
मध्यकालीन भारतीय इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलन का प्रभाव *
मध्यकालीन भारतीय इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलनों ने भारतीय समाज, संस्कृति, भाषा और दर्शन को एक नई दिशा प्रदान की। इन दोनों आंदोलनों ने एकेश्वरवाद, मानवतावाद, समानता और प्रेम के माध्यम से तत्कालीन रूढ़िवादी धार्मिक मान्यताओं और बाह्य आडंबरों को चुनौती दी, जिससे भारतीय समाज में एक समावेशी चेतना का विकास हुआ।
मध्यकालीन भारतीय इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलनों ने भारतीय समाज, संस्कृति, भाषा और दर्शन को एक नई दिशा प्रदान की। इन दोनों आंदोलनों ने एकेश्वरवाद, मानवतावाद, समानता और प्रेम के माध्यम से तत्कालीन रूढ़िवादी धार्मिक मान्यताओं और बाह्य आडंबरों को चुनौती दी, जिससे भारतीय समाज में एक समावेशी चेतना का विकास हुआ।
निर्गुण और सगुण भक्त परंपराएं
भक्ति आंदोलन मूल रूप से दो प्रमुख धाराओं—निर्गुण और सगुण में विभाजित था। निर्गुण परंपरा के संतों ने ईश्वर के निराकार, अनाम और रूपहीन स्वरूप की आराधना पर बल दिया और जाति व्यवस्था, मूर्तिपूजा तथा कर्मकांडों का पुरजोर विरोध किया। इस धारा के प्रमुख संतों में कबीर, नानक और रैदास शामिल थे। इसके विपरीत, सगुण परंपरा के संतों ने ईश्वर के साकार रूप, अवतारवाद और उसकी लीलाओं में अटूट विश्वास व्यक्त किया। इस धारा के अंतर्गत तुलसीदास ने रामभक्ति और सूरदास तथा मीराबाई ने कृष्णभक्ति के माध्यम से जनमानस को जोड़ा।
प्रमुख संत और उनका योगदान
संत कबीर ने अपनी साखियों और पदों के माध्यम से हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की कुप्रथाओं पर तीखा प्रहार किया तथा धार्मिक समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। संत तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' की रचना कर समाज में उच्च नैतिक मूल्यों, मर्यादा और पारिवारिक आदर्शों की स्थापना की। मीराबाई ने अपनी अनन्य कृष्णभक्ति के बल पर सामंती समाज की सीमाओं और पुरुष-प्रधान रूढ़ियों को चुनौती दी तथा राजसी सुखों का त्याग कर प्रेममार्गी भक्ति की पराकाष्ठा को प्रदर्शित किया।
सूफी सिलसिले: चिश्ती और सुहरावर्दी
भारत में सूफी आंदोलन विभिन्न सिलसिलों (संप्रदायों) के माध्यम से फला-फूला, जिसमें चिश्ती और सुहरावर्दी सिलसिले सबसे प्रमुख थे। चिश्ती सिलसिला ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती द्वारा भारत में स्थापित किया गया, जिसने स्थानीय संस्कृति को आत्मसात करते हुए सादगी, प्रेम, सर्वेश्वरवाद और संगीत (समां) को अपने प्रचार का माध्यम बनाया। इस सिलसिले के संतों ने गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा को ही सच्ची इबादत माना। इसके विपरीत, सुहरावर्दी सिलसिला मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिम भारत तक सीमित रहा और इसके संतों ने राज्य सत्ता के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे तथा भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग किए बिना धार्मिक कार्य किए।
क्षेत्रीय प्रसार और सामाजिक प्रभाव
भक्ति और सूफी आंदोलनों का प्रसार भारत के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर हुआ। दक्षिण भारत में अलवार और नयनार संतों ने इसकी नींव रखी, जो उत्तर भारत में बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान तक फैल गया। महाराष्ट्र में वारकरी संप्रदाय ने संत ज्ञानेश्वर और तुकाराम के नेतृत्व में भक्ति को जन-जन तक पहुंचाया। इन आंदोलनों के परिणामस्वरूप छुआछूत और जातिगत भेदभाव में कमी आई, क्षेत्रीय भाषाओं (जैसे अवधी, ब्रज, मैथिली, पंजाबी और मराठी) का अभूतपूर्व विकास हुआ और भारतीय समाज में सहिष्णुता, सांप्रदायिक सौहार्द तथा लोकतांत्रिक सांस्कृतिक मूल्यों की गहरी जड़ें जमीं।

