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुना गया है। उनके दशकों लंबे सफर ने देश के फिल्म इतिहास को समृद्ध किया है।
सिनेमा का सर्वोच्च शिखर
भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला दादा साहब फाल्के पुरस्कार देश में सिनेमा के क्षेत्र में मिलने वाला सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित सम्मान माना जाता है। इस पुरस्कार का मुख्य उद्देश्य उन महान शख्सियतों को सम्मानित करना है, जिन्होंने भारतीय सिनेमा के विकास, विस्तार और उसकी लोकप्रियता में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया हो।
इतिहास और परंपरा
इसकी शुरुआत वर्ष 1969 में हुई थी, जो भारतीय सिनेमा के जनक कहे जाने वाले दादा साहब फाल्के की जन्मशताब्दी का वर्ष था। इस प्रतिष्ठित पुरस्कार की पहली प्राप्तकर्ता महान अभिनेत्री देविका रानी थीं, जिन्हें भारतीय सिनेमा की पहली महिला के रूप में भी जाना जाता है। तब से लेकर आज तक यह परंपरा देश के उन चुनिंदा कलाकारों को मिलती रही है, जिनकी कला ने पीढ़ियों को प्रभावित किया है।
पुरस्कार का स्वरूप और भव्यता
यह सम्मान सिर्फ एक नाम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ भारतीय संस्कृति और कला का बड़ा गौरव जुड़ा हुआ है। इस पुरस्कार के तहत विजेता को एक स्वर्ण कमल (गोल्डन लोटस) मेडल, एक विशेष शॉल और दस लाख रुपये नकद पुरस्कार प्रदान किया जाता है। देश के राष्ट्रपति खुद अपने हाथों से इस प्रतिष्ठित सम्मान को प्रदान करते हैं, जो इसकी गरिमा को और अधिक बढ़ा देता है।
कौन थे दादा साहब फाल्के
धुंडीराज गोविंद फाल्के, जिन्हें प्यार और सम्मान से दादा साहब फाल्के कहा जाता है, का जन्म 30 अप्रैल 1870 को महाराष्ट्र के त्र्यंबक में हुआ था। वे एक दूरदर्शी फिल्म निर्देशक थे जिन्हें भारतीय सिनेमा का पितामह कहा जाता है। उन्होंने ही साल 1913 में भारत की पहली पूर्ण लंबाई वाली फीचर फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' का निर्देशन कर देश में सिनेमा की नींव रखी थी।
लद्दाख के चांगथांग अभयारण्य में सैन्य ठिकानों की होगी मैपिंग

लद्दाख के चांगथांग अभयारण्य में सैन्य ठिकानों की होगी मैपिंग

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📅 18 Sep2026

लद्दाख के चांगथांग कोल्ड डेजर्ट वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में सैन्य प्रतिष्ठानों की स्थानिक मैपिंग और फील्ड वेरिफिकेशन जल्द किया जाएगा। यह कदम रक्षा अधिकारियों और पुलिस के समन्वय से उठाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य इस सामरिक और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील उच्च तुंगता वाले क्षेत्र में सुरक्षा और प्रबंधन को बेहतर बनाना है।

लद्दाख के चांगथांग अभयारण्य में सैन्य ठिकानों की होगी मैपिंग
खबर का निचोड़:
लद्दाख के चांगथांग कोल्ड डेजर्ट वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में सैन्य प्रतिष्ठानों की स्थानिक मैपिंग और फील्ड वेरिफिकेशन जल्द किया जाएगा। यह कदम रक्षा अधिकारियों और पुलिस के समन्वय से उठाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य इस सामरिक और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील उच्च तुंगता वाले क्षेत्र में सुरक्षा और प्रबंधन को बेहतर बनाना है।
रणनीतिक सुरक्षा और पर्यावरण का अनूठा संगम
लद्दाख के ऊंचे और दुर्गम पठारों पर फैला चांगथांग वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी इन दिनों प्रशासनिक और सुरक्षात्मक कारणों से चर्चा के केंद्र में है। लगभग चार हजार वर्ग किलोमीटर के विशाल भूभाग पर फैले इस संरक्षित क्षेत्र में अब सैन्य प्रतिष्ठानों की मैपिंग और भौतिक सत्यापन का काम शुरू होने जा रहा है। रक्षा और पुलिस महकमे के आपसी तालमेल से होने वाली इस प्रक्रिया का मकसद इस संवेदनशील सीमाई और वन्यजीव क्षेत्र में व्यवस्थाओं को अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित करना है।
दुनिया की छत पर बसी अनोखी जैव विविधता
समुद्र तल से 14 हजार से 19 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह अभयारण्य अपनी भौगोलिक विषमताओं और बेजोड़ सुंदरता के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। गहरी घाटियों और विशाल पठारों से घिरे इस क्षेत्र में पैंगोंग त्सो, त्सो मोररी और त्सो कार जैसी दुनिया की सबसे ऊंची खारे पानी की झीलें मौजूद हैं। यहां का मौसम और कठिन परिस्थितियां इसे जितना चुनौतीपूर्ण बनाती हैं, उतनी ही यह भूमि दुर्लभ वन्यजीवों के लिए एक सुरक्षित आशियाना भी है।
दुर्लभ जीवों और चांग्पा संस्कृति का गढ़
यह sanctuary स्नो लेपर्ड यानी हिम तेंदुए का प्रमुख प्राकृतिक आवास है। इसके अलावा, यह भारत की उन चुनिंदा जगहों में शुमार है जहां तिब्बती जंगली गधा यानी किआंग और काले गर्दन वाले क्रेन खुलेआम विचरण करते हैं। इसके अलावा तिब्बती भेड़िया, जंगली याक, ब्राउन बियर और ब्लू शीप जैसे वन्यजीव इस ठंडे रेगिस्तान की रौनक बढ़ाते हैं।
इंसानी जीवन और संस्कृति की अनूठी दास्तान
इस अभयारण्य की सबसे बड़ी खासियत यहां की स्थानीय संस्कृति है। चांग्पा जनजाति के खानाबदोश समुदाय सदियों से इस कठिन भूगोल में अपनी पारंपरिक जीवनशैली के साथ जीवित हैं। वे याक, बकरियों और भेड़ों को चराते हुए इन विशाल घास के मैदानों में निवास करते हैं। बौद्ध संस्कृति से ओतप्रोत इस क्षेत्र में दुनिया के सबसे ऊंचे गांवों में शुमार कोरzok गांव और प्रसिद्ध कोरजोक मठ स्थित है, जो देश-विदेश के पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है।
राष्ट्रहित और वैश्विक कूटनीति का मर्म: आईसीडब्ल्यूए के 25 गौरवशाली वर्ष

