
पीएम पद की रेस में मोदी आगे, तमिलनाडु के सीएम विजय तीसरे नंबर पर
ताजा सर्वे के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की जनता की पहली पसंद बने हुए हैं। हालांकि, इस बार के आंकड़ों में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है, जहां तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हुए सीधे तीसरे स्थान पर कब्जा जमा लिया है।
ताजा सर्वे के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की जनता की पहली पसंद बने हुए हैं। हालांकि, इस बार के आंकड़ों में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है, जहां तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हुए सीधे तीसरे स्थान पर कब्जा जमा लिया है।
राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज
देश की सियासत में कौन किस पर भारी पड़ रहा है, इसका फैसला जनता वक्त-वक्त पर करती है। सी-वोटर और इंडिया टुडे के ताजा सर्वे ने राजनीतिक तापमान को एक बार फिर बढ़ा दिया है। इस सर्वे के आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति की बिसात पर कौन से चेहरे मुख्य भूमिका निभाने वाले हैं।
मोदी का दबदबा बरकरार
इस देशव्यापी सर्वे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर अपनी लोकप्रियता का लोहा मनवाया है। आज भी देश के 49 प्रतिशत लोग उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी पहली पसंद मानते हैं। मजबूत प्रशासनिक पकड़ और जनता के बीच उनकी पैठ उन्हें इस पायदान पर सबसे आगे रखती है। विरोधी चाहे जितनी भी घेराबंदी कर लें, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी लोकप्रियता का ग्राफ अभी भी सबसे ऊंचा बना हुआ है।
राहुल गांधी दूसरे स्थान पर
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी इस सर्वे में 27 प्रतिशत समर्थन के साथ दूसरे पायदान पर काबिज हैं। भारत जोड़ो यात्रा और उसके बाद के राजनीतिक अभियानों से उनकी छवि में आए बदलाव ने उनके समर्थकों को एकजुट किया है। हालांकि, वह मोदी से अभी भी काफी पीछे हैं, लेकिन मुख्य विपक्षी चेहरे के तौर पर उनकी स्थिति इस सर्वे में स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई है।
तमिलनाडु के सीएम विजय की धमाकेदार एंट्री
इस पूरे सर्वे का सबसे बड़ा चौंकाने वाला और चर्चित पहलू तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय की मौजूदगी है। राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा से अलग अपनी एक नई पहचान बनाने वाले विजय को 9 प्रतिशत लोगों ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना है। इस आंकड़े के साथ वह सीधे तीसरे स्थान पर पहुंच गए हैं। दक्षिण भारत के इस नेता की बढ़ती लोकप्रियता यह संकेत दे रही है कि आने वाले दिनों में वह राष्ट्रीय पटल पर एक बड़ा विकल्प बनकर उभर सकते हैं।
जनता का मूड और भविष्य की सियासत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आंकड़े केवल एक सर्वे तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह बदलते भारत की जनभावनाओं का आईना हैं। एक तरफ जहां पारंपरिक राजनीतिक चेहरे अपनी जमीन बचाने की कोशिश में हैं, वहीं क्षेत्रीय क्षत्रपों का राष्ट्रीय राजनीति की ओर कदम बढ़ाना इस बात का संकेत है कि आने वाला चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प और त्रिकोणीय होने की पूरी संभावना रखता है।

राजनीति के मैदान में उतरने से पहले ही फंस गया पेंच, क्या सच में पार्टी बनेगी CJP?