विजयनगर और बहमनी साम्राज्य: मध्यकालीन भारत का संघर्ष और संस्कृति *
विजयनगर और बहमनी साम्राज्य मध्यकालीन भारत के दो शक्तिशाली राज्य थे, जिन्होंने दक्षिण भारत की राजनीति, प्रशासन और संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला। उनके बीच कृष्णा-तुंगभद्रा दोआब और व्यापारिक नियंत्रण के लिए निरंतर संघर्ष हुआ, जिसका समापन तालीकोटा के युद्ध और हampi के वैभवशाली स्थापत्य में हुआ।
सारांश
विजयनगर और बहमनी साम्राज्य मध्यकालीन भारत के दो शक्तिशाली राज्य थे, जिन्होंने दक्षिण भारत की राजनीति, प्रशासन और संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला। उनके बीच कृष्णा-तुंगभद्रा दोआब और व्यापारिक नियंत्रण के लिए निरंतर संघर्ष हुआ, जिसका समापन तालीकोटा के युद्ध और हampi के वैभवशाली स्थापत्य में हुआ।
प्रशासनिक विशेषताएँ
विजयनगर साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में राजा सर्वोच्च अधिकारी होता था, जिसे मंत्रिमंडल और मंत्रियों का सहयोग प्राप्त था। साम्राज्य को प्रांतों (मंडलम), जिलों (नाडु) और गाँवों में विभाजित किया गया था। नायंकारा प्रणाली इस प्रशासन की मुख्य विशेषता थी, जिसमें नायकों को भूमि दी जाती थी जिसके बदले वे सेना रखते थे और राजस्व वसूलते थे। बहमनी साम्राज्य में प्रशासन फारसी शैली पर आधारित था। राज्य को 'तरफ' या प्रांतों में बांटा गया था, जिनके प्रमुख 'तरफदार' या 'सूबेदार' कहलाते थे। महमूद गवन के सुधारों ने बहमनी प्रशासन को अधिक केंद्रीयकृत और सुदृढ़ बनाया था।
सैन्य संगठन
दोनों साम्राज्यों ने एक शक्तिशाली सैन्य तंत्र विकसित किया था। विजयनगर की सेना में पैदल सेना, घुड़सवार सेना और बड़ी संख्या में हाथियों का प्रयोग किया जाता था। विदेशी यात्रियों के विवरण के अनुसार, विजयनगर की सेना अत्यधिक अनुशासित और सुसज्जित थी। बहमनी सेना अपनी तोपखाने और कुशल घुड़सवार सेना के लिए प्रसिद्ध थी। बहमनी शासकों ने तुर्की और फारसी सैन्य विशेषज्ञों की सहायता से अपनी सेना का आधुनिकीकरण किया था, जिसमें बारूद और तोपों का प्रभावी उपयोग शामिल था।
हampi की वास्तुकला
विजयनगर की राजधानी हampi वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल में शामिल है। यहाँ के मंदिरों में विरूपाक्ष मंदिर, विट्ठल मंदिर और हजारा राम मंदिर प्रमुख हैं। विट्ठल मंदिर के प्रसिद्ध संगीतमय खंभे और पत्थर का रथ इस वास्तुकला की उच्च तकनीकी और कलात्मक उत्कृष्टता को दर्शाते हैं। यहाँ की वास्तुकला में द्रविड़ शैली का उन्नत रूप दिखाई देता है, जिसमें विशाल गोपुरम, मंडप और विस्तृत नक्काशी शामिल हैं।
तालीकोटा का युद्ध
वर्ष 1565 में लड़ा गया तालीकोटा का युद्ध (जिसे राक्षस-तांगड़ी का युद्ध भी कहा जाता है) मध्यकालीन इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। इस युद्ध में बहमनी साम्राज्य के उत्तराधिकारी राज्यों (बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर और बीदर) के संयुक्त संघ ने विजयनगर साम्राज्य की सेना को पराजित किया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप विजयनगर की केंद्रीय शक्ति का पतन हो गया और उसकी राजधानी हampi को बुरी तरह नष्ट कर दिया गया।
व्यापार संबंध
दोनों साम्राज्यों की भौगोलिक स्थिति ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय व्यापार के केंद्र के रूप में स्थापित किया था। विजयनगर के पश्चिमी तट पर भटकल, मंगलौर और गोवा जैसे प्रमुख बंदरगाह थे, जहाँ से घोड़े, रेशम और मसालों का आयात-निर्यात होता था। साम्राज्य ने पुर्तगालियों और अरब व्यापारियों के साथ घनिष्ठ व्यापारिक संबंध बनाए रखे। बहमनी साम्राज्य का संबंध भी फारस, अरब और मध्य एशिया के साथ सुदृढ़ था, जिससे दक्कन के बंदरगाहों के माध्यम से समृद्ध समुद्री व्यापार संचालित होता था।

टेरियर साइबर क्वेस्ट 2026: भारतीय सेना का साइबर सुरक्षा अभ्यास
