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झारखंड के डैम्स पर मंडरा रहा खतरा, एनडीएसए ने मांगी सख्त कार्रवाई

झारखंड के डैम्स पर मंडरा रहा खतरा, एनडीएसए ने मांगी सख्त कार्रवाई

Delight News
📅 17 Sep2026

राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (NDSA) ने झारखंड सरकार से श्रेणी-द्वितीय के बांधों की सुरक्षा और मरम्मत के लिए समयबद्ध कार्रवाई की मांग की है। यह वैधानिक निकाय देश भर के बांधों की निगरानी, नियमन और उनके रखरखाव को सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

झारखंड के डैम्स पर मंडरा रहा खतरा, एनडीएसए ने मांगी सख्त कार्रवाई
खबर का निचोड़:
राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (NDSA) ने झारखंड सरकार से श्रेणी-द्वितीय के बांधों की सुरक्षा और मरम्मत के लिए समयबद्ध कार्रवाई की मांग की है। यह वैधानिक निकाय देश भर के बांधों की निगरानी, नियमन और उनके रखरखाव को सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
झारखंड में बांधों की सुरक्षा पर बड़ा संकट
देश के बुनियादी ढांचे और आम जनता की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण यानी एनडीएसए ने झारखंड राज्य में बांधों की सुरक्षा को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। राज्य के श्रेणी-द्वितीय (Category-II) के बांधों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है, जिसके चलते प्राधिकरण ने इनकी व्यापक सुरक्षा जांच और समयबद्ध पुनर्वास के लिए सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
क्या है राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण?
राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण कोई आम निकाय नहीं है, बल्कि इसे केंद्र सरकार द्वारा 'बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021' के तहत एक शक्तिशाली वैधानिक निकाय के रूप में स्थापित किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य देश भर के विशाल और संवेदनशील बांधों का नियमन करना, उन पर पैनी नजर रखना और समय-समय पर उनका निरीक्षण करना है। नई दिल्ली में इसका मुख्यालय स्थित है, जहां से पूरे देश की बांध प्रणालियों पर नियंत्रण रखा जाता है।
नेतृत्व और पांच मजबूत विंग
इस महत्वपूर्ण प्राधिकरण की कमान एक अनुभवी चेयरमैन के हाथों में होती है। उनके कार्यों को सुचारू रूप से चलाने और देश के बांध नेटवर्क को सुरक्षित रखने के लिए पांच विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्ति की गई है। ये सदस्य प्राधिकरण के पांच प्रमुख विंगों की कमान संभालते हैं, जिनमें नीति और अनुसंधान, तकनीकी, नियमन, आपदा और लचीलापन, तथा प्रशासन और वित्त विंग शामिल हैं। यह ढांचा इसे किसी भी आपदा से निपटने में सक्षम बनाता है।
एनडीएसए की कार्यप्रणाली और अधिकार
इस प्राधिकरण की कार्यशैली बेहद स्पष्ट और दूरदर्शी है। यह 'राष्ट्रीय बांध सुरक्षा समिति' द्वारा बनाई गई नीतियों को धरातल पर उतारने का काम करता है। इसके अलावा, यह राज्य बांध सुरक्षा संगठनों (SDSOs) और बांध मालिकों के बीच आने वाले जटिल विवादों को सुलझाने का काम भी करता है। बांधों की मजबूती की जांच और उनके रखरखाव के लिए कड़े नियम बनाना भी इसी के अधिकार क्षेत्र में आता है।
निर्माण एजेंसियों के लिए कड़े मानक
बांधों के डिजाइन, निर्माण और उनमें किसी भी तरह के बदलाव के लिए एनडीएसए देश की विभिन्न एजेंसियों को आधिकारिक मान्यता प्रदान करता है। इसके द्वारा तय किए गए मानकों में संरचनात्मक मजबूती, पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव और किसी भी आपदा से निपटने के लिए आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल शामिल हैं। देश भर में जागरूकता अभियान चलाने के साथ-साथ यह संस्था किसी भी प्राकृतिक आपदा या अनहोनी की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया योजनाओं को भी सुनिश्चित करती है।
​नागरहोल टाइगर रिजर्व पर नया अपडेट और इसका भौगोलिक महत्व

