
इंडोनेशिया में शुरू हुआ भारत-इंडोनेशिया का 'गरुड़ शक्ति' अभ्यास
भारत और इंडोनेशिया के विशेष बलों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास 'गरुड़ शक्ति' का 11वां संस्करण इंडोनेशिया के बान्युवांगी (Banyuwangi) में शुरू हो गया है। भारतीय थलसेना की पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेज) के जवान इस अभ्यास में भाग ले रहे हैं, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और इंटरऑपरेबिलिटी को मजबूत करना है।
भारतीय टुकड़ी की भागीदारी और मुख्य उद्देश्य
इस संयुक्त अभ्यास में भारत की ओर से पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेज) के पराक्रमी जवान हिस्सा ले रहे हैं। अभ्यास का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के विशेष बलों के बीच आपसी समझ, रक्षा सहयोग और इंटरऑपरेबिलिटी (अंतर-संचालन क्षमता) को सुदृढ़ करना है। यह दोनों देशों को अपने रणनीतिक अनुभवों को साझा करने के लिए एक बेहतरीन मंच प्रदान करता है।
जंगल युद्ध और विशेष ऑपरेशन्स पर ध्यान
गरुड़ शक्ति अभ्यास का प्राथमिक ध्यान मुख्य रूप से जंगल क्षेत्र के चुनौतीपूर्ण वातावरण में विशेष अभियानों के लिए रणनीति, तकनीकों और प्रक्रियाओं को निखारने पर है। अभ्यास के दौरान बाधा पार करना (ऑब्स्टेकल क्रॉसिंग), कॉम्बैट मार्क्समैनशिप (सटीक निशानेबाजी), पर्वतारोहण, एयर असॉल्ट ट्रेनिंग और कॉम्बैट-हार्डनिंग सेशन जैसी गहन गतिविधियों पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही दोनों पक्ष अपने आधुनिक हथियारों, उपकरणों और परिचालन संबंधी सर्वोत्तम प्रथाओं का भी आदान-प्रदान कर रहे हैं।
सामरिक महत्व और समापन
इस संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण का समापन एक 'वैलिडेशन एक्सरसाइज' (सत्यापन अभ्यास) के साथ होगा, जिसमें यथार्थवादी सामरिक परिदृश्यों को सिम्युलेट करके दोनों टुकड़ियों के धीरज, समन्वय और युद्ध तत्परता का मूल्यांकन किया जाएगा। यह अभ्यास भारत और इंडोनेशिया के बीच द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा।

नई दिल्ली में यूनेस्को डोपिंग रोधी सम्मेलन: खेल सत्यनिष्ठा पर जोर
नई दिल्ली में यूनेस्को के खेलों में डोपिंग के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन के तहत सीओपी10 ब्यूरो और एंटी-डोपिंग फंड अप्रूवल कमेटी की बैठकों की अध्यक्षता केंद्रीय युवा मामले एवं खेल मंत्री ने की। भारत इस वैश्विक समझौते का एक प्रमुख हस्ताक्षरकर्ता है, जिसका उद्देश्य खेलों में डोपिंग को समाप्त करना है।
कन्वेंशन की पृष्ठभूमि और मुख्य उद्देश्य
यूनेस्को के इस बहुपक्षीय समझौते को 19 अक्टूबर 2005 को यूनेस्को के 33वें सामान्य सम्मेलन के दौरान अपनाया गया था और यह 1 फरवरी 2007 को लागू हुआ था। वर्तमान में 192 देश इसके सदस्य हैं, जो इसे यूनेस्को की दूसरी सबसे अधिक अनुमोदित संधि बनाता है। भारत ने 7 नवंबर 2007 को इस संधि का अनुमोदन (Ratify) किया था। यह वैश्विक स्तर पर खेलों में डोपिंग को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए एकमात्र कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय तंत्र है।
प्रमुख विशेषताएं और संचालन प्रणाली
इस कन्वेंशन का मुख्य उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर डोपिंग रोधी कानूनों, दिशानिर्देशों और नियमों में तालमेल स्थापित करना है ताकि सभी एथलीटों को एक सुरक्षित और समान अवसर वाला माहौल प्रदान किया जा सके।
