
अंतरिक्ष में दो दशक गुजारने वाला नासा का स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी धरती पर लौटा
नासा का प्रसिद्ध नील गेहेरेल्स स्विफ्ट स्पेस टेलीस्कोप लगभग 22 वर्षों के ऐतिहासिक कार्यकाल के बाद 4 नवंबर 2026 को धरती के वायुमंडल में प्रवेश कर गया. इंडोनेशिया के ऊपर इसका अधिकांश हिस्सा जलकर नष्ट हो गया, जिससे अंतरिक्ष अनुसंधान के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत हो गया.
अंतरिक्ष अन्वेषण में बेजोड़ योगदान
मूल रूप से दो साल के मिशन के रूप में डिजाइन किया गया स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी उम्मीद से कहीं अधिक समय तक सक्रिय रहा. अपने तीन अत्याधुनिक उपकरणों—बर्स्ट अलर्ट टेलीस्कोप (BAT), एक्स-रे टेलीस्कोप (XRT), और यूवी/ऑप्टिकल टेलीस्कोप (UVOT)—की मदद से इस वेधशाला ने गामा-रे विस्फोटों के रहस्यों को गहराई से टटोला. अपने पूरे कार्यकाल के दौरान इसने सैकड़ों सुपरनोवा विस्फोटों, ब्लैक होल्स और अंतरिक्षीय पिंडों का अध्ययन किया, जिससे लगभग 7,000 शोध पत्र प्रकाशित हुए जो खगोल विज्ञान की दुनिया में एक मील का पत्थर साबित हुए हैं।
एक असफल बचाव अभियान और अंतिम विदाई
स्विफ्ट को सुरक्षित रखने के लिए नासा ने निजी अंतरिक्ष कंपनी 'कैटलिस्ट स्पेस टेक्नोलॉजीज' के साथ मिलकर एक अनूठा रोबोटिक बचाव मिशन भी शुरू किया था. जुलाई 2026 में 'लिंक' (LINK) नामक अंतरिक्ष यान को इसे सुरक्षित कक्षा में धकेलने के लिए भेजा गया था, लेकिन तकनीकी खराबी और अनियंत्रित स्पिन के कारण वह अभियान असफल हो गया. अंततः अक्टूबर के अंत में वैज्ञानिकों ने इस उपग्रह को पूरी तरह से बंद (Kill-switch) कर दिया. अमेरिकी अंतरिक्ष बल और नासा इसकी निगरानी कर रहे थे, जिसके तहत इसके अधिकांश घनत्व वाले हिस्से वायुमंडल के घर्षण में नष्ट हो गए और संभावित अवशेष समुद्र में समा गए.

पूर्वोत्तर भारत में मिली नई वनस्पति प्रजाति: 'डिसपोरम कामख्यासिंसे'
पूर्वोत्तर भारत की जैव विविधता में एक नया कीर्तिमान जुड़ गया है। शोधकर्ताओं ने असम और मेघालय के जंगलों में 'डिसपोरम कामख्यासिंसे' नामक एक नई फूलदार पौधे की प्रजाति की खोज की है। लगभग छह फीट तक लंबा होने वाला यह पौधा अपने सितारे जैसे सफेद फूलों के लिए जाना जाता है।
प्राकृतिक आवास और भौगोलिक फैलाव
इस नई प्रजाति को मुख्यतः तीन स्थानों पर दर्ज किया गया है—असम के कामरूप जिले में स्थित गर्भंगा आरक्षित वन, डिमा हसाओ का लाइसॉन्ग क्षेत्र और मेघालय का बारापानी इलाका। यह बहुवर्षीय शाकीय पौधा (Perennial herb) 200 से 1,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अर्ध-सदाबहार जंगलों में पाया जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह मुख्य रूप से बांस के जंगलों के नीचे चट्टानी ढलानों पर अन्य पौधों के साथ विकसित होता है।
कामरूप और खासी पहाड़ियों का संगम: नामकरण
इस पौधे का वैज्ञानिक नाम 'डिसपोरम कामख्यासिंसे' असम के प्राचीन नाम 'कामरूप' और मेघालय की प्रसिद्ध 'खासी पहाड़ियों' के भौगोलिक संदर्भों को जोड़कर रखा गया है। यह नाम उन क्षेत्रों का सम्मान करता है जहां से इस प्रजाति के पहले नमूने एकत्र किए गए थे। कोलचिकेसी (Colchicaceae) परिवार से ताल्लुक रखने वाला यह पौधा अपनी अनूठी संरचनात्मक विशेषताओं के कारण इस वंश के अन्य पौधों से काफी अलग पहचान बनाता है।
अनोखी बनावट और शारीरिक विशेषताएं
तुलनात्मक रूप से यह प्रजाति अपने निकटतम संबंधी 'डिसपोरम कैल्केराटम' की तुलना में काफी विशाल है। जहां आम तौर पर इस वंश के पौधे 100 सेमी तक बढ़ते हैं, वहीं डिसपोरम कामख्यासिंसे की लंबाई लगभग 180 सेमी (6 फीट) तक पहुंच सकती है। इसकी पत्तियां गहरी हरी, चमकदार और सात प्रमुख समानांतर शिराओं वाली होती हैं। जून से जुलाई के बीच इसमें सितारे के आकार के खूबसूरत सफेद फूल खिलते हैं, जिसके बाद जुलाई से अगस्त के दौरान इसमें फल आने की प्रक्रिया होती है।

छत्तीसगढ़ के गोमर्डा अभ्यारण्य में 5 दशक बाद लौटेगा काला हिरण
