
चोल साम्राज्य: मध्यकालीन भारत का गौरवशाली समुद्री और प्रशासनिक इतिहास
चोल साम्राज्य (9वीं-13वीं शताब्दी) मध्यकालीन भारत की सबसे शक्तिशाली राजधानियों में से एक था। हाल ही में नीदरलैंड से 'लीडेन प्लेट्स' (Leiden Plates) की भारत वापसी और तमिलनाडु में चोलकालीन स्वर्ण मुद्राओं की खोज ने इस साम्राज्य के प्रशासनिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक वैभव को फिर से चर्चा में ला दिया है।
खबर का निचोड़ (Summary)
चोल साम्राज्य (9वीं-13वीं शताब्दी) मध्यकालीन भारत की सबसे शक्तिशाली राजधानियों में से एक था। हाल ही में नीदरलैंड से 'लीडेन प्लेट्स' (Leiden Plates) की भारत वापसी और तमिलनाडु में चोलकालीन स्वर्ण मुद्राओं की खोज ने इस साम्राज्य के प्रशासनिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक वैभव को फिर से चर्चा में ला दिया है।
विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis)
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विस्तार
चोलों का उदय 9वीं शताब्दी में विजयलय द्वारा तंजावुर (तंजौर) को राजधानी बनाकर हुआ था। राजराज प्रथम और राजेंद्र प्रथम के शासनकाल में यह साम्राज्य अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचा। चोलों ने न केवल दक्षिण भारत को एकीकृत किया, बल्कि श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्वी एशिया (श्रीविजया साम्राज्य) तक अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उनकी नौसैनिक शक्ति इतनी सुदृढ़ थी कि बंगाल की खाड़ी को 'चोल झील' के रूप में जाना जाता था।
प्रशासनिक उत्कृष्ट और स्थानीय स्वशासन
चोलों की सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी अत्यधिक संगठित प्रशासनिक प्रणाली थी। संपूर्ण साम्राज्य 'मंडलम' (प्रांतों) में विभाजित था, जो आगे 'वलनाडु' और 'नाडु' (जिलों) में बंटे हुए थे। चोल प्रशासन अपनी स्वायत्त ग्राम सभाओं (उर और सभा) के लिए विश्व प्रसिद्ध है। 'उत्तरमेरूर शिलालेख' से स्थानीय स्वशासन और 'कुडावोलई' (लॉटरी द्वारा चयन) प्रणाली के साक्ष्य मिलते हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रारंभिक उदाहरण माने जाते हैं।
आर्थिक और समुद्री व्यापार
चोल शासकों ने विदेशी व्यापार के लिए एक व्यापक नेटवर्क तैयार किया था। नागपट्टिनम और कावेरीपट्टिनम जैसे बंदरगाह व्यापारिक गतिविधियों के केंद्र थे। चोलों के संबंध चीन, अरब जगत और दक्षिण-पूर्वी एशिया के साथ गहरे थे। हाल ही में नीदरलैंड से वापस लाई गई लीडेन ताम्रपत्र (Leiden Plates) इस बात का प्रमाण है कि चोल राजाओं ने नागपट्टिनम में 'चूड़ामणि विहार' जैसे बौद्ध केंद्रों को दान देकर धार्मिक सहिष्णुता और कूटनीतिक संबंध स्थापित किए थे।
कला, वास्तुकला और नवीनतम पुरातात्विक साक्ष्य
चोल वास्तुकला द्रविड़ शैली का चरमोत्कर्ष है। तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर और गंगईकोंडचोलपुरम इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। चोलकालीन कांस्य मूर्तियां (विशेषकर नटराज की प्रतिमा) अपनी धातु-ढलाई तकनीक के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। हाल ही में तमिलनाडु के जाव्वदु हिल्स के पास एक शिव मंदिर में 103 स्वर्ण मुद्राएं मिली हैं, जो चोलकालीन अर्थव्यवस्था की समृद्धि और मंदिर-केंद्रित व्यापारिक नेटवर्क को पुष्ट करती हैं।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण फैक्ट्स (UPSC/SSC)
