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दिल्ली डिफेंस डायलॉग 2026: रक्षा मंत्री ने दिया 'तकनीकी संप्रभुता' का संदेश

दिल्ली डिफेंस डायलॉग 2026: रक्षा मंत्री ने दिया 'तकनीकी संप्रभुता' का संदेश

Delight News
📅 04 Nov2026

नई दिल्ली में मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (MP-IDSA) द्वारा आयोजित तीसरे 'दिल्ली डिफेंस डायलॉग 2026' में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रक्षा सुधारों, आत्मनिर्भरता और रक्षा निर्यात पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि केवल उपकरणों को असेंबल करना आत्मनिर्भरता नहीं है, बल्कि तकनीक का विकास और संप्रभुता बेहद जरूरी है।

भारत की रक्षा और सुरक्षा रणनीतियों को मजबूत करने के उद्देश्य से नई दिल्ली में तीसरे 'दिल्ली डिफेंस डायलॉग (DDD) 2026' का आयोजन किया गया। मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (MP-IDSA) द्वारा आयोजित इस वार्षिक मंच को केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संबोधित किया। इस वर्ष के संवाद का मुख्य विषय "डिफेंस रिफॉर्म्स, आत्मनिर्भरता, कोलैबोरेशन एंड एक्सपोर्ट्स" रखा गया है।
चार प्रमुख स्तंभों पर जोर
अपने संबोधन में रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि केवल विदेशों से पुर्जे मंगवाकर भारत में असेंबल कर लेना वास्तविक आत्मनिर्भरता नहीं है। भारत को अपनी रक्षा तकनीकों का डिजाइन, विकास और अपग्रेडेशन खुद करने में सक्षम होना होगा। उन्होंने रक्षा सुधार, आत्मनिर्भरता, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और निर्यात को भारतीय रक्षा क्षेत्र के चार अनिवार्य स्तंभ बताया, जिनका एक साथ आगे बढ़ना आवश्यक है।
आधुनिक युद्ध और तकनीकी आत्मनिर्भरता
बदलते दौर में युद्ध कला के स्वरूप पर चर्चा करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि अब युद्ध केवल थल, जल और नभ तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि साइबर और अंतरिक्ष भी इसके मुख्य केंद्र बन चुके हैं। आज के समय में महंगे प्लेटफॉर्म्स को कम लागत वाले ड्रोन और स्वायत्त प्रणालियां (Autonomous Systems) चुनौती दे सकती हैं। इसलिए रक्षा तैयारियों में प्रयोगशाला से तकनीक को जल्द से जल्द सैन्य बलों तक पहुंचाना अनिवार्य है।
अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और निर्यात का लक्ष्य
भारत की आत्मनिर्भरता नीति का मतलब दुनिया से अलग-थलग होना नहीं है, बल्कि सह-विकास (Co-development) और सह-उत्पादन (Co-production) के जरिए मजबूत साझेदारी बनाना है। रक्षा उत्पादन और निर्यात के मोर्चे पर देश ने अभूतपूर्व प्रगति की है और वर्ष 2029 तक 3 लाख करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादन तथा 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है।
मनोहर पर्रिकर संस्थान का योगदान
11 नवंबर 1965 को स्थापित MP-IDSA रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर निष्पक्ष नीतिगत अनुसंधान करने वाला एक प्रमुख स्वायत्त निकाय है। रक्षा मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित यह संस्थान भारत की सामरिक और रक्षा प्राथमिकताओं को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
ओखला बर्ड सेंचुरी में दिखा दुर्लभ 'सफेद सारस', उमड़े पक्षी प्रेमी

ओखला बर्ड सेंचुरी में दिखा दुर्लभ 'सफेद सारस', उमड़े पक्षी प्रेमी

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📅 04 Nov2026

दिल्ली-नोएडा बॉर्डर पर स्थित ओखला बर्ड सेंचुरी में हाल ही में एक दुर्लभ 'सफेद सारस' (White Stork) देखा गया है। इस खूबसूरत प्रवासी पक्षी की उपस्थिति ने पक्षी प्रेमियों, पर्यावरणविदों और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफरों को आर्द्रभूमि (Wetland) की ओर आकर्षित किया है। यह घटना क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को दर्शाती है।