राष्ट्रहित और वैश्विक कूटनीति का मर्म: आईसीडब्ल्यूए के 25 गौरवशाली वर्ष

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📅 18 Sep2026

देश की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों के वैचारिक मंथन का प्रमुख केंद्र, भारतीय विश्व मामलों की परिषद (ICWA) ने अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर लिए हैं। नई दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित सप्रू हाउस में आयोजित इस भव्य रजत जयंती समारोह में उपराष्ट्रपति ने शिरकत की। इस अवसर पर भारत के कूटनीतिक सफर और वैश्विक पटल पर देश की बढ़ती साख पर विस्तार से चर्चा की गई।

राष्ट्रहित और वैश्विक कूटनीति का मर्म: आईसीडब्ल्यूए के 25 गौरवशाली वर्ष
वैश्विक कूटनीति के केंद्र में भारत की मजबूत होती गूंज
देश की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों के वैचारिक मंथन का प्रमुख केंद्र, भारतीय विश्व मामलों की परिषद (ICWA) ने अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर लिए हैं। नई दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित सप्रू हाउस में आयोजित इस भव्य रजत जयंती समारोह में उपराष्ट्रपति ने शिरकत की। इस अवसर पर भारत के कूटनीतिक सफर और वैश्विक पटल पर देश की बढ़ती साख पर विस्तार से चर्चा की गई।
स्थापना का इतिहास और वैचारिक नींव
इस प्रतिष्ठित थिंक टैंक की जड़ें आजादी से पहले वर्ष 1943 में जुड़ी हैं। देश के कुछ दूरदर्शी विचारकों ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति पर एक स्वदेशी और स्वतंत्र भारतीय दृष्टिकोण तैयार करने का बीड़ा उठाया था। महान बुद्धिजीवी सर टी.बी. सप्रू और डॉ. एच.एन. कुंजरू के नेतृत्व में स्थापित यह संस्था शुरू से ही अकादमिक और रणनीतिक गहराई का प्रतीक रही है। शुरुआत में इसे वर्ष 1860 के सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम के तहत एक गैर-आधिकारिक, गैर-राजनीतिक और गैर-लाभकारी संगठन के रूप में पंजीकृत किया गया था।
राष्ट्रीय महत्व का संस्थान और उसकी स्वायत्तता
वक्त के साथ इस संस्था के बढ़ते प्रभाव और रणनीतिक योगदान को देखते हुए संसद ने वर्ष 2001 में एक विशेष अधिनियम पारित किया। इसके तहत इसे 'राष्ट्रीय महत्व के संस्थान' का दर्जा दिया गया। संस्था की संरचना की एक खास विशेषता यह है कि देश के उपराष्ट्रपति इसके पदेन (एक्स-ऑफिशियो) अध्यक्ष होते हैं। हालांकि इसे विदेश मंत्रालय द्वारा वित्तीय सहायता मिलती है, लेकिन कामकाज के स्तर पर यह पूरी तरह स्वतंत्र रहकर अपने अनुसंधान और विश्लेषण को अंजाम देती है।
विदेश मामलों का अनूठा अध्ययन केंद्र
सप्रू हाउस स्थित यह परिषद पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश मामलों के समर्पित अध्ययन के लिए जानी जाती है। आज जब दुनिया भू-राजनीतिक बदलावों के एक दौर से गुजर रही है, तब इस तरह के थिंक टैंक भारत को वैश्विक कूटनीति की हर चुनौती का सामना करने के लिए अकादमिक और सामरिक इनपुट प्रदान करते हैं। रजत जयंती का यह मुकाम इस बात का गवाह है कि भारत वैश्विक मंचों पर अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए एक जिम्मेदार और सशक्त शक्ति के रूप में लगातार आगे बढ़ रहा है।
डिफेंस टेक्नोलॉजी में भारत की छलांग: DRDO ने हासिल किया GaN MMIC महारत का मुकाम