​नागरहोल टाइगर रिजर्व पर नया अपडेट और इसका भौगोलिक महत्व

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📅 17 Sep2026

केंद्र सरकार ने कर्नाटक के प्रतिष्ठित नागरहोल टाइगर रिजर्व के चारों ओर एक बार फिर पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र यानी ईको-सेंसेटिव जोन का ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है। इस बार लगभग 573.95 वर्ग किलोमीटर के दायरे को चिन्हित किया गया है, जहां वन्यजीवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कई व्यावसायिक और मानसूनी गतिविधियों पर कड़ी लगाम कसी जाएगी।

नगारहोल टाइगर रिजर्व की सुरक्षा: केंद्र सरकार ने उठाया कड़ा कदम
नागरहोल टाइगर रिजर्व पर नया अपडेट और इसका भौगोलिक महत्व
केंद्र का नया कदम: नागरहोल के इर्द-गिर्द कसा शिकंजा
केंद्र सरकार ने कर्नाटक के प्रतिष्ठित नागरहोल टाइगर रिजर्व के चारों ओर एक बार फिर पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र यानी ईको-सेंसेटिव जोन का ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है। इस बार लगभग 573.95 वर्ग किलोमीटर के दायरे को चिन्हित किया गया है, जहां वन्यजीवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कई व्यावसायिक और मानसूनी गतिविधियों पर कड़ी लगाम कसी जाएगी। यह कदम इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को इंसानी दखल से बचाने की दिशा में एक बेहद अहम मोड़ साबित होने वाला है।
प्रकृति की गोद में बसा अनूठा अभ्यारण्य
दक्षिण भारत के मैसूर और कोडागु जिलों में फैला यह रिजर्व भौगोलिक दृष्टि से बेहद खास है। यह कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल राज्यों के त्रि-जंक्शन पर स्थित है, जो इसे पश्चिमी और पूर्वी घाटों का एक बेजोड़ 'पारिस्थितिक संगम' बनाता है। इसका नाम 'नगारहोल' एक स्थानीय धारा के नाम पर पड़ा है, जिसका कन्नड़ में अर्थ 'सांप जैसी नदी' होता है। यह धारा रिजर्व के बीचों-बीच बलखाती हुई आगे बढ़ती है और अंत में काबिनी नदी में जा मिलती है।
विश्व धरोहर का एक चमकता सितारा
यह भव्य वन क्षेत्र विशाल नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व का एक अभिन्न हिस्सा है, जिसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है। इसके भौगोलिक विस्तार की बात करें तो इसके उत्तर में काबिनी नदी और दक्षिण में मोयार नदी इसका पहरा देती हैं। इसके अलावा, इसकी सीमाएं दक्षिण-पूर्व में बांदीपुर टाइगर रिजर्व और दक्षिण-पश्चिम में केरल के वायनाड वन्यजीव अभ्यारण्य से सटी हुई हैं, जो इसे वन्यजीवों के অবাধ विचरण के लिए एक सुरक्षित गलियारा बनाती हैं।
विविध वनस्पतियों और वन्यजीवों का स्वर्ग
इस रिजर्व की जलवायु और भौगोलिक विविधता इसकी वनस्पतियों में साफ झलकती है। इसके पूर्वी हिस्से में कम बारिश के चलते शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं, जबकि पश्चिमी छोर की ओर बढ़ते ही वर्षा की अधिकता के कारण यह क्षेत्र उष्णकटिबंधीय नम और अर्ध-सदाबहार जंगलों में बदल जाता है। यहां की वन संपदा में शीशम, भारतीय कीनो, चंदन, लॉरेल और विशाल बांस के झुंड प्रमुखता से शामिल हैं।
वन्यजीवों का प्राकृतिक साम्राज्य
घने जंगलों और पानी की प्रचुरता के कारण यह रिजर्व वन्यजीव प्रेमियों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है। यहां के शाकाहारी जीवों में गौर, सुस्त भालू, चार सींगों वाला मृग और विशाल हाथियों के झुंड प्रमुख हैं। वहीं, मांसाहारी जीवों की बात करें तो यहां बंगाल टाइगर और ढोले जैसे दुर्दांत शिकारी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हैं। यही विविधता इस पूरे अंचल को भारतीय वन्यजीव मानचित्र पर सबसे खास बनाती है।
बांग्लादेश के बजाय भारत ने भेजी हिला मछली, पलटी दशकों पुरानी परंपरा