इंडिया टुडे के 'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे के ताजे आंकड़ों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। क्या CJP यानी मुख्य न्यायाधीश (या उससे जुड़े संगठन/मुद्दे) को राजनीति में उतरना चाहिए और क्या जनता उन्हें वोट देगी? इस तीखे सवाल पर जनता की मिली-जुली और दिलचस्प प्रतिक्रिया सामने आई है।
इंडिया टुडे के 'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे के ताजे आंकड़ों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। क्या CJP यानी मुख्य न्यायाधीश (या उससे जुड़े संगठन/मुद्दे) को राजनीति में उतरना चाहिए और क्या जनता उन्हें वोट देगी? इस तीखे सवाल पर जनता की मिली-जुली और दिलचस्प प्रतिक्रिया सामने आई है।
राजनीति में एंट्री और जनता का मूड
भारतीय राजनीति का पारा एक नए और चौंकाने वाले सवाल पर गरमा गया है। क्या न्यायपालिका या उससे जुड़े प्रमुख चेहरे चुनावी मैदान में उतर सकते हैं? 'अगर CJP चुनाव लड़ती है तो क्या उन्हें वोट देंगे' इस सीधे सवाल पर देश की जनता दो स्पष्ट ध्रुवों में बंटती नजर आई है। ताजा सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, 33 प्रतिशत लोगों ने इसके पक्ष में 'हां' कहकर सबको चौंका दिया है, जबकि 43 प्रतिशत लोगों ने साफ तौर पर 'ना' कह दिया है। यह आंकड़ा यह बताने के लिए काफी है कि इस संभावित राजनीतिक प्रविष्टि को लेकर लोगों के मन में संशय भी है और उत्सुकता भी।
प्रेशर ग्रुप या राजनीतिक पार्टी, क्या चाहती है जनता
दूसरा सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या ऐसी संस्थाओं या मंचों को एक राजनीतिक पार्टी के रूप में खुद को स्थापित करना चाहिए या फिर एक दबाव समूह (प्रेशर ग्रुप) के रूप में ही काम करते रहना चाहिए। इस मोर्चे पर भी जनता की राय काफी स्पष्ट रही। करीब 39 प्रतिशत लोगों का मानना है कि इसे राजनीति के दलदल में उतरने के बजाय एक मजबूत 'प्रेशर ग्रुप' बने रहना चाहिए। वहीं, सिर्फ 26 प्रतिशत लोगों ने इसे एक राजनीतिक पार्टी का रूप देने पर अपनी सहमति जताई। बाकी के लोगों ने इस पर चुप्पी साध रखी है या वे किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं।
भविष्य के सियासी समीकरणों पर असर
इन आंकड़ों के गहरे मायने हैं। लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर और राजनीति के अखाड़े के बीच की रेखाएं जब भी धुंधली होती हैं, देश की जनता तीखी प्रतिक्रिया देती है। एक तरफ जहां एक तिहाई मतदाता इस विकल्प के लिए तैयार दिखते हैं, वहीं बड़ा बहुमत अभी भी इसे राजनीति से दूर रखकर एक स्वतंत्र दबाव समूह के रूप में देखना चाहता है। जैसे-जैसे चुनावों का वक्त नजदीक आएगा, इस तरह के सर्वे इस बात की तस्दीक करेंगे कि जनता देश के भविष्य को किस रूप में देखना चाहती है। राजनीतिक दलों के रणनीतिकार भी इन आंकड़ों को बारीकी से खंगाल रहे हैं ताकि भविष्य के सियासी समीकरणों को साधा जा सके।

लोकसभा सीटों को 25 साल तक स्थिर रखने की मांग, खड़गे का पीएम को पत्र
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर लोकसभा सीटों की संख्या अगले 25 वर्षों तक स्थिर रखने की मांग की है। 131वें संशोधन विधेयक, 2026 के विरोध में उन्होंने परिसीमन प्रक्रिया पर तत्काल सर्वदलीय बैठक बुलाने का आग्रह किया है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर लोकसभा सीटों की संख्या अगले 25 वर्षों तक स्थिर रखने की मांग की है। 131वें संशोधन विधेयक, 2026 के विरोध में उन्होंने परिसीमन प्रक्रिया पर तत्काल सर्वदलीय बैठक बुलाने का आग्रह किया है।
परिसीमन पर सियासी संग्राम और खड़गे की आपत्ति
संसदीय राजनीति में एक बार फिर परिसीमन और सीटों के परिसीमन को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक कड़ा पत्र लिखकर राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। खड़गे ने मांग की है कि लोकसभा की वर्तमान 543 सीटों की संख्या को अगले 25 साल तक बिल्कुल स्थिर रखा जाए। उनका तर्क है कि यदि समय से पहले सीटों का पुनर्गठन या परिसीमन किया गया, तो उन राज्यों के साथ बड़ा अन्याय होगा जिन्होंने देश के परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को पूरी ईमानदारी से लागू किया है।
131वें संशोधन विधेयक पर तीखी प्रतिक्रिया