राजधानी क्षेत्र के पर्यावरण और पक्षी प्रेमियों के लिए एक बेहद सुखद खबर सामने आई है। उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जिले में स्थित प्रसिद्ध ओखला बर्ड सेंचुरी में हाल ही में एक अत्यंत दुर्लभ 'सफेद सारस' (Ciconia ciconia) देखा गया है। इस दुर्लभ प्रवासी मेहमान को देखने के लिए अभयारण्य में पक्षी वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और वन्यजीव फोटोग्राफरों का तांता लगा हुआ है।
सफेद सारस की अनूठी विशेषताएं
सिकोनिडे (Ciconiidae) परिवार से ताल्लुक रखने वाला सफेद सारस एक बड़ा जलपक्षी है। यह मुख्य रूप से अपने आकर्षक पंखों, लंबी लाल चोंच और लंबे लाल पैरों के कारण आसानी से पहचाना जाता है। खड़े होने पर इसकी लंबाई लगभग 95 से 110 सेंटीमीटर और पंखों का फैलाव 183 से 217 सेंटीमीटर तक होता है। ये पक्षी उड़ते समय अपनी गर्दन सीधी फैलाकर और पैरों को पीछे खींचकर हवा में तैरते हुए ऊर्जा की बचत करते हैं।
लंबी दूरी के प्रवासी पक्षी
यूरोप, एशिया माइनर, उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व में पाए जाने वाले ये सारस सर्दियों के मौसम में प्रवास करते हैं। ठंड की शुरुआत होते ही ये अफ्रीका के उष्णकटिबंधीय इलाकों, मध्य पूर्व और भारतीय उपमहाद्वीप की ओर रुख करते हैं। ये पक्षी आमतौर पर उथले जलाशयों, घास के मैदानों और कृषि क्षेत्रों में भोजन की तलाश करते हैं। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट में इन्हें 'लीस्ट कंसर्न' (कम चिंतनीय) श्रेणी में रखा गया है।
ओखला बर्ड सेंचुरी का महत्व
दिल्ली से उत्तर प्रदेश में यमुना नदी के प्रवेश द्वार पर स्थित यह लगभग 4 वर्ग किलोमीटर का अभयारण्य प्रवासी पक्षियों के लिए एक आदर्श पड़ाव है। बर्डलाइफ इंटरनेशनल द्वारा 'महत्वपूर्ण पक्षी और जैव विविधता क्षेत्र' (IBA) के रूप में मान्यता प्राप्त यह सेंचुरी दुर्लभ जीवों के संरक्षण में अहम भूमिका निभाती है।
सफेद सारस का ओखला जैसे संरक्षित क्षेत्र में पहुंचना यह साबित करता है कि शहरी फैलाव के बीच भी ये नमी वाले इलाके प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित शरणगाह बने हुए हैं।
नीति आयोग ने लॉन्च किया 'इंडिया साइंस एंड टेक्नोलॉजी स्कोरबोर्ड'

नीति आयोग ने लॉन्च किया 'इंडिया साइंस एंड टेक्नोलॉजी स्कोरबोर्ड'

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📅 04 Nov2026

नीति आयोग के साइंस एंड टेक्नोलॉजी डिवीजन ने देश के विज्ञान और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को ट्रैक करने के लिए एक इंटरैक्टिव डेटा प्लेटफॉर्म 'इंडिया साइंस एंड टेक्नोलॉजी स्कोरबोर्ड' लॉन्च किया है। इसके जरिए राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपनी प्रदर्शन क्षमता, शोध आउटपुट और नीतियों की तुलना कर सकते हैं।

भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र को नई ऊंचाई देने के उद्देश्य से नीति आयोग ने 'इंडिया साइंस एंड टेक्नोलॉजी (S&T) Scoreboard' नामक एक नया इंटरैक्टिव डेटा प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है। नीति आयोग के साइंस एंड टेक्नोलॉजी डिवीजन द्वारा तैयार किया गया यह डिजिटल प्लेटफॉर्म देश भर के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रिसर्च, पेटेंट और इनोवेशन के प्रदर्शन का विस्तृत खाका पेश करेगा।
डेटा का एकीकृत महामंच
यह स्कोरबोर्ड देश भर के शोध संस्थानों, प्रकाशनों, पेटेंट आवेदन, स्टार्टअप्स और अनुसंधान निधि (R&D Funding) से जुड़ी जानकारियों को एक ही स्थान पर उपलब्ध कराता है। इसमें केंद्रीय, राज्य स्तरीय और निजी उच्च शिक्षण संस्थानों के साथ-साथ आरएंडडी लैब्स, डीप-टेक स्टार्टअप्स और अटल टिंकरिंग लैब्स तक का संपूर्ण डेटा शामिल किया गया है। इसके माध्यम से राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपनी ताकत, कमियों और विकास की संभावनाओं का सटीक मूल्यांकन कर सकेंगे।
11 प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर फोकस
नीति आयोग का यह मंच राष्ट्रीय महत्व के 11 प्रमुख अनुसंधान क्षेत्रों पर केंद्रित है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्लीन एनर्जी, सेमीकंडक्टर, क्रिटिकल मिनरल्स और आधुनिक कृषि जैसे भविष्य के महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं। इन क्षेत्रों में शोध के उत्पादन और राज्यवार प्रगति की तुलना आसानी से की जा सकती है।
बेंचमार्किंग और राज्यों की तुलना
इस प्लेटफॉर्म की सबसे खास बात इसकी बेंचमार्किंग प्रणाली है। इसके जरिए यूजर किसी भी दो राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों के बीच अनुसंधान आउटपुट, शोध क्षेत्रों और विभिन्न सेक्टर्स के प्रदर्शन का सीधा तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं। पेटेंट के मोर्चे पर यह पेटेंट आवेदनों की संख्या, पेटेंट क्षमता और राज्यों के बीच आपसी सहयोग की जानकारी भी विस्तार से प्रदान करता है।
नीतियों और नवाचारों का साझाकरण
यह स्कोरबोर्ड केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विभिन्न राज्यों की साइंस एंड टेक्नोलॉजी, स्टार्टअप और इनोवेशन नीतियों का दस्तावेजीकरण भी करता है। इसके माध्यम से राज्य एक-दूसरे की सर्वश्रेष्ठ कार्यप्रणालियों (Best Practices) का अध्ययन कर उन्हें अपने यहां लागू कर सकते हैं। नीति निर्माताओं के लिए यह उपकरण साक्ष्य-आधारित नीतियां बनाने और राज्य स्तर पर शोध और नवाचार को बढ़ावा देने में बेहद मददगार साबित होगा।
फिलीपींस का मयॉन ज्वालामुखी फटा, आसमान में 3,000 मीटर ऊंचा राख का गुबार

फिलीपींस का मयॉन ज्वालामुखी फटा, आसमान में 3,000 मीटर ऊंचा राख का गुबार

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📅 03 Nov2026

फिलीपींस के सबसे सक्रिय मयॉन ज्वालामुखी में हाल ही में एक मध्यम स्तर का विस्फोटक उदगार हुआ, जिससे आसमान में हजारों मीटर ऊपर तक राख का घना गुबार छा गया। बढ़ते खतरे को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने अलर्ट स्तर 3 लागू कर दिया है और प्रभावित इलाकों से हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है।

फिलीपींस के सबसे सक्रिय और दुनिया भर में अपने लगभग पूर्ण शंकु (Perfect Cone) आकार के लिए प्रसिद्ध 'मयॉन ज्वालामुखी' ने एक बार फिर विकराल रूप धारण कर लिया है। हाल ही में इस ज्वालामुखी में हुए मध्यम स्तर के विस्फोटक उदगार (Moderately Explosive Eruption) के बाद आसमान में लगभग 3,000 मीटर (करीब 10,000 फीट) की ऊंचाई तक राख और धुएं का काला गुबार फैल गया। इस अचानक हुई गतिविधि ने अधिकारियों और वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है।
अलर्ट स्तर 3 और सुरक्षा उपाय
फिलीपींस के ज्वालामुखी और भूकंप विज्ञान संस्थान (PHIVOLCS) ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए चेतावनी स्तर को बढ़ाकर 'लेवल 3' कर दिया है। पिछले कुछ दिनों में दर्जनों ज्वालामुखी भूकंप और रॉकफॉल की घटनाएं रिकॉर्ड की गई हैं। संभावित खतरों के मद्देनजर क्रेटर के आसपास के 6 किलोमीटर के स्थायी खतरनाक दायरे (Danger Zone) में लोगों के प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है, साथ ही विमानों को भी इस क्षेत्र से दूर रहने की चेतावनी दी गई है। एहतियात के तौर पर हजारों स्थानीय निवासियों को सुरक्षित शिविरों में स्थानांतरित किया गया है।
मयॉन ज्वालामुखी का भौगोलिक महत्व
फिलीपींस के लुजोन द्वीप पर अल्बाय प्रांत में स्थित मयॉन एक एक्टिव स्ट्रेटोवोलcano (संस्तर ज्वालामुखी) है। यह प्रशांत महासागर की प्रसिद्ध 'रिंग ऑफ फायर' (Ring of Fire) का हिस्सा है। फिलीपींस ट्रेंच के पास स्थित होने के कारण यह क्षेत्र अत्यधिक भूगर्भीय हलचलों के प्रति संवेदनशील है। समुद्र तल से 2,462 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस ज्वालामुखी का आधार लगभग 130 किलोमीटर के दायरे में फैला है। इसकी अद्भुत सममितीय बनावट (Symmetry) इसे दुनिया के सबसे सुंदर ज्वालामुखियों में शुमार करती है।
इतिहास का सबसे विनाशकारी दौर
1616 के बाद से अब तक इस ज्वालामुखी में 30 से अधिक बड़े उदगार दर्ज किए जा चुके हैं। इसका सबसे हिंसक और भयानक उदगार 1814 में हुआ था, जिसमें लगभग 1,200 से अधिक लोगों की जान चली गई थी और कई शहर इसकी चपेट में आकर दफन हो गए थे। इसके निचले ढलानों पर बड़े पैमाने पर अबाका (Abaca) के बागान हैं, और यूनेस्को (UNESCO) ने इसे 2016 में बायोस्फीयर रिजर्व घोषित किया था।
वर्तमान में लगातार बढ़ रही सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) गैस और राख के उत्सर्जन को देखते हुए वैज्ञानिक इसकी हर गतिविधि पर पैनी नजर रखे हुए हैं ताकि किसी भी बड़े खतरे से समय रहते निपटा जा सके।
एशियाई काले भालू द्वारा लाल पांडा के शिकार का पहला दुर्लभ फोटो साक्ष्य

