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कंगना-तापसी में फिर छिड़ी जंग: 'सस्ती कॉपी' से परवरिश तक पहुँचा विवाद

कंगना-तापसी में फिर छिड़ी जंग: 'सस्ती कॉपी' से परवरिश तक पहुँचा विवाद

Delight News
📅 23 Aug2026

बॉलीवुड अभिनेत्रियों कंगना रनौत और तापसी पन्नू के बीच सालों पुराना विवाद एक बार फिर गहरा गया है। 'सस्ती कॉपी' और 'बी-ग्रेड एक्ट्रेस' जैसे बयानों से शुरू हुई यह जुबानी जंग अब निजी हमलों तक पहुँच चुकी है। हाल ही में दोनों स्टार्स ने एक-दूसरे के बयानों, परवरिश और फिल्मों पर जमकर निशाना साधा है।

कंगना-तापसी में फिर छिड़ी जंग: 'सस्ती कॉपी' से परवरिश तक पहुँचा विवाद
खबर का निचोड़
बॉलीवुड अभिनेत्रियों कंगना रनौत और तापसी पन्नू के बीच सालों पुराना विवाद एक बार फिर गहरा गया है। 'सस्ती कॉपी' और 'बी-ग्रेड एक्ट्रेस' जैसे बयानों से शुरू हुई यह जुबानी जंग अब निजी हमलों तक पहुँच चुकी है। हाल ही में दोनों स्टार्स ने एक-दूसरे के बयानों, परवरिश और फिल्मों पर जमकर निशाना साधा है।
मुख्य आर्टिकल
वार और पलटवार का नया दौर
बॉलीवुड की दो बेबाक अभिनेत्रियों, कंगना रनौत और तापसी पन्नू के बीच की कड़वाहट खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। 23 अगस्त 2026 को इस जुबानी जंग ने एक नया और आक्रामक मोड़ ले लिया। कंगना ने तापसी के बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए न केवल उन्हें दोबारा 'सस्ती कॉपी' कहा, बल्कि उनकी परवरिश और माता-पिता पर भी तंज कस दिया। इतना ही नहीं, कंगना ने तापसी पर अपनी 'बी-ग्रेड फिल्म' के प्रमोशन के लिए मीडिया का गलत इस्तेमाल करने का आरोप भी मढ़ दिया।
पन्नू का शांत लेकिन करारा जवाब
कंगना रनौत के इस बेहद निजी और तीखे हमले के बाद तापसी पन्नू ने भी खामोश रहना सही नहीं समझा। तापसी ने बेहद संतुलित लेकिन धारदार अंदाज में पलटवार करते हुए कहा कि किसी के भी विचार और भाषा उसकी खुद की परवरिश और सोच को दर्शाते हैं। तापसी के इस बयान ने सोशल मीडिया पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जहाँ लोग दो खेमों में बंटे नजर आ रहे हैं।
विवाद की पुरानी और कड़वी जड़ें
इन दोनों अभिनेत्रियों के बीच तल्खी कोई नई बात नहीं है। इस विवाद की शुरुआत साल 2019 में हुई थी, जब कंगना की बहन रंगोली चंदेल ने तापसी को कंगना की 'सस्ती कॉपी' करार दिया था। इसके बाद साल 2020 में यह मामला तब और गरमा गया जब कंगना ने खुद एक इंटरव्यू के दौरान तापसी को 'बी-ग्रेड एक्ट्रेस' कह दिया था। तब से लेकर आज तक दोनों के बीच यह कड़वाहट किसी न किसी बहाने सतह पर आती रही है।
बयानों से भड़की ताजा आग
हाल ही में तापसी पन्नू ने एक बातचीत के दौरान कहा था कि वह कंगना रनौत से कभी व्यक्तिगत रूप से नहीं मिली हैं और उनका कंगना से कोई सीधा रिश्ता नहीं है। तापसी के इसी बयान ने कंगना को भड़का दिया, जिसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया और मीडिया के जरिए तापसी के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया।
कंगना का मानना है कि तापसी जानबूझकर उनके नाम का इस्तेमाल सुर्खियों में रहने और अपनी फिल्मों को पब्लिसिटी दिलाने के लिए करती हैं। फिलहाल, दोनों अभिनेत्रियों का यह विवाद बॉलीवुड के गलियारों और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।
NTPC Green Energy Recruitment 2026: 114 पदों पर बंपर भर्ती

