
ब्रिक्स एजेंडा और वैश्विक कूटनीति में भारत की रणनीतिक भूमिका
ब्रिक्स समूह का वर्तमान एजेंडा भू-राजनीतिक तनावों और वैश्विक आर्थिक सुधार के दौर से गुजर रहा है। भारत के समक्ष मध्य पूर्व संघर्ष और रूस-украina युद्ध के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाने, बहुपक्षीय मंचों पर वैश्विक दक्षिण की आवाज बुलंद करने और वित्तीय संस्थानों में व्यापक सुधार लाने की दोहरी चुनौती है।
सारांश
ब्रिक्स समूह का वर्तमान एजेंडा भू-राजनीतिक तनावों और वैश्विक आर्थिक सुधार के दौर से गुजर रहा है। भारत के समक्ष मध्य पूर्व संघर्ष और रूस-украina युद्ध के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाने, बहुपक्षीय मंचों पर वैश्विक दक्षिण की आवाज बुलंद करने और वित्तीय संस्थानों में व्यापक सुधार लाने की दोहरी चुनौती है।
भू-राजनीतिक चुनौतियाँ और कूटनीतिक संतुलन
समकालीन वैश्विक परिदृश्य में ईरान-इजराइल-अमेरिका संघर्ष और रूस-украina युद्ध अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्थिरता के लिए गंभीर संकट उत्पन्न कर रहे हैं। इन संघर्षों के बीच भारत की विदेश नीति रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांतों पर आधारित है, जो विभिन्न विरोधी ध्रुवों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की मांग करती है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान एक संयुक्त घोषणा-पत्र जारी करना भारत के राजनयिक कौशल की कड़ी परीक्षा होगी, क्योंकि सदस्य देशों के बीच इन वैश्विक मुद्दों पर मतभेद स्पष्ट रूप से मौजूद हैं।
रूस और चीन के शीर्ष नेतृत्व की यात्राएं भारत को उच्च स्तरीय द्विपक्षीय और बहुपक्षीय परामर्श के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करती हैं। इन वार्ताओं का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि क्षेत्रीय संघर्षों की छाया ब्रिक्स के व्यापक आर्थिक और विकासात्मक एजेंडे को प्रभावित न कर सके। भारत पारंपरिक रूप से किसी भी गुटबंदी का समर्थन करने से बचता आया है और इस मंच का उपयोग शांति स्थापना, संवाद और कूटनीतिक समाधान के पक्ष में वैश्विक जनमत तैयार करने के लिए करता है।
बहुपक्षीय वित्तीय सुधार और न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका
वैश्विक वित्तीय वास्तुकला में सुधार ब्रिक्स एजेंडे का एक केंद्रीय स्तंभ रहा है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान, जैसे कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक, समकालीन बहुध्रुवीय दुनिया की आर्थिक वास्तविकताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। ब्रिक्स मंच लंबे समय से इन संस्थाओं में मतदान सुधारों और कोटा पुनर्गठन की मांग करता रहा है ताकि विकासशील देशों को उचित निर्णय लेने की शक्ति मिल सके।
न्यू डेवलपमेंट बैंक ब्रिक्स देशों द्वारा स्थापित एक महत्वपूर्ण विकल्प है, जिसका उद्देश्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं में बुनियादी ढांचे और सतत विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करना है। इस बैंक को मजबूत करने की दिशा में पूंजी आधार का विस्तार करना, नई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को सदस्य के रूप में शामिल करना और पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों पर निर्भरता कम करना प्राथमिकता है। भारत इस दिशा में एक अधिक समावेशी और पारदर्शी वैश्विक वित्तीय प्रणाली के निर्माण की वकालत करता है जो विकासशील देशों के हितों की रक्षा कर सके।
लचीली आपूर्ति श्रृंखला और स्थानीय मुद्रा में व्यापार