एशियाई काले भालू द्वारा लाल पांडा के शिकार का पहला दुर्लभ फोटो साक्ष्य

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📅 03 Nov2026

भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के शोधकर्ताओं ने पश्चिम बंगाल के सिंगालिला नेशनल पार्क में एशियाई काले भालू (Asiatic Black Bear) द्वारा संकटग्रस्त लाल पांडा (Red Panda) के शिकार का पहला फोटो साक्ष्य दर्ज किया है। यह दुर्लभ घटना उच्च-हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर नई रोशनी डालती है।

भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के वैज्ञानिकों ने हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ा एक अत्यंत दुर्लभ और चौंकाने वाला प्राकृतिक घटनाक्रम दर्ज किया है। पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में स्थित सिंगालिला नेशनल पार्क में लगभग 9,000 फीट की ऊंचाई पर लगे कैमरा-ट्रैप्स ने एक एशियाई काले भालू (Ursus thibetanus) को लाल पांडा (Ailurus fulgens) का शिकार करते हुए कैद किया है। वैज्ञानिक समुदाय में किसी भालू द्वारा लाल पांडा के शिकार का यह पहला सत्यापित फोटोग्राफिक प्रमाण है।
दुर्लभ शिकार की घटना और वैज्ञानिक महत्व
कैमरा-ट्रैप से प्राप्त तस्वीरों की श्रृंखला में देखा गया कि एक लाल पांडा पेड़ पर चढ़ रहा था। अगले ही दिन एक एशियाई काला भालू उसी स्थान पर पहुंचा, पेड़ पर चढ़ा और अपने मुंह में लाल पांडा को दबाकर नीचे उतर आया। अब तक यह माना जाता था कि लाल पांडा पेड़ों की ऊंची शाखाओं को सुरक्षित शरणस्थल (Refuge) के रूप में इस्तेमाल करते हैं, जहां वे शिकारियों से पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं। हालांकि, इस घटना ने साबित कर दिया है कि पेड़ों पर भी वे शिकार के खतरे से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं।
एशियाई काले भालू की शारीरिक और पारिस्थितिक विशेषताएं
एशियाई काला भालू मुख्य रूप से एशिया के घने और पहाड़ी जंगलों में पाया जाता है। इसकी सबसे बड़ी पहचान इसकी छाती पर बना हल्के बादामी या सफेद रंग का 'V' आकार का निशान है। यह भालू पेड़ों पर चढ़ने और तैरने में बेहद कुशल होता है। भारत में यह पूर्वी से लेकर पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों में 2,600 से 11,400 फीट की ऊंचाई पर पाया जाता है। यह सर्वभक्षी जीव आम तौर पर फल, कीड़े-मकोड़े और छोटे जानवर खाता है और सर्दियों में शीतनिद्रा (Hibernation) में चला जाता है।
संरक्षण की चुनौतियां और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
वैज्ञानिकों का मानना है कि खाद्य स्रोतों में मौसमी बदलाव, दोनों प्रजातियों के निवास स्थान का एक-दूसरे से जुड़ना और जलवायु परिवर्तन के कारण शीतनिद्रा के पैटर्न में बदलाव जैसी वजहें भालू के इस तरह के आक्रामक व्यवहार का कारण बन सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में एशियाई काले भालू को 'संवेदनशील' (Vulnerable) और लाल पांडा को 'संकटग्रस्त' (Endangered) श्रेणी में रखा गया है। जब एक संकटग्रस्त प्रजाति दूसरी संकटग्रस्त प्रजाति का शिकार करती है, तो वन्यजीव विशेषज्ञों के सामने संरक्षण नीतियों को लेकर एक नई जटिल चुनौती खड़ी हो जाती है।

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