छत्तीसगढ़ सरकार ने वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए गोमर्डा वन्यजीव अभ्यारण्य में काले हिरणों (ब्लैकबक) को पुनर्वसित करने का फैसला लिया है। लगभग पाँच दशकों के लंबे इंतजार के बाद यह खूबसूरत प्रजाति एक बार फिर Raigarh और सारंगढ़ के जंगलों की शान बढ़ाती नजर आएगी।
गोमर्डा अभ्यारण्य का समृद्ध प्राकृतिक आधार
वर्ष 1975 में स्थापित और गोमर्डा गांव के नाम पर नामित यह अभ्यारण्य लगभग 278 वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है। यहां की जमीन पथरीली और चट्टानी होने के कारण खेती के अनुकूल नहीं है, लेकिन यही प्राकृतिक बनावट वन्य जीवों के लिए एक बेहतरीन सुरक्षित पनाहगाह तैयार करती है। अभ्यारण्य के कोर क्षेत्र से होकर बहने वाली लात और मनाई नदियां भीषण गर्मी के दिनों में भी वन्यजीवों के लिए पानी की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करती हैं। यहां के उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती जंगलों में साल, बीजा, तेंदू और बांस की प्रचुरता पाई जाती है।
घास के मैदानों का सम्राट: कृष्णमृग
वैज्ञानिक रूप से 'एंटीलोप सर्विकुप्रा' (Antilope cervicapra) के नाम से पहचाना जाने वाला काला हिरण मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप की मूल प्रजाति है। दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत ब्लैकबक आबादी भारत के खुले घास के मैदानों, झाड़ियों और शुष्क क्षेत्रों में निवास करती है। नर काले हिरण अपने गहरे रंग के कोट और पेचदार, घुमावदार सींगों की वजह से बेहद आकर्षक दिखते हैं, जबकि मादाएं और शावक हल्के भूरे रंग के होते हैं। अपनी असाधारण दृष्टि और तीव्र रफ्तार के बल पर यह प्राणी किसी भी शिकारी को चकमा देने में माहिर माना जाता है।
पारिस्थितिक संतुलन और संरक्षण की ओर कदम
बाघ, तेंदुए, गौर, स्लॉथ बियर और दुर्लभ पक्षियों की विविधता से समृद्ध गोमर्डा में काले हिरणों के आगमन से खाद्य श्रृंखला और मजबूत होगी। पंजाब, हरियाणा और आंध्र प्रदेश के इस राज्य पशु को अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में 'कम चिंताजनक' (Least Concern) श्रेणी में रखा गया है। 5 से 50 के समूह में रहने वाले इन सामाजिक प्राणियों का पुनर्वास गोमर्डा के खुले घास के मैदानों को एक बार फिर उनके ऐतिहासिक प्राकृतिक स्वरूप में वापस लाएगा।

डीआरडीओ का बड़ा धमाका: ओडिशा तट से 'प्रलय' मिसाइल का सफल परीक्षण
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने ओडिशा के चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR) से स्वदेशी 'प्रलय' क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल का सफल उड़ान परीक्षण किया है। सतह से सतह पर मार करने वाली इस मिसाइल ने लगभग 500 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कृत्रिम लक्ष्यों को सटीकता से नष्ट कर अपनी क्षमता साबित की।
आरसीआई और स्वदेशी उद्योग का साझा प्रयास
'प्रलय' मिसाइल को हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारात (RCI) ने डीआरडीओ की अन्य प्रयोगशालाओं और भारतीय औद्योगिक साझेदारों के सहयोग से विकसित किया है। भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) जैसी प्रमुख रक्षा कंपनियां इसके उत्पादन और सिस्टम एकीकरण में शामिल हैं। यह मिसाइल दुश्मन के कमांड सेंटर, एयर डिफेंस साइट्स, लॉजिस्टिक्स हब और एयरबेस को तबाह करने में पूरी तरह सक्षम है।
क्वासी-बैलिस्टिक तकनीक और घातक मारक क्षमता
ठोस प्रणोदक (Solid-propellant) रॉकेट मोटर से संचालित होने के कारण इस मिसाइल को लंबे समय तक तुरंत लॉन्च करने की स्थिति में रखा जा सकता है। पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों के विपरीत, जो एक निश्चित और अनुमानित पथ का पालन करती हैं, क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइलें अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर उड़ती हैं और उड़ान के दौरान अपनी दिशा और गति बदल सकती हैं। यह खूबी दुश्मन के रडार और मिसाइल रक्षा प्रणालियों (Air Defence Systems) के लिए इसे ट्रैक करना और इंटरसेप्ट करना बेहद कठिन बना देती है।
