
जंतर-मंतर को दहलाने की साजिश नाकाम, ISI के नौ गिरफ्तार
पंजाब पुलिस ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़े आतंकी हमले की साजिश को नाकाम कर दिया है। आईएसआई समर्थित इस मॉड्यूल के नौ सदस्यों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें चार नाबालिग भी शामिल हैं। इनके पास से हथियार और पेट्रोल बम बरामद हुए हैं, जो स्वतंत्रता दिवस से पहले देश को दहलाने की फिराक में थे।

विराट का भक्ति मार्ग: मोहम्मद शमी बोले— 'किस बात की आपत्ति?'
विराट कोहली के आध्यात्मिक गुरु प्रेमानंद महाराज के पास बार-बार जाने पर भारतीय तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी का बड़ा बयान सामने आया है। शमी ने कोहली का समर्थन करते हुए कहा कि किसी की व्यक्तिगत आस्था और भक्ति मार्ग पर सवाल उठाना गलत है। इस सकारात्मक कदम से किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।
खबर का निचोड़
विराट कोहली के आध्यात्मिक गुरु प्रेमानंद महाराज के पास बार-बार जाने पर भारतीय तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी का बड़ा बयान सामने आया है। शमी ने कोहली का समर्थन करते हुए कहा कि किसी की व्यक्तिगत आस्था और भक्ति मार्ग पर सवाल उठाना गलत है। इस सकारात्मक कदम से किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।
कोहली का भक्ति मार्ग और शमी की खरी-खरी
भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार बल्लेबाज विराट कोहली बीते कुछ समय से अपनी बल्लेबाजी के साथ-साथ अपनी आध्यात्मिक यात्रा को लेकर भी काफी चर्चा में हैं। उन्हें अक्सर वृंदावन में संत प्रेमानंद महाराज के दर्शन करते और उनका आशीर्वाद लेते देखा गया है। जहां सोशल मीडिया पर इस विषय पर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही थीं, वहीं अब भारतीय टीम के स्टार तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी ने इस पूरे मामले पर अपनी बेबाक राय रखकर आलोचकों को करारा जवाब दिया है।
"यह तो अच्छी बात है, किसी को क्या दिक्कत?"
एक बातचीत के दौरान जब शमी से विराट कोहली के प्रेमानंद महाराज के पास बार-बार जाने को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने बिना किसी झिझक के कोहली का पक्ष लिया। शमी ने बेहद सीधे शब्दों में कहा कि किसी की व्यक्तिगत आस्था पर उंगली उठाने की कोई वजह नहीं बनती।
शमी का मानना है कि ईश्वर की भक्ति में लीन होना या किसी संत के सानिध्य में शांति तलाशना एक सकारात्मक प्रक्रिया है। उन्होंने कहा, "जहां तक महाराज की बात है, मुझे नहीं लगता कि किसी को कोई आपत्ति होनी चाहिए या किसी को कुछ ऐसा पॉइंट आउट करने की जरूरत है। यह तो बहुत अच्छी बात है, इससे किसी को क्या दिक्कत हो सकती है?"
खेल और अध्यात्म का अनूठा संतुलन
मैदान पर आक्रामक अंदाज में खेलने वाले विराट कोहली का आध्यात्मिक रूप प्रशंसकों के लिए काफी प्रेरणादायक रहा है। कठिन दौर से उबरने और मानसिक शांति बनाए रखने के लिए विराट ने अध्यात्म का सहारा लिया है। जब कोई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार दबाव का सामना करता है, तो मानसिक संतुलन और सकारात्मकता बेहद मायने रखती है। प्रेमानंद महाराज के प्रवचन और उनके सानिध्य ने विराट को एक नई ऊर्जा दी है, जिसे शमी ने भी पूरी तरह स्वाभाविक और सराहनीय माना है।
आस्था व्यक्तिगत विषय, सवाल उठाना गलत
मोहम्मद शमी के इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ड्रेसिंग रूम में खिलाड़ी एक-दूसरे की व्यक्तिगत पसंद और आध्यात्मिक प्राथमिकताओं का सम्मान करते हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए उसकी धार्मिक या आध्यात्मिक यात्रा पूरी तरह से निजी होती है। जब तक इससे खेल या प्रदर्शन पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता, तब तक किसी को इस पर सवाल खड़े करने का अधिकार नहीं है। शमी के इस रुख की सोशल मीडिया और क्रिकेट प्रेमियों के बीच काफी सराहना हो रही है।

सोनम वांगचुक का बड़ा खुलासा: इस डर से वापस ली धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग
पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग वापस लेने के पीछे दो मुख्य कारणों का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि सरकार ने दो प्रमुख मांगों पर सकारात्मक रुख दिखाया था। साथ ही, उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर किसी बड़े विवाद या हिंसा की आशंका का डर भी सता रहा था।