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में हालिया व्यवधानों ने अर्थव्यवस्थाओं की संवेदनशीलता को उजागर किया है, जिससे लचीली और सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखलाओं का विकास आवश्यक हो गया है। ब्रिक्स सदस्य देश व्यापारिक बाधाओं को कम करने, रसद लागत को अनुकूलित करने और व्यापारिक प्रक्रियाओं को डिजिटल बनाने पर जोर दे रहे हैं। इसके साथ ही, अमेरिकी डॉलर पर वैश्विक व्यापार की अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए स्थानीय मुद्राओं में द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देना एक प्रमुख रणनीतिक लक्ष्य बन गया है।
स्थानीय मुद्रा भुगतान प्रणालियों के विकास से न केवल विनिमय दर के जोखिमों से राहत मिलती है, बल्कि पश्चिमी प्रतिबंधों के प्रभाव से भी अर्थव्यवस्थाओं को सुरक्षा मिलती है। भारत अपने राष्ट्रीय भुगतान निगम के माध्यम से डिजिटल भुगतान अवसंरचना के अनुभवों को अन्य सदस्य देशों के साथ साझा कर रहा है। इससे सीमा पार लेन-देन अधिक सुगम और सुरक्षित हो रहे हैं, जो अंततः अंतर-ब्रिक्स व्यापार को नई गति प्रदान करते हैं।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और स्वास्थ्य सहयोग
डिजिटल समावेशन के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां वैश्विक स्तर पर एक मिसाल बन चुकी हैं। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, पहचान प्रणालियों और डिजिटल भुगतान के मोर्चों पर भारत के मॉडलों को ब्रिक्स मंच के माध्यम से अन्य विकासशील देशों तक पहुंचाया जा रहा है। यह सहयोग ग्लोबल साउथ के देशों को उनकी अपनी डिजिटल अर्थव्यवस्था के निर्माण और वित्तीय समावेशन को तेजी से प्राप्त करने में सक्षम बनाता है।
स्वास्थ्य सुरक्षा के क्षेत्र में कोविड-19 महामारी के अनुभवों से सबक लेते हुए ब्रिक्स देशों के बीच टीकों के अनुसंधान, उत्पादन और वितरण के लिए सुदृढ़ तंत्र विकसित करने पर सहमति बन रही है। पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के आदान-प्रदान और स्वास्थ्य अनुसंधान नेटवर्क को मजबूत करने से सामूहिक जनस्वास्थ्य क्षमताओं में वृद्धि होती है। यह सहयोग न केवल आपातकालीन स्वास्थ्य संकटों से निपटने में सहायक है, बल्कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
जलवायु वित्त, critical minerals और समावेशी कनेक्टिविटी
जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से निपटने के लिए जलवायु वित्त की आवश्यकता ब्रिक्स एजेंडे का एक अनिवार्य हिस्सा है। विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को तकनीक और वित्तीय सहायता हस्तांतरित करने की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए ब्रिक्स मंच एक मजबूत दबाव समूह के रूप में कार्य करता है। भारत अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप नवीकरणीय ऊर्जा और सतत विकास के एजेंडे को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ा रहा है।
भविष्य की हरित प्रौद्योगिकियों और विनिर्माण क्षेत्रों के लिए क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन खनिजों पर कुछ देशों की एकाधिकारवादी स्थिति को तोड़ने और पारदर्शी तथा सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखलाओं का निर्माण करने के लिए ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग की अपार संभावनाएं हैं। इसके साथ ही, भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं से परे हटकर समावेशी कनेक्टिविटी परियोजनाओं को बढ़ावा देना क्षेत्रीय एकीकरण को मजबूत करता है और आर्थिक विकास के नए द्वार खोलता है।

राजनीतिक वित्तपोषण और पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल: चुनौतियाँ और सुधार
भारत में पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल (RUPPs) चुनावी लोकतंत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए थे, परंतु विधिक कमियों और कमजोर अनुपालन के कारण ये अपारदर्शी चंदे और कर छूट प्राप्त करने का जरिया बन चुके हैं। निर्वाचन आयोग को अधिक अधिकार देने और चंदे की कर छूट को एक तर्कसंगत वोट शेयर से जोड़ने की आवश्यकता है।
