
नासा के BioSentinel यान ने चंद्रमा के पास मापा गहरा अंतरिक्ष विकिरण
नासा के 6U क्यूबसैट BioSentinel प्रोब ने चंद्रमा के पास से गुजरते हुए गहरे अंतरिक्ष विकिरण का अध्ययन किया है। इस मिशन में जीवित यीस्ट (खमीर) का उपयोग करके पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से बाहर जैविक कोशिकाओं पर विकिरण के प्रभाव को मापने का प्रयास किया गया। यह परीक्षण भविष्य के मानव अंतरिक्ष अभियानों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।
मिशन का उद्देश्य और इसकी खास तकनीक
BioSentinel एक 6-यूनिट (6U) क्यूबसैट है, जिसे 16 नवंबर 2022 को नासा के आर्टेमिस I (Artemis I) मिशन के साथ लॉन्च किया गया था। इस छोटा सा उपग्रह (CubeSat) गहरे अंतरिक्ष में जीवित जीवों को जीवित रखने की क्षमता विकसित करने और वहां के घातक विकिरण का अध्ययन करने के उद्देश्य से भेजा गया है।
इस यान में दो मुख्य उपकरण लगे हैं—माइक्रोफ्लुइडिक-आधारित बायोसेंसर और एक रेडिएशन डिटेक्टर (LET स्पेक्ट्रोमीटर)। बायोसेंसर उपकरण में बडिंग यीस्ट (Saccharomyces cerevisiae) को भेजा गया था। यीस्ट की डीएनए संरचना इंसानों के काफी करीब मानी जाती है, इसलिए इसके जरिए गहरे अंतरिक्ष में लगातार एकत्र होने वाली विकिरण खुराक पर कोशिकाओं की प्रतिक्रिया को परखा जाना तय किया गया था।
गहरे अंतरिक्ष विकिरण की चुनौती और निष्कर्ष
गहरे अंतरिक्ष का वातावरण पृथ्वी के सुरक्षात्मक चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) से बाहर होता है, जहां सूर्य के सौर कणों और गैलेक्टिक कॉस्मिक किरणों का उच्च विकिरण बना रहता है। हालांकि बायोसेंसर में रखे यीस्ट के नमूने लंबे समय तक स्टोरेज में रहने के कारण सक्रिय नहीं हो पाए, लेकिन यान में मौजूद रेडिएशन डिटेक्टर लगातार गहरे अंतरिक्ष के विकिरण डेटा को सफलतापूर्वक रिकॉर्ड कर रहा है।
भविष्य के मानव अभियानों के लिए क्यों जरूरी है यह खोज
नासा का यह प्रयोग भविष्य के चंद्रमा (Artemis program) और मंगल ग्रह पर भेजे जाने वाले मानव मिशनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। अंतरिक्ष यात्रियों को लंबे अभियानों के दौरान गहरे अंतरिक्ष के खतरनाक विकिरण से बचाने और उनकी कोशिकाओं में डीएनए क्षति को रोकने की रणनीतियां तैयार करने में BioSentinel से प्राप्त डेटा निर्णायक भूमिका निभाएगा।

सोमालिया में 30 साल बाद संयुक्त राष्ट्र का राजनीतिक मिशन समाप्त
सोमालिया में दो साल के संक्रमण काल (Transition Period) के बाद संयुक्त राष्ट्र (UN) का राजनीतिक मिशन औपचारिक रूप से समाप्त हो गया है। तीन दशकों से अधिक समय तक चले इस शांति मिशन का समापन सोमालिया में लोकतांत्रिक प्रक्रिया, शासन और राष्ट्रीय संस्थानों की बढ़ती मजबूती तथा आत्मनिर्भरता को दर्शाता है।
UN मिशन का इतिहास और इसकी भूमिका
सोमालिया में आतंकवाद, चरमपंथी समूहों और दशकों से जारी गृहयुद्ध के बाद लोकतंत्र व कानून का शासन स्थापित करने के लिए वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (UNSOM) की स्थापना की गई थी।
अक्टूबर 2024 में UNSOM का कार्यकाल समाप्त होने के बाद इसे दो वर्षीय 'संयुक्त राष्ट्र संक्रमणकालीन सहायता मिशन' (UNTMIS) में बदला गया, ताकि राष्ट्रीय संस्थानों को शक्तियों का हस्तांतरण सुचारू रूप से हो सके। लगभग 30 वर्षों से अधिक समय के बाद इस मिशन के समापन के साथ ही अब सभी प्रमुख प्रशासनिक और सुरक्षा जिम्मेदारियां सोमालिया सरकार को सौंप दी गई हैं।
सोमालिया की भौगोलिक स्थिति और विशेषताएं
सोमालिया की भौगोलिक स्थिति बेहद खास है। भूमध्य रेखा (Equator) इसके दक्षिणी हिस्से से होकर गुजरती है। यह देश उत्तर-पश्चिम में जिबूती, पश्चिम में इथियोपिया और दक्षिण-पश्चिम में केन्या के साथ अपनी जमीनी सीमा साझा करता है। इसके अलावा उत्तर में अदन की खाड़ी और पूर्व में हिंद महासागर इसकी समुद्री सीमाओं को बनाते हैं। मोगादिशु इसकी राजधानी है।
