
जापान के सकुराजिमा ज्वालामुखी में विस्फोट: नीले आसमान में उठा राख का गुबार
जापान के सबसे सक्रिय ज्वालामुखियों में से एक सकुराजिमा में हाल ही में एक जोरदार विस्फोट हुआ है, जिससे साफ नीले आसमान में राख का एक विशाल और घना गुबार छा गया। कगोशिमा शहर के पास स्थित इस स्ट्रेटोवोलकैनो में नियमित रूप से अलग-अलग स्तर के विस्फोट होते रहते हैं।
भौगोलिक स्थिति और संरचना
सकुराजिमा ज्वालामुखी दक्षिणी जापान के क्यूशू द्वीप के दक्षिणी छोर पर कगोशिमा शहर के करीब स्थित है। यह कगोशिमा खाड़ी (किंकोवान खाड़ी) में ऐरा काल्डेरा (Aira Caldera) के दक्षिणी किनारे पर मौजूद है। समुद्र तल से लगभग 1,117 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस ज्वालामुखी की परिधि लगभग 50 किलोमीटर है। एक अभिसारी प्लेट सीमा (Convergent Plate Margin) पर स्थित होने के कारण यह एक 'स्ट्रेटोवोलकैनो' (Stratovolcano) है, जो लावा और राख की विभिन्न परतों से मिलकर बना है।
द्वीप से मुख्य भूमि बनने का सफर
सकुराजिमा ज्वालामुखी का निर्माण लगभग 13,000 साल पहले शुरू हुआ था। साल 1914 से पहले सकुराजिमा कगोशिमा खाड़ी के बीच में स्थित एक द्वीप था। हालांकि, 1914 में हुए एक बहुत बड़े ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान निकले भारी मात्रा में लावे और मलबे के जमाव के कारण यह द्वीप जापान की मुख्य भूमि से जुड़ गया।
दो प्रमुख चोटियां और अनूठी विशेषताएं
सकुराजिमा एक एंडेसिटिक (Andesitic) ज्वालामुखी है, जिसका अर्थ है कि इसके लावे में गैस की मात्रा अधिक होती है और यह काफी गाढ़ा (Viscous) होता है। इसके दो मुख्य ज्वालामुखीय शिखर हैं—उत्तरी चोटी (कितादाके), जो पुरानी है और फिलहाल निष्क्रिय है, तथा दक्षिणी चोटी (मिनामीदाके), जो नई है और वर्तमान में सक्रिय है।
लगातार सक्रियता और प्राकृतिक स्थिति
यह जापान के सबसे खतरनाक और सक्रिय ज्वालामुखियों में से एक है। वर्ष 1955 के बाद से सकुराजिमा में हर साल औसतन 100 से 200 बार छोटे-बड़े विस्फोट होते रहते हैं। इनमें से अधिकांश विस्फोट 'स्ट्रोमबोलियन' (Strombolian) प्रकार के होते हैं, जो मुख्य रूप से ज्वालामुखी के शिखर को ही प्रभावित करते हैं। प्रशासन और वैज्ञानिक इस इलाके में लगातार गश्त और निगरानी बनाए रखते हैं ताकि आसपास रहने वाले नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

भारत और मैक्सिको के बीच व्यापार समझौते का रास्ता साफ: साइन हुई ToR
भारत और मैक्सिको ने दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौते पर बातचीत शुरू करने के लिए 'शर्तों की रूपरेखा' (ToR) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। मैक्सिको में संपन्न इस समझौते के बाद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों और व्यापारिक सहयोग को नई गति मिलने की उम्मीद है।
भौगोलिक स्थिति और सीमाएं
उत्तरी अमेरिका के दक्षिणी हिस्से में स्थित मैक्सिको अपनी अनूठी भौगोलिक बनावट और सामरिक स्थिति के लिए जाना जाता है। इसके उत्तर में संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और दक्षिण-पूर्व में ग्वाटेमाला तथा बेलीज की सीमाएं लगती हैं। इसके अलावा, इसके दक्षिण और पश्चिम में प्रशांत महासागर तथा पूर्व में मैक्सिको की खाड़ी और कैरिबियन सागर स्थित हैं, जो इसे एक महत्वपूर्ण समुद्री तटरेखा प्रदान करते हैं। मैक्सिको की राजधानी मैक्सिको सिटी है।
