
लद्दाख में संकटग्रस्त त्सो कर झील के पुनरुद्धार हेतु महत्वाकांक्षी परियोजना आरंभ
लद्दाख प्रशासन द्वारा त्सो कर झील को संरक्षित करने के लिए रूपशो खरनक हिमनद धारा से प्रतिदिन 320 मिलियन लीटर हिमनद जल मोड़ने की परियोजना शुरू की गई है। पंद्रह हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित यह झील अपनी अनूठी जैव विविधता और रामसर आर्द्रभूमि स्थल के रूप में वैश्विक पारिस्थितिक महत्व रखती है।
सारांश
लद्दाख प्रशासन द्वारा त्सो कर झील को संरक्षित करने के लिए रूपशो खरनक हिमनद धारा से प्रतिदिन 320 मिलियन लीटर हिमनद जल मोड़ने की परियोजना शुरू की गई है। पंद्रह हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित यह झील अपनी अनूठी जैव विविधता और रामसर आर्द्रभूमि स्थल के रूप में वैश्विक पारिस्थितिक महत्व रखती है।
भौगोलिक एवं पारिस्थितिक अवस्थिति
त्सो कर झील लद्दाख की रूपशो घाटी में लगभग 15,280 फीट की ऊंचाई पर स्थित एक उच्च तुंगता वाली खारी झील है। यह पैंगोंग त्सो और त्सो मोरिरी के साथ क्षेत्र की तीन प्रमुख झीलों में सबसे छोटी है। इसके किनारों पर जमे सफेद नमक के निक्षेपों के कारण इसे 'श्वेत झील' कहा जाता है। इस बेसिन में मुख्य त्सो कर के अलावा स्टार्टसापुक त्सो नामक एक ताजे पानी की झील भी शामिल है, जो मिलकर एक दुर्लभ आर्द्रभूमि तंत्र का निर्माण करती है। इस क्षेत्र में तापमान सर्दियों में शून्य से चालीस डिग्री सेल्सियस नीचे तक गिर जाता है, जबकि गर्मियों में तापमान तीस डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता है।
जैव विविधता एवं वन्यजीव संरक्षण
यह क्षेत्र विभिन्न प्रकार के प्रवासी पक्षियों और दुर्लभ वन्यजीवों का प्रमुख प्राकृतिक आवास है। यहाँ मुख्य रूप से काले गर्दन वाले क्रेन (ब्लैक-नेक्ड क्रेन) अंडे देने के लिए आते हैं। इसके अलावा ब्राह्मणी बत्तख, बार-headed गीज़ और ग्रेट क्रेस्टेड ग्रेब जैसे पक्षी भी पाए जाते हैं। स्तनधारियों में जंगली गधे की सबसे बड़ी प्रजाति कियांग के साथ-साथ ibex, हिम तेंदुए और स्नो फॉक्स भी इस पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। स्थानीय खम्पा जनजाति के लोग झील के तटों से नमक एकत्र कर अपनी आजीविका चलाते हैं।
रामसर अभिसमय एवं संरक्षण महत्व
पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील इस क्षेत्र के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2020 में त्सो कर को रामसर कन्वेंशन के तहत 'अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि' घोषित किया गया था। जलवायु परिवर्तन और जल स्तर में आ रही लगातार कमी के कारण इस अद्वितीय झील के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा था, जिससे निपटने के लिए प्रशासन द्वारा जल डायवर्जन जैसी महत्वपूर्ण परियोजना को क्रियान्वित किया जा रहा है।

भारतीय नौसेना के गाइडेड मिसाइल पोत आईएनएस कुलिश की कंबोडिया यात्रा
भारतीय नौसेना के कोरा श्रेणी के गाइडेड मिसाइल पोत आईएनएस कुलिश ने पूर्वी बेड़े की ऑपरेशनल डिप्लॉयमेंट के तहत कंबोडिया के रीम नेवल बेस का दौरा किया है। यह सामरिक यात्रा भारत और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के बीच द्विपक्षीय समुद्री सहयोग और सुरक्षा साझेदारी को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
सारांश
भारतीय नौसेना के कोरा श्रेणी के गाइडेड मिसाइल पोत आईएनएस कुलिश ने पूर्वी बेड़े की ऑपरेशनल डिप्लॉयमेंट के तहत कंबोडिया के रीम नेवल बेस का दौरा किया है। यह सामरिक यात्रा भारत और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के बीच द्विपक्षीय समुद्री सहयोग और सुरक्षा साझेदारी को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
परिचय एवं पृष्ठभूमि
आईएनएस कुलिश भारतीय नौसेना का एक प्रमुख कोरा श्रेणी का गाइडेड मिसाइल पोत है। संस्कृत भाषा में 'कुलिश' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'वज्र' होता है। इस पोत का निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) द्वारा पूर्णतः स्वदेशी तकनीक से किया गया था। इसे वर्ष 1995 से 2001 के बीच निर्मित किया गया और वर्ष 2001 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया।
तकनीकी विशेषताएं एवं मारक क्षमता
