
सहरा रेगिस्तान में मिला मंगल ग्रह का 4.1 अरब साल पुराना दुर्लभ गुलाबी टुकड़ा
वैज्ञानिकों को सहरा के रेगिस्तान में एक अत्यंत दुर्लभ और प्राचीन गुलाबी रंग का उल्कापिंड मिला है, जिसे 'तेघाज़ा 001' नाम दिया गया है। 4.1 अरब साल पुराना यह उल्कापिंड मंगल ग्रह पर कभी मौजूद रहे पानी और संभावित जीवन के रहस्यों से पर्दा उठाने में बेहद मददगार साबित हो सकता है।
मंगल का प्राचीनतम राजदार
वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग 800 ग्राम वजन का यह उल्कापिंड 4.1 अरब साल से भी अधिक पुराना है। यह वह समय था जब मंगल ग्रह पर पिघले हुए मैग्मा से ज़िरकॉन (zircon) खनिज का निर्माण हो रहा था। ज़िरकॉन खनिज की मौजूदगी के कारण शोधकर्ताओं के लिए इसका सटीक समय चक्र और उम्र तय करना आसान हो गया। पृथ्वी पर अब तक पाए गए लगभग 435 मंगल ग्रह के उल्कापिंडों में से तेघाज़ा 001 सबसे प्राचीन तीन नमूनों में शामिल हो गया है। इससे पहले केवल 'ALH84001' और 'ब्लैक ब्यूटी' नाम के उल्कापिंड ही इस श्रेणी में दर्ज थे।
पानी और जीवन के संकेत
तेघाज़ा 001 की बनावट और रासायनिक संरचना अब तक ज्ञात किसी भी उल्कापिंड समूह से मेल नहीं खाती, जो इसे अपने आप में अनूठा बनाती है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इसके विश्लेषणात्मक अध्ययन में ऐसे रासायनिक संकेत मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि अपने निर्माण और विकास के दौरान यह चट्टान तरल पानी के संपर्क में रही थी। यह खोज इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि अरबों साल पहले लाल ग्रह (मंगल) पर पानी मौजूद था और वहां जीवन के पनपने के अनुकूल परिस्थितियां थीं।
क्या होते हैं उल्कापिंड
अंतरिक्ष विज्ञान के नजरिए से समझें तो सूर्य की परिक्रमा कर रहे ठोस पदार्थों के छोटे-बड़े टुकड़ों को उल्कापिंडीय पिंड (Meteoroids) कहा जाता है। जब ये टुकड़े अत्यधिक तेज गति से पृथ्वी या किसी अन्य ग्रह के वायुमंडल में प्रवेश करके जलने लगते हैं, तो इन्हें 'उल्का' या 'शूटिंग स्टार' कहा जाता है। वहीं, जो वायुमंडलीय घर्षण से बचकर सफलतापूर्वक जमीन पर गिरते हैं, उन्हें उल्कापिंड (Meteorite) कहा जाता है। तेघाज़ा 001 इसी तरह का एक दुर्लभ उल्कापिंड है, जो अब ब्रह्मांडीय इतिहास की नई परतें खोल रहा है।

तवांग मठ में भगवान बुद्ध की पवित्र अस्थियों का हुआ भव्य स्वागत
अरुणाचल प्रदेश के ऐतिहासिक गदेन नामग्यालल्हात्से (तवांग मठ) में भगवान बुद्ध की पवित्र अस्थियों (Sacred Relics) का पारंपरिक और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ स्वागत किया गया। भारत के सबसे बड़े इस मठ में पवित्र अस्थियों के दर्शन के लिए श्रद्धालु और बौद्ध भिक्षु बड़ी संख्या में एकत्रित हुए।