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पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग वापस लेने के पीछे दो मुख्य कारणों का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि सरकार ने दो प्रमुख मांगों पर सकारात्मक रुख दिखाया था। साथ ही, उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर किसी बड़े विवाद या हिंसा की आशंका का डर भी सता रहा था।
सरकार का रुख और राष्ट्रीय सुरक्षा का डर
जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने आखिरकार उस रहस्य से पर्दा उठा दिया है कि उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की अपनी जिद्द आखिर क्यों छोड़ दी। वांगचुक के इस खुलासे के बाद राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में नई चर्चा छिड़ गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह फैसला किसी दबाव में नहीं, बल्कि परिस्थितियों की गंभीरता और देश के माहौल को देखते हुए लिया गया था।
वांगचुक के अनुसार, निर्णय बदलने के पीछे दो सबसे महत्वपूर्ण कारक थे—पहला, सरकार की ओर से मिला सकारात्मक संकेत और दूसरा, देश में किसी बड़े अप्रिय घटनाक्रम की आशंका।
मांगों पर लचीलापन और सीजेपी का रुख
सोनम वांगचुक ने बताया कि बातचीत के दौरान सरकार ने आंदोलनकारियों की दो प्रमुख मांगों पर काफी लचीला और सहयोगात्मक रुख अपनाया। हालांकि, सीजेपी (CJP) का पूरा जोर केवल धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर ही टिका हुआ था। वांगचुक का मानना था कि जब सरकार मुख्य मुद्दों और मांगों पर विचार करने के लिए तैयार दिख रही हो, तो केवल एक व्यक्ति के इस्तीफे की बात पर अड़े रहना आंदोलन के व्यापक हित में नहीं होगा।
संवाद के रास्ते खुले रखने और समाधान की तरफ बढ़ने के लिए उन्होंने अपनी इस मांग को पीछे छोड़ना ही बेहतर समझा।
लेह की घटना और राष्ट्रीय स्तर की चिंता
अपनी जिद्द पीछे छोड़ने की दूसरी और सबसे बड़ी वजह बताते हुए सोनम वांगचुक ने एक गहरे डर का जिक्र किया। 23 जुलाई के आसपास के माहौल को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय लोगों के बीच यह चर्चा चरम पर थी कि कुछ बहुत बड़ा और अनहोनी होने वाली है।
उनके दिमाग में पिछले साल लेह में हुई वह घटना ताजा थी, जब सुरक्षाकर्मियों को गोलियां चलानी पड़ी थीं। वांगचुक को इस बात का गहरा खौफ था कि लेह जैसी हिंसक या तनावपूर्ण स्थिति कहीं राष्ट्रीय स्तर पर न दोहराई जाए। किसी भी संभावित हिंसा, जनहानि या देशव्यापी अशांति को रोकने के लिए उन्होंने शांति और समझदारी का रास्ता चुनना सही समझा।

इंदिरा गांधी से सुनेत्रा पवार तक: राजनीतिक गलियारों में फिर क्यों गूंजा 'गूंगी गुड़िया' तंज?
वर्ष 1966 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए इस्तेमाल हुआ शब्द 'गूंगी गुड़िया' देश के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर गूंज उठा है। महाराष्ट्र की उप-मुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार पर कांग्रेस नेता की ओर से की गई इस टिप्पणी के बाद एनसीपी कार्यकर्ताओं ने मुंबई स्थित कांग्रेस कार्यालय पर जोरदार प्रदर्शन किया।
वर्ष 1966 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए इस्तेमाल हुआ शब्द 'गूंगी गुड़िया' देश के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर गूंज उठा है। महाराष्ट्र की उप-मुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार पर कांग्रेस नेता की ओर से की गई इस टिप्पणी के बाद एनसीपी कार्यकर्ताओं ने मुंबई स्थित कांग्रेस कार्यालय पर जोरदार प्रदर्शन किया।
'गूंगी गुड़िया' टिप्पणी से महाराष्ट्र में भड़का सियासी संग्राम
महाराष्ट्र की राजनीति में जुबानी जंग अक्सर तीखे मोड़ लेती रही है, लेकिन इस बार मामला उप-मुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार पर की गई एक व्यक्तिगत और अपमानजनक टिप्पणी से गरमा गया है। कांग्रेस नेता द्वारा सुनेत्रा पवार को 'गूंगी गुड़िया' कहे जाने के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) का गुस्सा फूट पड़ा। एनसीपी कार्यकर्ताओं ने मुंबई में कांग्रेस दफ्तर के बाहर जमकर विरोध प्रदर्शन किया और नारेबाजी की। इस विवाद ने राज्य के सियासी माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है।
1966 का वो दौर: राममनोहर लोहिया ने गढ़ा था यह शब्द