डिफेंस टेक्नोलॉजी में भारत की छलांग: DRDO ने हासिल किया GaN MMIC महारत का मुकाम

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📅 18 Sep2026

रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी DRDO ने भारत को रक्षा और अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में एक नया मुकाम दिला दिया है। भारत ने स्वदेशी गैलियम नाइट्राइड मोनोलिथिक माइक्रोवेव इंटीग्रेटेड सर्किट (GaN MMIC) टेक्नोलॉजी के सफल प्रदर्शन और कार्यान्वयन का ऐतिहासिक कारनामा कर दिखाया है। इस उपलब्धि के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा सात देशों के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया है, जिनके पास यह अत्याधुनिक तकनीक है।

डिफेंस टेक्नोलॉजी में भारत की छलांग: DRDO ने हासिल किया GaN MMIC महारत का मुकाम
क्या है GaN MMIC टेक्नोलॉजी और क्यों है यह गेम-चेंजर?
रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी DRDO ने भारत को रक्षा और अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में एक नया मुकाम दिला दिया है। भारत ने स्वदेशी गैलियम नाइट्राइड मोनोलिथिक माइक्रोवेव इंटीग्रेटेड सर्किट (GaN MMIC) टेक्नोलॉजी के सफल प्रदर्शन और कार्यान्वयन का ऐतिहासिक कारनामा कर दिखाया है। इस उपलब्धि के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा सात देशों के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया है, जिनके पास यह अत्याधुनिक तकनीक है। इस सूची में अब अमेरिका, रूस, फ्रांस, जर्मनी, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे दिग्गजों के साथ भारत का नाम भी शान से जुड़ गया है।
सुपर-पावरफुल चिप जो बदल देगी युद्ध की सूरत
यह तकनीक कोई आम तकनीक नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा बेहद छोटा और सुपर-पावरफुल कंप्यूटर चिप है, जो बिना पिघले अत्यंत उच्च-आवृत्ति वाले वायरलेस सिग्नलों को आसानी से संभाल सकता है। इसे एक विशेष रासायनिक सामग्री पर तैयार किया गया है। यह एक ऐसा ऑल-इन-वन चिप है, जिसमें ट्रांजिस्टर, रेसिस्टर और कैपेसिटर जैसे छोटे-छोटे हिस्सों को एक ही सामग्री पर समेटा गया है। इसका मुख्य काम अदृश्य वायरलेस यानी माइक्रोवेव तरंगों को नियंत्रित करना है। खास तौर पर इसे एक्स-बैंड (X-band) आवृत्ति रेंज तक के अनुप्रयोगों के लिए डिजाइन किया गया है।
सिलिकॉन से 300 गुना तेज और आकार में बेहद कॉम्पैक्ट
गैलियम नाइट्राइड (GaN) अपने असाधारण थर्मल और इलेक्ट्रिकल गुणों के लिए जाना जाता है। यही वजह है कि यह आधुनिक रक्षा प्रणालियों जैसे कि रडार, सेंसर, मिसाइल और उपग्रहों के लिए रीढ़ की हड्डी साबित हो रहा है। महज 3.5 गुणा 3 मिलीमीटर के आकार वाला यह स्वदेशी GaN चिप 30 वॉट तक की जबरदस्त पावर देने की क्षमता रखता है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह सिलिकॉन के मुकाबले 300 गुना तेज गति से काम करता है।
क्यों पड़ी इस क्रांतिकारी सेमीकंडक्टर की जरूरत?
आधुनिक युद्ध कौशल और अंतरिक्ष अभियानों में यह तकनीक गेम-चेंजर साबित होने जा रही है। GaN सेमीकंडक्टर अपनी उच्च ऊर्जा दक्षता, बेहतर थर्मल परफॉर्मेंस और शानदार पावर आउटपुट के लिए पूरी दुनिया में पहचाना जाता है। यह तकनीक रक्षा उपकरणों का आकार और वजन कम करने में मदद करती है, जिससे सैनिकों और हथियारों की गतिशीलता बढ़ती है। सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह अत्यधिक कठोर और प्रतिकूल वातावरण में भी बिना किसी रुकावट के पूरी विश्वसनीयता के साथ काम कर सकती है।

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