बांग्लादेश के बजाय भारत ने भेजी हिला मछली, पलटी दशकों पुरानी परंपरा

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📅 17 Sep2026

भारत ने पिछले दो महीनों में बांग्लादेश को लगभग 500 टन हिल्सा मछली का निर्यात किया है। यह पहली बार है जब दोनों देशों के बीच इस लोकप्रिय मछली के पारंपरिक व्यापार का रुख पूरी तरह से पलट गया है, जिससे खाद्य और व्यापार जगत में नया दौर शुरू हुआ है।

बांग्लादेश के बजाय भारत ने भेजी हिला मछली, पलटी दशकों पुरानी परंपरा
भारत ने पिछले दो महीनों में बांग्लादेश को लगभग 500 टन हिल्सा मछली का निर्यात किया है। यह पहली बार है जब दोनों देशों के बीच इस लोकप्रिय मछली के पारंपरिक व्यापार का रुख पूरी तरह से पलट गया है, जिससे खाद्य और व्यापार जगत में नया दौर शुरू हुआ है।
बंगाली थाली की शान और इतिहास
हिल्सा मछली, जिसे स्थानीय भाषा में इलिश भी कहा जाता है, बंगाल की संस्कृति, खानपान और सामाजिक परंपराओं का एक बेहद अहम हिस्सा है। क्लुपेइडे परिवार से ताल्लुक रखने वाली यह मछली हेरिंग प्रजाति से जुड़ी है। अपने अनूठे स्वाद, लाजवाब खुशबू और मक्खन जैसी मुलायम बनावट के कारण इसे खाने के शौकीनों के बीच अत्यधिक महत्व दिया जाता है। वैश्विक स्तर पर कुल इलिश उत्पादन का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अकेले बांग्लादेश में होता है, जो इसकी भारी मांग को साफ तौर पर दर्शाता है।
रूप-रंग और शारीरिक बनावट
इस खास मछली की शारीरिक संरचना इसे अन्य प्रजातियों से अलग बनाती है। हिल्सा का शरीर चांदी की तरह चमकदार और चमकीला होता है। यह काफी चपटी और आगे की तरफ से नुकीले सिर वाली होती है। हालांकि इसके लजीज स्वाद के दीवाने करोड़ों लोग हैं, लेकिन यह मछली अपने शरीर में मौजूद अनगिनत छोटे-छोटे कांटों के लिए भी जानी जाती है, जिन्हें खाते समय खासी सावधानी बरतनी पड़ती है।
अनोखा प्रवास और प्राकृतिक रहवास
हिल्सा का जीवन चक्र नदियों और समुद्र के बीच की एक लंबी यात्रा से जुड़ा हुआ है। यह मछली मुख्य रूप से बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान, म्यांमार और फारस की खाड़ी के आसपास की नदियों और मुहानों में पाई जाती है। यह खारे और मीठे, दोनों तरह के पानी में आसानी से रह सकती है। हालांकि, जब अंडे देने का समय आता है, तो ये मीठे पानी की तलाश में समुद्र से उल्टी दिशा में नदियों की तरफ तैरकर लंबी यात्रा तय करती हैं। इस रोमांचक प्रवास के दौरान वे बांग्लादेश की पद्मा और मेघना नदियों के साथ-साथ भारत की गंगा और गोदावरी जैसी प्रमुख नदियों का रुख करती हैं।
संरक्षण और मौजूदा स्थिति
प्रकृति संरक्षण के लिए काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन आईयूसीएन की रेड लिस्ट में हिल्सा मछली को फिलहाल 'Least Concern' यानी न्यूनतम चिंता की श्रेणी में रखा गया है। इसका मतलब है कि अभी इस प्रजाति पर विलुप्त होने का कोई बड़ा खतरा मंडरा नहीं रहा है। इसके बावजूद, नदी के बढ़ते प्रदूषण और अबाध शिकार जैसी गतिविधियों के कारण इसके प्राकृतिक आवास पर लगातार नजर रखी जा रही है ताकि भविष्य में इस अनमोल जल-जीव का संतुलन बिगड़ने न पाए।
BRICS Summit 2026 में छाई हिमालयी गुच्छी मशरूम, जानिए क्यों है इतनी खास