सारांश
भारत में पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल (RUPPs) चुनावी लोकतंत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए थे, परंतु विधिक कमियों और कमजोर अनुपालन के कारण ये अपारदर्शी चंदे और कर छूट प्राप्त करने का जरिया बन चुके हैं। निर्वाचन आयोग को अधिक अधिकार देने और चंदे की कर छूट को एक तर्कसंगत वोट शेयर से जोड़ने की आवश्यकता है।
भारतीय दलीय प्रणाली में राजनीतिक दलों का वर्गीकरण और RUPP की स्थिति
भारतीय चुनावी लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को मुख्य रूप से मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दलों, मान्यता प्राप्त राज्य दलों और पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (RUPPs) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत पंजीकृत होने वाले वे दल RUPP की श्रेणी में आते हैं, जो राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त करने के लिए आवश्यक मतों या सीटों के न्यूनतम मानदंडों को पूरा नहीं कर पाते। इन दलों की संख्या में पिछले कुछ दशकों में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है।
आरंभ में इस श्रेणी का उद्देश्य छोटे और नए राजनीतिक समूहों को चुनावी प्रक्रियाओं में भाग लेने और अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए एक मंच प्रदान करना था। हालांकि, समय के साथ यह व्यवस्था विधिक सरलता और कमजोर अनुपालन तंत्र के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। वर्तमान में बड़ी संख्या में ऐसे दल पंजीकृत हैं जो सक्रिय राजनीति या चुनावों से दूर रहकर केवल वित्तीय लाभ और विधिक संरक्षण प्राप्त करने का माध्यम बन चुके हैं।
RUPPs को मिलने वाले प्रशासनिक और वित्तीय विशेषाधिकार
पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद RUPPs को भारतीय निर्वाचन आयोग और आयकर कानूनों के अंतर्गत कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और वित्तीय विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। इन दलों को लोकसभा या राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान अपने उम्मीदवारों के लिए एक 'सामान्य प्रतीक' (Common Symbol) आवंटित कराने की सुविधा मिलती है, जिससे उनके लिए मतदाताओं के बीच पहचान बनाना आसान होता है। इसके अलावा, ये दल चुनाव प्रचार के लिए अपने स्टार प्रचारकों की सूची में अधिकतम 20 सदस्यों को शामिल कर सकते हैं।
वित्तीय मोर्चे पर, इन दलों को मिलने वाले चंदे पर आयकर कानूनों के तहत कर छूट का प्रावधान है। राजनीतिक दलों को मिलने वाला यह वित्तीय संरक्षण उन्हें अपने संसाधनों को बढ़ाने में सहायता करता है। यद्यपि कानून के अनुसार उन्हें 20,000 रुपये से अधिक के चंदे का हिसाब और दानदाताओं का विवरण निर्वाचन आयोग को देना होता है तथा 2,000 रुपये से अधिक का नकद चंदा स्वीकार करने पर प्रतिबंध है, परंतु अधिकांश स्तरों पर इसका कड़ाई से पालन नहीं होता है।
अपारदर्शी वित्तपोषण और कर छूट का दुरुपयोग