यह पूरा विवाद 131वें संशोधन विधेयक, 2026 के सामने आने के बाद गरमाया है। खड़गे ने प्रधानमंत्री को याद दिलाते हुए लिखा है कि जिस तरह की जल्दबाजी और प्रशासनिक ज़बरदस्ती अप्रैल 2026 के मध्य में करने का प्रयास किया गया था, वैसी गलती दोबारा न दोहराई जाए। उनका साफ कहना है कि किसी भी बड़े बदलाव से पहले सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में लिया जाना चाहिए ताकि देश के संघीय ढांचे पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े।
दक्षिण और उत्तर भारत के बीच असंतुलन का डर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि खड़गे की यह चिंता पूरी तरह से बेनतीजा नहीं है। यदि जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का नया परिसीमन किया जाता है, तो उत्तर भारत के कई राज्यों में सीटों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हो सकती है, जबकि दक्षिण भारत के राज्य जो जनसंख्या नियंत्रण में आगे रहे हैं, उनकी राजनीतिक ताकत संसद में कम हो जाएगी। यह स्थिति देश की लोकतांत्रिक एकता और संतुलन के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।
सर्वदलीय बैठक बुलाने की पुरजोर मांग
अपने पत्र के अंत में मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री मोदी से स्पष्ट शब्दों में आग्रह किया है कि वे इस संवेदनशील और गंभीर मुद्दे पर किसी भी एकतरफा फैसले से बचें। उन्होंने देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को एक मंच पर लाकर सर्वदलीय बैठक आयोजित करने की मांग की है। कांग्रेस का मानना है कि राष्ट्रीय महत्व के इस विषय पर व्यापक आम सहमति बनना बेहद जरूरी है ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार का विवाद या असंतोष पैदा न हो।

राहुल गांधी के बयान पर शंकराचार्य की दो टूक: माफी मांगें या भुगतें परिणाम
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी द्वारा मनुस्मृति पर की गई टिप्पणी पर विवाद गहराता जा रहा है। ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने राहुल को चेतावनी देते हुए सार्वजनिक माफी की मांग की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि माफी न मांगने पर सनातन समाज कांग्रेस के बहिष्कार का बड़ा अभियान छेड़ेगा।
खबर का निचोड़
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी द्वारा मनुस्मृति पर की गई टिप्पणी पर विवाद गहराता जा रहा है। ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने राहुल को चेतावनी देते हुए सार्वजनिक माफी की मांग की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि माफी न मांगने पर सनातन समाज कांग्रेस के बहिष्कार का बड़ा अभियान छेड़ेगा।
विवाद की जड़ और बयान का दायरा
राजनीतिक गलियारों से लेकर धार्मिक मंचों तक राहुल गांधी के बयानों को लेकर हलचल तेज हो गई है। हाल ही में मनुस्मृति को लेकर दिए गए एक विवादित बयान ने संत समाज को झकझोर कर रख दिया है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए कांग्रेस नेता को कटघरे में खड़ा किया है। उनका मानना है कि राजनीतिक फायदे के लिए धार्मिक ग्रंथों और आस्था के प्रतीकों को निशाना बनाना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
संतों की दो टूक चेतावनी
शंकराचार्य ने एक प्रेस वार्ता के दौरान दो टूक शब्दों में कहा कि राहुल गांधी को अपने बयानों के लिए बिना किसी देरी के देश के बहुसंख्यक समाज से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कांग्रेस नेता अपनी इस शैली में बदलाव नहीं लाते हैं और अपने शब्दों के लिए क्षमाप्रार्थी नहीं होते हैं, तो संत समाज चुप नहीं बैठेगा। इस स्थिति में एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया जाएगा, जिसका मुख्य उद्देश्य सनातन धर्मावलंबियों को कांग्रेस पार्टी से पूरी तरह दूर करना और उसे राजनीतिक रूप से नकारना होगा।
राजनीतिक गलियारों में बढ़ती सरगर्मी
धार्मिक गुरुओं के इस तीखे तेवर से राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ गया है। चुनावों के इस दौर में जहां सभी दल हिंदू वोटों को अपने पाले में करने के लिए जोड़-तोड़ में लगे हैं, वहीं शंकराचार्य का यह बयान कांग्रेस के लिए एक बड़ी मुसीबत बन सकता है। पार्टी के रणनीतिकार अब इस डैमेज कंट्रोल में जुट गए हैं कि कैसे इस नाराजगी को थामा जाए। दूसरी ओर, विपक्षी दल इस मुद्दे को लपककर राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को हिंदू विरोधी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
