
भारत-दक्षिण कोरिया नौसेना अभ्यास: बुसान में INS सह्याद्रि का शक्ति प्रदर्शन
भारतीय नौसेना का स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट INS सह्याद्रि भारत-दक्षिण कोरिया (IN-RoKN) द्विपक्षीय नौसेना अभ्यास के दूसरे संस्करण में भाग लेने के लिए बुसान नौसेना हार्बर पहुंचा है। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य भारत-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सहयोग, सुरक्षा और दोनों देशों की सेनाओं के बीच अंतःक्रियाशीलता (Interoperability) को मजबूत करना है।
दो चरणों में आयोजित हो रहा अभ्यास
यह नौसैन्य अभ्यास दो अलग-अलग चरणों—हार्बर चरण (Harbour Phase) और सी चरण (Sea Phase) में आयोजित किया जा रहा है। बुसान बंदरगाह पर आयोजित हार्बर चरण के दौरान दोनों नौसेनाओं के कार्मिक पेशेवर बातचीत, क्रॉस-डेक विजिट, क्रॉस-ट्रेनिंग सत्रों और खेल गतिविधियों में भाग ले रहे हैं। इन गतिविधियों से परिचालन अनुभवों और सर्वोत्तम प्रथाओं (Best Practices) के आदान-प्रदान में मदद मिल रही है।
समुद्र में सामरिक कौशल का प्रदर्शन
अभ्यास के दूसरे चरण यानी 'सी फेज' (Sea Phase) में INS सह्याद्रि के साथ दक्षिण कोरियाई नौसेना का विध्वंसक युद्धपोत ROKS मुन्मू द ग्रेट (ROKS Munmu the Great) हिस्सा ले रहा है। खुले समुद्र में आयोजित इस चरण में दोनों युद्धपोत संयुक्त सामरिक अभ्यास, क्रॉस-डेक हेलीकॉप्टर संचालन और जटिल नौसैनिक युद्धाभ्यास कर रहे हैं। इस चरण का उद्देश्य दोनों देशों के जहाजों के बीच परिचालन समन्वय को नई ऊंचाइयों पर ले जाना है।
INS सह्याद्रि की मारक क्षमता और विशेषताएं
आईएनएस सह्याद्रि शिवालिक श्रेणी का तीसरा गाइडेड मिसाइल स्टील्थ फ्रिगेट है। मुंबई स्थित मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) द्वारा निर्मित इस युद्धपोत को पूरी तरह से भारत में डिजाइन और निर्मित किया गया था तथा 2012 में नौसेना में शामिल किया गया। 6,800 टन विस्थापन क्षमता और 32 समुद्री मील (knots) की रफ्तार वाले इस पोत में बराक-1, श्टिल-1 (Shtil-1) और ब्रह्मोस (BrahMos) जैसी आधुनिक मिसाइल प्रणालियाँ तथा पनडुब्बी-रोधी रॉकेट लॉन्चर तैनात हैं। यह जहाज बहु-स्तरीय खतरों से निपटने में सक्षम है और भारत की युद्धपोत निर्माण क्षमता का प्रतीक है।
भारत-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक महत्व
यह द्विपक्षीय अभ्यास भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' (Act East Policy) और 'सागर' (SAGAR - Security and Growth for All in the Region) विजन को मजबूती प्रदान करता है। वैश्विक व्यापार के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों (SLOCs) की सुरक्षा और भारत-दक्षिण कोरिया के बीच रक्षा सहयोग को गहरा करने में इस प्रकार के सैन्य अभ्यास बेहद निर्णायक साबित हो रहे हैं।

यूनिफाइड लॉजिस्टिक्स इंटरफेस प्लेटफॉर्म विवाद: यूएलआईपी ने खारिज किए आरोप
सड़क परिवहन मंत्रालय द्वारा वाहन डेटा बिक्री की शिकायतों के बाद लॉजिस्टिक्स पोर्टल के उपयोगकर्ताओं के ऑडिट के निर्देश पर यूनिफाइड लॉजिस्टिक्स इंटरफेस प्लेटफॉर्म (ULIP) ने अपनी सफाई दी है। यूएलआईपी ने प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग के आरोपों को खारिज करते हुए अपनी डेटा सुरक्षा प्रणाली को पूरी तरह सुरक्षित बताया है।
क्या है यूनिफाइड लॉजिस्टिक्स इंटरफेस प्लेटफॉर्म