गदेन नामग्यालल्हात्से (तवांग मठ) का इतिहास
अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में स्थित यह मठ भारत का सबसे बड़ा और तिब्बत के ल्हासा स्थित पोताला महल के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बौद्ध मठ है। इसे 'गदेन नामग्यालल्हात्से' (Gaden Namgyal Lhatse) के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है "पूर्ण विजय का दिव्य स्वर्ग"। इस ऐतिहासिक मठ की स्थापना 17वीं शताब्दी में मेराक लामा लोद्रे ग्यात्सो ने 5वें दलाई लामा की इच्छा के अनुसार की थी। यह महायान और वज्रयान बौद्ध धर्म की गेलुग परंपरा का एक प्रमुख केंद्र है।
वास्तुकला और मुख्य सभा भवन 'दुखांग'
तवांग मठ की संरचना अत्यंत भव्य और कलात्मक है। इसका सबसे प्रमुख और केंद्रीय भवन सभा भवन है, जिसे 'दुखांग' (Dukhang) कहा जाता है। तीन मंजिला दुखांग के अंदरूनी हिस्सों की दीवारों पर देवी-देवताओं और बौद्ध संतों की आकर्षक चित्रकारी (Mural Paintings) की गई है। भवन के मध्य में भगवान बुद्ध की एक विशाल और भव्य स्वर्ण-मंडित मूर्ति विराजमान है, जिसके दोनों ओर उनके मुख्य शिष्य मोद्गल्यायन और सारिपुत्र की प्रतिमाएं स्थापित हैं।
देवी श्री देवी की थंका और दुर्लभ पांडुलिपियां
दुखांग के मुख्य वेदी के बाईं ओर रेशम में लिपटा हुआ एक चांदी का कास्कट रखा है, जिसमें मुख्य देवी 'श्री देवी' (पाल्देन ल्हामो) का थंका चित्र सुरक्षित है। यह थंका 5वें दलाई लामा द्वारा संस्थापक मेराक लामा को उपहार स्वरूप दिया गया था। इसके अतिरिक्त, मठ के पुस्तकालय में केंग्यूर और तेंग्यूर जैसी दुर्लभ और प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियों का अमूल्य संग्रह मौजूद है, जिनमें से कई के अक्षर सोने की स्याही से लिखे गए हैं।
आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व
तवांग मठ न केवल बौद्ध भिक्षुओं के अध्ययन और धार्मिक साधना का प्रमुख केंद्र है, बल्कि यह पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध बौद्ध संस्कृति और निरंतरता का प्रतीक भी है। भगवान बुद्ध की पवित्र अस्थियों की इस प्रदर्शनी और आगमन ने इस क्षेत्र में शांति, करुणा और वैश्विक भ्रातृत्व के संदेश को पुनः नया विस्तार दिया है।

ओलिव रिडेल कछुओं की सुरक्षा के लिए ओडिशा तट पर मछली पकड़ने पर रोक
संकटग्रस्त ओलिव रिडले समुद्री कछुओं के संरक्षण और प्रजनन सीजन को सुरक्षित बनाने के लिए ओडिशा के निर्धारित तटीय इलाकों में अगले सात महीनों के लिए मछली पकड़ने और मशीनीकृत नावों के संचालन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है।
कौन हैं ओलिव रिडले कछुए और उनकी विशेषताएं?