RUPPs के संदर्भ में सबसे गंभीर चिंता का विषय काले धन को सफेद करने और कर छूट प्राप्त करने के लिए इनका एक साधन के रूप में उपयोग किया जाना है। चूंकि भारत में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर कर में व्यापक छूट मिलती है, इसलिए कई संस्थाएं और व्यक्ति अपने अघोषित धन को राजनीतिक चंदे के रूप में इन दलों को हस्तांतरित कर देते हैं। इसके बदले में बड़ी मात्रा में धन अवैध माध्यमों से वापस प्राप्त कर लिया जाता है, जिससे यह व्यवस्था कर चोरी का एक समानांतर तंत्र बन जाती है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और अन्य विधिक निगरानी संस्थाओं की रिपोर्टों से यह बार-बार उजागर हुआ है कि एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे दलों का होता है जो या तो अपने वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट और अंशदान विवरण (Contribution Reports) समय पर दाखिल नहीं करते या फिर धरातल पर उनका कोई अस्तित्व ही नहीं होता। इसके बावजूद, वे आयकर अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत करोड़ों रुपये की कर छूट का लाभ उठाने में सफल रहते हैं।
निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र और विधिक विसंगतियां
भारतीय निर्वाचन आयोग के पास राजनीतिक दलों के पंजीकरण की शक्ति तो है, परंतु जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत एक बार किसी दल का पंजीकरण हो जाने के बाद आयोग के पास उसे सूची से हटाने (De-register) का कोई स्पष्ट और प्रभावी वैधानिक अधिकार नहीं है। आयोग राजनीतिक दलों के नाम, पते या पदाधिकारियों में बदलाव न होने पर कार्रवाई करने की कोशिश करता है, लेकिन कानूनी जटिलताओं के कारण यह प्रक्रिया बेहद धीमी और पेचीदा साबित होती है।
दूसरी मुख्य समस्या प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी है। निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों के रजिस्टर का रखरखाव करता है, जबकि वित्तीय लेन-देन और कर छूट का मामला आयकर विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है। दोनों संस्थाओं के बीच सूचनाओं और कार्रवाई के स्तर पर तालमेल के अभाव में एक एजेंसी द्वारा की गई कार्रवाई का स्वतः प्रभाव दूसरी एजेंसी पर नहीं पड़ता, जिसका लाभ उठाकर अनियमितताएं करने वाले दल कानून की पकड़ से बाहर बने रहते हैं।
प्रतीक आवंटन और चुनावी सहभागिता के मानदंड
चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के अंतर्गत RUPPs को सामान्य प्रतीक प्राप्त करने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी होती हैं। इसके तहत दलों को संबंधित राज्य विधानसभा चुनाव में कुल सीटों के कम से कम पांच प्रतिशत हिस्से पर अपने उम्मीदवार उतारने का आश्वासन या पूर्व प्रदर्शन दिखाना होता है। इसके अतिरिक्त, प्रतीक के निरंतर आवंटन के लिए पिछले चुनावों में एक निश्चित मत प्रतिशत प्राप्त करने की शर्त भी लागू होती है।
परंतु यह देखा गया है कि कई दल केवल सांकेतिक रूप से कुछ सीटों पर उम्मीदवार खड़े करके इन शर्तों को पूरा कर लेते हैं और चुनाव के बाद पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं। इससे चुनावी मैदान में अनावश्यक रूप से दलों की भीड़ बढ़ जाती है और वास्तविक रूप से सक्रिय दलों तथा मतदाताओं के लिए भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। टोकन उम्मीदवारी के इस चलन ने प्रतीक आवंटन और राजनीतिक मान्यता के मौजूदा मानदंडों की प्रभावशीलता को कमजोर कर दिया है।
कर छूट को चुनावी सफलता और मत प्रतिशत से जोड़ने की आवश्यकता
राजनीतिक वित्तपोषण में शुचिता लाने के लिए नीति निर्माताओं और निर्वाचन आयोग द्वारा यह सुधारात्मक सुझाव दिया गया है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाली कर छूट को उनके वास्तविक चुनावी प्रदर्शन से जोड़ा जाना चाहिए। वर्तमान में RUPPs को केवल कागजी पंजीकरण के आधार पर ही कर छूट मिल जाती है, भले ही वे किसी भी चुनाव में एक भी वोट हासिल करने में असफल क्यों न रहे हों।