इस युद्धपोत की विस्थापन क्षमता लगभग 1,500 टन है। यह पोत ट्विन डीजल इंजनों द्वारा संचालित होता है, जो इसे 25 नॉट तक की अधिकतम गति प्रदान करते हैं। यह पोत बिना किसी रीप्लेनिशमेंट के 2,500 समुद्री मील की विस्तारित रेंज तक संचालन करने में सक्षम है। इसकी प्राथमिक मारक क्षमता रूसी मूल की ख-35 एंटी-शिप क्रूज मिसाइल है। इसके अतिरिक्त, यह आधुनिक सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलों, लंबी दूरी की बंदूकों और आत्म-रक्षा के लिए सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों से लैस है। इस पर चेतक हेलीकॉप्टर के संचालन की सुविधा भी उपलब्ध है, जो इसके सामरिक संचालन में लचीलेपन को बढ़ाती है।
रणनीतिक और सामरिक महत्व
पूर्वी बेड़े के हिस्से के रूप में इस पोत की कंबोडिया यात्रा भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा और विकास के दृष्टिकोण को रेखांकित करती है। यह रणनीतिक तैनाती मित्र देशों के साथ समुद्री सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देने, अंतर-संचालन क्षमता विकसित करने और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आधुनिक सेंसर और अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लैस यह पोत भारतीय नौसेना की तकनीकी आत्मनिर्भरता और समुद्री प्रभाव का प्रतीक है।

जलवायु-अनुकूल मोंठ बीन किस्में और शुष्क कृषि प्रणाली
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI) ने मोंठ बीन की नई जलवायु-अनुकूल किस्में विकसित की हैं। ये किस्में अत्यधिक तापमान, परिवर्तनशील वर्षा और लंबे शुष्क दौर का सामना करने में सक्षम हैं, जो पश्चिमी भारत के मरुस्थलीय क्षेत्रों में खाद्य और पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करती हैं।
सारांश (Summary):
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI) ने मोंठ बीन की नई जलवायु-अनुकूल किस्में विकसित की हैं। ये किस्में अत्यधिक तापमान, परिवर्तनशील वर्षा और लंबे शुष्क दौर का सामना करने में सक्षम हैं, जो पश्चिमी भारत के मरुस्थलीय क्षेत्रों में खाद्य और पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करती हैं।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis):
केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान का नवाचार
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत आने वाले केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI), जोधपुर द्वारा मोंठ बीन की चार नई उन्नत किस्में—CAZRI Moth-4, CAZRI Moth-5, CAZRI Moth-6 और CAZRI Moth-7 विकसित की गई हैं। इन किस्मों को व्यापक शोध और आनुवंशिक सुधार कार्यक्रमों के माध्यम से तैयार किया गया है, जो विशेष रूप से अल नीनो वर्ष के दौरान उत्पन्न होने वाली गंभीर जल कमी और शुष्क परिस्थितियों का प्रभावी ढंग से मुकाबला करती हैं।
मोंठ बीन की वानस्पतिक विशेषताएं और अनुकूलन
वैज्ञानिक रूप से 'विग्ना एकॉन्टिफोलिया' (Vigna aconitifolia) के रूप में जानी जाने वाली मोंठ बीन फैबेसी परिवार से संबंधित एक अत्यंत सहनशील दलहनी फसल है। यह मुख्य रूप से भारत के उत्तर-पश्चिमी शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों विशेषकर राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और महाराष्ट्र में उगाई जाती है। इस पौधे की गहरी पैठ बनाने वाली मूसला जड़ प्रणाली (Taproot system) इसे मिट्टी की निचली परतों से नमी प्राप्त करने में सहायता करती है। इसके अतिरिक्त, इनमें विकासात्मक सुनम्यता (Developmental plasticity) पाई जाती है, जिसके कारण यह पौधे उपलब्ध मृदा नमी के अनुसार अपनी वृद्धि और परिपक्वता को समायोजित कर लेते हैं।
जलवायु संबंधी आवश्यकताएं और कृषि-पारिस्थितिकी महत्व
यह फसल 24 से 32 डिग्री सेल्सियस के तापमान में सर्वोत्तम रूप से विकसित होती है, किंतु 45 डिग्री सेल्सियस तक के उच्च तापमान को भी सहन कर सकती है। यह 200 से 300 मिलीमीटर की न्यूनतम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी जीवित रहने की क्षमता रखती है। मोंठ बीन न केवल शुष्क क्षेत्रों के किसानों के लिए प्रोटीन युक्त दाल और उच्च गुणवत्ता वाला पशुचारा प्रदान करती है, बल्कि यह हरी खाद के रूप में मृदा की उर्वरता बढ़ाकर मरुस्थलीकरण को रोकने और रेत के टीलों को स्थिर करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

सुकन्या समृद्धि vs MF SIP: 15 साल में कहाँ मिलेगा बड़ा फंड?