NTPC Green Energy Recruitment 2026: 114 पदों पर बंपर भर्ती

Delight News
📅 23 Aug2026

एनटीपीसी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड (NGEL) ने युवाओं और अनुभवी प्रोफेशनल्स के लिए शानदार अवसर का ऐलान किया है। संस्थान ने डीजीपी और असिस्टेंट इंजीनियर के कुल 114 पदों पर बंपर भर्ती निकाली है, जिसके लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 11 जुलाई 2026 से शुरू होकर 31 अगस्त 2026 तक चलेगी। सरकारी नौकरी की तलाश कर रहे योग्य उम्मीदवारों के लिए यह एक बेहतरीन मौका है।

NTPC Green Energy Recruitment 2026: 114 पदों पर बंपर भर्ती
एनटीपीसी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड (NGEL) ने युवाओं और अनुभवी प्रोफेशनल्स के लिए शानदार अवसर का ऐलान किया है। संस्थान ने डीजीपी और असिस्टेंट इंजीनियर के कुल 114 पदों पर बंपर भर्ती निकाली है, जिसके लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 11 जुलाई 2026 से शुरू होकर 31 अगस्त 2026 तक चलेगी। सरकारी नौकरी की तलाश कर रहे योग्य उम्मीदवारों के लिए यह एक बेहतरीन मौका है।
आवेदन की तारीखें और महत्वपूर्ण तिथियां
एनटीपीसी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड की इस नवीनतम भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन विंडो 11 जुलाई 2026 को खोल दी गई थी। आवेदन करने की अंतिम तिथि 31 अगस्त 2026 निर्धारित की गई है। जो उम्मीदवार रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में अपना करियर बनाना चाहते हैं, उन्हें अंतिम तिथि से पहले आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर अपना आवेदन पत्र समय से सबमिट करना होगा। समय सीमा समाप्त होने के बाद किसी भी आवेदन पर विचार नहीं किया जाएगा।
कुल पद और पात्रता मानदंड
इस रिक्रूटमेंट ड्राइव के माध्यम से कुल 114 पदों पर नियुक्तियां की जाएंगी। इसमें डिप्टी जनरल मैनेजर और असिस्टेंट इंजीनियर जैसे महत्वपूर्ण पद शामिल हैं। विभिन्न पदों के लिए शैक्षिक योग्यता, अनुभव और आयु सीमा के नियम अलग-अलग तय किए गए हैं। उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे आवेदन करने से पहले विभाग द्वारा जारी आधिकारिक विज्ञापन को ध्यान से पढ़ लें ताकि पात्रता से जुड़ी किसी भी प्रकार की भ्रम की स्थिति न रहे।
चयन प्रक्रिया और वेतनमान
योग्य उम्मीदवारों का चयन निर्धारित चयन प्रक्रिया के आधार पर किया जाएगा, जिसमें योग्यता, इंटरव्यू या अन्य परीक्षण शामिल हो सकते हैं। चयनित होने वाले उम्मीदवारों को एनटीपीसी के नियमों के अनुसार आकर्षक वेतनमान और अन्य अनुषंगी लाभ प्रदान किए जाएंगे। यह भर्ती देश के हरित ऊर्जा क्षेत्र में युवाओं को आगे बढ़ाने और अपनी प्रतिभा दिखाने का एक सुनहरा अवसर प्रदान करती है।
मध्यकालीन भारतीय इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलन का प्रभाव *

मध्यकालीन भारतीय इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलन का प्रभाव *

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📅 23 Aug2026

मध्यकालीन भारतीय इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलनों ने भारतीय समाज, संस्कृति, भाषा और दर्शन को एक नई दिशा प्रदान की। इन दोनों आंदोलनों ने एकेश्वरवाद, मानवतावाद, समानता और प्रेम के माध्यम से तत्कालीन रूढ़िवादी धार्मिक मान्यताओं और बाह्य आडंबरों को चुनौती दी, जिससे भारतीय समाज में एक समावेशी चेतना का विकास हुआ।