यूएलआईपी एक डिजिटल गेटवे है जो एपीआई (API)-आधारित एकीकरण के माध्यम से विभिन्न सरकारी प्रणालियों से लॉजिस्टिक्स से संबंधित डेटा तक पहुंचने की सुविधा प्रदान करता है। इसे नीति आयोग (NITI Aayog) द्वारा परिकल्पित किया गया था और 'पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान' (PMGS-NMP) के तहत विकसित किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 17 सितंबर 2022 को 'राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति' (NLP) के हिस्से के रूप में इसका शुभारंभ किया गया था।
मजबूत तकनीकी ढांचा और संचालन
इस राष्ट्रीय प्लेटफॉर्म का रख-रखाव और संचालन 'एनआईसीडीसी लॉजिस्टिक्स डेटा सर्विसेज' (NLDS) द्वारा किया जाता है। एनएलडीएस भारत सरकार (NICDIT के माध्यम से) और जापान की प्रमुख आईटी कंपनी 'एनईसी कॉरपोरेशन' (NEC Corporation) का 50:50 की इक्विटी साझेदारी वाला एक संयुक्त उद्यम है। वर्तमान में यह प्लेटफॉर्म 129 एपीआई के माध्यम से 11 मंत्रालयों की 44 सरकारी प्रणालियों से एकीकृत है, जिसके तहत 1800 से अधिक डेटा फील्ड्स कवर किए जाते हैं। इसमें वाहन, सारथी, फास्टैग, एफआईएस, आइसगेट और पोर्ट कम्युनिटी सिस्टम जैसी प्रमुख डेटाबेस शामिल हैं।
योजना के मुख्य उद्देश्य
यूएलआईपी का प्राथमिक उद्देश्य एंड-टू-एंड विजिबिलिटी प्रदान करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी सिंगल-विंडो लॉजिस्टिक्स प्लेटफॉर्म तैयार करना है। यह आपूर्ति श्रृंखला के विभिन्न चरणों में लगे सरकारी और निजी संस्थाओं के बीच सुगम डेटा विनिमय का मंच प्रदान करता है। इसके जरिए परिवहन के विभिन्न साधनों के इष्टतम उपयोग, दस्तावेजीकरण, अनुपालन, फाइलिंग, प्रमाणन और मंजूरी जैसे जटिल प्रक्रियाओं को बेहद सरल बनाना इसका मुख्य लक्ष्य है।
उद्योग और हितधारकों को लाभ
यह प्लेटफॉर्म चालकों व वाहनों के विवरण के सत्यापन, खेप (consignment) की रियल-टाइम ट्रैकिंग, रूट ऑप्टिमाइजेशन योजना और गंतव्य के सटीक अपडेट जैसे कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ प्रदान करता है। लॉजिस्टिक्स के साधनों के कुशल उपयोग और संरचित नियोजन (structured planning) में मदद करके यह समय और लागत दोनों की भारी बचत करता है, जिससे भारत के लॉजिस्टिक्स सेक्टर की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार हो रहा है।

शिपिंग सेक्टर को रफ्तार: कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग प्रमोशन स्कीम को हरी झंडी
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत को वैश्विक कंटेनर निर्माण हब बनाने और आयात निर्भरता कम करने के लिए ₹10,000 करोड़ के परिव्यय वाली 'कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग प्रमोशन स्कीम' (CMPS) को मंजूरी दे दी है। यह योजना वित्त वर्ष 2039-40 तक घरेलू क्षमता को दस गुना बढ़ाकर 7.5 लाख TEUs करने का लक्ष्य रखती है।
ब्याज अनुदान सहायता और क्षमता विस्तार
योजना का पहला प्रमुख घटक 'इंट्रेस्ट सबवेंशन असिस्टेंस' (ISA) है, जिसके लिए ₹859 करोड़ आवंटित किए गए हैं। इसके तहत ग्रीनफील्ड (न्यूनतम 1,00,000 TEUs वार्षिक क्षमता) और ब्राउनफील्ड (न्यूनतम 25,000 TEUs अतिरिक्त क्षमता) इकाइयों की स्थापना के लिए लिए गए टर्म लोन पर प्रतिवर्ष 3% का ब्याज अनुदान दिया जाएगा। इस वित्तीय प्रोत्साहन से देश में नए विनिर्माण संयंत्र स्थापित करने और मौजूदा इकाइयों का विस्तार करने में मदद मिलेगी।
