
भूटान ने पीएम मोदी को समर्पित किया स्तूप, 'गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी' को भारत का समर्थन
भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक ने 'गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी' (GMC) प्रोजेक्ट में भारत के सहयोग के प्रति आभार व्यक्त करते हुए स्तूप संख्या 76 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समर्पित किया है। रिकॉर्ड 9 घंटे में 40,000 स्वयंसेवकों द्वारा बनाए गए 108 बौद्ध स्तूपों (जांगचुप चोर्टेन) में से एक को पीएम मोदी को समर्पित किया गया।
गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी (GMC) क्या है?
भूटान नरेश की परिकल्पना पर आधारित गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी हिमालय की तलहटी में बसाया जाने वाला एक क्रांतिकारी और भविष्यवादी शहर है। भारत के असम राज्य की सीमा से सटे दक्षिणी मैदानों में फैले 4,046 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में बनने वाला यह शहर भूटान के कुल भूभाग का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा है। फरवरी 2024 में एक रॉयल चार्टर के जरिए इसे अत्यधिक स्वायत्तता वाला विशेष प्रशासनिक क्षेत्र (SAR) घोषित किया गया था। यहाँ एक स्वतंत्र न्यायपालिका और शासन व्यवस्था होगी, जो वैश्विक मानकों के अनुरूप कार्य करेगी।
अनोखा मास्टरप्लान और डिजाइन
गेलेफू शहर को पर्यावरण संरक्षण, आध्यात्मिकता और आधुनिकता का अद्भुत संगम बनाया जा रहा है। इसका मास्टरप्लान एक के बाद एक जुड़ने वाले 'रहने योग्य पुलों' (Inhabitable Bridges) और मंडाला-आकार के 11 पड़ोस (Neighborhoods) के रूप में तैयार किया गया है। शहर में बहने वाली 35 नदियों और नालों की सुरक्षा के लिए विशेष सीढ़ीदार धान के खेत बनाए जाएंगे, जो बाढ़ नियंत्रण के साथ-साथ जैव विविधता गलियारे का भी काम करेंगे। इसके अलावा, योजना में एक नया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, विश्वविद्यालय, पूर्वी और पश्चिमी चिकित्सा केंद्र, और जलविद्युत बांध शामिल हैं।
स्तूप समर्पण और रिकॉर्ड निर्माण का महत्व
गेलेफू में माऊ छू (Aie) नदी के किनारे लगभग 40,000 प्रशिक्षित स्वयंसेवकों ने एक ही दिन में मात्र नौ घंटे में 15 मीटर ऊंचे 108 स्तूपों का निर्माण कर इतिहास रच दिया। स्तूप संख्या 76 को पीएम मोदी को समर्पित करने के पीछे खास वजह यह भी है कि वे हाल ही में 76 वर्ष के हुए हैं। यह समर्पण इस बात का प्रतीक है कि भारत इस दूरदर्शी माइंडफुलनेस सिटी के बुनियादी ढांचे, कनेक्टिविटी और आर्थिक विकास में एक प्रमुख भागीदार के रूप में खड़ा है।
भारत-भूटान संबंधों में नया मोड़
गेलेफू परियोजना न केवल भूटान के आर्थिक भविष्य की दिशा तय करेगी, बल्कि पूर्वोत्तर भारत के राज्यों के साथ व्यापार, पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को अभूतपूर्व बढ़ावा देगी। भारत के सक्रिय समर्थन ने दोनों देशों के बीच सामरिक और रणनीतिक साझेदारी को एक नई गहराई प्रदान की है।

LRS के तहत भारत से बाहर भेजा गया फंड $20 बिलियन के पार
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की लिबरलाइज़्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत साल 2026 के पहले आठ महीनों में विदेश भेजा गया धन $20 बिलियन के आंकड़े को पार कर गया है। विदेशी शिक्षा, यात्रा और संपत्ति निवेश के कारण आउटवर्ड रेमिटेंस में यह उल्लेखनीय उछाल देखने को मिला है।
क्या है लिबरलाइज़्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS)?
लिबरलाइज़्ड रेमिटेंस स्कीम की शुरुआत भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा 4 फरवरी 2004 को की गई थी। यह विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) 1999 का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भारत से बाहर भेजे जाने वाले पैसों के दिशा-निर्देश तय करता है।
प्रेषण सीमा और पात्रता नियम
LRS के तहत भारत में रहने वाले सभी निवासी व्यक्तियों (जिनमें नाबालिग भी शामिल हैं) को एक वित्तीय वर्ष (अप्रैल से मार्च) में 2,50,000 अमेरिकी डॉलर (USD) तक की राशि बिना किसी जटिल प्रक्रिया के विदेश भेजने की अनुमति होती है। एक वित्तीय वर्ष में लेनदेन की संख्या या आवृत्ति पर कोई सीमा नहीं रखी गई है। यह राशि चालू खाता (Current Account) या पूंजीगत खाता (Capital Account) दोनों प्रकार के लेनदेन के लिए भेजी जा सकती है।
किन कार्यों के लिए पैसा भेजने की अनुमति है?