भारतीय सेना की प्रादेशिक सेना (टेरिटोरियल आर्मी) ने गैर-लाभकारी थिंक टैंक साइबरपीस के सहयोग से 'टेरियर साइबर क्वेस्ट 2026' (TCQ 3.0) के तीसरे संस्करण का शुभारंभ किया है। यह पहल देश के सामरिक बुनियादी ढांचे को सुरक्षित करने, राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और कुशल साइबर योद्धाओं को तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
भारतीय सेना की प्रादेशिक सेना (टेरिटोरियल आर्मी) ने गैर-लाभकारी थिंक टैंक साइबरपीस के सहयोग से 'टेरियर साइबर क्वेस्ट 2026' (TCQ 3.0) के तीसरे संस्करण का शुभारंभ किया है। यह पहल देश के सामरिक बुनियादी ढांचे को सुरक्षित करने, राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और कुशल साइबर योद्धाओं को तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
परिचय और उद्देश्य
टेरियर साइबर क्वेस्ट 2026 (TCQ 3.0) भारतीय सेना द्वारा साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में तकनीकी नवाचार और सहयोगात्मक प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए आयोजित किया जा रहा है। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य देश के युवाओं, तकनीकी विशेषज्ञों और सुरक्षा शोधकर्ताओं को एक मंच प्रदान करना है, जिससे वे वास्तविक दुनिया के साइबर खतरों से निपटने के लिए अपनी रणनीतिक और तकनीकी दक्षता का प्रदर्शन कर सकें। यह प्रतियोगिता राष्ट्र की डिजिटल सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत मानव संसाधन आधार तैयार करती है।
रणनीतिक साझेदारी और महत्व
इस संस्करण का आयोजन प्रादेशिक सेना और 'साइबरपीस' फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में किया गया है। यह साझेदारी सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच साइबर रक्षा क्षमताओं को एकीकृत करने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में, जहां राज्य और गैर-राज्य एक्टर्स द्वारा महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और सरकारी नेटवर्क पर साइबर हमलों की संभावना बढ़ रही है, ऐसे अभ्यास रक्षा बलों को अत्याधुनिक तकनीकी चुनौतियों के लिए तैयार रखते हैं।
परीक्षा की दृष्टि से प्रासंगिकता
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए यह विषय आंतरिक सुरक्षा (Internal Security), सूचना प्रौद्योगिकी और साइबर सुरक्षा (Cyber Security) के पाठ्यक्रम के अंतर्गत अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पहल भारत सरकार के डिजिटल इंडिया मिशन और राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति के उद्देश्यों के अनुरूप है, जो देश को डिजिटल रूप से सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाने पर बल देती है।

मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS): भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा अधिसूचित मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) का कुल वित्तीय परिव्यय 62,500 करोड़ रुपये है। यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक प्रभावी रहेगी। इसका मुख्य उद्देश्य भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और निर्यात का एक प्रमुख केंद्र बनाना है।
सारांश (Summary):
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा अधिसूचित मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) का कुल वित्तीय परिव्यय 62,500 करोड़ रुपये है। यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक प्रभावी रहेगी। इसका मुख्य उद्देश्य भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और निर्यात का एक प्रमुख केंद्र बनाना है।
योजना का परिचय और पृष्ठभूमि