परिचालन व्यय सहायता और स्वदेशीकरण पर जोर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय निर्माताओं को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए ₹8,891 करोड़ का 'ऑपरेशनल एक्सपेंडिचर असिस्टेंस' (OEA) का प्रावधान किया गया है। वैश्विक मानकों के अनुरूप निर्मित और बेचे जाने वाले कंटेनरों पर निर्माताओं को लागत अंतर की भरपाई के लिए वित्तीय सहायता मिलेगी। योजना का लाभ उठाने के लिए निर्माताओं के लिए वित्त वर्ष 2031-32 तक कम से कम 70% लोकल-कंटेंट अनिवार्य होगा, जिसे वित्त वर्ष 2032-33 से बढ़ाकर 90% कर दिया जाएगा।
परीक्षण, प्रमाणन और बंदरगाहों पर भूमि सहायता
अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे उतरने और विदेशी लैब्स पर निर्भरता कम करने के लिए 'डायनामिक लोंगिट्यूडनल इम्पैक्ट' जैसी कॉमन टेस्टिंग सुविधाओं के निर्माण हेतु ₹150 करोड़ का बजट आवंटित किया गया है। इसके अतिरिक्त, निर्माताओं को प्रमुख बंदरगाहों पर अधिसूचित दरों के महज 25% पर लीज पर जमीन उपलब्ध कराई जाएगी।
अर्थव्यवस्था और रोजगार पर व्यापक प्रभाव
यह योजना भारत की वार्षिक कंटेनर विनिर्माण क्षमता को दस गुना बढ़ाकर 7.5 लाख TEUs (ट्वेंटी-फुट इक्विवेलेंट यूनिट्स) तक पहुंचाएगी। इससे लगभग 3,000 प्रत्यक्ष और 50,000 से अधिक अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। साथ ही स्पेशल स्टील, कॉर्नर कास्टिंग, लकड़ी के फ्रेम और पेंट्स जैसे सहायक उद्योगों को भी भारी प्रोत्साहन मिलेगा, जो 'मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047' के सपनों को साकार करने में अहम भूमिका निभाएगा।

भारत और लिकटेंस्टीन के संबंध: बहुपक्षीय संस्थानों को मजबूत करने की प्रतिबद्धता
लिकटेंस्टीन के कार्यवाहक राष्ट्राध्यक्ष प्रिंस अलोइस की भारत यात्रा के दौरान भारत और लिकटेंस्टीन ने संयुक्त राष्ट्र सहित बहुपक्षीय संस्थानों को मजबूत करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। दोनों देशों ने व्यापार, निवेश और नवाचार के क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की है।
मध्य यूरोप का एक अनूठा 'डबली लैंडलॉक्ड' देश
लिकटेंस्टीन मध्य यूरोप में आल्प्स पहाड़ियों के बीच स्थित एक छोटा लेकिन अत्यधिक समृद्ध देश है। भूगोल की दृष्टि से यह एक 'डबली लैंडलॉक्ड' (Doubly Landlocked) देश है—अर्थात यह जिन देशों से घिरा हुआ है, वे स्वयं भी चारों तरफ से जमीन से घिरे (लैंडलॉक्ड) हैं। लिकटेंस्टीन उत्तर और पूर्व में ऑस्ट्रिया तथा दक्षिण और पश्चिम में स्विट्जरलैंड से अपनी सीमाएं साझा करता है। वादुज (Vaduz) इसकी राजधानी शहर है और यह प्रसिद्ध राइन (Rhine) नदी के तट पर बसा हुआ है।
भौगोलिक विशेषताएं और प्राकृतिक परिदृश्य
भौगोलिक दृष्टि से लिकटेंस्टीन का पूर्वी आधा हिस्सा आल्प्स पर्वतमाला की ऊंची चोटियों से ढका है, जबकि पश्चिमी भाग राइन नदी की उपजाऊ घाटी से समृद्ध है। इस देश की सबसे ऊंची पर्वत चोटी 'फोर्डर ग्रौस्पिट्ज़' (Vorder Grauspitz) है, जिसकी ऊंचाई 8,526 फीट (2,599 मीटर) है। देश का एकमात्र प्राकृतिक झील क्षेत्र 'गैमप्रिनर सीले' (Gampriner Seele) है। राइन और समीना (Samina) इस छोटे से देश से होकर बहने वाली दो प्रमुख नदियां हैं।
भारत के साथ मजबूत होते कूटनीतिक संबंध
भारत और लिकटेंस्टीन के बीच कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत वर्ष 1993 में हुई थी। हालांकि यह एक भौगोलिक रूप से छोटा देश है, लेकिन इसका वित्तीय और औद्योगिक क्षेत्र बेहद मजबूत है। हिलटी (Hilti) और आईवोक्लार (Ivoclar) जैसी लिकटेंस्टीन की प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में सक्रिय रूप से काम कर रही हैं। दोनों देश न केवल वित्तीय पारदर्शिता और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए एक-दूसरे का समर्थन कर रहे हैं, बल्कि वैश्विक मंचों पर भी अंतरराष्ट्रीय शांति और कूटनीति के लिए एक साथ खड़े हैं।