BRICS Summit 2026 में छाई हिमालयी गुच्छी मशरूम, जानिए क्यों है इतनी खास

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📅 17 Sep2026

ग्लोबल मंच पर भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर एक बार फिर चमक उठी है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में हिमालय की गोद से निकलने वाली दुर्लभ गुच्छी मशरूम ने अपनी खास जगह बनाई है। अपनी अनूठी खूबियों, औषधीय गुणों और आसमान छूती कीमतों के चलते यह मशरूम पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गई है।

BRICS Summit 2026 में छाई हिमालयी गुच्छी मशरूम, जानिए क्यों है इतनी खास
ग्लोबल मंच पर भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर एक बार फिर चमक उठी है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में हिमालय की गोद से निकलने वाली दुर्लभ गुच्छी मशरूम ने अपनी खास जगह बनाई है। अपनी अनूठी खूबियों, औषधीय गुणों और आसमान छूती कीमतों के चलते यह मशरूम पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गई है।
दुनिया की सबसे महंगी और दुर्लभ मशरूम
गुच्छी मशरूम, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'मोर्चेल्ला एस्कुलेंटा' कहा जाता है, अपनी विशिष्ट बनावट के कारण पहचानी जाती है। इसके स्पंजी और जालीदार (हनीकॉम्ब) कैप पीले से लेकर गहरे भूरे रंग के होते हैं, जबकि इसका तना खोखला और हल्का होता है। यह दुनिया की सबसे महंगी मशरूमों में गिनी जाती है, क्योंकि इसकी कीमत अच्छे-अच्छे विदेशी व्यंजनों और प्रीमियम उत्पादों को भी पीछे छोड़ देती है।
प्रकृति की गोद से थाली तक का रोमांचक सफर
इसकी खेती करना आज के समय में भी नामुमकिन के बराबर है, क्योंकि इसे प्रयोगशालाओं या खेतों में आसानी से उगाया नहीं जा सकता। यह मुख्य रूप से भारत के पहाड़ी राज्यों जैसे जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सर्द जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगती है। यह उन पहाड़ी कोनिफेरस जंगलों की मिट्टी, नमी और पिघलती बर्फ के बीच पनपती है जहां का मौसम और तापमान इसके अनुकूल होता है।
स्थानीय आदिवासियों की कड़ी मेहनत
गुच्छी को इकट्ठा करना कोई आसान काम नहीं है। स्थानीय पहाड़ी समुदायों के लोग दुर्गम और खतरनाक पहाड़ी रास्तों पर ट्रैकिंग करते हुए इसे अपने हाथों से चुनते हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह जरूरी नहीं कि जो मशरूम इस साल एक खास जगह पर उगी हो, वह अगले साल भी उसी स्थान पर मिले। यह अनिश्चितता इसके संग्रहण को और अधिक थकाऊ और चुनौतीपूर्ण बना देती है।
सेहत का खजाना और स्वाद का बेजोड़ संगम
ताजा गुच्छी में नमी की मात्रा बहुत अधिक होती है, इसलिए इसकी शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए इसे पारंपरिक तरीकों से धूप में सुखाया जाता है, जिससे इसका वजन काफी कम हो जाता है। स्वाद और सुगंध में लाजवाब होने के साथ-साथ यह सेहत के लिए भी वरदान है। इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन, डाइटरी फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन-डी पाया जाता है, जो इसे पोषण के मामले में भी सबसे आगे रखता है।
डायनासोर प्रेमियों के लिए बड़ी खबर: स्पेन में मिला ‘डिप्लोडोकस’ का पहला जीवाश्म!