प्रमुख भौगोलिक विशेषताएं और 'रिंग ऑफ फायर'
मैक्सिको दुनिया के सबसे सक्रिय भूगर्भीय क्षेत्रों में से एक 'रिंग ऑफ फायर' (Ring of Fire) का हिस्सा है, जिसके कारण इस क्षेत्र में अक्सर भूकंपीय गतिविधियां और ज्वालामुखी विस्फोट होते रहते हैं। देश के भूगोल में बाजा प्रायद्वीप (Baja Peninsula) और यूकाटन प्रायद्वीप (Yucatan Peninsula) प्रमुख रूप से शामिल हैं। यहाँ की मुख्य पर्वत श्रृंखला 'सिएरा माद्रे' (Sierra Madre) है। रियो ग्रांडे नदी और कोलोराडो नदी (जो अमेरिका के साथ साझा होती है) यहाँ की प्रमुख नदियां हैं, जबकि लेक चापाला और लेक कुइत्जियो यहाँ की प्रमुख झीलें हैं।
प्राकृतिक संसाधनों का खजाना
प्राकृतिक संसाधनों के मामले में मैक्सिको बेहद समृद्ध देश है। यहाँ पेट्रोलियम, चांदी, एंटीमनी, तांबा, सोना, सीसा, जस्ता और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार मौजूद हैं। वैश्विक बाजार में मैक्सिको चांदी और अन्य खनिजों के बड़े उत्पादकों में गिना जाता है।
व्यापार समझौते के मायने
भारत और मैक्सिको के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत शुरू होने से दोनों देशों के उद्योगों, तकनीकी आदान-प्रदान और बाजार पहुंच को बढ़ावा मिलेगा। कृषि, तकनीक, फार्मास्यूटिकल्स और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ने से दोनों अर्थव्यवस्थाओं को बड़ा लाभ पहुंचेगा।

भारत की गंगा डॉल्फिन प्रजाति संरक्षण कार्यक्रम को यूएनईपी की वैश्विक सराहना
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की एक रिपोर्ट में भारत के गंगा नदी डॉल्फिन (Platanista gangetica) प्रजाति संरक्षण कार्यक्रम की विशेष रूप से सराहना की गई है। भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव मानी जाने वाली यह मीठे पानी की डॉल्फिन अपनी अनोखी बायो-सोनार प्रणाली और संरक्षण प्रयासों के चलते दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी हुई है।
राष्ट्रीय जलीय जीव और इसका भौगोलिक विस्तार
गंगा नदी की डॉल्फिन को भारत सरकार द्वारा देश का 'राष्ट्रीय जलीय जीव' घोषित किया गया है। यह दुनिया की बेहद दुर्लभ मीठे पानी की डॉल्फिन प्रजातियों में से एक है। इसका प्राकृतिक वास नेपाल, भारत और बांग्लादेश के गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना और कर्णफुली-सांगू नदी तंत्रों तक फैला हुआ है। इसे स्थानीय स्तर पर 'ब्लाइंड डॉल्फिन', 'गंगा सुसु', 'हिहू' या 'साइड-स्वाइमिंग डॉल्फिन' के नाम से भी जाना जाता है।
अनूठी शारीरिक बनावट और विशेषताएं
गंगा डॉल्फिन की शारीरिक बनावट इसे अन्य जलीय जीवों से अलग बनाती है। इसका थूथन लंबा और पतला, पेट गोल, शरीर गठीला और पंख (फ्लिपर) बड़े होते हैं। यह मुख्य रूप से मीठे पानी की मछलियों और अकशेरुकी जीवों को अपना आहार बनाती है। इस प्रजाति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनकी आंखों में लेंस नहीं होते, जिसके कारण इन्हें अक्सर 'अंधी डॉल्फिन' भी कहा जाता है।
बायो-सोनार प्रणाली और सांस लेने की प्रक्रिया