खेल उद्योग को बढ़ावा: खेलो इंडिया स्पोर्ट्स गुड्स मैन्युफैक्चरिंग योजना को मंजूरी
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत के खेल उपकरण निर्माण क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर मजबूत करने के उद्देश्य से 'खेलो इंडिया स्पोर्ट्स Goods मैन्युफैक्चरिंग योजना' को स्वीकृति दे दी है। ₹1,856.67 करोड़ के कुल वित्तीय परिव्यय वाली यह योजना 2026 से 2033-34 तक लागू की जाएगी।
एकीकृत विनिर्माण जोन और बुनियादी ढांचा विकास
योजना के तहत देश में समर्पित 'स्पोर्ट्स गुड्स मैन्युफैक्चरिंग जोन्स' (SGMZs) विकसित किए जाएंगे। ये जोन निर्माताओं, आपूर्तिकर्ताओं, परीक्षण सुविधाओं, डिजाइन व प्रोटोटाइपिंग केंद्रों और सहायक उद्यमों को एक साथ एक ही स्थान पर लाएंगे। इनका विकास भाव्य (BHAVYA) योजना और एनआईसीडीसी (NICDC) इंडस्ट्रियल पार्कों के साथ तालमेल बिठाकर किया जाएगा। इसके अलावा, मौजूदा विनिर्माण क्लस्टरों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (MSMEs) के बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने के लिए राज्यों के साथ लागत साझा की जाएगी।
निवेश प्रोत्साहन और उत्पादन विस्तार
वैश्विक और घरेलू ब्रांड्स को आकर्षित करने तथा उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए योजना में ₹1,130 करोड़ की राशि का प्रावधान किया गया है। इसमें 'एंकर इन्वेस्टमेंट सपोर्ट' (Anchor Investment Support) के जरिए दिग्गज वैश्विक और घरेलू कंपनियों को इन विशेष जोन में अपनी इकाइयां स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। वहीं 'टर्नओवर लिंक्ड सपोर्ट' (Turnover Linked Support) के माध्यम से उत्पादन बढ़ाने, विनिर्माण क्षमता का विस्तार करने और सतत विकास बनाए रखने वाले निर्माताओं को वित्तीय प्रोत्साहन दिया जाएगा।
वैश्विक प्रमाणन और अनुसंधान में नवाचार
भारतीय खेल सामानों की अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच आसान बनाने के लिए ₹105 करोड़ का विशेष आवंटन किया गया है। इस राशि से भारतीय निर्माताओं को अंतरराष्ट्रीय खेल महासंघों से आवश्यक गुणवत्ता प्रमाणन हासिल करने और उनका नवीनीकरण कराने में सहायता मिलेगी। साथ ही, खेल उपकरणों, मैटेरियल साइंस और एडवांस टेक्नोलॉजी में अनुसंधान के लिए उत्कृष्ट संस्थानों में 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' स्थापित किए जाएंगे। अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) के साथ सह-वित्तपोषण को बढ़ावा दिया जाएगा तथा डीपीआईआईटी (DPIIT) पंजीकृत स्पोर्ट्स स्टार्टअप्स को ₹20 लाख तक की ग्रांट दी जाएगी।
कौशल विकास और वैश्विक ब्रांडिंग
बदलती तकनीकी जरूरतों के अनुसार कुशल कार्यबल तैयार करने के लिए कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय तथा उद्योग के हितधारकों के साथ मिलकर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएंगे। इसके अतिरिक्त, 'निर्यात प्रोत्साहन मिशन' (Export Promotion Mission) के सहयोग से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय खेल उत्पादों की ब्रांडिंग, आउटरीच और बाजार विकास संबंधी पहल की जाएगी। यह योजना 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' के विजन को गति देते हुए युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित करेगी।
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