डायनासोर प्रेमियों के लिए बड़ी खबर: स्पेन में मिला ‘डिप्लोडोकस’ का पहला जीवाश्म!

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📅 17 Sep2026

जुरासिक काल के विशालकाय और शाकाहारी डायनासोर 'डिप्लोडोकस' के अवशेष पहली बार अमेरिका से बाहर स्पेन में खोजे गए हैं। लगभग 90 फीट लंबे और अनोखी विशेषताओं वाले इस जीव की इस नई खोज ने पैलियोन्टोलॉजी की दुनिया में एक बार फिर हलचल मचा दी है।

डायनासोर प्रेमियों के लिए बड़ी खबर: स्पेन में मिला ‘डिप्लोडोकस’ का पहला जीवाश्म!
खबर का निचोड़
जुरासिक काल के विशालकाय और शाकाहारी डायनासोर 'डिप्लोडोकस' के अवशेष पहली बार अमेरिका से बाहर स्पेन में खोजे गए हैं। लगभग 90 फीट लंबे और अनोखी विशेषताओं वाले इस जीव की इस नई खोज ने पैलियोन्टोलॉजी की दुनिया में एक बार फिर हलचल मचा दी है।
जुरासिक काल का बेताज बादशाह
डायनासोर की दुनिया हमेशा से इंसानों को अपनी ओर खींचती रही है। अब इस रोमांचक सिलसिले में एक नया और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। अब तक अमेरिका के विभिन्न इलाकों तक सीमित रहने वाले मशहूर डायनासोर 'डिप्लोडोकस' के अवशेष आखिरकार यूरोप की धरती यानी स्पेन से बरामद कर लिए गए हैं। यह खोज विज्ञान जगत के लिए किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं है।
क्या है डिप्लोडोकस और उसकी खासियतें?
डिप्लोडोकस दुनिया के सबसे बड़े और विशालकाय सौरोपॉड (Sauropod) समूह का हिस्सा रहा है। ये जीव अपने भारी-भरकम शरीर, चार खंभे जैसे पैरों और बेहद लंबी गर्दन के लिए जाने जाते हैं। वैज्ञानिक इतिहास में इसे सबसे लंबे पूर्ण डायनासोर के रूप में दर्ज किया गया है। आज से करीब 155 से 145 मिलियन वर्ष पहले लेट जुरासिक काल के दौरान यह धरती पर राज करता था। इसका मुख्य ठिकाना घने जंगलों और पेड़ों के किनारे वाले मैदानी इलाके हुआ करते थे।
हैरान कर देने वाले शारीरिक आंकड़े
इस डायनासोर का आकार जितना विशाल था, उसका वजन उतना ही हैरान करने वाला था। डिप्लोडोकस की लंबाई करीब 90 फीट और कूल्हों के पास इसकी ऊंचाई लगभग 15 फीट थी। हालांकि यह विशालकाय था, लेकिन सौरोपॉड परिवार में इसे हल्का माना जाता था, जिसका वजन करीब 30 टन था। इसके पीछे इसकी रीढ़ की हड्डियों की अनूठी और खोखली संरचना थी, जो इसे हल्का रखने में मदद करती थी।
अजीब बनावट और 'डबल बीम' का रहस्य
डिप्लोडोकस का सिर घोड़े की तरह छोटा था और इसका दिमाग भी काफी छोटा होता था। इसके मुंह के अगले हिस्से में नुकीले, खूंटे जैसे दांत थे। इसके पिछले पैर आगे के पैरों से थोड़े लंबे थे, जिससे इसका शरीर कूल्हों से सिर की ओर ढलान लिए रहता था। इसके पैर हाथियों जैसे थे और पिछले पैरों में तीन-तीन पंजे होते थे। दिलचस्प बात यह है कि इसका नाम 'डिप्लोडोकस' यानी 'डबल बीम' इसकी पूंछ की हड्डियों के आधार पर रखा गया है, जो रक्त वाहिकाओं और ऊतकों की रक्षा करती थीं।

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