संस्थापक: विजयलय (850 ईस्वी)।
प्रमुख शासक: राजराज प्रथम (बृहदेश्वर मंदिर निर्माता) और राजेंद्र प्रथम (गंगा की विजय और नौसैनिक अभियान)।
प्रशासनिक इकाई: मंडलम > वलनाडु > नाडु > ग्राम (उर/सभा)।
कुडावोलई (Kudavolai): चोल प्रशासन में स्थानीय सभा के सदस्यों को चुनने की चुनावी प्रणाली।
साहित्य: तमिल साहित्य का स्वर्ण युग, 'कंबन' (रामायण के रचयिता) इसी काल में हुए।
लीडेन ताम्रपत्र: इसमें राजराज प्रथम और राजेंद्र प्रथम द्वारा बौद्ध विहार को दिए गए अनुदान का विवरण है; यह 160 वर्षों बाद भारत लौटा है।
राजस्व: मुख्य स्रोत भू-राजस्व था, जिसे 'कडामई' (Kadamai) कहा जाता था।

बांदीपुर और नागरहोल टाइगर रिजर्व: पारिस्थितिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण
कर्नाटक सरकार ने बांदीपुर और नागरहोल टाइगर रिजर्व में जंगल सफारी को पुनः बहाल कर दिया है। नवंबर 2025 से मानव-बाघ संघर्ष के कारण इन्हें बंद कर दिया गया था। यह निर्णय पारिस्थितिक पर्यटन को बढ़ावा देने और इन संरक्षित क्षेत्रों में जैव-विविधता प्रबंधन को पुनः सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से लिया गया है।
खबर का निचोड़
कर्नाटक सरकार ने बांदीपुर और नागरहोल टाइगर रिजर्व में जंगल सफारी को पुनः बहाल कर दिया है। नवंबर 2025 से मानव-बाघ संघर्ष के कारण इन्हें बंद कर दिया गया था। यह निर्णय पारिस्थितिक पर्यटन को बढ़ावा देने और इन संरक्षित क्षेत्रों में जैव-विविधता प्रबंधन को पुनः सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से लिया गया है।
विस्तृत विश्लेषण
पृष्ठभूमि और प्रशासनिक निर्णय
कर्नाटक के बांदीपुर और नागरहोल टाइगर रिजर्व में पर्यटन गतिविधियों का निलंबन मुख्य रूप से मानव-वन्यजीव संघर्ष और क्षेत्र में बाघों की बढ़ती सक्रियता के कारण किया गया था। प्रशासनिक स्तर पर यह निर्णय सुरक्षा प्रोटोकॉल और वन्यजीव गलियारों (wildlife corridors) के संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए लिया गया था। अब, स्थितियों के सामान्य होने और सुरक्षा उपायों के सुदृढ़ीकरण के बाद, वन विभाग ने सफारी को पूरी तरह संचालित करने की अनुमति दी है।
पारिस्थितिक महत्व और अवस्थिति
ये दोनों टाइगर रिजर्व नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व के अभिन्न अंग हैं, जो भारत का पहला और सबसे महत्वपूर्ण बायोस्फीयर रिजर्व है। भौगोलिक रूप से, ये पश्चिमी घाट के हॉटस्पॉट में स्थित हैं। यहाँ की पारिस्थितिकी का महत्व इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि ये मुदुमलाई (तमिलनाडु) और वायनाड (केरल) के साथ मिलकर दुनिया के सबसे बड़े निरंतर संरक्षित वन परिदृश्यों में से एक का निर्माण करते हैं। काबिनी जलाशय इन दोनों अभयारण्यों के बीच एक प्राकृतिक सीमा का कार्य करता है, जो वन्यजीवों के जल स्रोतों तक पहुंच सुनिश्चित करता है।
वन्यजीव संरक्षण और प्रोजेक्ट टाइगर
बांदीपुर टाइगर रिजर्व का इतिहास 1973 से जुड़ा है, जब इसे 'प्रोजेक्ट टाइगर' के तहत पहले नौ बाघ अभयारण्यों में से एक के रूप में अधिसूचित किया गया था। नागरहोल, जिसे राजीव गांधी नेशनल पार्क के रूप में भी जाना जाता है, 2003 में टाइगर रिजर्व घोषित किया गया। ये क्षेत्र मुख्य रूप से बाघों और एशियाई हाथियों की उच्चतम घनत्व वाली आबादी के लिए जाने जाते हैं।
वनस्पति और जैव-विविधता