यह समझौता सरकारों को आधिकारिक तौर पर विश्व डोपिंग रोधी एजेंसी (WADA) और उसके कोड को मान्यता देने का अधिकार प्रदान करता है। इसके अलावा, सदस्य देशों में डोपिंग के प्रति जागरूकता फैलाने और क्षमता निर्माण के उद्देश्य से एक 'एंटी-डोपिंग फंड' की स्थापना की गई है। कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (COP) इस कन्वेंशन की सर्वोच्च संस्था है जो द्विवार्षिक सत्रों में बैठक कर इसके कार्यान्वयन का निरीक्षण करती है।

मेघालय में मिली सीकाडा कीट की नई प्रजाति 'निओटर्पनोसिया मॉफलांगेंसिस'
उत्तर-पूर्वी भारत के मेघालय की मावफलांग पहाड़ियों के अर्ध-सदाबहार जंगलों से सीकाडा कीट की एक नई प्रजाति की खोज की गई है। वैज्ञानिकों ने इसका नाम 'निओटर्पनोसिया मॉफलांगेंसिस' रखा है। यह नई प्रजाति अपनी पारदर्शी पंखों के विशिष्ट निशानों, अनोखी बनावट और भोर के समय गाए जाने वाले गीतों के लिए जानी जाती है।
आवास और शारीरिक विशेषताएं
यह नई प्रजाति मावफलांग के 1,378 से 1,605 मीटर की ऊंचाई वाले उपोष्णकटिबंधीय चीड़ (पाइन) और अर्ध-सदाबहार जंगलों में पाई गई है। निओटर्पनोसिया मॉफलांगेंसिस के पारदर्शी पंखों पर विशेष निशान बने होते हैं और नर कीट के जननांगों की संरचना इसे इस जीनस की अन्य प्रजातियों से अलग बनाती है। यह कीट पेड़ों की छालों पर मौजूद काई (मॉस) के बीच खुद को बेहतरीन तरीके से छिपा (Camouflage) सकता है और यह रोशनी या प्रकाश की ओर आकर्षित नहीं होता है।
अनोखा व्यवहार और सामूहिक गायन
इस प्रजाति का व्यवहार बेहद दिलचस्प है। यह मुख्य रूप से भोर (सुबह के तड़के) के समय सक्रिय होती है और जंगलों की ऊंची शाखाओं व पत्तियों के बीच से आवाज निकालती है। आमतौर पर नर सीकाडा शाम को लगभग 6 बजे गाना शुरू करते हैं और अनुकूल मौसम में लगभग 30 मिनट तक कोरस (सामूहिक गान) बनाते हैं। धुंध और हल्की बारिश के दौरान इन्हें गाते हुए देखा गया है, हालांकि तेज बारिश शुरू होते ही ये शांत हो जाते हैं।
क्या होते हैं सीकाडा कीट और उनका जीवन चक्र
सीकाडा ध्वनि उत्पन्न करने वाले कीटों का एक बड़ा परिवार है, जिसमें दुनिया भर में 3,000 से अधिक प्रजातियां शामिल हैं। ये अपने तेज, जटिल और विशिष्ट आवाज तंत्र के लिए जाने जाते हैं, जिसे नर सीकाडा अपने पेट पर स्थित 'टैम्बल' (Tymbals) नामक अंग से मादा को आकर्षित करने के लिए निकालते हैं।
इनका जीवन चक्र काफी अनोखा होता है। मादा सीकाडा पेड़ की टहनियों में अंडे देती है। अंडों से निकलने के बाद इनके बच्चे (निम्फ) जमीन में चले जाते हैं और सालों तक जड़ों का रस पीकर विकसित होते हैं। बाहर आने और वयस्क बनने के बाद इनका जीवनकाल केवल 4 से 6 सप्ताह का होता है। हालांकि, कुछ आवधिक (Periodical) सीकाडा प्रजातियों का निम्फ चरण 13 से 17 वर्षों का भी हो सकता है।

कित्तूर किले में बनेगा ₹40 करोड़ का कित्तूर चन्नम्मा फ्रीडम पार्क
कर्नाटका सरकार ने बेलगावी जिले के ऐतिहासिक कित्तूर किले में ₹40 करोड़ की लागत से 'किट्तूर चन्नम्मा फ्रीडम पार्क' बनाने का फैसला किया है। 1857 के संग्राम से 33 साल पहले अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व करने वाली वीरांगना रानी चन्नम्मा का यह किला एक प्रमुख ऐतिहासिक और स्थापत्य स्थल है।
कित्तूर किले का स्वर्णिम इतिहास