मध्यकालीन भारतीय इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलन का प्रभाव
मध्यकालीन भारतीय इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलनों ने भारतीय समाज, संस्कृति, भाषा और दर्शन को एक नई दिशा प्रदान की। इन दोनों आंदोलनों ने एकेश्वरवाद, मानवतावाद, समानता और प्रेम के माध्यम से तत्कालीन रूढ़िवादी धार्मिक मान्यताओं और बाह्य आडंबरों को चुनौती दी, जिससे भारतीय समाज में एक समावेशी चेतना का विकास हुआ।
निर्गुण और सगुण भक्त परंपराएं
भक्ति आंदोलन मूल रूप से दो प्रमुख धाराओं—निर्गुण और सगुण में विभाजित था। निर्गुण परंपरा के संतों ने ईश्वर के निराकार, अनाम और रूपहीन स्वरूप की आराधना पर बल दिया और जाति व्यवस्था, मूर्तिपूजा तथा कर्मकांडों का पुरजोर विरोध किया। इस धारा के प्रमुख संतों में कबीर, नानक और रैदास शामिल थे। इसके विपरीत, सगुण परंपरा के संतों ने ईश्वर के साकार रूप, अवतारवाद और उसकी लीलाओं में अटूट विश्वास व्यक्त किया। इस धारा के अंतर्गत तुलसीदास ने रामभक्ति और सूरदास तथा मीराबाई ने कृष्णभक्ति के माध्यम से जनमानस को जोड़ा।
प्रमुख संत और उनका योगदान
संत कबीर ने अपनी साखियों और पदों के माध्यम से हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की कुप्रथाओं पर तीखा प्रहार किया तथा धार्मिक समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। संत तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' की रचना कर समाज में उच्च नैतिक मूल्यों, मर्यादा और पारिवारिक आदर्शों की स्थापना की। मीराबाई ने अपनी अनन्य कृष्णभक्ति के बल पर सामंती समाज की सीमाओं और पुरुष-प्रधान रूढ़ियों को चुनौती दी तथा राजसी सुखों का त्याग कर प्रेममार्गी भक्ति की पराकाष्ठा को प्रदर्शित किया।
सूफी सिलसिले: चिश्ती और सुहरावर्दी
भारत में सूफी आंदोलन विभिन्न सिलसिलों (संप्रदायों) के माध्यम से फला-फूला, जिसमें चिश्ती और सुहरावर्दी सिलसिले सबसे प्रमुख थे। चिश्ती सिलसिला ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती द्वारा भारत में स्थापित किया गया, जिसने स्थानीय संस्कृति को आत्मसात करते हुए सादगी, प्रेम, सर्वेश्वरवाद और संगीत (समां) को अपने प्रचार का माध्यम बनाया। इस सिलसिले के संतों ने गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा को ही सच्ची इबादत माना। इसके विपरीत, सुहरावर्दी सिलसिला मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिम भारत तक सीमित रहा और इसके संतों ने राज्य सत्ता के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे तथा भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग किए बिना धार्मिक कार्य किए।
क्षेत्रीय प्रसार और सामाजिक प्रभाव
भक्ति और सूफी आंदोलनों का प्रसार भारत के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर हुआ। दक्षिण भारत में अलवार और नयनार संतों ने इसकी नींव रखी, जो उत्तर भारत में बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान तक फैल गया। महाराष्ट्र में वारकरी संप्रदाय ने संत ज्ञानेश्वर और तुकाराम के नेतृत्व में भक्ति को जन-जन तक पहुंचाया। इन आंदोलनों के परिणामस्वरूप छुआछूत और जातिगत भेदभाव में कमी आई, क्षेत्रीय भाषाओं (जैसे अवधी, ब्रज, मैथिली, पंजाबी और मराठी) का अभूतपूर्व विकास हुआ और भारतीय समाज में सहिष्णुता, सांप्रदायिक सौहार्द तथा लोकतांत्रिक सांस्कृतिक मूल्यों की गहरी जड़ें जमीं।
विजयनगर और बहमनी साम्राज्य: मध्यकालीन भारत का संघर्ष और संस्कृति *

