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बक्सा रिजर्व से निकली बाघिन पहुंची असम के रायमोना नेशनल पार्क

बक्सा रिजर्व से निकली बाघिन पहुंची असम के रायमोना नेशनल पार्क

Delight News
📅 27 Oct2026

बिहार से लाकर पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में छोड़ी गई एक बाघिन रिहाई के महज तीन सप्ताह के भीतर असम के रायमोना नेशनल पार्क में दाखिल हो गई है। रेडियो कॉलर की मदद से दोनों राज्यों के वन विभाग अधिकारी लगातार इसकी गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं।

वन्यजीव संरक्षण और कॉरिडोर आवाजाही के लिहाज से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में हाल ही में छोड़ी गई एक बाघिन संकोश नदी को पार करके असम के रायमोना नेशनल पार्क में प्रवेश कर गई है। महज तीन हफ्तों में बाघिन द्वारा किया गया यह अंतरराज्यीय सफर पूर्वी हिमालयी क्षेत्र के वन्यजीव गलियारों की सक्रियता को दर्शाता है।
रेडियो कॉलर से रखी जा रही है निगरानी
वन अधिकारियों के अनुसार लगभग 3 वर्ष की इस रॉयल बंगाल टाइगर को बिहार से लाकर बक्सा रिजर्व में छोड़ा गया था। इसके गले में लगे रेडियो कॉलर से प्राप्त सिग्नल के आधार पर पश्चिम बंगाल और असम के वन विभागों की संयुक्त टीम इसकी हर गतिविधि को ट्रैक कर रही है। फिलहाल बाघिन को बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के प्राकृतिक रूप से नए वातावरण में ढलने का मौका दिया जा रहा है।
भारत-भूटान सीमा पर स्थित समृद्ध जैव-विविधता
असम के कोकराझार जिले में स्थित रायमोना नेशनल पार्क भारत-भूटान सीमा के पास पूर्वी हिमालय की तलहटी में फैला हुआ है। यह नेशनल पार्क पश्चिम में संकोश नदी, पूर्व में सरलभांगा नदी और दक्षिण में पेकुआ नदी से घिरा है। यह क्षेत्र भूटान के फिप्सू वाइल्डलाइफ सेंचुरी और जिग्मे सिंग्ये वांगचुक नेशनल पार्क से सीधा जुड़ा हुआ है, जिससे वन्यजीवों को एक विशाल और सुरक्षित प्राकृतिक गलियारा मिलता है।
दुर्लभ सुनहरे लंगूर और बाघों का ठिकाना
यह नेशनल पार्क मुख्य रूप से अपने प्रसिद्ध सुनहरे लंगूर (Golden Langur) के प्राकृतिक आवास के लिए जाना जाता है। इसके अलावा यहाँ एशियाई हाथी, बंगाल टाइगर, क्लाउडेड लेपर्ड, जंगली भैंसे और चित्तीदार हिरण जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं। उष्णकटिबंधीय नम साल के जंगलों और नदी के घास के मैदानों से समृद्ध यह पार्क बाघिन के स्थायी रूप से बसने के लिए एक आदर्श वातावरण प्रदान करता है।
घरेलू बचत से इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास: InvITs बने भारतीय निवेशकों की पहली पसंद

घरेलू बचत से इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास: InvITs बने भारतीय निवेशकों की पहली पसंद

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📅 27 Oct2026

भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) की ओर निवेशकों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। यह माध्यम देश की घरेलू बचत को सड़कों, पावर ट्रांसमिशन नेटवर्क और अन्य आय पैदा करने वाली बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में लगाने का एक बड़ा जरिया बन चुका है।

भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में एक नया वित्तीय बदलाव देखने को मिल रहा है। देश के इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) की ओर संस्थागत ही नहीं, बल्कि आम निवेशकों की रुचि भी तेजी से बढ़ रही है। यह माध्यम भारतीय नागरिकों की घरेलू बचत को सीधे सड़क, बिजली ग्रिड और संचार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश करने का अवसर प्रदान कर रहा है।
क्या है इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट ट्रस्ट
इन्फ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट ट्रस्ट (InvIT) एक सामूहिक निवेश योजना है, जिसका ढांचा म्यूचुअल फंड की तरह होता है। इसे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के तहत ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य खुदरा निवेशकों को बड़े पैमाने की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश करने का मौका देना है, जो पहले केवल बड़े संस्थागत निवेशकों या कॉर्पोरेट्स तक सीमित था।
चार-स्तरीय मजबूत और पारदर्शी संरचना
InvITs का संचालन SEBI द्वारा निर्धारित नियमों के तहत एक चार-स्तरीय ढांचे में होता है:
स्पॉन्सर: यह वही कंपनी या इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर होता है जो ट्रस्ट की स्थापना करता है और अपनी परिसंपत्तियां इसमें ट्रांसफर करता है।
ट्रस्टी: SEBI द्वारा प्रमाणित ट्रस्टी निवेशकों के हितों की सुरक्षा और InvIT के प्रदर्शन का निरीक्षण करता है।
इन्वेस्टमेंट मैनेजर: यह इकाई निवेश के रणनीतिक फैसले और पोर्टफोलियो प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालती है।
प्रोजेक्ट मैनेजर: इसका मुख्य काम बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के दैनिक संचालन और रखरखाव को सुनिश्चित करना है।
निवेशकों के लिए आकर्षण का कारण
नियामक नियमों के तहत, InvITs को अपनी शुद्ध कमाई का कम से कम 90 प्रतिशत हिस्सा लाभांश के रूप में निवेशकों के बीच बांटना अनिवार्य होता है। इसके अलावा, इनमें से अधिकतर फंड पहले से निर्मित और चालू परियोजनाओं में लगाए जाते हैं, जिससे नए निर्माण का जोखिम बेहद कम हो जाता है। यही कारण है कि यह निवेशकों को नियमित और स्थिर आय का भरोसा देता है।
थाइलैंड के फुकेत द्वीप पर आफत की बारिश, फ्लैश फ्लड से जनजीवन अस्त-व्यस्त

