
मालाबार 2026 नौसेना अभ्यास में भाग लेने जापान पहुंचा INS सह्याद्री
बहुपक्षीय नौसैन्य अभ्यास 'मालाबार 2026' में हिस्सा लेने के लिए भारतीय नौसेना का स्वदेशी युद्धपोत 'आईएनएस सह्याद्री' जापान के योकोसुका नेवल बेस पहुंच गया है। भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की नौसेनाओं के बीच यह अभ्यास इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और आपसी तालमेल को मजबूत करेगा।
क्या है मालाबार अभ्यास और भागीदार देश
मालाबार 2026 एक प्रमुख बहुपक्षीय नौसैन्य अभ्यास है, जिसमें चार मुख्य देश—भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया भाग ले रहे हैं। इस अभ्यास का प्राथमिक उद्देश्य भाग लेने वाली नौसेनाओं के बीच परिचालन समन्वय, अंतर-संचालनीयता (Interoperability) को मजबूत करना और समुद्री विशेषज्ञता का आदान-प्रदान करना है। यह आयोजन 'मुक्त और खुले इंडो-पैसिफिक' के साझा दृष्टिकोण को सशक्त बनाता है।
अभ्यास का इतिहास और विस्तार
मालाबार अभ्यास की शुरुआत वर्ष 1992 में भारत और अमेरिका के बीच एक द्विपक्षीय नौसेना अभ्यास के रूप में हुई थी। वर्ष 2007 में बंगाल की खाड़ी में पहली बार इसका विस्तृत आयोजन किया गया। इसके बाद वर्ष 2015 में जापान को इसमें स्थायी सदस्य के रूप में शामिल किया गया, जिससे यह त्रिपक्षीय रूप में बदल गया। वर्ष 2020 में ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के शामिल होने से यह चार देशों (क्वाड समूह) का एक शक्तिशाली नौसैन्य अभ्यास बन गया। यह अभ्यास प्रतिवर्ष बारी-बारी से हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में आयोजित किया जाता है।
अभ्यास के दो प्रमुख चरण
मालाबार 2026 का आयोजन दो मुख्य चरणों में किया जा रहा है। पहला 'हार्बर फेज' (Harbour Phase) है, जिसमें भाग लेने वाले देशों के नौसैनिक अधिकारियों के बीच पेशेवर बातचीत, रणनीतिक सत्र और समन्वित योजनाएं शामिल हैं। इसके बाद 'सी फेज' (Sea Phase) आयोजित किया जाएगा, जिसमें आईएनएस सह्याद्री और अन्य तीनों देशों की नौसैनिक इकाइयां समुद्र में जटिल युद्ध अभियानों और लाइव-फायर ड्रिल्स को एक साथ अंजाम देंगी।
रणनीतिक महत्व और महासागर विजन
आईएनएस सह्याद्री की इस भागीदारी से भारत की समुद्री साझेदारी को और अधिक मजबूती मिलेगी। यह तैनाती भारत सरकार के विजन 'महासागर' (MAHASAGAR - Mutual and Holistic Advancement for Security and Growth Across Regions) के पूरी तरह अनुकूल है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा, सहयोग और स्थिरता को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के 'गैया' मिशन ने खोजा दुर्लभ डबल स्टार क्लस्टर
भारतीय खगोलविदों के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के 'गैया' मिशन के डेटा का उपयोग करके स्टार क्लस्टर 'UBC 63' को एक डबल क्लस्टर सिस्टम के रूप में फिर से परिभाषित किया है। अंतरिक्ष अनुसंधान की दिशा में यह एक बड़ी और महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
गैया मिशन और इसका उद्देश्य
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा साल 2013 में लॉन्च किए गए 'गैया' मिशन का मूल नाम 'ग्लोबल एयरोमेट्रिक इंटरफेरोमीटर फॉर एस्ट्रोफिज़िक्स' है। इसे मुख्य रूप से हमारी आकाशगंगा (Milky Way) का सबसे सटीक और विस्तृत 3D नक्शा तैयार करने के लिए डिजाइन किया गया था। इस अंतरिक्ष यान को पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किलोमीटर दूर 'लैग्रेंज पॉइंट 2' (L2) पर स्थापित किया गया है।
वैज्ञानिक उपकरण और तकनीक
गैया अंतरिक्ष यान में दोहरी दूरबीनें (Twin Telescopes) और लगभग 1 बिलियन पिक्सेल वाला एक शक्तिशाली डिजिटल कैमरा लगा है, जो अंतरिक्ष में भेजा गया अब तक का सबसे बड़ा कैमरा है। इसमें तीन मुख्य उपकरण शामिल हैं: खगोलीय पिंडों की सटीक स्थिति मापने वाला एस्टरोमीटर, तारों की चमक व तापमान मापने वाला फोटोमीटर, और उनकी रासायनिक संरचना व गति की पहचान करने वाला स्पेक्ट्रोमीटर।
क्या है UBC 63?