बेटी के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सही निवेश चुनना हर माता-पिता की पहली प्राथमिकता होती है। 15 साल के दीर्घकालिक निवेश के लिए सुकन्या समृद्धि योजना (SSY) और म्यूचुअल फंड SIP दोनों ही लोकप्रिय विकल्प हैं। सुरक्षा और उच्च रिटर्न के इस संतुलन में कौन सा विकल्प बाजी मारता है, जानिए।
खबर का निचोड़
बेटी के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सही निवेश चुनना हर माता-पिता की पहली प्राथमिकता होती है। 15 साल के दीर्घकालिक निवेश के लिए सुकन्या समृद्धि योजना (SSY) और म्यूचुअल फंड SIP दोनों ही लोकप्रिय विकल्प हैं। सुरक्षा और उच्च रिटर्न के इस संतुलन में कौन सा विकल्प बाजी मारता है, जानिए।
सुकन्या समृद्धि vs MF SIP
जब बात बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और उनकी उच्च शिक्षा के लिए बड़ा कॉर्पस तैयार करने की आती है, तो सही जगह पैसा लगाना सबसे महत्वपूर्ण फैसला होता है। भारतीय बाजार में सुकन्या समृद्धि योजना (SSY) और म्यूचुअल फंड एसआईपी (SIP) दो ऐसे विकल्प हैं, जिन पर सबसे ज्यादा भरोसा जताया जाता है। लेकिन 15 सालों की लंबी अवधि में कौन सा विकल्प आपके पैसे को ज्यादा तेजी से बढ़ा सकता है, इसे आंकड़ों के साथ समझना जरूरी है।
सुकन्या समृद्धि योजना सरकार द्वारा समर्थित एक सुरक्षित बचत योजना है, जो वर्तमान में 8.2% वार्षिक ब्याज दर की गारंटी देती है। यदि आप इसमें हर महीने ₹12,500 यानी सालाना ₹1,50,000 की अधिकतम सीमा तक निवेश करते हैं, तो 15 वर्षों में आपका कुल निवेश ₹22.50 लाख होगा। 8.2% अनुमानित ब्याज दर के हिसाब से इस अवधि में आपको लगभग ₹20.68 लाख का ब्याज यानी रिटर्न मिलेगा। इस तरह 15 साल पूरे होने पर आपका कुल मैच्योरिटी फंड करीब ₹43.18 लाख तैयार हो जाता है। यह योजना उन निवेशकों के लिए बेहतरीन है जो बिना किसी जोखिम के गारंटीड रिटर्न चाहते हैं।
दूसरी तरफ, म्यूचुअल फंड में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए निवेश करना बाजार के जोखिमों के अधीन होता है, लेकिन यह लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन का एक सशक्त जरिया है। अगर आप म्यूचुअल फंड एसआईपी में भी 15 साल तक हर महीने ₹12,500 का निवेश करते हैं, और इस पर औसतन 12% वार्षिक रिटर्न मानकर चलें, तो तस्वीर काफी बदल जाती है।
इस 12% अनुमानित रिटर्न के साथ आपका कुल निवेश तो ₹22.50 लाख ही रहेगा, लेकिन इस पर मिलने वाला अनुमानित रिटर्न उछलकर लगभग ₹36.99 लाख तक पहुंच जाता है। नतीजतन, 15 सालों के बाद आपका कुल मैच्योरिटी फंड ₹59.49 लाख का बन सकता है।
तुलना स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि सुकन्या समृद्धि योजना जहाँ शत-प्रतिशत सुरक्षा और निश्चित ब्याज की गारंटी देती है, वहीं म्यूचुअल फंड एसआईपी में कंपाउंडिंग की ताकत से लगभग ₹16.31 लाख का अतिरिक्त रिटर्न बनाने की क्षमता दिखती है।

ट्रॉफी चोर मोहसिन नकवी का ACC चेयरमैन कार्यकाल कब होगा खत्म
एशियन क्रिकेट काउंसिल (ACC) के चेयरमैन मोहसिन नकवी का दो साल का कार्यकाल अप्रैल 2027 में समाप्त होने जा रहा है। अप्रैल 2025 में कार्यभार संभालने वाले नकवी का कार्यकाल क्रिकेट से ज्यादा भारतीय टीम के साथ हुए विवादों के कारण सुर्खियों में रहा है। एशिया कप की ट्रॉफियों को लेकर पैदा हुआ गतिरोध इस विवाद की मुख्य वजह बना।