राजनीतिक बयानों के इतिहास को देखें तो 'गूंगी गुड़िया' शब्द नया नहीं है। इसका पहला प्रयोग वर्ष 1966 में हुआ था, जब देश की कमान पहली बार इंदिरा गांधी के हाथों में आई थी। उस समय प्रख्यात समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने इंदिरा गांधी के शांत स्वभाव, संसद में कम बोलने और संकोच को लेकर उन पर यह तंज कसा था।
लोहिया का यह शब्द विपक्षी राजनीति में इंदिरा गांधी की घेराबंदी का बड़ा हथियार बना था। हालांकि, बाद में इंदिरा गांधी ने अपने दृढ़ फैसलों, 1971 के युद्ध और मजबूत नेतृत्व से इस छवि को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था।
अतीत के तंज से वर्तमान का बवंडर
दशकों पुराने इस विवादित शब्द का दोबारा इस्तेमाल यह दर्शाता है कि भारतीय राजनीति में महिलाओं के खिलाफ किस तरह पुरानी शब्दावली को नए सिरे से दोहराया जाता है। एनसीपी नेताओं का स्पष्ट कहना है कि एक संवैधानिक पद पर बैठी महिला नेता के लिए इस प्रकार की भाषा का प्रयोग बेहद अमर्यादित और अस्वीकार्य है।
सुनेत्रा पवार को लेकर शुरू हुए इस नए विवाद ने विपक्ष को रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया है, जबकि सत्तारूढ़ खेमा इसे महिलाओं के अपमान से जोड़कर आक्रामक रुख अपनाए हुए है।

महिला पहलवान यौन उत्पीड़न मामला: दिल्ली कोर्ट ने बृजभूषण शरण सिंह को किया बरी
दिल्ली के राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को बड़ी राहत देते हुए 6 महिला पहलवानों द्वारा दर्ज कराए गए यौन उत्पीड़न के मामले में बरी कर दिया है। कोर्ट ने सह-आरोपी विनोद तोमर को भी सभी आरोपों से मुक्त कर दिया, जिससे लंबे समय से चला आ रहा यह विवाद एक नए मोड़ पर पहुंच गया है।
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दिल्ली के राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को बड़ी राहत देते हुए 6 महिला पहलवानों द्वारा दर्ज कराए गए यौन उत्पीड़न के मामले में बरी कर दिया है। कोर्ट ने सह-आरोपी विनोद तोमर को भी सभी आरोपों से मुक्त कर दिया, जिससे लंबे समय से चला आ रहा यह विवाद एक नए मोड़ पर पहुंच गया है।
महिला पहलवानों से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में पूर्व WFI अध्यक्ष बरी
भारतीय कुश्ती जगत और देश की राजनीति में लंबे समय तक सुर्खियों में रहे यौन उत्पीड़न मामले में दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने भारतीय कुश्ती संघ (WFI) के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह को 6 महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया है। इस फैसले के साथ ही देश की राजनीति और खेल जगत में एक बार फिर गर्माहट आ गई है।
सह-आरोपी विनोद तोमर को भी मिली राहत
अदालत ने केवल बृजभूषण शरण सिंह को ही नहीं, बल्कि इस मामले में नामज़द एक अन्य आरोपी और भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व सहायक सचिव विनोद तोमर को भी दोषमुक्त कर दिया है। दोनों पर महिला पहलवानों के साथ कथित तौर पर यौन उत्पीड़न और डराने-धमकाने के गंभीर आरोप लगाए गए थे। कोर्ट द्वारा साक्ष्यों और तर्कों की गहन समीक्षा के बाद दोनों को राहत देने का फैसला सुनाया गया।
जंतर-मंतर से उठी विरोध की चिंगारी और लंबा कानूनी सफर
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई थी जब देश के शीर्ष पहलवानों ने दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन शुरू किया था। पहलवान विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले एथलीटों ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ मोर्चा खोला था। महीनों चले इस विरोध प्रदर्शन ने न सिर्फ मीडिया का ध्यान खींचा, बल्कि संसद से लेकर सड़कों तक तीखी बहस को जन्म दिया था।
महिला पहलवानों ने महासंघ के अध्यक्ष पर अपने पद का दुरुपयोग करने और महिला खिलाड़ियों का मानसिक व शारीरिक शोषण करने के संगीन आरोप लगाए थे। लंबी खींचतान और सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद दिल्ली पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज की थी और चार्जशीट दाखिल की थी।
फैसले का खेल और राजनीति पर असर
अदालत का यह फैसला भारतीय कुश्ती और राजनीतिक गलियारों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। एक तरफ जहां बृजभूषण शरण सिंह और उनके समर्थकों के लिए यह कानूनी जीत के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इस फैसले ने आंदोलनकारी पहलवानों की कानूनी लड़ाई पर बड़ा विराम लगा दिया है।
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