इस योजना के अंतर्गत विदेश में बैंक खाता खोलना, अचल संपत्ति खरीदना, विदेशी शेयरों या पोर्टफोलियो में निवेश (ODI/OPI) करना शामिल है। इसके अलावा निजी विदेश यात्राएं (नेपाल और भूटान को छोड़कर), विदेशों में पढ़ाई, चिकित्सा उपचार, और अनिवासी भारतीय (NRI) रिश्तेदारों को ऋण देना भी पूरी तरह मान्य है।
इन गतिविधियों पर लागू है पूर्ण प्रतिबंध
LRS के तहत कुछ विशिष्ट गतिविधियों के लिए पैसा बाहर भेजने पर सख्त प्रतिबंध है। लॉटरी टिकट खरीदना, विदेशी मुद्रा में ट्रेडिंग (Forex Trading) करना, भारतीय कंपनियों के FCCBs खरीदना, आतंकवाद से जुड़ी संस्थाओं को धन भेजना या FATF द्वारा 'गैर-सहयोगी देशों' के रूप में चिह्नित राष्ट्रों में फंड ट्रांसफर करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
भारतीय अर्थव्यवस्था और बाहरी क्षेत्र का संकेत
LRS के तहत 20 बिलियन डॉलर से अधिक का यह प्रवाह भारतीय नागरिकों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती खर्च क्षमता, विदेशी परिसंपत्तियों में रुचि और वैश्विक शिक्षा व पर्यटन के प्रति रुझान को दर्शाता है।

नेपाल के शे-फोक्सुंडो झील के पास फंसे सभी भारतीय पर्यटक सुरक्षित रेस्क्यू
नेपाल की प्रसिद्ध शे-फोक्सुंडो झील के पास भारी बर्फबारी के बीच फंसे छह भारतीय पर्यटकों को हेलीकॉप्टर की मदद से सुरक्षित बचा लिया गया है। नुमला और बगला पास के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में फंसे इन पर्यटकों का स्वास्थ्य सामान्य है और जिला मुख्यालय पहुंचा दिया गया है।
भारी बर्फबारी और विकट परिस्थितियां
नेपाल के डोल्पा जिले में स्थित शे-फोक्सुंडो राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में अचानक हुई भारी बर्फबारी के चलते यह दल फंस गया था। ये सभी पर्यटक नुमला पास और बगला पास के ऊंचे पहाड़ी दर्रों के बीच संपर्क से कट गए थे। बंगाल की खाड़ी के पास विकसित हुए चक्रवाती प्रभाव और खराब मौसम के कारण इन पहाड़ी इलाकों में जनजीवन और आवागमन बुरी तरह प्रभावित हुआ था।
स्थानीय चेतावनियों को नजरअंदाज करना पड़ा भारी
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन पर्यटकों ने स्थानीय गाइड और सुरक्षाकर्मियों की चेतावनियों के बावजूद अपनी यात्रा जारी रखी थी। अत्यधिक बर्फबारी और संचार माध्यमों (मोबाइल कनेक्टिविटी) के अभाव के कारण शुरुआती दौर में उनकी सटीक लोकेशन का पता लगाना चुनौतीपूर्ण हो गया था।
वायु सेना और स्थानीय प्रशासन का सफल अभियान
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नेपाली सेना और जिला प्रशासन ने तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। मौसम की बाधाओं के बावजूद चलाए गए इस अभियान के तहत हेलीकॉप्टरों की मदद से सभी फंसे हुए पर्यटकों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। प्रशासन ने पुष्टि की है कि बचाए गए सभी भारतीय नागरिकों की स्वास्थ्य स्थिति पूरी तरह सामान्य है।
प्रशासनिक चेतावनी और सुरक्षा निर्देश
इस घटना के बाद स्थानीय प्रशासन ने हिमालयी क्षेत्रों की यात्रा करने वाले सभी पर्यटकों और सैलानियों के लिए सख्त चेतावनी जारी की है। प्रशासन ने खराब मौसम के दौरान जोखिम भरे उच्च ऊंचाई वाले मार्गों पर जाने से बचने और सुरक्षित स्थानों पर रहने की सलाह दी है।

मणिपुर में मिली कैटफिश की नई दुर्लभ प्रजाति Exostoma nasibarbatum
मणिपुर में शोधकर्ताओं ने ग्लाइप्टोस्टेरनाइन कैटफिश की एक नई और दुर्लभ प्रजाति 'Exostoma nasibarbatum' की खोज की है। म्यांमार सीमा के पास दुजांग नदी की सहायक बीउपाल धारा में मिली यह नई मछली तेज बहाव वाले पर्वतीय पानी में रहने और पत्थरों पर चिपके रहने की अद्भुत शारीरिक क्षमताओं से लैस है।
उफनती धाराओं में रहने के अनुकूल शारीरिक संरचना
यह नई प्रजाति पथरीली सतहों और बड़े पत्थरों वाली तेज बहाव की उफनती धाराओं में पाई जाती है। पानी के तेज बहाव में टिके रहने के लिए इसमें कई खास शारीरिक अनुकूलन मौजूद हैं। इसका सिर और शरीर काफी चिपटा होता है। इसके अलावा, इसकी पसलियों जैसे पंख चिपकने वाली धारियों (Adhesive striae) से लैस होते हैं, जिनकी मदद से यह पत्थरों की सतह पर मजबूती से चिपकी रहती है।
क्यों पड़ा 'nasibarbatum' नाम?
