
490 पुलिस कर्मियों को मिला 'केंद्रीय गृहमंत्री दक्षता पदक', देखें पूरी खबर
गृह मंत्रालय ने वर्ष 2026 के लिए 490 पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को 'केंद्रीय गृहमंत्री दक्षता पदक' से सम्मानित करने की घोषणा की है। सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर घोषित यह पदक विशेष अभियानों, जांच, खुफिया जानकारी और फॉरेंसिक साइंस के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाता है।
सरदार पटेल की जयंती पर घोषणा की परंपरा
इस पदक की घोषणा हर साल 31 अक्टूबर को भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती (राष्ट्रीय एकता दिवस) के अवसर पर की जाती है। इस पुरस्कार का मुख्य उद्देश्य देश भर के पुलिस बलों, सुरक्षा संगठनों, खुफिया विभागों और फॉरेंसिक साइंस लैब में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाना और उनमें उच्च पेशेवर मानकों को प्रोत्साहित करना है।
चार प्रमुख क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए सम्मान
गृह मंत्रालय द्वारा दिए जाने वाले इस पदक का दायरा चार मुख्य श्रेणियों में बंटा हुआ है:
विशेष अभियान (Special Operation)
जांच (Investigation)
खुफिया जानकारी (Intelligence)
फॉरेंसिक साइंस (Forensic Science)
यह पदक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की पुलिस, केंद्रीय पुलिस संगठनों (CPOs), केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) और केंद्र व राज्यों की फॉरेंसिक साइंस प्रयोगशालाओं के कर्मियों को उनके असाधारण कार्य के लिए प्रदान किया जाता है।
चार पुराने पदकों का विलय
'केंद्रीय गृहमंत्री दक्षता पदक' का गठन भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा वर्ष 2024 में किया गया था। इस नए पदक को गृह मंत्रालय द्वारा पूर्व में दिए जाने वाले चार अलग-अलग पदकों (विशेष अभियान पदक, जांच में उत्कृष्टता पदक, असाधारण खुफिया दक्षता पदक और मेधावी सेवा पदक) का विलय (Merge) करके एक एकीकृत पदक के रूप में स्थापित किया गया था।
यह सम्मान उन सुरक्षाकर्मियों के साहस, बुद्धिमत्ता और तकनीकी दक्षता की सराहना करता है जो देश की आंतरिक सुरक्षा और न्याय प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए दिन-रात समर्पित रहते हैं।

अमेरिका और जापान के बीच AMRAAM मिसाइल निर्माण के लिए ऐतिहासिक समझौता
अमेरिका और जापान ने AIM-120 'अमराम' (AMRAAM) मिसाइलों की अंतिम असेंबली और टेस्टिंग के लिए जापान में एक नया रक्षा संयंत्र स्थापित करने का समझौता किया है। यह कदम इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एफ-35 जैसे आधुनिक लड़ाकू विमानों के लिए मिसाइलों की आपूर्ति और रक्षा उत्पादन क्षमता को मजबूत करेगा।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सामरिक मजबूती
जापान में बनने वाला यह नया असेंबली और इंस्पेक्शन प्लांट (FACO) अमेरिका के बाहर स्थापित होने वाली अपनी तरह की पहली सुविधा होगी। इस सुविधा के शुरू होने से अमेरिकी और जापानी वायु सेनाओं के लड़ाकू जहाजों, जैसे F-35, F-15 और F-16 को समय पर मिसाइलों की पुनरपूर्ति (Replenishment) सुनिश्चित की जा सकेगी। इसके साथ ही यह समझौता दोनों देशों के रक्षा-औद्योगिक आधार को मजबूत करने में बेहद सहायक होगा।
AIM-120 अमराम मिसाइल की खासियतें
AIM-120 अमराम एक ऑल-वेदर (हर मौसम में सक्षम), सुपरसोनिक और एक्टिव रडार-गाइडेड बीवियोंड-विजुअल-रेंज (BVR) एयर-टू-एयर मिसाइल है। 1970 और 1980 के दशक में अमेरिका द्वारा विकसित यह मिसाइल 1991 से परिचालन में है। 3.65 मीटर लंबी और लगभग मैक 4 (ध्वनि की गति से चार गुना अधिक) की रफ्तार से उड़ान भरने वाली यह मिसाइल 160 किलोमीटर से अधिक दूरी पर मौजूद दुश्मन के लड़ाकू विमानों, बमवर्षकों और क्रूज मिसाइलों को नष्ट कर सकती है।
एडवांस गाइडेंस तकनीक और वर्सेटाइल उपयोग