ओलिव रिडले कछुए दुनिया भर में पाए जाने वाले सभी समुद्री कछुओं में आकार में सबसे छोटे और सबसे अधिक मात्रा में पाए जाने वाले कछुए हैं। इनके कवच (Carapace) का रंग जैतून जैसा हरा (Olive Green) होता है, जिसके कारण इनका नाम ओलिव रिडले पड़ा है। ये आमतौर पर खुले महासागरों में अकेले रहना पसंद करते हैं और शाकाहारी व मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन करते हैं। यह कछुए साल भर में भोजन और प्रजनन स्थलों के बीच हजारों किलोमीटर की लंबी यात्रा तय करते हैं।
अनोखी सामूहिक घोंसला बनाने की प्रक्रिया (अरिबाड़ा)
ये कछुए अपनी अनूठी सामूहिक नेस्टिंग के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं, जिसे 'अरिबाड़ा' (Arribada) कहा जाता है। इस दौरान हजारों की संख्या में मादा कछुए एक साथ एक ही तट पर अंडे देने के लिए पहुंचती हैं। ओडिशा का गहिरमाथा मरीन सेंचुरी (Gahirmatha Marine Sanctuary) समुद्री कछुओं का दुनिया का सबसे बड़ा रूकरी यानी प्रजनन केंद्र माना जाता है।
वैश्विक वितरण और संरक्षण की स्थिति
ओलिव रिडले कछुए मुख्य रूप से प्रशांत, अटलांटिक और हिंद महासागर के गर्म पानी में पाए जाते हैं। इनकी घटती संख्या और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर इन्हें विशेष संरक्षण प्राप्त है।
आईयूसीएन रेड लिस्ट (IUCN Red List): सुभेद्य (Vulnerable)
साइट्स (CITES): परिशिष्ट I (Appendix I)
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: अनुसूची 1 (Schedule 1)
प्रतिबंध का उद्देश्य
मशीनीकृत नावों और ट्रेवलिंग गियर के कारण अक्सर ये कछुए जाल में फंसकर घायल हो जाते हैं या उनकी मौत हो जाती है। सात महीने के इस सख्त प्रतिबंध का उद्देश्य अंडों से बच्चों के निकलने की प्रक्रिया (Hatching season) को सुरक्षित बनाना और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करना है।

सोरायसिस के मरीजों को मोतियाबिंद का अधिक खतरा, नई स्टडी में हुआ खुलासा
एक हालिया अध्ययन के अनुसार, सोरायसिस से पीड़ित मरीजों में मोतियाबिंद (Cataracts) और इससे जुड़ी सर्जरी का जोखिम काफी बढ़ जाता है। हालांकि, यह जोखिम रोगियों की उपचार पद्धतियों (Treatment modality) के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।
सोरायसिस क्या है और इसके कारण क्या हैं?
सोरायसिस एक दीर्घकालिक (Chronic) ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसके कारण त्वचा की कोशिकाएं बहुत तेजी से बढ़ने लगती हैं। सामान्य तौर पर त्वचा की कोशिकाओं को विकसित होकर झड़ने में एक महीना लगता है, लेकिन सोरायसिस के मामलों में यह प्रक्रिया महज तीन से चार दिनों में पूरी हो जाती है। परिणाम यह होता है कि कोशिकाएं झड़ने के बजाय त्वचा की सतह पर जमा होने लगती हैं, जिससे खुजलीदार और पपड़ीदार चकत्ते बन जाते हैं। यह आनुवंशिकी, प्रतिरक्षा प्रणाली और पर्यावरणीय कारकों के मेल से उत्पन्न होती है।
प्रमुख लक्षण और ट्रिगर्स
इस बीमारी के मुख्य लक्षणों में मोटी लाल त्वचा के पैच, चांदी जैसी सफेद पपड़ी, सूखी और फटी हुई त्वचा, तथा नाखून खराब होना शामिल है। कई मरीजों को इसके साथ 'सोरायटिक आर्थराइटिस' की समस्या भी होती है, जिसमें जोड़ों में दर्द और जकड़न पैदा होती है। इसके प्रमुख ट्रिगर्स में भावनात्मक तनाव, संक्रमण, त्वचा पर चोट, मौसम में बदलाव और लिथियम या बीटा-ब्लॉकर्स जैसी कुछ दवाइयां शामिल हैं। यह बीमारी किसी को छूने से नहीं फैलती, यानी यह संक्रामक (Contagious) नहीं है।
वर्तमान उपचार और प्रबंधन
फिलहाल सोरायसिस का कोई पूर्ण इलाज (Cure) संभव नहीं है, लेकिन इसके उपचार का मुख्य उद्देश्य सूजन को कम करना, त्वचा कोशिकाओं की वृद्धि को धीमा करना और पपड़ी को हटाना होता है। इसके लिए स्टेरॉयड क्रीम, मॉइस्चराइजर, विटामिन D3 और A के मलहम, एंथ्रालाइन और medicated शैंपू का उपयोग किया जाता है। मोतियाबिंद के बढ़ते खतरे के सामने आने के बाद अब डॉक्टरों को सोरायसिस के दीर्घकालिक प्रबंधन में आंखों के स्वास्थ्य पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता महसूस हो रही है।

भूटान ने पीएम मोदी को समर्पित किया स्तूप, 'गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी' को भारत का समर्थन
भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक ने 'गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी' (GMC) प्रोजेक्ट में भारत के सहयोग के प्रति आभार व्यक्त करते हुए स्तूप संख्या 76 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समर्पित किया है। रिकॉर्ड 9 घंटे में 40,000 स्वयंसेवकों द्वारा बनाए गए 108 बौद्ध स्तूपों (जांगचुप चोर्टेन) में से एक को पीएम मोदी को समर्पित किया गया।
गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी (GMC) क्या है?