जलवायु की दृष्टि से सोमालिया मुख्य रूप से शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र है, जहां तापमान में बहुत कम मौसमी बदलाव देखा जाता है। अदन की खाड़ी के साथ फैला तटीय मैदान 'गुबन' कहलाता है। जुब्बा और शबेले देश की दो प्रमुख नदियां हैं, जबकि माउंट शिमबिरिस (2,460 मीटर) सोमालिया की सबसे ऊंची चोटी है। यह देश लोहे, यूरेनियम, तांबा, बॉक्साइट और जिप्सम जैसे प्राकृतिक संसाधनों से भी समृद्ध है।
भविष्य की राह और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
राजनीतिक मिशन के समापन का मतलब सोमालिया से वैश्विक समुदाय का हटना नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न विकास, मानवीय और मानवाधिकार एजेंसियां स्थानीय प्राधिकारियों के साथ मिलकर कार्य करती रहेंगी। यह बदलाव सोमालिया को अपनी सुरक्षा और लोकतांत्रिक प्राथमिकताओं को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करेगा।

सिंहगढ़ किले पर लहराएगा 100 फीट ऊंचा भव्य भगवा ध्वज
छत्रपति शिवाजी महाराज और मराठा साम्राज्य के शौर्य के प्रतीक ऐतिहासिक सिंहगढ़ किले पर पुणे नगर निगम (PMC) द्वारा 100 फीट ऊंचा भव्य भगवा ध्वज स्थापित किया जाएगा। इस परियोजना के लिए ₹1 करोड़ का बजट आवंटित किया गया है, जिसके तहत ध्वजस्तंभ के साथ-साथ परिसर का सौंदर्यीकरण और आकर्षक प्रकाश व्यवस्था भी की जाएगी।
परियोजना और सौंदर्य सुधार योजना
पुणे नगर निगम ने इस विशेष परियोजना के लिए ₹1 करोड़ की राशि का प्रावधान किया है। इस परियोजना के अंतर्गत 100 फीट ऊंचा ध्वजस्तंभ स्थापित करने के साथ-साथ महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम (MTDC) परिसर के आसपास सौंदर्यीकरण और रात के समय भव्य दृश्य प्रस्तुत करने वाली विशेष विद्युत रोषणाई (lighting) की व्यवस्था भी की जाएगी। ध्वज और ध्वजस्तंभ के रखरखाव की जिम्मेदारी भी नगर निगम ही संभालेगा।
सिंहगढ़ किले की भौगोलिक स्थिति
पहले 'कोंढाणा' नाम से जाना जाने वाला सिंहगढ़ किला महाराष्ट्र में सहयाद्री पर्वतमाला की भुलेश्वर श्रृंखला में समुद्र तल से लगभग 1,312 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह पुणे के पास एक रणनीतिक पहाड़ी पर स्थित है और राजगढ़, तोरणा तथा पुरंदर जैसे अन्य प्रमुख किलों से घिरा हुआ है।
2000 वर्षों से अधिक का ऐतिहासिक सफर
सिंहगढ़ का इतिहास 2,000 वर्षों से अधिक पुराना है। इसका मूल नाम ऋषि कौंडिन्य के नाम पर 'कोंढाणा' पड़ा था। समय के साथ यह कई शासकों के अधीन रहा, जिनमें 1340 ईस्वी में तुगलक राजवंश और 1496 ईस्वी में निजामशाही शामिल थे। बाद में मराठा शासक शाहजी भोंसले और 1647 ईस्वी में शिवाजी महाराज ने इस पर अधिकार किया। 1665 ईस्वी की पुरंदर की संधि के तहत इसे मुगलों को सौंपना पड़ा था।
'गढ़ आला पण सिंह गेला' और स्थापत्य कला
वर्ष 1670 में सिंहगढ़ की लड़ाई में शिवाजी महाराज के सेनापति तानाजी मालुसरे ने अदम्य साहस दिखाते हुए मुगलों से यह किला वापस छीन लिया। इस युद्ध में तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए, जिस पर भावुक होकर शिवाजी महाराज ने कहा था— "गढ़ आला, पण सिंह गेला" (किला जीता, पर शेर चला गया)। उन्हीं के सम्मान में इसका नाम 'सिंहगढ़' रखा गया।
स्थापत्य की दृष्टि से यह किला मराठा वास्तुकला की मिसाल है। इसमें लगभग 2 मील लंबी मजबूत किलेबंदी, पुणे दरवाजा और कल्याण दरवाजा नामक दो मुख्य प्रवेश द्वार तथा उन्नत जल संचयन प्रणाली मौजूद है। किले में देवी काली का मंदिर, तानाजी मालुसरे और राजा राम छत्रपति की समाधियां भी स्थित हैं।

उमरेड-करहांडला का बाघ शावक पहुंचा पेंच टाइगर रिजर्व, उठी उम्मीदें
महाराष्ट्र के उमरेड-करहांडला वन्यजीव अभयारण्य में जन्मी बाघिन 'F2' का शावक सफर तय करते हुए पेंच टाइगर रिजर्व के चोरबहुली गेट के पास पहुंच गया है। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना दो बड़े जंगलों के बीच प्राकृतिक वन्यजीव गलियारे (Wildlife Corridor) के सक्रिय होने का एक सकारात्मक संकेत है।