इस दिशा में एक प्रभावी उपाय यह हो सकता है कि कर छूट की पात्रता के लिए एक निश्चित और तर्कसंगत वैध मत शेयर (Vote Share) या लोकसभा अथवा विधानसभा चुनावों में सीटों की जीत की शर्त को अनिवार्य बना दिया जाए। जिस प्रकार प्रतीक आवंटन के लिए 1% मत का प्रावधान आंशिक रूप से मौजूद है, उसी तर्ज पर कर लाभों को केवल उन्हीं दलों तक सीमित किया जाना चाहिए जो चुनाव में जनता का एक न्यूनतम समर्थन प्राप्त करने में सफल होते हैं। इससे केवल गंभीर और जन-सहभागिता वाले दल ही वित्तीय लाभ प्राप्त कर सकेंगे और गैर-गंभीर एवं मुखौटा दलों का प्रसार रुकेगा।
विधिक सुधार और जवाबदेही तय करने के उपाय
राजनीतिक वित्तपोषण के इस ढांचे को दुरुस्त करने के लिए जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में व्यापक संशोधन की आवश्यकता है। सबसे पहले, निर्वाचन आयोग को यह स्पष्ट विधिक अधिकार मिलना चाहिए कि यदि कोई राजनीतिक दल लगातार एक निश्चित अवधि तक किसी भी चुनाव में भाग नहीं लेता है या अपने वित्तीय रिटर्न दाखिल नहीं करता है, तो उसका पंजीकरण स्वतः समाप्त (Lapse) माना जाए।
दूसरा, चंदे के प्रकटीकरण की सीमा और बैंकिंग चैनलों के माध्यम से होने वाले लेन-देन के नियमों को अधिक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। अनाम स्रोतों से मिलने वाले चंदे पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए और प्रत्येक प्राप्ति का अंकेक्षित विवरण समय पर सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध होना अनिवार्य किया जाना चाहिए। आयकर विभाग और निर्वाचन आयोग को एक साझा डिजिटल मंच पर लाकर सख्त मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करना होगा ताकि नियमों का उल्लंघन करने वाले दलों की पहचान तुरंत हो सके और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक तथा दंडात्मक कार्रवाई की जा सके।

डिजिटल भारत निधि: संरचना, उद्देश्य और संशोधित भारतनेट कार्यक्रम
दूरसंचार विभाग के अधीन संचालित डिजिटल भारत निधि ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में सार्वभौमिक दूरसंचार सेवा सुनिश्चित करने वाला एक प्रमुख निकाय है। यह टेलीकम्युनिकेशन एक्ट, 2023 के तहत पुराने यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड का नया स्वरूप है, जो आधुनिक तकनीकी विकास और डिजिटल समावेश को गति देता है।
सारांश
दूरसंचार विभाग के अधीन संचालित डिजिटल भारत निधि ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में सार्वभौमिक दूरसंचार सेवा सुनिश्चित करने वाला एक प्रमुख निकाय है। यह टेलीकम्युनिकेशन एक्ट, 2023 के तहत पुराने यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड का नया स्वरूप है, जो आधुनिक तकनीकी विकास और डिजिटल समावेश को गति देता है।
विधिक पृष्ठभूमि एवं प्रशासनिक ढांचा
डिजिटल भारत निधि (DBN) की स्थापना भारतीय टेलीकम्युनिकेशन एक्ट, 2023 के प्रावधानों के अंतर्गत की गई है। यह दूरसंचार विभाग (DoT), संचार मंत्रालय के तहत एक संलग्न कार्यालय के रूप में कार्य करता है। इस निधि का प्रशासन केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक प्रशासक द्वारा संचालित किया जाता है। प्रशासनिक प्रक्रियाओं के तहत प्रशासक विभिन्न योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु पारदर्शी तरीके से बोलियों या पात्र आवेदनों के माध्यम से कार्यान्वयनकर्ताओं का चयन करता है। यह व्यवस्था देश के वंचित ग्रामीण, दूरस्थ और शहरी क्षेत्रों में आधुनिक डिजिटल बुनियादी ढांचे के विकास को विधिक और प्रशासनिक मजबूती प्रदान करती है।
वित्तीय तंत्र एवं निधि का प्रबंधन
डिजिटल भारत निधि के लिए दूरसंचार कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले अंशदान को सबसे पहले भारत की संचित निधि में जमा किया जाता है। इसके उपरांत संसद द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से इन्हें इस निधि में आवंटित किया जाता है। इस वित्तीय तंत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वित्तीय वर्ष के अंत में निधि में शेष बची हुई राशि व्यपगत (lapse) नहीं होती है, जिससे दीर्घकालिक परियोजनाओं के लिए वित्तीय निरंतरता बनी रहती है। इन संसाधनों का उपयोग देश के हर कोने में सुलभ और किफायती दूरसंचार सेवाएं पहुंचाने के लिए किया जाता है।