इस प्रजाति का नाम इसकी सबसे प्रमुख विशेषता यानी इसके लंबे 'नेज़ल बार्बेल' (नाक के पास स्थित दाढ़ीनुमा संवेदी अंग) के आधार पर रखा गया है। यह अंग इसकी आंख की पिछली सीमा से भी आगे तक फैला होता है। लैटिन भाषा के दो शब्दों 'Nasus' (नाक) और 'Barba' (दाढ़ी) को मिलाकर इसका नाम 'nasibarbatum' रखा गया है, जो नथुने के पास स्थित इस लंबे स्पर्श-संवेदी अंग को दर्शाता है।
जीनस और परिवार का विवरण
यह प्रजाति Exostoma जीनस से संबंधित है, जो मुख्य रूप से एशिया के ताजे पानी में पाई जाने वाली सिसोरिड (Sisorid) कैटफिश का समूह है। सिसोरिड कैटफिश 'सिलुरिफॉर्मिस' (Siluriformes) क्रम के तहत 'सिसोरिडे' परिवार से आती हैं।
दक्षिण-पूर्व एशिया में जैव विविधता का प्रमाण
वर्तमान में Exostoma जीनस के तहत 23 वैध प्रजातियों को मान्यता प्राप्त है, जो दक्षिण-पूर्व एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप की प्रमुख नदी प्रणालियों में फैली हुई हैं। इनमें से सात प्रजातियां अकेले चिंदविन-इरावदी नदी क्षेत्र में पाई जाती हैं। मणिपुर में हुई यह नई खोज पूर्वोत्तर भारत के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की समृद्धि को एक बार फिर रेखांकित करती है।

सिक्किम मिल्क यूनियन में माइक्रोबायोलॉजी लैब का उद्घाटन, राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम को बल
केंद्रीय मतस्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम (NPDD) के तहत सिक्किम मिल्क यूनियन के लिए एक अत्याधुनिक माइक्रोबायोलॉजी प्रयोगशाला का उद्घाटन करने जा रहे हैं। इस कदम का मुख्य उद्देश्य सिक्किम और आसपास के क्षेत्रों में दूध एवं डेयरी उत्पादों की गुणवत्ता और परीक्षण क्षमताओं को और मजबूत करना है।
राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम (NPDD) का परिचय
राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत संचालित एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना (Central Sector Scheme) है। वर्ष 2014 में शुरू की गई इस योजना को जुलाई 2021 में नए सिरे से पुनर्गठित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य देश में डेयरी बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाना, डेयरी सहकारी समितियों को सशक्त करना और संगठित दूध खरीद, प्रसंस्करण तथा विपणन की हिस्सेदारी को बढ़ावा देना है।
योजना के प्रमुख घटक
राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम को दो मुख्य घटकों में विभाजित करके लागू किया जा रहा है।
घटक 'A' (Component A): इसके तहत राज्य सहकारी डेयरी फेडरेशन, जिला दुग्ध उत्पादक संघों, स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के लिए दूध की गुणवत्ता की जांच करने वाले उपकरणों और प्राथमिक शीतलन सुविधाओं (Chilling Facilities) को मजबूत किया जाता है। सिक्किम में शुरू हो रही माइक्रोबायोलॉजी प्रयोगशाला इसी गुणवत्ता परीक्षण का एक हिस्सा है।
घटक 'B' (Component B): इसका मुख्य ध्यान किसानों को संगठित बाजारों तक बेहतर पहुंच प्रदान करने, डेयरी प्रसंस्करण सुविधाओं और विपणन बुनियादी ढांचे को अपग्रेड करने पर है। इसके जरिए उत्पादक-स्वामित्व वाले संस्थानों की क्षमता का विस्तार करके दूध और डेयरी उत्पादों की बिक्री में बढ़ोतरी की जाती है।
पूर्वोत्तर और पूर्व-क्षेत्रीय डेयरी उद्योग को गति
सिक्किम मिल्क यूनियन के तहत इस नई लैब की स्थापना से पूर्वोत्तर क्षेत्र में दूध की सूक्ष्मजैविक जांच (Microbiological Testing) में तेजी आएगी। इससे न केवल आम उपभोक्ताओं को सुरक्षित और शुद्ध डेयरी उत्पाद प्राप्त होंगे, बल्कि क्षेत्र के डेयरी किसानों को भी अपने उत्पाद का बेहतर मूल्य और बड़ा बाजार हासिल करने में सीधी मदद मिलेगी।
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