वन्यजीव गलियारे (कॉरिडोर्स) की मजबूती का संकेत
सामान्यतः जब युवा बाघ बड़े होते हैं, तो वे अपने लिए नए आवास और शिकार की तलाश में अपने जन्मस्थान से निकलकर दूसरे जंगलों का रुख करते हैं, जिसे 'टाइगर डिस्पर्सल' कहा जाता है। इस शावक का उमरेड-करहांडला से पेंच तक सुरक्षित पहुंचना यह दर्शाता है कि दोनों संरक्षित क्षेत्रों के बीच प्राकृतिक आवाजाही का रास्ता अभी भी प्रभावी ढंग से काम कर रहा है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, यह इस बात का प्रमाण है कि जंगलों के बीच का प्राकृतिक कॉरिडोर्स वन्यजीवों के लिए सुरक्षित है। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि शावक ने पेंच को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया है या वह केवल इस क्षेत्र से गुजर रहा है।
पेंच टाइगर रिजर्व की भौगोलिक स्थिति और विशेषता
सतपुड़ा पहाड़ियों के दक्षिणी छोर पर फैला पेंच टाइगर रिजर्व मध्य प्रदेश के सिवनी और छिंदवाड़ा जिलों से लेकर महाराष्ट्र की सीमा तक विस्तृत है। उत्तर से दक्षिण की ओर बहने वाली पेंच नदी इस रिजर्व की जीवन रेखा है, जिसके नाम पर इसका नामकरण हुआ है। इस अभ्यारण्य में इंदिरा प्रियदर्शिनी पेंच राष्ट्रीय उद्यान और पेंच मोगली अभ्यारण्य शामिल हैं। यहां की वनस्पति मुख्य रूप से दक्षिण भारतीय उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती, शुष्क पर्णपाती सागौन और शुष्क मिश्रित पर्णपाती वनों से बनी है। सागौन, महुआ और विभिन्न प्रकार की घास वाले इस क्षेत्र में चीतल, सांभर, नीलगाय, गौर और जंगली सूअर प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।

असम में डैम्सलफ्लाई की नई प्रजाति 'डिस्फिया असमेंसिस' की खोज
शोधकर्ताओं ने असम के कर्बी आंगलोंग जिले से डैम्सलफ्लाई (एक प्रकार की ड्रैगनफ्लाई जैसी कीट) की एक नई प्रजाति 'डिस्फिया असमेंसिस' (Dysphaea assamensis) की औपचारिक खोज की है। पेट पर नीले रंग के जटिल पैटर्न वाली यह प्रजाति इंडो-बर्मा जैव विविधता क्षेत्र में स्वच्छ और छायादार जंगलों की धाराओं में पाई जाती है।
नई प्रजाति की अनोखी शारीरिक पहचान
यह नई खोजी गई प्रजाति अपने वर्ग के अन्य सभी जीवों से अलग और खास नजर आती है। इसके पेट के ऊपरी खंडों (dorsal pattern) पर एक बहुत ही जटिल और विस्तृत नीले रंग की संरचना पाई जाती है, जो इसे डिस्फिया वंश (genus) की अन्य सभी ज्ञात प्रजातियों से स्पष्ट रूप से अलग करती है। इस नई खोज के साथ ही दुनिया भर में डिस्फिया वंश की मान्यता प्राप्त प्रजातियों की कुल संख्या अब बढ़कर 10 हो गई है।
आवास और पर्यावरण के लिए महत्व
डिस्फिया असमेंसिस का मुख्य आवास शांत, निर्बाध और छायादार जंगली धाराएं (forest streams) हैं। इसका पाया जाना इंडो-बर्मा जैविक सीमा क्षेत्र की असाधारण और समृद्ध जैव विविधता को रेखांकित करता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस प्रकार की प्रजातियों की उपस्थिति उस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) के पूरी तरह स्वस्थ और स्वच्छ होने का संकेत देती है।
क्या होती हैं डैम्सलफ्लाई?
डैम्सलफ्लाई मुख्य रूप से ओडोनाटा (Odonata) क्रम के अंतर्गत आने वाले शिकारी और हवाई कीटों का एक समूह हैं। ये आमतौर पर उथले और मीठे पानी के स्रोतों के आसपास पाई जाती हैं। पतले शरीर और लंबे, झिल्लीदार व जालदार पंखों के साथ ये बहुत ही सुंदर और शालीन उड़ान भरती हैं।
सामान्य ड्रैगनफ्लाई की तुलना में डैम्सलफ्लाई आकार में छोटी, अधिक नाजुक और धीमी गति से उड़ने वाली होती हैं। इनमें स्प्रेडविंग डैम्सलफ्लाई को पहचानना काफी आसान होता है, क्योंकि वे आराम करते समय अपने पंखों को पेट के ऊपर 'V' आकार में फैलाकर रखती हैं।
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