भूटान नरेश की परिकल्पना पर आधारित गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी हिमालय की तलहटी में बसाया जाने वाला एक क्रांतिकारी और भविष्यवादी शहर है। भारत के असम राज्य की सीमा से सटे दक्षिणी मैदानों में फैले 4,046 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में बनने वाला यह शहर भूटान के कुल भूभाग का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा है। फरवरी 2024 में एक रॉयल चार्टर के जरिए इसे अत्यधिक स्वायत्तता वाला विशेष प्रशासनिक क्षेत्र (SAR) घोषित किया गया था। यहाँ एक स्वतंत्र न्यायपालिका और शासन व्यवस्था होगी, जो वैश्विक मानकों के अनुरूप कार्य करेगी।
अनोखा मास्टरप्लान और डिजाइन
गेलेफू शहर को पर्यावरण संरक्षण, आध्यात्मिकता और आधुनिकता का अद्भुत संगम बनाया जा रहा है। इसका मास्टरप्लान एक के बाद एक जुड़ने वाले 'रहने योग्य पुलों' (Inhabitable Bridges) और मंडाला-आकार के 11 पड़ोस (Neighborhoods) के रूप में तैयार किया गया है। शहर में बहने वाली 35 नदियों और नालों की सुरक्षा के लिए विशेष सीढ़ीदार धान के खेत बनाए जाएंगे, जो बाढ़ नियंत्रण के साथ-साथ जैव विविधता गलियारे का भी काम करेंगे। इसके अलावा, योजना में एक नया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, विश्वविद्यालय, पूर्वी और पश्चिमी चिकित्सा केंद्र, और जलविद्युत बांध शामिल हैं।
स्तूप समर्पण और रिकॉर्ड निर्माण का महत्व
गेलेफू में माऊ छू (Aie) नदी के किनारे लगभग 40,000 प्रशिक्षित स्वयंसेवकों ने एक ही दिन में मात्र नौ घंटे में 15 मीटर ऊंचे 108 स्तूपों का निर्माण कर इतिहास रच दिया। स्तूप संख्या 76 को पीएम मोदी को समर्पित करने के पीछे खास वजह यह भी है कि वे हाल ही में 76 वर्ष के हुए हैं। यह समर्पण इस बात का प्रतीक है कि भारत इस दूरदर्शी माइंडफुलनेस सिटी के बुनियादी ढांचे, कनेक्टिविटी और आर्थिक विकास में एक प्रमुख भागीदार के रूप में खड़ा है।
भारत-भूटान संबंधों में नया मोड़
गेलेफू परियोजना न केवल भूटान के आर्थिक भविष्य की दिशा तय करेगी, बल्कि पूर्वोत्तर भारत के राज्यों के साथ व्यापार, पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को अभूतपूर्व बढ़ावा देगी। भारत के सक्रिय समर्थन ने दोनों देशों के बीच सामरिक और रणनीतिक साझेदारी को एक नई गहराई प्रदान की है।
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