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने देश में मोबाइल फोन और उसके घटकों के विनिर्माण को गति देने के लिए मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) को आधिकारिक रूप से अधिसूचित कर दिया है। यह नीतिगत कदम भारत को वैश्विक मूल्य श्रृंखला में एकीकृत करने और घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करने के सरकार के व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है।
वित्तीय परिव्यय और कार्यान्वयन अवधि
इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए 62,500 करोड़ रुपये का भारी-भरकम वित्तीय परिव्यय तय किया गया है। यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से शुरू होकर वित्त वर्ष 2030-31 तक, यानी कुल पांच वर्षों की अवधि के लिए लागू की जाएगी। यह बड़ा निवेश उद्योग को दीर्घकालिक स्थिरता और प्रोत्साहन प्रदान करेगा।
रणनीतिक उद्देश्य और आर्थिक प्रभाव
इस योजना का मुख्य उद्देश्य घरेलू स्तर पर रोजगार के नए अवसरों का सृजन करना, आयात पर निर्भरता को कम करना और भारत से मोबाइल फोन के निर्यात को भारी बढ़ावा देना है। इसके माध्यम से वैश्विक स्तर की कंपनियों को भारत में अपने उत्पादन केंद्र स्थापित करने के लिए आकर्षित किया जाएगा।
परीक्षा की दृष्टि से महत्व
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की मुख्य परीक्षा के अंतर्गत अर्थव्यवस्था, औद्योगिक विकास, 'मेक इन इंडिया' पहल और सरकारी नीतियों के विश्लेषण के लिए यह टॉपिक अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और तकनीकी आत्मनिर्भरता से जुड़े प्रश्नों के उत्तर में उपयोगी है।

एशियाई विकास बैंक और चेन्नई जल सुरक्षा परियोजना *
भारत सरकार और एशियाई विकास बैंक (ADB) ने चेन्नई में जलवायु-प्रतिरोधी जल सुरक्षा और सीवरेज परियोजना के आधुनिकीकरण के लिए 230 मिलियन अमेरिकी डॉलर के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह पहल शहरी बुनियादी ढांचा को मजबूत करने और जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
सारांश
भारत सरकार और एशियाई विकास बैंक (ADB) ने चेन्नई में जलवायु-प्रतिरोधी जल सुरक्षा और सीवरेज परियोजना के आधुनिकीकरण के लिए 230 मिलियन अमेरिकी डॉलर के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह पहल शहरी बुनियादी ढांचा को मजबूत करने और जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
परिचय एवं पृष्ठभूमि
एशियाई विकास बैंक (ADB) एशिया और प्रशांत क्षेत्र का एक प्रमुख बहुपक्षीय विकास वित्तीय संस्थान है, जिसकी स्थापना 19 दिसंबर 1966 को हुई थी। इसका मुख्यालय मनीला, फिलीपींस में स्थित है। इसका मुख्य उद्देश्य अपने सदस्य देशों के सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। हालिया समझौता चेन्नई महानगर में जल आपूर्ति और मलजल प्रबंधन प्रणालियों को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करने के लिए किया गया है।
परियोजना के प्रमुख उद्देश्य
इस परियोजना का प्राथमिक लक्ष्य चेन्नई में जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील जल आपूर्ति और सीवरेज नेटवर्क का निर्माण करना है। इसके तहत उन्नत अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों की स्थापना, जल वितरण नेटवर्क का आधुनिकीकरण और बाढ़ के जोखिम वाले क्षेत्रों में सुरक्षित बुनियादी ढांचे का विकास किया जाना शामिल है। यह पहल सतत विकास लक्ष्य (SDG-6) यानी स्वच्छ जल और स्वच्छता के विजन के भी अनुरूप है।
भारत और एशियाई विकास बैंक के संबंध
भारत ADB का एक संस्थापक सदस्य है और यह संगठन देश में परिवहन, ऊर्जा, शहरी विकास और ग्रामीण बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण में एक प्रमुख भागीदार रहा है। इस प्रकार की परियोजनाएं भारत के टियर-1 और टियर-2 शहरों में जलवायु अनुकूलन क्षमताओं को बढ़ाने के साथ-साथ आपदा जोखिम न्यूनीकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
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