आंखों से न देख पाने के बावजूद ये नदिशेष अत्यधिक विकसित बायो-सोनार प्रणाली की मदद से गंदले पानी में भी आसानी से शिकार कर लेती हैं। ये अल्ट्रासोनिक (पराश्रव्य) तरंगें छोड़ती हैं, जो शिकार से टकराकर वापस लौटती हैं, जिससे डॉल्फिन के मस्तिष्क में शिकार की छवि बन जाती है। एक स्तनधारी (Mammal) होने के कारण यह पानी के भीतर सांस नहीं ले सकती और इसे हर 30 से 120 सेकंड में पानी की सतह पर आना पड़ता है। सतह पर आते समय यह जो आवाज निकालती है, उसी के कारण इसे प्यार से 'सुसु' भी कहा जाता है।
संरक्षण स्थिति और भविष्य की राह
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस प्रजाति को बचाने के लिए कड़े नियम लागू किए गए हैं। आईयूसीएन (IUCN) की रेड लिस्ट में इसे 'संकटग्रस्त' (Endangered) श्रेणी में रखा गया है, जबकि CITES के तहत इसे परिशिष्ट I और भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 की अनुसूची-I में शामिल किया गया है। यूएनईपी की रिपोर्ट द्वारा इस कार्यक्रम की सराहना किए जाने से भारत के संरक्षण प्रयासों को और अधिक वैश्विक प्रोत्साहन मिला है।

राष्ट्रीय सहकारिता विकास निगम की 93वीं बैठक: सहकारी समितियों को मिलेगा नया बल
नई दिल्ली में राष्ट्रीय सहकारिता विकास निगम (NCDC) की शासी परिषद की 93वीं बैठक आयोजित की गई। 1963 में स्थापित यह वैधानिक संगठन देश में किसान सहकारिता को मजबूत करने, कृषि उत्पादन बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए वित्तीय सहायता और विभिन्न योजनाएं संचालित करता है।
1963 में हुई थी स्थापना
राष्ट्रीय सहकारिता विकास निगम (NCDC) संसद के एक अधिनियम द्वारा 1963 में स्थापित एक वैधानिक संगठन (Statutory Organisation) है। इसका मुख्य उद्देश्य किसान सहकारिता को बढ़ावा देना, मजबूत करना और विकसित करना है, ताकि देश भर में कृषि उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने के साथ-साथ कटाई के बाद (Post-Harvest) मिलने वाली सुविधाओं का विस्तार किया जा सके।
कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों में मुख्य कार्य
एनसीडीसी सहकारिता क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है। यह कृषि उपज के प्रसंस्करण (Processing), भंडारण, कोल्ड चेन और विपणन (Marketing) के साथ-साथ बीज, उर्वरक और अन्य कृषि इनपुट की आपूर्ति के लिए धन उपलब्ध कराता है। कृषि के अलावा, यह डेयरी, पशुपालन, हथकरघा और रेशम उत्पादन जैसे गैर-कृषि और कमजोर वर्गों से जुड़े आय-सर्जक क्षेत्रों को भी संबल प्रदान करता है।
प्रमुख योजनाएं और पहल
निगम सहकारिता के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को सशक्त बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं चला रहा है। इनमें युवा उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए 'युवा सहकार', स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए 'आयुष्मान सहकार', महिला सहकारिता को बढ़ावा देने के लिए 'नंदिनी सहकार' और महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को ऋण सहायता देने के लिए 'स्वयं सहकार' शामिल हैं। इसके अतिरिक्त 'डेयरी सहकार' के जरिए पर्यावरण, सामाजिक और प्रशासनिक नियमों (ESG) से जुड़ी गतिविधियों को वित्तीय सहायता दी जाती है।