यहाँ की वनस्पति में उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती, शुष्क पर्णपाती और झाड़ीदार वनों का मिश्रण पाया जाता है। सागौन और बांस के सघन वन क्षेत्र न केवल वन्यजीवों को आवास प्रदान करते हैं, बल्कि कार्बन सिंक के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहाँ लेपर्ड, ढोल (एशियाई जंगली कुत्ता), स्लॉथ बीयर, माउस डियर और चौसिंगा जैसे दुर्लभ प्राणी भी पाए जाते हैं, जो इन रिजर्व को शोध और संरक्षण का प्रमुख केंद्र बनाते हैं।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य (UPSC/SSC)
बायोस्फीयर रिजर्व: बांदीपुर और नागरहोल 'नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व' का हिस्सा हैं।
प्रोजेक्ट टाइगर: बांदीपुर 1973 के मूल नौ बाघ अभयारण्यों में शामिल है।
भौगोलिक सीमा: काबिनी नदी और उसका जलाशय इन दोनों पार्कों को विभाजित करता है।
लैंडस्केप: ये रिजर्व 'नीलगिरी क्लस्टर' का हिस्सा हैं, जो भारत में सबसे अधिक बाघ घनत्व वाले क्षेत्रों में से एक है।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WPA), 1972: इन रिजर्वों का प्रबंधन इसी अधिनियम की धाराओं के तहत 'कोर' और 'बफर' जोन के रूप में किया जाता है।

एयर सुविधा 2.0: स्वास्थ्य निगरानी और हवाई यात्रा सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण
नागरिक उड्डयन मंत्रालय और दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड ने 'एयर सुविधा 2.0' पोर्टल लॉन्च किया है। यह एक संपर्क रहित स्वास्थ्य स्व-घोषणा डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के माध्यम से होने वाली संक्रामक बीमारियों की निगरानी करना है। यह प्रणाली डेटा को वास्तविक समय में संबंधित स्वास्थ्य एजेंसियों के साथ साझा करती है।
खबर का निचोड़
नागरिक उड्डयन मंत्रालय और दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड ने 'एयर सुविधा 2.0' पोर्टल लॉन्च किया है। यह एक संपर्क रहित स्वास्थ्य स्व-घोषणा डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के माध्यम से होने वाली संक्रामक बीमारियों की निगरानी करना है। यह प्रणाली डेटा को वास्तविक समय में संबंधित स्वास्थ्य एजेंसियों के साथ साझा करती है।
विस्तृत विश्लेषण
पोर्टल का उद्देश्य और कार्यप्रणाली
एयर सुविधा 2.0 का मुख्य उद्देश्य भारत में प्रवेश करने वाले अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की स्वास्थ्य निगरानी को डिजिटल और सुगम बनाना है। यह पोर्टल वैश्विक स्वास्थ्य आपात स्थितियों, जैसे कि इबोला/बुंडिबुग्यो वायरस के प्रकोप के मद्देनजर, सीमा पर सुरक्षा प्रोटोकॉल को मजबूत करता है। अंतरराष्ट्रीय आगमन वाले यात्रियों के लिए अब इमिग्रेशन प्रक्रिया से पूर्व पोर्टल पर स्वास्थ्य स्व-घोषणा करना अनिवार्य है। इसमें पिछले 21 दिनों का यात्रा इतिहास, संभावित संक्रमण का विवरण और संबंधित लक्षणों की रिपोर्टिंग शामिल है।
अंतर-विभागीय समन्वय
इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता इसका तकनीकी एकीकरण है। पोर्टल के माध्यम से प्राप्त जानकारी को एयरपोर्ट हेल्थ ऑफिसर (APHO), ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन, इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (IDSP) और राज्य निगरानी अधिकारियों के साथ वास्तविक समय (real-time) में साझा किया जाता है। यह निर्बाध डेटा प्रवाह संभावित रूप से संक्रमित या जोखिम वाले यात्रियों की पहचान करने और उन्हें तुरंत चिकित्सकीय सहायता या क्वारंटाइन में भेजने में सक्षम बनाता है।