प्रमुख उद्देश्य एवं संशोधित भारतनेट कार्यक्रम
इस निधि का मुख्य अधिदेश ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में दूरसंचार सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुंच को बढ़ावा देना है। इसके दायरे में केवल बुनियादी कनेक्टिविटी का विस्तार ही नहीं, बल्कि दूरसंचार सेवाओं, अत्याधुनिक तकनीकों और उत्पादों के अनुसंधान एवं विकास (R&D) को समर्थन देना भी शामिल है। इसके अतिरिक्त, यह निधि विभिन्न पायलट प्रोजेक्ट्स, परामर्श सहायता और नवीन तकनीकों के प्रायोगिक प्रसार को वित्तीय सहायता प्रदान करती है। हाल ही में इस फ्रेमवर्क के अंतर्गत संशोधित भारतनेट कार्यक्रम (ABP) के क्रियान्वयन को गति दी गई है, जिसका उद्देश्य देश की ग्राम पंचायतों और गांवों को भविष्य की जरूरतों के अनुकूल मजबूत और तीव्र ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी से जोड़ना है।

भारत-अमेरिका सैन्य अभ्यास 'युद्ध अभ्यास 2026' के विविध आयाम
भारत और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की सेनाओं के बीच द्विविद्वर्षीय संयुक्त सैन्य अभ्यास 'युद्ध अभ्यास' का 22वां संस्करण आरंभ हो चुका है। यह रणनीतिक अभ्यास दोनों देशों के बीच रक्षा कूटनीति, सैन्य सहयोग और पारंपरिक-गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने की साझा प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करता है। इसकी शुरुआत दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों को प्रगाढ़ करने और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के उद्देश्य से की गई थी।
परिचय एवं पृष्ठभूमि
भारत और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की सेनाओं के बीच द्विविद्वर्षीय संयुक्त सैन्य अभ्यास 'युद्ध अभ्यास' का 22वां संस्करण आरंभ हो चुका है। यह रणनीतिक अभ्यास दोनों देशों के बीच रक्षा कूटनीति, सैन्य सहयोग और पारंपरिक-गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने की साझा प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करता है। इसकी शुरुआत दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों को प्रगाढ़ करने और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के उद्देश्य से की गई थी।
सामरिक अवस्थिति एवं भौगोलिक चरण
इस वर्ष का सैन्य अभ्यास दो विशिष्ट भौगोलिक चरणों में विभाजित है। पहला चरण राजस्थान के महाजान फील्ड फायरिंग रेंज में पाकिस्तान सीमा के निकट आयोजित किया जा रहा है, जहाँ मरुस्थलीय युद्धकौशल का परीक्षण होगा। इसके पश्चात, सैन्य टुकड़ियाँ उत्तराखंड के औली में उच्च तुंगता वाले पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानांतरित होंगी, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा के निकट स्थित है। यह विविधता दोनों देशों की सेनाओं को रेगिस्तानी और उच्च-तुंगता दोनों प्रकार के जटिल ভূ-भागों में संयुक्त रूप से अभियान चलाने की क्षमता प्रदान करती है।
तकनीकी एकीकरण एवं नवाचार
वर्तमान संस्करण में आधुनिक युद्धक तकनीकों और विशेषबलों की भागीदारी पर विशेष बल दिया गया है। इसमें अमेरिकी सेना के अलास्का स्थित 11वें एयरबोर्न डिवीजन के आर्कटिक-प्रशिक्षित सैनिकों के साथ-साथ तीसरी मल्टी-डोमेन टास्क फोर्स की हिस्सेदारी शामिल है। युद्धाभ्यास के दौरान लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता, आधुनिक कमान और नियंत्रण प्रणालियों तथा काउंटर-ड्रोन क्षमताओं का एकीकरण किया जा रहा है। विशेष रूप से, मोबाइल लो, स्लो, स्मॉल अनमैंड एयरक्राफ्ट इंटीग्रेटेड डिफीट सिस्टम (MLIDS) की तैनाती से आधुनिक युद्धक्षेत्र के उभरते खतरों से निपटने की संयुक्त क्षमता मजबूत होती है।