ग्रामीण समृद्धि की ओर बढ़ते कदम
इन पहलों और योजनाओं के माध्यम से एनसीडीसी न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद कर रहा है, बल्कि सहकारिता से समृद्धि के राष्ट्रीय लक्ष्य को साकार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। शासी परिषद की यह बैठक आगामी समय में सहकारिता आंदोलन को और अधिक पारदर्शी, आधुनिक और जन-उपयोगी बनाने की दिशा में एक अहम कदम है।

कासरगोड में जल संरक्षण की अनूठी पहल: 'सुरंगम' सुरंग कुओं का होगा कायाकल्प
केरल के कासरगोड जिले की आठ ग्राम पंचायतों में पारंपरिक भूमिगत जल सुरंगों यानी 'सुरंगम' के पुनरुद्धार के लिए एक व्यापक परियोजना लागू की जा रही है। बिना बिजली और मोटर के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर काम करने वाला यह स्वदेशी जल प्रबंधन तंत्र क्षेत्र की पेयजल और सिंचाई जरूरतों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
क्या है सुरंगम जल प्रबंधन प्रणाली
सुरंगम, जिन्हें तुरंगम या थोरप्पु भी कहा जाता है, कासरगोड जिले और कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ इलाकों में पाई जाने वाली एक अनूठी जल संचयन प्रणाली है। ये वास्तव में लाल मिट्टी की पहाड़ियों (Laterite Hillocks) में क्षैतिज रूप से खोदी गई सुरंगें होती हैं। पहाड़ियों से रिसने वाला जल इन सुरंगों की दीवारों के माध्यम से अंदर एकत्र होता है और एक भंडारण गड्ढे में बह जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, इस तकनीक की तुलना प्राचीन सिल्क रूट के माध्यम से भारत आई फारस (ईरान) की 'कनात' (Qanat) प्रणाली से की जाती है।
बिना बिजली और पंप के चलता है तंत्र
सुरंगम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके निर्माण या संचालन में किसी भी तरह के बिजली के मोटर या पंप का उपयोग नहीं होता। यह पूरी तरह से प्राकृतिक जल रिसाव और गुरुत्वाकर्षण बल पर निर्भर करता है। सुरंग से बहकर आने वाला पानी बिना किसी लागत के घरों और खेतों तक पहुंचता है। आमतौर पर इन सुरंगों की चौड़ाई 0.45 से 0.70 मीटर और ऊंचाई 1.8 से 2.0 मीटर होती है, जबकि इनकी लंबाई 3 मीटर से लेकर 300 मीटर तक हो सकती है। लंबी सुरंगों में हवा के दबाव को संतुलित रखने के लिए विशेष वेंटिलेशन शाफ्ट भी बनाए जाते हैं।
पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक समझ
सुरंगम की खुदाई करने वाले पारंपरिक कारीगर स्थानीय भूगोल, मिट्टी की बनावट, ढलान और प्राकृतिक वनस्पतियों के आधार पर जल स्रोतों की सटीक पहचान करते थे। कासरगोड जिले में ही 5,000 से अधिक सुरंगम मौजूद हैं, जो दशकों से स्थानीय समुदायों की जीवन रेखा बने हुए हैं।
पुनरुद्धार परियोजना का महत्व
आधुनिकता और अंधाधुंध भूजल दोहन के कारण उपेक्षित हो चुकी इस पारंपरिक तकनीक को बचाने के लिए अब पंचायत स्तर पर कदम उठाए जा रहे हैं। आठ ग्राम पंचायतों में लागू की जा रही यह परियोजना न केवल इन सुरंगों की मरम्मत और सफाई करेगी, बल्कि भूजल स्तर को सुधारने और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाएगी।
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