
नेपाल के शे-फोक्सुंडो झील के पास फंसे सभी भारतीय पर्यटक सुरक्षित रेस्क्यू
नेपाल की प्रसिद्ध शे-फोक्सुंडो झील के पास भारी बर्फबारी के बीच फंसे छह भारतीय पर्यटकों को हेलीकॉप्टर की मदद से सुरक्षित बचा लिया गया है। नुमला और बगला पास के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में फंसे इन पर्यटकों का स्वास्थ्य सामान्य है और जिला मुख्यालय पहुंचा दिया गया है।
भारी बर्फबारी और विकट परिस्थितियां
नेपाल के डोल्पा जिले में स्थित शे-फोक्सुंडो राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में अचानक हुई भारी बर्फबारी के चलते यह दल फंस गया था। ये सभी पर्यटक नुमला पास और बगला पास के ऊंचे पहाड़ी दर्रों के बीच संपर्क से कट गए थे। बंगाल की खाड़ी के पास विकसित हुए चक्रवाती प्रभाव और खराब मौसम के कारण इन पहाड़ी इलाकों में जनजीवन और आवागमन बुरी तरह प्रभावित हुआ था।
स्थानीय चेतावनियों को नजरअंदाज करना पड़ा भारी
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन पर्यटकों ने स्थानीय गाइड और सुरक्षाकर्मियों की चेतावनियों के बावजूद अपनी यात्रा जारी रखी थी। अत्यधिक बर्फबारी और संचार माध्यमों (मोबाइल कनेक्टिविटी) के अभाव के कारण शुरुआती दौर में उनकी सटीक लोकेशन का पता लगाना चुनौतीपूर्ण हो गया था।
वायु सेना और स्थानीय प्रशासन का सफल अभियान
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नेपाली सेना और जिला प्रशासन ने तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। मौसम की बाधाओं के बावजूद चलाए गए इस अभियान के तहत हेलीकॉप्टरों की मदद से सभी फंसे हुए पर्यटकों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। प्रशासन ने पुष्टि की है कि बचाए गए सभी भारतीय नागरिकों की स्वास्थ्य स्थिति पूरी तरह सामान्य है।
प्रशासनिक चेतावनी और सुरक्षा निर्देश
इस घटना के बाद स्थानीय प्रशासन ने हिमालयी क्षेत्रों की यात्रा करने वाले सभी पर्यटकों और सैलानियों के लिए सख्त चेतावनी जारी की है। प्रशासन ने खराब मौसम के दौरान जोखिम भरे उच्च ऊंचाई वाले मार्गों पर जाने से बचने और सुरक्षित स्थानों पर रहने की सलाह दी है।

मणिपुर में मिली कैटफिश की नई दुर्लभ प्रजाति Exostoma nasibarbatum
मणिपुर में शोधकर्ताओं ने ग्लाइप्टोस्टेरनाइन कैटफिश की एक नई और दुर्लभ प्रजाति 'Exostoma nasibarbatum' की खोज की है। म्यांमार सीमा के पास दुजांग नदी की सहायक बीउपाल धारा में मिली यह नई मछली तेज बहाव वाले पर्वतीय पानी में रहने और पत्थरों पर चिपके रहने की अद्भुत शारीरिक क्षमताओं से लैस है।
उफनती धाराओं में रहने के अनुकूल शारीरिक संरचना
यह नई प्रजाति पथरीली सतहों और बड़े पत्थरों वाली तेज बहाव की उफनती धाराओं में पाई जाती है। पानी के तेज बहाव में टिके रहने के लिए इसमें कई खास शारीरिक अनुकूलन मौजूद हैं। इसका सिर और शरीर काफी चिपटा होता है। इसके अलावा, इसकी पसलियों जैसे पंख चिपकने वाली धारियों (Adhesive striae) से लैस होते हैं, जिनकी मदद से यह पत्थरों की सतह पर मजबूती से चिपकी रहती है।
क्यों पड़ा 'nasibarbatum' नाम?