खबर का निचोड़
एशियन क्रिकेट काउंसिल (ACC) के चेयरमैन मोहसिन नकवी का दो साल का कार्यकाल अप्रैल 2027 में समाप्त होने जा रहा है। अप्रैल 2025 में कार्यभार संभालने वाले नकवी का कार्यकाल क्रिकेट से ज्यादा भारतीय टीम के साथ हुए विवादों के कारण सुर्खियों में रहा है। एशिया कप की ट्रॉफियों को लेकर पैदा हुआ गतिरोध इस विवाद की मुख्य वजह बना।
विवादों के साए में मोहसिन नकवी का कार्यकाल
एशियन क्रिकेट काउंसिल (ACC) की बागडोर संभालने के बाद से ही मोहसिन नकवी लगातार चर्चा के केंद्र में बने हुए हैं। अप्रैल 2025 में अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी लेने वाले नकवी का 2 साल का निर्धारित कार्यकाल अप्रैल 2027 में समाप्त होगा। हालांकि, मैदान के अंदर क्रिकेट के विकास से ज्यादा, मैदान के बाहर भारतीय क्रिकेट टीम के साथ उनका सीधा टकराव इस पूरे दौर की पहचान बन चुका है।
पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) के प्रमुख होने के साथ-साथ ACC की अध्यक्षता कर रहे नकवी के कार्यकाल को खेल से ज्यादा प्रशासनिक खींचातानी के रूप में देखा जा रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से जारी राजनीतिक और खेल तनाव को नकवी के कुछ फैसलों ने और अधिक हवा देने का काम किया।
'ट्रॉफी विवाद' से बना बड़ा गतिरोध
मोहसिन नकवी के कार्यकाल का सबसे विवादित पहलू भारतीय क्रिकेट टीम के साथ हुआ 'ट्रॉफी विवाद' रहा। यह विवाद तब खुलकर सामने आया जब 2025 में आयोजित पुरुष एशिया कप के दौरान भारतीय टीम ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। मैच खत्म होने के बाद जब प्राइज डिस्ट्रीब्यूशन सेरेमनी की बारी आई, तब भारतीय टीम ने ACC चेयरमैन मोहसिन नकवी के हाथों ट्रॉफी स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया।
भारतीय टीम का यह कड़ा रुख सिर्फ एक टूर्नामेंट तक सीमित नहीं रहा। इसके ठीक बाद 2026 में आयोजित महिला एशिया कप में भी बिल्कुल ऐसा ही नजारा देखने को मिला। भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने भी चैंपियन बनने के बाद नकवी से ट्रॉफी लेने से परहेज किया। लगातार दो बड़े टूर्नामेंट्स में एशियाई चैंपियन टीमों द्वारा इस तरह का बहिष्कार झेलने के बाद सोशल मीडिया और क्रिकेट गलियारों में नकवी को 'ट्रॉफी चोर' जैसे तंज कसते हुए जमकर ट्रोल किया गया।
कार्यकाल के आखिरी पड़ाव पर टिकीं नजरें
नकवी का कार्यकाल अप्रैल 2027 तक चलने वाला है, लेकिन क्रिकेट प्रशासकों के बीच उनकी साख पर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। ACC के इतिहास में ऐसा पहली बार देखा गया जब एशियाई क्रिकेट की सबसे बड़ी संस्था के प्रमुख को ही विजेता टीम ट्रॉफी देने से इनकार कर रही हो।
भारत और ACC के बीच की यह तल्खी एशियाई क्रिकेट के भविष्य के लिहाज से भी चिंताजनक मानी जा रही है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अपने कार्यकाल के बाकी बचे समय में नकवी इस कड़वाहट को कम करने की कोई कोशिश करते हैं या फिर विवादों का यह सिलसिला 2027 में उनकी विदाई तक यूं ही जारी रहेगा।
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