अन्य द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय रक्षा अभ्यास
भारत और अमेरिका के मध्य सामरिक समन्वय को मजबूत करने वाले अन्य प्रमुख सैन्य अभ्यासों में वज्र प्रहार (विशेष बल), कोप इंडिया (वायु सेना), और टाइगर ट्रायम्फ (त्रि-सेवा मानवीय सहायता और आपदा राहत अभ्यास) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, मालाबार अभ्यास में भारतीय नौसेना और अमेरिकी नौसेना के साथ जापान तथा ऑस्ट्रेलिया भी शामिल होते हैं, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बहुपक्षीय सुरक्षा वास्तुकला को सुदृढ़ करते हैं।

ऐतिहासिक गूठी किले की वास्तुकला, इतिहास और डाक टिकट प्रस्ताव
आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में स्थित प्राचीन गूठी किला अपनी विशिष्ट हिंदू-इस्लामी वास्तुकला और समृद्ध रणनीतिक इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। हाल ही में संचार मंत्रालय द्वारा इस ऐतिहासिक दुर्ग पर एक विशेषस्मारकीय डाक टिकट जारी करने का प्रस्ताव अंतिम अनुमोदन हेतु प्रेषित किया गया है।
ऐतिहासिक गूठी किले की वास्तुकला, इतिहास और डाक टिकट प्रस्ताव
सारांश (Summary):
आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में स्थित प्राचीन गूठी किला अपनी विशिष्ट हिंदू-इस्लामी वास्तुकला और समृद्ध रणनीतिक इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। हाल ही में संचार मंत्रालय द्वारा इस ऐतिहासिक दुर्ग पर एक विशेषस्मारकीय डाक टिकट जारी करने का प्रस्ताव अंतिम अनुमोदन हेतु प्रेषित किया गया है।
विस्तृत विश्लेषण:
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गूठी किला, जिसे रवादुर्ग और गुट्टी कोटा के नाम से भी जाना जाता है, अनंतपुर जिले की एक प्रमुख पहाड़ी संरचना है। यहाँ प्राप्त शिलालेख पश्चिमी चालुक्य शासक विक्रमादित्य षष्ठम के शासनकाल से संबंधित हैं। ग्यारहवीं शताब्दी में चालुक्यों और चोल शासक वीर राजेंद्र के बीच यहाँ एक भीषण संघर्ष हुआ था। बाद में यह क्षेत्र विजयनगर साम्राज्य के अधीन आया और प्रतापी राजा कृष्णदेवराय का निवास स्थान रहा। इसके पश्चात कुतुबशाही वंश, मुगल साम्राज्य, मराठा जनरल मुरारी राव, मैसूर के शासक हैदर अली और अंततः ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में यह किला हस्तांतरित हुआ।
वास्तुकला और सामरिक विशेषताएँ
यह दुर्ग हिंदू-इस्लामी वास्तुकला का एक उत्कृष्ट समन्वय प्रस्तुत करता है। ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित और चूने-गारे से सुसज्जित इस किले की संरचना शंख के आकार की है, जिसके भीतर पंद्रह छोटे किले और विभिन्न प्रवेश द्वार अवस्थित हैं। किले के ऊपरी हिस्से में स्थित 'मुरारी राव सीट' नामक पॉलिश किए गए चूना पत्थर का मंडप पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों का मुख्य आकर्षण है। इसके अतिरिक्त, शिखर पर जल संकट से निपटने के लिए कई कुओं का निर्माण किया गया था।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
इस ऐतिहासिक परिसर के भीतर कई प्राचीन मंदिर और एक दरगाह विद्यमान हैं। धार्मिक स्थलों में लक्ष्मी नरसिंह मंदिर, नागेश्वर स्वामी मंदिर, हनुमान मंदिर, ज्योतिम्मा मंदिर और रामस्वामी मंदिर प्रमुख हैं। किले के ऊपरी स्तर पर स्थित ये विभिन्न संरचनाएं इस क्षेत्र के बहुसांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास की पुष्टि करती हैं। हाल ही में इस ऐतिहासिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित करने के लिए स्मारक डाक टिकट का प्रस्ताव तैयार किया गया है।
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