विजयनगर और बहमनी साम्राज्य: मध्यकालीन भारत का संघर्ष और संस्कृति *

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📅 23 Aug2026

विजयनगर और बहमनी साम्राज्य मध्यकालीन भारत के दो शक्तिशाली राज्य थे, जिन्होंने दक्षिण भारत की राजनीति, प्रशासन और संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला। उनके बीच कृष्णा-तुंगभद्रा दोआब और व्यापारिक नियंत्रण के लिए निरंतर संघर्ष हुआ, जिसका समापन तालीकोटा के युद्ध और हampi के वैभवशाली स्थापत्य में हुआ।

विजयनगर और बहमनी साम्राज्य: मध्यकालीन भारत का संघर्ष और संस्कृति
सारांश
विजयनगर और बहमनी साम्राज्य मध्यकालीन भारत के दो शक्तिशाली राज्य थे, जिन्होंने दक्षिण भारत की राजनीति, प्रशासन और संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला। उनके बीच कृष्णा-तुंगभद्रा दोआब और व्यापारिक नियंत्रण के लिए निरंतर संघर्ष हुआ, जिसका समापन तालीकोटा के युद्ध और हampi के वैभवशाली स्थापत्य में हुआ।
प्रशासनिक विशेषताएँ
विजयनगर साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में राजा सर्वोच्च अधिकारी होता था, जिसे मंत्रिमंडल और मंत्रियों का सहयोग प्राप्त था। साम्राज्य को प्रांतों (मंडलम), जिलों (नाडु) और गाँवों में विभाजित किया गया था। नायंकारा प्रणाली इस प्रशासन की मुख्य विशेषता थी, जिसमें नायकों को भूमि दी जाती थी जिसके बदले वे सेना रखते थे और राजस्व वसूलते थे। बहमनी साम्राज्य में प्रशासन फारसी शैली पर आधारित था। राज्य को 'तरफ' या प्रांतों में बांटा गया था, जिनके प्रमुख 'तरफदार' या 'सूबेदार' कहलाते थे। महमूद गवन के सुधारों ने बहमनी प्रशासन को अधिक केंद्रीयकृत और सुदृढ़ बनाया था।
सैन्य संगठन
दोनों साम्राज्यों ने एक शक्तिशाली सैन्य तंत्र विकसित किया था। विजयनगर की सेना में पैदल सेना, घुड़सवार सेना और बड़ी संख्या में हाथियों का प्रयोग किया जाता था। विदेशी यात्रियों के विवरण के अनुसार, विजयनगर की सेना अत्यधिक अनुशासित और सुसज्जित थी। बहमनी सेना अपनी तोपखाने और कुशल घुड़सवार सेना के लिए प्रसिद्ध थी। बहमनी शासकों ने तुर्की और फारसी सैन्य विशेषज्ञों की सहायता से अपनी सेना का आधुनिकीकरण किया था, जिसमें बारूद और तोपों का प्रभावी उपयोग शामिल था।
हampi की वास्तुकला
विजयनगर की राजधानी हampi वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल में शामिल है। यहाँ के मंदिरों में विरूपाक्ष मंदिर, विट्ठल मंदिर और हजारा राम मंदिर प्रमुख हैं। विट्ठल मंदिर के प्रसिद्ध संगीतमय खंभे और पत्थर का रथ इस वास्तुकला की उच्च तकनीकी और कलात्मक उत्कृष्टता को दर्शाते हैं। यहाँ की वास्तुकला में द्रविड़ शैली का उन्नत रूप दिखाई देता है, जिसमें विशाल गोपुरम, मंडप और विस्तृत नक्काशी शामिल हैं।
तालीकोटा का युद्ध
वर्ष 1565 में लड़ा गया तालीकोटा का युद्ध (जिसे राक्षस-तांगड़ी का युद्ध भी कहा जाता है) मध्यकालीन इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। इस युद्ध में बहमनी साम्राज्य के उत्तराधिकारी राज्यों (बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर और बीदर) के संयुक्त संघ ने विजयनगर साम्राज्य की सेना को पराजित किया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप विजयनगर की केंद्रीय शक्ति का पतन हो गया और उसकी राजधानी हampi को बुरी तरह नष्ट कर दिया गया।
व्यापार संबंध
दोनों साम्राज्यों की भौगोलिक स्थिति ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय व्यापार के केंद्र के रूप में स्थापित किया था। विजयनगर के पश्चिमी तट पर भटकल, मंगलौर और गोवा जैसे प्रमुख बंदरगाह थे, जहाँ से घोड़े, रेशम और मसालों का आयात-निर्यात होता था। साम्राज्य ने पुर्तगालियों और अरब व्यापारियों के साथ घनिष्ठ व्यापारिक संबंध बनाए रखे। बहमनी साम्राज्य का संबंध भी फारस, अरब और मध्य एशिया के साथ सुदृढ़ था, जिससे दक्कन के बंदरगाहों के माध्यम से समृद्ध समुद्री व्यापार संचालित होता था।
टेरियर साइबर क्वेस्ट 2026: भारतीय सेना का साइबर सुरक्षा अभ्यास