बुंडिबुग्यो वायरस रोग की समझ
बुंडिबुग्यो वायरस रोग (BVD) इबोला वायरस परिवार का एक दुर्लभ लेकिन अत्यंत घातक वायरल हेमोरेजिक फीवर है। यह रोग मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के रक्त या शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क में आने से फैलता है। इसके अतिरिक्त, संक्रमित जानवरों जैसे चमगादड़ या गैर-मानव प्राइमेट्स का संपर्क भी संक्रमण का कारण बनता है। इसके नैदानिक लक्षणों में तीव्र बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द और आंतरिक रक्तस्राव शामिल हैं। वर्तमान में, इस रोग के लिए कोई विशिष्ट वैक्सीन या स्वीकृत उपचार उपलब्ध नहीं है, जो इसे वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बनाता है।
प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
नोडल एजेंसियां: इस पोर्टल का विकास नागरिक उड्डयन मंत्रालय और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।
PHEIC का महत्व: जब WHO किसी प्रकोप को 'अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल' (PHEIC) घोषित करता है, तो सदस्य देशों के लिए अपनी सीमा निगरानी बढ़ाना अनिवार्य हो जाता है।
निगरानी तंत्र: एयर सुविधा पोर्टल का उपयोग करना 'IDSP' (एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम) के तहत आता है, जो भारत में संक्रामक रोगों की शुरुआती पहचान के लिए प्रमुख तंत्र है।
वैश्विक संदर्भ: बुंडिबुग्यो वायरस का नाम पहली बार 2007 में युगांडा के बुंडिबुग्यो जिले में हुए प्रकोप के कारण पड़ा था।

पीसीपीएनडीटी अधिनियम: लिंग चयन पर प्रतिबंध और वर्तमान चुनौतियां
पीसीपीएनडीटी अधिनियम, 1994, गिरते बाल लिंगानुपात को रोकने हेतु भ्रूण लिंग निर्धारण और चयन को प्रतिबंधित करता है। वर्तमान में पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड उपकरणों के प्रसार के कारण कानून के क्रियान्वयन और स्वास्थ्य पहुंच के बीच संतुलन बनाने पर चर्चा तेज हो गई है, जिससे अधिनियम में सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
खबर का निचोड़
पीसीपीएनडीटी अधिनियम, 1994, गिरते बाल लिंगानुपात को रोकने हेतु भ्रूण लिंग निर्धारण और चयन को प्रतिबंधित करता है। वर्तमान में पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड उपकरणों के प्रसार के कारण कानून के क्रियान्वयन और स्वास्थ्य पहुंच के बीच संतुलन बनाने पर चर्चा तेज हो गई है, जिससे अधिनियम में सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और अधिनियम का उद्देश्य
भारत में घटते बाल लिंगानुपात की चिंताजनक स्थिति को नियंत्रित करने के लिए 1994 में पीसीपीएनडीटी अधिनियम लागू किया गया था। इस कानून का प्राथमिक उद्देश्य भ्रूण लिंग परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक कुरीतियों को कानूनी रूप से रोकना था। 2003 के संशोधनों ने इसके दायरे को विस्तृत करते हुए आधुनिक प्रजनन तकनीकों के माध्यम से 'गर्भधारण-पूर्व' (pre-conception) लिंग चयन पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
प्रमुख विनियामक प्रावधान
अधिनियम के तहत सभी आनुवंशिक परामर्श केंद्रों, प्रयोगशालाओं और अल्ट्रासाउंड क्लीनिकों का पंजीकरण अनिवार्य है। इन केंद्रों को केवल विशिष्ट आनुवंशिक या जन्मजात विकारों का पता लगाने के लिए ही डायग्नोस्टिक तकनीक का उपयोग करने की अनुमति है। लिंग निर्धारण का संकेत देने वाले विज्ञापन देना या ऐसा कार्य करना कानूनी अपराध है। प्रत्येक पंजीकृत केंद्र के लिए प्रक्रियाओं का विस्तृत रिकॉर्ड रखना अनिवार्य है, और इसमें चूक को अधिनियम का गंभीर उल्लंघन माना जाता है।