UBC 63 पृथ्वी से लगभग 4,892 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित एक कम घनी आबादी वाला और गुरुत्वाकर्षण से शिथिल रूप से बंधा हुआ 'गैलेक्टिक ओपन क्लस्टर' है। पहले इसे एक एकल तारा समूह (Single star cluster) माना जाता था, लेकिन गैया मिशन के आधुनिक डेटा और भारतीय खगोलविदों के विश्लेषण से अब यह खुलासा हुआ है कि यह वास्तव में दो अलग-अलग और विशिष्ट तारा समूहों से मिलकर बना एक डबल क्लस्टर सिस्टम है।

परमाणु ऊर्जा में निजी निवेश: AERB का सुरक्षा से समझौता न करने का भरोसा
परमाणु ऊर्जा नियामक परिषद (AERB) के अध्यक्ष ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों के प्रवेश को लेकर जताई जा रही चिंताओं को खारिज किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि निजी भागीदारी के बावजूद सुरक्षा और विनियामक मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। 1983 में स्थापित AERB भारत में परमाणु सुरक्षा की शीर्ष नियामक संस्था है।
AERB का गठन और विनियामक अधिकार
परमाणु ऊर्जा नियामक परिषद (AERB) भारत में परमाणु और विकिरण सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली शीर्ष संस्था है। इसका गठन 15 नवंबर 1983 को परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 के तहत भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया गया था। AERB के अधिकार परमाणु ऊर्जा अधिनियम और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत बनाए गए नियमों से प्राप्त होते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परमाणु ऊर्जा के उपयोग से जनता के स्वास्थ्य और पर्यावरण को कोई खतरा न हो।
संगठन और प्रशासनिक संरचना
AERB का मुख्यालय मुंबई में स्थित है। बोर्ड में कुल छह सदस्य होते हैं, जिनमें अध्यक्ष सहित दो पूर्णकालिक सदस्य शामिल हैं। परिषद परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) को अपनी रिपोर्ट सौंपती है, जो सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करता है। क्षेत्रीय स्तर पर निगरानी के लिए कोलकाता, चेन्नई और नई दिल्ली में क्षेत्रीय विनियामक केंद्र (RRCs) कार्यरत हैं, जबकि कलपक्कम में सुरक्षा अनुसंधान संस्थान (SRI) स्थित है।
प्रमुख कार्य और जिम्मेदारियां
AERB परमाणु और विकिरण सुविधाओं के लिए सुरक्षा नीतियां, कोड और मानक तैयार करता है। यह संयंत्रों की स्थापना से लेकर उनके चालू होने और विघटन (Decommissioning) तक के सभी चरणों के लिए लाइसेंस और स्वीकृतियां प्रदान करता है। इसके अलावा, संस्था विकिरण जोखिम की सीमा तय करने, आपातकालीन तैयारियों की समीक्षा करने और कर्मचारियों के प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों को निर्धारित करने का कार्य भी करती है।
निजी क्षेत्र का प्रवेश और सख्त निगरानी
परमाणु क्षेत्र में निजी भागीदारी के नए प्रस्तावों के बावजूद, AERB विनियामक समीक्षाओं, नियमित सुरक्षा निरीक्षणों और सख्त प्रवर्तन प्रणालियों के माध्यम से सुरक्षा मानकों को लागू करना जारी रखेगा। बोर्ड यह सुनिश्चित करेगा कि निजी ऑपरेटरों द्वारा स्थापित और संचालित सभी इकाइयां स्थापित अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सुरक्षा मानदंडों का पूरी तरह से पालन करें।

महिला MSMEs को गति देने के लिए आत्मनिर्भर भारत फंड पर कार्यशाला आयोजित
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) मंत्रालय ने महिला नेतृत्व वाले उद्यमों को बढ़ावा देने के लिए 'आत्मनिर्भर भारत फंड' (SRI Fund) पर एक जागरूकता कार्यशाला का आयोजन किया। ₹50,000 करोड़ का यह फंड देश के MSMEs को विकास पूंजी प्रदान कर उन्हें वैश्विक मंच पर स्थापित करने में मदद कर रहा है।
50,000 करोड़ रुपये का विशाल वित्तीय ढांचा