किट्तूर किले का निर्माण 1660 से 1691 ईस्वी के दौरान कित्तूर राजवंश के पांचवें शासक अल्लाप्पा गौड़ा सरदेसाई ने करवाया था। यह किला 1824 में अंग्रेजों के खिलाफ हुए सशस्त्र विद्रोह के लिए जाना जाता है। 1857 की क्रांति से लगभग 33 वर्ष पहले, कित्तूर की रानी चन्नम्मा ने ब्रिटिश हुकूमत के अन्यायपूर्ण शासन और हड़प नीति के खिलाफ पहला बिगुल फूंका था। यद्यपि अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबा दिया था, लेकिन रानी चन्नम्मा का यह संघर्ष भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अमिट छाप छोड़ गया।
अद्वितीय वास्तुकला और विशेषताएं
किट्तूर किला अपनी उत्कृष्ट वास्तुकला और संरचनात्मक इंजीनियरिंग के लिए प्रसिद्ध है। काले बेसाल्ट पत्थरों से निर्मित यह किला पेशवा-इस्लामिक वास्तुकला का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है। किले के भीतर एक तीन मंजिला भव्य महल, गुप्त पानी के कुएं (वॉटर सिस्टर्न), ध्रुव तारे को देखने के लिए बनाया गया एक विशेष कमरा और शाही सभाओं के लिए एक बड़ा महल हॉल मौजूद है।
विरासत और वर्तमान स्थिति
किले के अवशेषों में पुराना महल, वॉचटॉवर, प्राचीन मंदिर और जल प्रणाली आज भी सुव्यवस्थित स्थिति में मौजूद हैं। किले के अंदर स्थित एक संग्रहालय में रानी कित्तूर चन्नम्मा के युग के हथियार, मूर्तियां और ऐतिहासिक अवशेष रखे गए हैं। नए फ्रीडम पार्क के निर्माण से इस ऐतिहासिक धरोहर को वैश्विक पटल पर और अधिक पहचान मिलेगी और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।

मैक्रोफेज का बढ़ता दायरा: कई गंभीर बीमारियों के पीछे छिपा कारण
चिकित्सा अनुसंधान में यह सामने आया है कि प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाएं, जिन्हें मैक्रोफेज कहा जाता है, कई गंभीर बीमारियों के विकास और प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऑस्टियोपोरोसिस, ऑटोइम्यून विकार, कैंसर और कार्डियोवैस्कुलर रोगों से लेकर सेप्सिस तक, ये कोशिकाएं सूजन और अंग क्षति का मुख्य कारण बन रही हैं।
ऑटोइम्यून और हड्डियों की बीमारियां
मैक्रोफेज कोशिकाएं शरीर में सूजन (Inflammation) को नियंत्रित और उत्तेजित करने में अहम भूमिका निभाती हैं। जब ये कोशिकाएं अनियंत्रित हो जाती हैं, तो यह ऑस्टियोपोरोसिस जैसी हड्डियों को कमजोर करने वाली बीमारी का कारण बनती हैं। इसके अलावा, लुपस (Lupus), संधिशोध (Rheumatoid Arthritis), स्क्लेरोडर्मा और टाइप-1 डायबिटीज जैसे ऑटोइम्यून विकारों को बढ़ावा देने में भी इनकी बड़ी भूमिका पाई गई है।
हृदय, लिवर और कैंसर से संबंध
हृदय रोगों के मामलों में, धमनियों में प्लाक जमने की प्रक्रिया यानी एथेरोस्क्लेरोसिस (Atherosclerosis) में मैक्रोफेज की सक्रियता देखी गई है। इसी तरह, अत्यधिक शराब के सेवन से होने वाले लिवर रोग जैसे अल्कोहलिक हेपेटाइटिस और विभिन्न प्रकार के कैंसर के बढ़ने में भी ये कोशिकाएं जिम्मेदार पाई गई हैं।
न्यूरोलॉजिकल विकार और सेप्सिस की जटिलताएं
मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों, जैसे अल्जाइमर और मल्टीपल स्केलेरोसिस (MS) में भी मैक्रोफेज की भूमिका सामने आई है। इतना ही नहीं, 'मैक्रोफेज एक्टिवेशन सिंड्रोम' (MAS) एक ऐसी जटिल स्थिति है जो रूमेटोलॉजिकल बीमारियों के कारण अनियंत्रित सूजन पैदा करती है। इसके अतिरिक्त, सेप्सिस के दौरान शरीर के प्रमुख अंगों को होने वाले नुकसान में भी मैक्रोफेज ही मुख्य कारक बनते हैं।
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