कानूनी दंड और प्रवर्तन
अधिनियम के उल्लंघन पर कठोर दंड का प्रावधान है। प्रथम अपराध के लिए तीन वर्ष तक का कारावास और दस हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। बार-बार अपराध करने पर पांच वर्ष तक का कारावास और भारी जुर्माने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त, दोषी चिकित्सा पेशेवरों का पंजीकरण राज्य चिकित्सा परिषद द्वारा निलंबित या रद्द किया जा सकता है।
पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड और उभरती चुनौतियां
वर्तमान में तकनीकी प्रगति के साथ पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनों का उपयोग बढ़ा है। ये मशीनें सुदूर और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को सुगम बनाती हैं, परंतु इनके दुरुपयोग की संभावना ने नीति निर्माताओं के समक्ष एक चुनौती खड़ी कर दी है। विशेषज्ञ वर्ग का मानना है कि अधिनियम के मौजूदा सख्त प्रावधानों के कारण कई बार डॉक्टरों को स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने में संकोच होता है। अतः, कानून को अधिक सुदृढ़ और व्यावहारिक बनाने की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि प्रौद्योगिकी का उपयोग जनहित में हो, न कि सामाजिक अपराधों को बढ़ावा देने के लिए।
परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (UPSC/SSC)
नोडल मंत्रालय: यह अधिनियम स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत आता है।
अधिनियम का मूल उद्देश्य: 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान के साथ तालमेल बिठाते हुए लिंगानुपात में सुधार लाना।
निगरानी तंत्र: अधिनियम के अंतर्गत राज्य और जिला स्तर पर उचित प्राधिकरण (Appropriate Authorities) और सलाहकार समितियां गठित की जाती हैं।
अधिनियम की सीमा: यह कानून केवल 'लिंग के चयन' और 'लिंग निर्धारण' को रोकता है; यह चिकित्सा उपचार या डायग्नोस्टिक तकनीक के उपयोग का विरोधी नहीं है, बशर्ते वह कानूनी दायरे में हो।
महत्वपूर्ण सांख्यिकी: यूपीएससी परीक्षा के लिए 'नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे' (NFHS-5) के लिंगानुपात से संबंधित आंकड़ों का अध्ययन करना अत्यंत प्रासंगिक है।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो रिपोर्ट 2025: भारत की आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां
केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी ‘नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) वार्षिक रिपोर्ट 2025’ के अनुसार, अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा अफीम पर प्रतिबंध के बाद म्यांमार वैश्विक अफीम आपूर्ति के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा है। रिपोर्ट में म्यांमार में अफीम की खेती में 56% की भारी वृद्धि पर चिंता जताई गई है, जो भारत की आंतरिक सुरक्षा और मादक पदार्थों की तस्करी के लिए नई चुनौती है।
खबर का निचोड़
केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी ‘नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) वार्षिक रिपोर्ट 2025’ के अनुसार, अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा अफीम पर प्रतिबंध के बाद म्यांमार वैश्विक अफीम आपूर्ति के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा है। रिपोर्ट में म्यांमार में अफीम की खेती में 56% की भारी वृद्धि पर चिंता जताई गई है, जो भारत की आंतरिक सुरक्षा और मादक पदार्थों की तस्करी के लिए नई चुनौती है।