यह मिसाइल 'फायर एंड फॉरगेट' (दागो और भूल जाओ) तकनीक पर काम करती है, जिससे मिसाइल दागने के बाद लड़ाकू विमान अन्य खतरों से निपटने के लिए स्वतंत्र हो जाता है। इसमें इनर्शियल गाइडेंस और अंतिम चरण में एक्टिव रडार होमिंग सिस्टम का इस्तेमाल होता है।
अमराम का उपयोग न केवल विभिन्न लड़ाकू विमानों (जैसे F-35, यूरोफाइटर टाइफून, ग्रिपेन) में किया जाता है, बल्कि इसका जमीन आधारित संस्करण (AMRAAM-ER) NASAMS जैसे एयर डिफेंस सिस्टम में भी तैनात किया जाता है। अमेरिका और जापान के बीच हुआ यह समझौता इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रक्षात्मक और रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करने का एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

डूबने की कगार पर कारियाचल्ली द्वीप, बचाने को उतरी कृत्रिम प्रवाल भित्तियां
मन्नार की खाड़ी में तेजी से जलमग्न हो रहे कारियाचल्ली द्वीप को डूबने से बचाने के लिए तमिलनाडु सरकार ने एक व्यापक पुनर्उद्धार अभियान शुरू किया है। आईआईटी मद्रास के सहयोग से वर्ल्ड बैंक पोषित इस प्रोजेक्ट के तहत 8,500 कृत्रिम प्रवाल भित्ति (आर्टिफिशियल कोरल रीफ) मॉड्यूल तैनात किए जा रहे हैं।
तेजी से घट रहा है द्वीप का क्षेत्रफल
आईआईटी मद्रास (IIT Madras) के महासागर इंजीनियरिंग विभाग द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, 1969 की तुलना में वर्ष 2024 तक इस द्वीप का 70 प्रतिशत से अधिक भूभाग समुद्री कटाव की भेंट चढ़ चुका है। 1969 में 20.85 हेक्टेयर में फैला यह निर्जन द्वीप अब घटकर छह हेक्टेयर से भी कम रह गया है।
समुद्र के बढ़ते जलस्तर, तटीय कटाव और आसपास मौजूद प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) व समुद्री घास के विनाश के कारण द्वीप तेजी से डूब रहा है। आंकड़ों के मुताबिक द्वीप के लगभग एक-तिहाई कोरल ब्लीचिंग (प्रवाल विरंजन) का शिकार हो चुके हैं। यदि मौजूदा गति से कटाव जारी रहा, तो वर्ष 2036 तक यह द्वीप पूरी तरह समुद्र में समा जाएगा।
क्या है 'तमिलनाडु शोर' प्रोजेक्ट
द्वीप को डूबने से बचाने के लिए तमिलनाडु सरकार ने विश्व बैंक के सहयोग से 'तमिलनाडु शोर' (Sustainably Harnessing Ocean Resources - TN SHORE) प्रोजेक्ट के तहत पुनर्उद्धार का काम शुरू किया है। इस मिशन पर लगभग 50 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है।
इस परियोजना के तहत आईआईटी मद्रास द्वारा तरंग गतिशीलता और गहराई अध्ययन के आधार पर तैयार किए गए 8,500 बहुउद्देशीय कृत्रिम प्रवाल भित्ति (आर्टिफिशियल कोरल रीफ) मॉड्यूल्स को समुद्र में स्थापित किया जा रहा है। ये कृत्रिम मॉड्यूल लहरों की ऊर्जा को कम करेंगे, तट रेखा को स्थिर बनाएंगे और तलछट जमाव को बढ़ाएंगे।
समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली
इंजीनियरिंग तकनीकों के अलावा, इस अभियान के तहत तीन एकड़ से अधिक क्षतिग्रस्त समुद्री घास (Seagrass beds) के मैदानों और स्थानीय कोरल प्रजातियों का पुनर्वास भी किया जा रहा है। इस परियोजना में ब्लू-कार्बन मूल्यांकन भी शामिल है ताकि तटीय संरक्षण के साथ-साथ समुद्री जैव विविधता और स्थानीय मछुआरों की आजीविका की रक्षा की जा सके।

रावी नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर रणजीत सागर बांध का पड़ा बड़ा असर
आईआईटी गांधीनगर के शोधकर्ताओं ने रावी नदी के तीन दशकों के आंकड़ों और उपग्रह छवियों का विश्लेषण किया है। अध्ययन में 2001 में रणजीत सागर जलाशय (थीन बांध) के चालू होने के बाद नदी के जल प्रवाह और उसके बाढ़ के मैदानों में आए महत्वपूर्ण बदलावों का खुलासा हुआ है।
शोध में सामने आए मुख्य निष्कर्ष
अध्ययन में पाया गया है कि जलाशय के निर्माण के बाद से नदी के प्राकृतिक जल प्रवाह पैटर्न में व्यापक बदलाव आए हैं। विशाल जलाशय द्वारा जल भंडारण किए जाने के कारण नदी के निचले हिस्सों में जल उपलब्धता प्रभावित हुई है। इसके साथ ही, नदी के तटीय पारिस्थितिकी तंत्र, गाद प्रवाह (Sediment Transport) और इसके आसपास की भूमि की प्रकृति में भी उल्लेखनीय परिवर्तन दर्ज किए गए हैं।
पौराणिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि
रावी नदी उत्तर-पश्चिमी भारत और उत्तर-पूर्वी पाकिस्तान से होकर बहने वाली एक प्रमुख ट्रांसबाउंड्री नदी है। यह सिंधु नदी की उन पांच सहायक नदियों में शामिल है जिनके आधार पर पंजाब का नामकरण हुआ है। वैदिक काल में इसे 'इरावती' और 'परुष्णी' के नाम से जाना जाता था, जबकि प्राचीन यूनानियों ने इसे 'हाइड्राओट्स' (Hydraotes) कहा था।
यह नदी हिमाचल प्रदेश में रोहतांग दर्रे के उत्तरी ढलान से निकलती है और बुढिल तथा तांतगारी नामक दो धाराओं के रूप में बहना शुरू करती है। 720 किलोमीटर लंबी इस नदी का 320 किलोमीटर हिस्सा भारत में और 400 किलोमीटर हिस्सा पाकिस्तान में है। पाकिस्तान का ऐतिहासिक शहर लाहौर इसी नदी के पूर्वी तट पर स्थित है।
प्रमुख अवसंरचना और जल संधि
रावी नदी पर कई महत्वपूर्ण जलविद्युत और सिंचाई परियोजनाएं स्थित हैं, जिनमें रणजीत सागर बांध (थीन बांध), चमेरा बांध, शाहपुरकंडी बांध और उझ बांध शामिल हैं। वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई 'सिंधु जल संधि' (Indus Water Treaty) के तहत रावी, ब्यास और सतलुज नदियों के जल का अधिकार भारत को सौंपा गया था। आईआईटी गांधीनगर का यह ताजा अध्ययन बांधों के निर्माण से नदियों पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों को समझने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

तांदूर लाल चने की पहली खेप ऑस्ट्रेलिया रवाना, तेलंगाना को बड़ी उपलब्धि
तेलंगाना के प्रसिद्ध जीआई-टैग प्राप्त 'तांदूर लाल चने' (Tandur Red Gram) की 2.5 मीट्रिक टन की पहली व्यावसायिक खेप ऑस्ट्रेलिया के लिए रवाना की गई है। हैदराबाद से अपेडा (APEDA) के सहयोग से भेजी गई यह पहली अंतरराष्ट्रीय शिपमेंट तेलंगाना के कृषि उत्पादों के वैश्विक बाजार में विस्तार का मार्ग प्रशस्त करेगी।
क्या है तांदूर लाल चने की खासियत
लोकप्रिय रूप से 'तांदूर तूर दाल' के रूप में जाने जाने वाला यह उत्पाद मुख्य रूप से तेलंगाना के तांदूर क्षेत्र के चार मंडलों—तांदूर, बशीरबाद, पेद्देमुल और येलाल के वर्षा आधारित इलाकों में उगाया जाता है। इस चने की विशिष्ट गुणवत्ता, स्वाद और रंग यहां की उपजाऊ गहरी काली मिट्टी, अटापुलगाइट मिट्टी के खनिजों और चूना पत्थर के समृद्ध भंडारों की वजह से होती है। वर्ष 2022 में तांदूर लाल चना तेलंगाना का पहला ऐसा कृषि उत्पाद बना था जिसे भौगोलिक संकेत (GI Tag) पंजीकरण प्राप्त हुआ था।
पौष्टिक मूल्य और बेहतर गुणवत्ता
तांदूर लाल चने का पोषण मूल्य अन्य अनाजों की तुलना में काफी अधिक होता है। इसमें लगभग 22 से 24 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है, जो सामान्य अनाजों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है। यह अपने बेजोड़ स्वाद, पकाने में कम समय लेने की क्षमता और लंबे समय तक सुरक्षित रखने (स्टोरेज क्वालिटी) के गुणों के लिए जाना जाता है।
भौगोलिक संकेत (GI Tag) के बारे में
भौगोलिक संकेत (GI) एक ऐसा टैग या चिन्ह है जो किसी उत्पाद की विशिष्ट भौगोलिक उत्पत्ति और उससे जुड़ी विशेष गुणवत्ता या प्रतिष्ठा को प्रमाणित करता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से कृषि उत्पादों, खाद्य पदार्थों, हस्तशिल्प और औद्योगिक वस्तुओं के लिए किया जाता है।
भारत में भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत जीआई टैग प्रदान किया जाता है। एक बार पंजीकृत होने के बाद यह जीआई टैग 10 वर्षों के लिए वैध होता है, जिसे बाद में नवीनीकृत (Renew) कराया जा सकता है। ऑस्ट्रेलिया के लिए तांदूर लाल चने के इस निर्यात से भारतीय किसानों और निर्यातकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नए अवसर खुलेंगे।
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