इस प्रजाति का नाम इसकी सबसे प्रमुख विशेषता यानी इसके लंबे 'नेज़ल बार्बेल' (नाक के पास स्थित दाढ़ीनुमा संवेदी अंग) के आधार पर रखा गया है। यह अंग इसकी आंख की पिछली सीमा से भी आगे तक फैला होता है। लैटिन भाषा के दो शब्दों 'Nasus' (नाक) और 'Barba' (दाढ़ी) को मिलाकर इसका नाम 'nasibarbatum' रखा गया है, जो नथुने के पास स्थित इस लंबे स्पर्श-संवेदी अंग को दर्शाता है।
जीनस और परिवार का विवरण
यह प्रजाति Exostoma जीनस से संबंधित है, जो मुख्य रूप से एशिया के ताजे पानी में पाई जाने वाली सिसोरिड (Sisorid) कैटफिश का समूह है। सिसोरिड कैटफिश 'सिलुरिफॉर्मिस' (Siluriformes) क्रम के तहत 'सिसोरिडे' परिवार से आती हैं।
दक्षिण-पूर्व एशिया में जैव विविधता का प्रमाण
वर्तमान में Exostoma जीनस के तहत 23 वैध प्रजातियों को मान्यता प्राप्त है, जो दक्षिण-पूर्व एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप की प्रमुख नदी प्रणालियों में फैली हुई हैं। इनमें से सात प्रजातियां अकेले चिंदविन-इरावदी नदी क्षेत्र में पाई जाती हैं। मणिपुर में हुई यह नई खोज पूर्वोत्तर भारत के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की समृद्धि को एक बार फिर रेखांकित करती है।

सिक्किम मिल्क यूनियन में माइक्रोबायोलॉजी लैब का उद्घाटन, राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम को बल
केंद्रीय मतस्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम (NPDD) के तहत सिक्किम मिल्क यूनियन के लिए एक अत्याधुनिक माइक्रोबायोलॉजी प्रयोगशाला का उद्घाटन करने जा रहे हैं। इस कदम का मुख्य उद्देश्य सिक्किम और आसपास के क्षेत्रों में दूध एवं डेयरी उत्पादों की गुणवत्ता और परीक्षण क्षमताओं को और मजबूत करना है।
राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम (NPDD) का परिचय
राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत संचालित एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना (Central Sector Scheme) है। वर्ष 2014 में शुरू की गई इस योजना को जुलाई 2021 में नए सिरे से पुनर्गठित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य देश में डेयरी बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाना, डेयरी सहकारी समितियों को सशक्त करना और संगठित दूध खरीद, प्रसंस्करण तथा विपणन की हिस्सेदारी को बढ़ावा देना है।
योजना के प्रमुख घटक
राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम को दो मुख्य घटकों में विभाजित करके लागू किया जा रहा है।
घटक 'A' (Component A): इसके तहत राज्य सहकारी डेयरी फेडरेशन, जिला दुग्ध उत्पादक संघों, स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के लिए दूध की गुणवत्ता की जांच करने वाले उपकरणों और प्राथमिक शीतलन सुविधाओं (Chilling Facilities) को मजबूत किया जाता है। सिक्किम में शुरू हो रही माइक्रोबायोलॉजी प्रयोगशाला इसी गुणवत्ता परीक्षण का एक हिस्सा है।
घटक 'B' (Component B): इसका मुख्य ध्यान किसानों को संगठित बाजारों तक बेहतर पहुंच प्रदान करने, डेयरी प्रसंस्करण सुविधाओं और विपणन बुनियादी ढांचे को अपग्रेड करने पर है। इसके जरिए उत्पादक-स्वामित्व वाले संस्थानों की क्षमता का विस्तार करके दूध और डेयरी उत्पादों की बिक्री में बढ़ोतरी की जाती है।
पूर्वोत्तर और पूर्व-क्षेत्रीय डेयरी उद्योग को गति
सिक्किम मिल्क यूनियन के तहत इस नई लैब की स्थापना से पूर्वोत्तर क्षेत्र में दूध की सूक्ष्मजैविक जांच (Microbiological Testing) में तेजी आएगी। इससे न केवल आम उपभोक्ताओं को सुरक्षित और शुद्ध डेयरी उत्पाद प्राप्त होंगे, बल्कि क्षेत्र के डेयरी किसानों को भी अपने उत्पाद का बेहतर मूल्य और बड़ा बाजार हासिल करने में सीधी मदद मिलेगी।

भारतीय नौसेना का प्रोजेक्ट 18A: ₹80,000 करोड़ का महा-युद्धपोत मिशन
रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने भारतीय नौसेना के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट 18A को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। लगभग ₹80,000 करोड़ की लागत वाला यह प्रोजेक्ट भारत को नेक्स्ट-जनरेशन के स्टील्थ गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर से लैस करेगा। 13,000 टन से अधिक वजन वाले ये युद्धपोत भारत की समुद्री सुरक्षा क्षमता को अभूतपूर्व ऊंचाई पर ले जाएंगे।