विस्तृत विश्लेषण
बदलती वैश्विक ड्रग आपूर्ति श्रृंखला
ऐतिहासिक रूप से 'गोल्डन क्रिसेंट' (अफगानिस्तान, ईरान और पाकिस्तान) वैश्विक अफीम उत्पादन का केंद्र रहा है। वर्ष 2022 में तालिबान द्वारा अफीम उत्पादन पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक बड़ा बदलाव आया है। इसके परिणामस्वरूप, 'गोल्डन ट्राएंगल' (म्यांमार, लाओस और थाईलैंड) में अवैध गतिविधियों में पुनरुत्थान देखा गया है। विशेष रूप से म्यांमार अब अफीम के प्रमुख वैकल्पिक स्रोत के रूप में स्थापित हो गया है।
म्यांमार में अफीम खेती का विस्तार
NCB की रिपोर्ट के अनुसार, 2021 और 2023 के बीच म्यांमार में अफीम की अवैध खेती में लगभग 56% की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है। वर्तमान में यहाँ अफीम की खेती का कुल क्षेत्रफल 45,200 हेक्टेयर तक पहुँच गया है। यह डेटा इस क्षेत्र में मादक पदार्थों के उत्पादन की बढ़ती तीव्रता और संगठित अपराध नेटवर्क के विस्तार को दर्शाता है।
भारत के लिए सुरक्षा निहितार्थ
म्यांमार के साथ भारत की लगभग 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा है। पूर्वोत्तर राज्यों के माध्यम से म्यांमार की यह बढ़ती अफीम आपूर्ति भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। इससे न केवल देश के भीतर मादक पदार्थों के सेवन की समस्या बढ़ रही है, बल्कि यह क्षेत्र में उग्रवादी समूहों को वित्तपोषित करने (नार्को-टेररिज्म) के लिए भी एक साधन बन रहा है।
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की भूमिका और चुनौतियां
NCB इस चुनौती से निपटने के लिए पड़ोसी देशों की सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय बढ़ा रहा है। रिपोर्ट में सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी तंत्र को सुदृढ़ करने और समुद्री मार्गों पर विशेष सतर्कता बरतने पर जोर दिया गया है। भारत 'नशा मुक्त भारत अभियान' के माध्यम से मांग में कमी (Demand Reduction) और तस्करी की रोकथाम (Supply Reduction) दोनों मोर्चों पर काम कर रहा है।
परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण तथ्य
गोल्डन ट्राएंगल (Golden Triangle): इसमें दक्षिण-पूर्व एशिया के तीन देश शामिल हैं - म्यांमार, लाओस और थाईलैंड।
गोल्डन क्रिसेंट (Golden Crescent): इसमें दक्षिण-पश्चिम एशिया के देश शामिल हैं - अफगानिस्तान, ईरान और पाकिस्तान।
संवैधानिक प्रावधान: मादक पदार्थों का व्यापार और तस्करी भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत एक गंभीर आपराधिक विषय है। एनडीपीएस अधिनियम, 1985 (NDPS Act) भारत में नशीले पदार्थों से संबंधित मुख्य कानून है।
NCB का गठन: नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की स्थापना 1986 में नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 के प्रावधानों के तहत की गई थी।
प्रमुख चिंता: म्यांमार में अस्थिर राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाकर अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट्स का सक्रिय होना भारत की 'एक्ट ईस्ट नीति' और सीमावर्ती राज्यों की सुरक्षा के लिए एक बड़ी बाधा है।
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