आत्मनिर्भर भारत फंड की स्थापना विकास क्षमता रखने वाले MSMEs में ₹50,000 करोड़ की इक्विटी पूंजी जुटाने के उद्देश्य से की गई है। इस विशाल कॉर्पस में भारत सरकार द्वारा ₹10,000 करोड़ का योगदान दिया गया है, जबकि शेष ₹40,000 करोड़ की राशि प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल (PE/VC) फंडों के माध्यम से जुटाई जा रही है।
'मदर-फंड और डॉटर-फंड' की अनूठी संरचना
यह फंड 'मदर-फंड और डॉटर-फंड' संरचना (Mother-fund and Daughter-fund structure) के तहत काम करता है। इसे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के पास पंजीकृत श्रेणी-II अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड 'NSIC वेंचर कैपिटल फंड लिमिटेड' (NVCFL) द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है। MSME मंत्रालय इस फंड का एंकर निवेशक है। नियम के अनुसार, डॉटर फंड्स को SRI फंड से प्राप्त राशि का कम से कम 5 गुना निवेश पात्र MSMEs में करना अनिवार्य है।
योजना के मुख्य उद्देश्य और प्रभाव
SRI फंड का मुख्य उद्देश्य एमएसएमई इकाइयों को इक्विटी या क्वैसी-इक्विटी के रूप में विकास पूंजी प्रदान करना है, ताकि वे शेयर बाजार में सूचीबद्ध (Listing) हो सकें। इसके अतिरिक्त, यह फंड देश में रोजगार के अवसर पैदा करने, तकनीकी रूप से आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने और होनहार MSMEs को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के चैंपियन उद्यमों में बदलने में मदद करता है।

मालाबार ट्री टॉड बना कर्नाटक का आधिकारिक राज्य उभयचर
कर्नाटक सरकार ने दुर्लभ और संकटग्रस्त 'मालाबार ट्री टॉड' को अपना राज्य उभयचर घोषित किया है। इस तरह की आधिकारिक घोषणा करने वाला कर्नाटक देश का पहला राज्य बन गया है। पश्चिमी घाट में पाई जाने वाली यह अनोखी प्रजाति मुख्य रूप से पेड़ों पर रहने के लिए जानी जाती है।
100 से अधिक वर्षों बाद पुनः खोज
वैज्ञानिक रूप से 'पेदोस्टिब्स ट्यूबरकुलोसस' नाम से जाना जाने वाला यह ट्री टॉड 'पेदोस्टिब्स' वंश की एकमात्र प्रजाति है। इस प्रजाति की खोज सबसे पहले वर्ष 1876 में हुई थी, लेकिन इसके बाद 100 से अधिक वर्षों तक इसका कोई सुराग नहीं मिला। लंबे अंतराल के बाद वर्ष 1980 में इसे केरल के साइलेंट वैली नेशनल पार्क में फिर से देखा गया था।
पेड़ों पर रहने वाला अनोखा उभयचर
अधिकांश बिच्छू या मेंढकों के विपरीत जो जमीन पर रहते हैं, मालाबार ट्री टॉड भारत की एकमात्र ऐसी टॉड प्रजाति है जो पेड़ों पर चढ़ने और वहां रहने में सक्षम है। यह मुख्य रूप से समुद्र तल से 50 मीटर से 1000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित सदाबहार और नम पर्णपाती जंगलों, पेड़ों के खोखलों और नदियों के किनारों पर पाया जाता है। यह भारत के पश्चिमी घाट क्षेत्र के लिए स्थानिक (Endemic) है।
मानसून पूर्व का विशेष प्रजनन चक्र
इस प्रजाति की एक और अनूठी विशेषता इसका प्रजनन चक्र है। जहां अधिकांश उभयचर मानसून के दौरान या उसके बाद प्रजनन करते हैं, वहीं मालाबार ट्री टॉड का प्रजनन काल मानसून से ठीक पहले मार्च से जून के बीच होता है। इस दौरान ये पेड़ों से नीचे उतरकर नदियों और धाराओं के किनारों पर बने पानी के छोटे कुंडों में अंडे देने आते हैं।
संरक्षण स्थिति और कानूनी सुरक्षा
अपनी सीमित आबादी और विशिष्ट आवास के कारण मालाबार ट्री टॉड को आईयूसीएन (IUCN) की रेड लिस्ट में 'संकटग्रस्त' (Endangered) श्रेणी में रखा गया है। इसके अलावा, भारत के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत इसे अनुसूची II (Schedule II) में कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई है। कर्नाटक सरकार द्वारा इसे राज्य उभयचर घोषित किए जाने से इसके संरक्षण और इसके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा के प्रयासों को और गति मिलेगी।
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