सनातन आस्था और राजनीतिक मर्यादा
यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर इस बहस को जन्म दे रहा है कि राजनीति में धार्मिक ग्रंथों और आस्था के केंद्रों का उपयोग किस हद तक होना चाहिए। एक तरफ जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ धार्मिक भावनाओं के आहत होने का दर्द भी कम मुखर नहीं है। शंकराचार्य के इस अल्टीमेटम ने साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा आसानी से ठंडा नहीं पड़ने वाला है और इस पर सियासत और धर्म का यह टकराव और अधिक तीखा रूप ले सकता है।

नदियों का खौफनाक सच: त्रिशूली और नारायणी से मिले 64 शव, फुल हुआ शवगृह
नेपाल की त्रिशूली और नारायणी नदियों से लगातार उफनते पानी के बीच से 64 शवों के बरामद होने से हड़कंप मच गया है। हालात इतने भयावह हैं कि भरतपुर अस्पताल का शवगृह पूरी तरह भर चुका है और नए शवों को रखने के लिए अब अस्थाई व्यवस्था करनी पड़ रही है। सुरक्षा बल नदी तटों पर बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चला रहे हैं।
नेपाल की त्रिशूली और नारायणी नदियों से लगातार उफनते पानी के बीच से 64 शवों के बरामद होने से हड़कंप मच गया है। हालात इतने भयावह हैं कि भरतपुर अस्पताल का शवगृह पूरी तरह भर चुका है और नए शवों को रखने के लिए अब अस्थाई व्यवस्था करनी पड़ रही है। सुरक्षा बल नदी तटों पर बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चला रहे हैं।
नदियों के सीने से निकल रहे भयानक राज
नेपाल के जल स्रोतों में इस वक्त मौत का जो सिलसिला चल रहा है, उसने प्रशासन की नींद उड़ा दी है। देश की दो प्रमुख नदियां—त्रिशूली और नारायणी—इन दिनों लगातार लाशें उगल रही हैं। दोनों नदियों के किनारों से अब तक कुल 64 शव बरामद किए जा चुके हैं। जैसे-जैसे गोताखोर और सुरक्षाकर्मी पानी के तेज बहाव में तलाश कर रहे हैं, वैसे-वैसे एक के बाद एक शव बाहर आ रहे हैं। इस हृदयविदारक स्थिति ने स्थानीय नागरिकों और प्रशासनिक तंत्र दोनों को सकते में डाल दिया है।
भर चुका है भरतपुर अस्पताल का शवगृह
बरामद होने वाले शवों की संख्या इतनी अधिक है कि चिकित्सा व्यवस्था चरमरा गई है। चितवन जिले का प्रमुख केंद्र माना जाने वाला भरतपुर अस्पताल इस वक्त अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। अस्पताल का मोर्चरी हाउस (शवगृह) पूरी तरह भर चुका है और वहां अब एक भी शव को रखने की जगह नहीं बची है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने अस्पताल परिसर के बाहर अस्थाई शवगृह बनाने का काम शुरू कर दिया है, ताकि आगे मिलने वाले शवों का सम्मानजनक प्रबंधन किया जा सके।
युद्धस्तर पर जारी है सुरक्षा एजेंसियों का सर्च ऑपरेशन
इस आपदा से निपटने के लिए नेपाल की तमाम सुरक्षा एजेंसियां पूरी ताकत से जुट गई हैं। नेपाली सेना, सशस्त्र पुलिस बल और नेपाल पुलिस के गोताखोर त्रिशूली और नारायणी नदियों के चप्पे-चप्पे को खंगाल रहे हैं। नदी के तेज बहाव और दुर्गम इलाकों के बावजूद सर्च ऑपरेशन को रोका नहीं गया है। अधिकारी लगातार इस बात की आशंका जता रहे हैं कि पानी के अंदर अभी और भी कई शव फंसे हो सकते हैं, जिनकी तलाश के लिए रेस्क्यू टीमों को विशेष उपकरणों के साथ तैनात किया गया है।
प्रशासन और आम जनता के बीच गहराता तनाव
एक साथ इतनी बड़ी संख्या में शव मिलने के बाद से इलाके में मातम और अनिश्चितता का माहौल है। लापता लोगों के परिवारजन अपने प्रियजनों की तलाश में भरतपुर अस्पताल के बाहर भारी संख्या में जुट रहे हैं। शिनाख्त की प्रक्रिया बेहद धीमी और तनावपूर्ण हो गई है, क्योंकि पानी में लंबे समय तक रहने के कारण कई शवों की पहचान करना असंभव सा हो गया है। डीएनए परीक्षण और अन्य फॉरेंसिक तरीकों की मदद ली जा रही है, ताकि मृतकों की पहचान कर उनके परिजनों को सूचित किया जा सके। स्थानीय प्रशासन इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए है और आपदा प्रबंधन के उच्चाधिकारियों को लगातार अपडेट भेजा जा रहा है।
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