टेरियर साइबर क्वेस्ट 2026: भारतीय सेना का साइबर सुरक्षा अभ्यास

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📅 23 Aug2026

भारतीय सेना की प्रादेशिक सेना (टेरिटोरियल आर्मी) ने गैर-लाभकारी थिंक टैंक साइबरपीस के सहयोग से 'टेरियर साइबर क्वेस्ट 2026' (TCQ 3.0) के तीसरे संस्करण का शुभारंभ किया है। यह पहल देश के सामरिक बुनियादी ढांचे को सुरक्षित करने, राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और कुशल साइबर योद्धाओं को तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

टेरियर साइबर क्वेस्ट 2026: भारतीय सेना का साइबर सुरक्षा अभ्यास
भारतीय सेना की प्रादेशिक सेना (टेरिटोरियल आर्मी) ने गैर-लाभकारी थिंक टैंक साइबरपीस के सहयोग से 'टेरियर साइबर क्वेस्ट 2026' (TCQ 3.0) के तीसरे संस्करण का शुभारंभ किया है। यह पहल देश के सामरिक बुनियादी ढांचे को सुरक्षित करने, राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और कुशल साइबर योद्धाओं को तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
परिचय और उद्देश्य
टेरियर साइबर क्वेस्ट 2026 (TCQ 3.0) भारतीय सेना द्वारा साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में तकनीकी नवाचार और सहयोगात्मक प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए आयोजित किया जा रहा है। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य देश के युवाओं, तकनीकी विशेषज्ञों और सुरक्षा शोधकर्ताओं को एक मंच प्रदान करना है, जिससे वे वास्तविक दुनिया के साइबर खतरों से निपटने के लिए अपनी रणनीतिक और तकनीकी दक्षता का प्रदर्शन कर सकें। यह प्रतियोगिता राष्ट्र की डिजिटल सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत मानव संसाधन आधार तैयार करती है।
रणनीतिक साझेदारी और महत्व
इस संस्करण का आयोजन प्रादेशिक सेना और 'साइबरपीस' फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में किया गया है। यह साझेदारी सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच साइबर रक्षा क्षमताओं को एकीकृत करने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में, जहां राज्य और गैर-राज्य एक्टर्स द्वारा महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और सरकारी नेटवर्क पर साइबर हमलों की संभावना बढ़ रही है, ऐसे अभ्यास रक्षा बलों को अत्याधुनिक तकनीकी चुनौतियों के लिए तैयार रखते हैं।
परीक्षा की दृष्टि से प्रासंगिकता
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए यह विषय आंतरिक सुरक्षा (Internal Security), सूचना प्रौद्योगिकी और साइबर सुरक्षा (Cyber Security) के पाठ्यक्रम के अंतर्गत अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पहल भारत सरकार के डिजिटल इंडिया मिशन और राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति के उद्देश्यों के अनुरूप है, जो देश को डिजिटल रूप से सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाने पर बल देती है।

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