महाविनाशक क्षमता और क्रूजर श्रेणी में भारत का प्रवेश
विशाखापत्तनम-क्लास (P-15B) डिस्ट्रॉयर के उत्तराधिकारी के रूप में विकसित किए जा रहे इन युद्धपोतों का विस्थापन (Displacement) 13,000 टन से अधिक होगा। यह वर्तमान विशाखापत्तनम-क्लास (7,400 टन) की तुलना में लगभग दोगुना बड़ा है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार 10,000 टन से अधिक के युद्धपोत 'क्रूजर' श्रेणी में आते हैं। इस प्रोजेक्ट के साथ ही भारत इस विशेष और शक्तिशाली युद्धपोत वर्ग में कदम रख देगा।
स्वदेशी तकनीक और घातक हथियार प्रणाली
प्रोजेक्ट 18A के तहत बनने वाले जहाजों में लगभग 75% स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया जाएगा। इस मिशन की सबसे बड़ी खासियत इसमें शामिल 144 वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (VLS) सेल्स होंगे। इन सेल्स के जरिए लंबी दूरी की ब्रह्मोस-NG सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें, 150 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक मार करने वाली बराक-8 ER मिसाइलें और LR-LACM मिसाइलें दागी जा सकेंगी।
एडवांस सुरक्षा प्रणाली और भविष्य की तकनीक
दुश्मन के हवाई हमलों और ड्रोन स्वार्म्स से निपटने के लिए इन युद्धपोतों में 30mm के रैपिड-फायर CIWS और हाई-एनर्जी लेजर आधारित डायरेक्टेड-एनर्जी वेपन लगाए जाएंगे। इसके अलावा, पनडुब्बी रोधी युद्ध (ASW) के लिए वरुणशास्त्र हैवी टॉरपीडो और उन्नत सोनार सिस्टम भी शामिल होंगे। ये युद्धपोत मानवरहित पनडुब्बियों (UUVs) और कामिकेज ड्रोन को ले जाने तथा संचालित करने में सक्षम होंगे।
उन्नत रडार और स्टील्थ डिजाइन
इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन (IEP) से लैस ये जहाज 18 नौटिकल मील की गति पर 4,500 नौटिकल मील तक यात्रा कर सकते हैं और 45 से अधिक दिनों तक लगातार समुद्र में तैनात रह सकते हैं। 500 किलोमीटर तक की दूरी से खतरों को भांपने वाला रडार और रडार-अवशोषक सामग्री से तैयार एक्स-शेप्ड मास्ट इसकी स्टील्थ (अदृश्यता) क्षमता को बेहद धारदार बनाता है।

35 साल पुराना MINURSO मिशन खत्म, पश्चिमी सहारा में बढ़ा तनाव
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा जनादेश का नवीनीकरण न किए जाने के बाद पश्चिमी सहारा में 35 साल पुराने शांति मिशन (MINURSO) का अंत हो गया है। खनिजों और तटीय संसाधनों से समृद्ध इस उत्तर-पश्चिम अफ़्रीकी क्षेत्र में इस ऐतिहासिक बदलाव से क्षेत्रीय स्थिरता और मोरोक्को-पॉलीसारियो मोर्चे के बीच तनाव बढ़ने की आशंका गहरा गई है।
पश्चिमी सहारा का भौगोलिक और आर्थिक महत्व
पश्चिमी सहारा उत्तर-पश्चिम अफ्रीका का एक विशाल, कम आबादी वाला रेगिस्तानी इलाका है। इसके उत्तर में मोरक्को, उत्तर-पूर्व में अल्जीरिया और पूर्व व दक्षिण में मॉरिटानिया की सीमाएं लगती हैं। वहीं, इसके पश्चिम और उत्तर-पश्चिम में अटलांटिक महासागर का विशाल तट फैला हुआ है। यह क्षेत्र सिर्फ सामरिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी बेहद समृद्ध है। यहाँ फॉस्फेट और अन्य मूल्यवान खनिजों के बड़े भंडार मौजूद हैं, साथ ही अटलांटिक तट पर फैला मछली पकड़ने का उद्योग यहाँ की अर्थव्यवस्था की मुख्य रीढ़ है।
क्या था MINURSO मिशन?
वर्ष 1991 में मोरक्को और 'फ्रेंटी पॉलिसारियो' (Frente Polisario) के बीच शांति समझौते और संघर्ष विराम को लागू करने के लिए संयुक्त राष्ट्र मिशन (MINURSO) की स्थापना की गई थी। इस शांति मिशन का मुख्य मुख्यालय पश्चिमी सहारा के सबसे बड़े शहर लाआयुन (Laayoune) में स्थित था।
शांति बनाए रखने में अहम भूमिका
पिछले साढ़े तीन दशकों से यह मिशन क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा था। इसका मुख्य काम संघर्ष विराम की निगरानी करना, घटनाओं की निष्पक्ष जांच करना, रिपोर्ट तैयार करना और दोनों पक्षों के बीच उपजे तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास करना था।
शांति प्रक्रिया पर पड़ेगा असर
सुरक्षा परिषद में सर्वसम्मति न बनने के कारण इस मिशन का खत्म होना पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। शांति मिशन की वापसी के बाद इस संसाधन-समृद्ध क्षेत्र में एक बार फिर पुराने विवाद और तनाव के भड़कने की आशंका तेज हो गई है।
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