प्रमुख विशेषताएं और क्षमताएं
स्ट्राइक रेंज और स्पीड: इसकी मारक क्षमता 150 से 500 किलोमीटर तक है और यह मैक 6.1 (Mach 6.1) की घातक गति प्राप्त कर सकती है।
पेलोड और मोबाइल लॉन्च: यह 500 से 1,000 किलोग्राम तक के विभिन्न प्रकार के वॉरहेड (Warheads) ले जाने में सक्षम है और इसे मोबाइल लॉन्चर से दागा जा सकता है।
सटीक निशाना: उन्नत नेविगेशन और गाइडेंस सिस्टम से लैस यह मिसाइल 10 मीटर से कम के 'सर्कुलर एरर प्रोबेबल' (CEP) के साथ लक्ष्य पर सटीक वार करती है।
सामरिक बल और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती
चांदीपुर से हुआ यह सफल परीक्षण भारतीय सशस्त्र बलों के लिए एक एकीकृत रॉकेट फोर्स (Integrated Rocket Force) के निर्माण और सामरिक अग्रिम मोर्चों को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर है। स्वदेशी रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में 'प्रलय' का सफल प्रदर्शन भारत की बढ़ती रक्षा आत्मनिर्भरता को रेखांकित करता है।

कोरिया युद्धपोत संग आईएनएस सह्याद्रि का संयुक्त अभ्यास संपन्न
भारतीय नौसेना के बहु-उद्देश्यीय स्टील्थ फ्रिगेट आईएनएस सह्याद्रि ने दक्षिण कोरिया के बुसान तट पर भारत-गणराज्य कोरिया नौसेना द्विपक्षीय अभ्यास में सफलतापूर्वक भाग लिया। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच समुद्री सहयोग और रणनीतिक तालमेल (Interoperability) को मजबूत करना था।
द्विपक्षीय अभ्यास के प्रमुख चरण
इस अभ्यास को दो मुख्य चरणों—हार्बर फेज और सी (समुद्री) फेज—में विभाजित किया गया था।
हार्बर फेज: इसके दौरान दोनों देशों के नौसैनिक अधिकारियों और कर्मियों ने पेशेवर चर्चाएं, क्रॉस-डेक विजिट, परिचालन ब्रीफिंग और विषय-विशेषज्ञों के विचार साझा किए।
सी फेज: इस चरण में आईएनएस सह्याद्रि और दक्षिण कोरियाई नौसेना के युद्धपोत 'ROKS मुनमू द ग्रेट' ने मिलकर समन्वित नेविगेशन, हेलीकॉप्टर संचालन और जटिल समुद्री युद्धाभ्यास का सफल प्रदर्शन किया।
प्रोजेक्ट 17 और शिवालिक श्रेणी
आईएनएस सह्याद्रि भारत की 'प्रोजेक्ट 17' (Project 17) के तहत निर्मित शिवालिक श्रेणी (Shivalik Class) का तीसरा और अंतिम मल्टी-रोल गाइडेड मिसाइल स्टील्थ फ्रिगेट है। मुंबई स्थित मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) द्वारा निर्मित इस युद्धपोत को 21 जुलाई 2012 को नौसेना में शामिल किया गया था। यह वर्तमान में विशाखापट्टनम में स्थित भारतीय नौसेना के पूर्वी बेड़े (Eastern Fleet) का एक अभिन्न हिस्सा है। इसके वर्ग के अन्य दो पोत आईएनएस शिवालिक और आईएनएस सतपुड़ा हैं।
आईएनएस सह्याद्रि की प्रमुख विशेषताएं
आकार और गति: 468 फीट लंबा और 55 फीट चौड़ा यह पोत 6,800 टन विस्थापन क्षमता रखता है। दो गैस टर्बाइन और दो डीजल इंजनों की शक्ति से यह 30 समुद्री मील (55 किमी/घंटा से अधिक) की गति हासिल कर सकता है।
घातक हथियार प्रणाली: यह सतह से सतह पर मार करने वाली ब्रह्मोस (BrahMos) एंटी-शिप मिसाइल, बराक-1 (Barak-1), श्टिल-1 (Shtil-1) मिसाइलों और एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर से लैस है।
सुरक्षा व टोही क्षमताएं: इसमें दुश्मनों की पनडुब्बियों और मिसाइलों को नष्ट करने के लिए उन्नत इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और टॉरपीडो लगे हैं। साथ ही यह ध्रुव (Dhruv), सी किंग (Sea King) या कामोव (Kamov) जैसे दो हेलीकॉप्टरों को ले जाने में सक्षम है।
यह सफल अभ्यास दर्शाता है कि भारतीय नौसेना वैश्विक स्तर पर अपनी समुद्री क्षमताओं का निरंतर प्रदर्शन कर रही है और अपने मित्र राष्ट्रों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जा रही है।
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