थाइलैंड के फुकेत द्वीप पर आफत की बारिश, फ्लैश फ्लड से जनजीवन अस्त-व्यस्त

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📅 27 Oct2026

थाइलैंड के प्रमुख पर्यटन स्थल फुकेत द्वीप पर मूसलाधार बारिश के बाद अचानक आई बाढ़ (फ्लैश फ्लड) ने भारी तबाही मचाई है। फुकेत शहर सहित द्वीप के तीनों प्रमुख जिले पानी में डूब गए हैं। इसके साथ ही कई इलाकों में भूस्खलन होने से सड़कों पर मलबे का ढेर लग गया है।

दुनियाभर के पर्यटकों के पसंदीदा केंद्र थाइलैंड के फुकेत द्वीप पर कुदरत का कहर टूटा है। भीषण रातभर हुई बारिश के चलते द्वीप के कई हिस्से जलमग्न हो गए हैं और निचले इलाकों में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई है। स्थानीय प्रशासन ने आपातकालीन राहत कार्य शुरू कर दिए हैं।
अचानक आई बाढ़ से जनजीवन हुआ प्रभावित
अंडमान सागर में स्थित यह खूबसूरत द्वीप अचानक आई बाढ़ और जलजमाव की चपेट में है। फुकेत शहर समेत इसके तीनों प्रशासनिक क्षेत्रों में पानी भर गया है। सड़कों पर जलभराव के कारण वाहनों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिसके चलते प्रशासन ने छोटे वाहनों और ड्राइवरों को प्रभावित इलाकों की यात्रा से बचने की सख्त हिदायत जारी की है।
भूस्खलन और मलबे से बढ़ीं मुश्किलें
बारिश के कारण कई इलाकों में भूस्खलन की घटनाएं भी दर्ज की गई हैं। पहाड़ियों से नीचे आए कीचड़, पत्थरों और मलबे से सड़कें और जल निकासी की नहरें अवरुद्ध हो गई हैं। बचाव दल और प्रांतीय आपदा दल लगातार मलबे को हटाने और जल प्रवाह को बहाल करने के काम में जुटे हुए हैं ताकि स्थिति को और गंभीर होने से रोका जा सके।
मौसम विभाग की चेतावनी और राहत कार्य
मौसम पूर्वानुमान एजेंसियों ने क्षेत्र में और भारी बारिश होने की संभावना जताई है, जिससे जलभराव और भूस्खलन का खतरा बना हुआ है। राहत एवं बचाव एजेंसियों को अलर्ट पर रखा गया है। प्रभावित परिवारों तक सहायता पहुंचाई जा रही है और प्रशासन लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है ताकि पर्यटकों और स्थानीय निवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
दिल्ली-NCR को मिली सौगात: देश में शुरू हुई प्रदूषण बताने वाली अनोखी लैब

दिल्ली-NCR को मिली सौगात: देश में शुरू हुई प्रदूषण बताने वाली अनोखी लैब

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📅 27 Oct2026

विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान केंद्रीय राज्य मंत्री ने दिल्ली-NCR के लिए दुनिया की अपनी तरह की पहली 'एयर पोल्यूशन एनालिसिस' लैब का उद्घाटन किया है। 'ए इंटीग्रेटेड एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री एंड एयरोसोल टॉक्सिसिटी एनालिसिस लेबोरेटरी' (AATAL) नाम की यह लैब प्रदूषण के सटीक स्रोतों और उनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर की रीयल-टाइम जानकारी देगी।

दिल्ली-NCR में लगातार बढ़ती वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान केंद्रीय राज्य मंत्री ने क्षेत्र के लिए विश्व की पहली विशिष्ट 'एयर पोल्यूशन एनालिसिस' सुविधा का उद्घाटन किया है। इसे 'एकीकृत वायुमंडलीय रसायन विज्ञान और एयरोसोल विषाक्तता विश्लेषण प्रयोगशाला' (AATAL) नाम दिया गया है।
मिशन मौसम के तहत मिली नई ताकत
इस अत्याधुनिक प्रयोगशाला को 'मिशन मौसम' के तहत स्थापित किया गया है। अब तक अधिकारी केवल एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) के आंकड़ों पर निर्भर रहते थे, लेकिन AATAL के जरिए प्रदूषण के सटीक कारणों और उनके सापेक्ष योगदान की रीयल-टाइम जानकारी मिल सकेगी। इससे प्रशासन को केवल आंकड़े देखने के बजाय प्रदूषण नियंत्रण के लिए ठोस और लक्षित कदम उठाने में मदद मिलेगी।
हवा के हर कण का होगा सटीक विश्लेषण
यह नई प्रयोगशाला वायुमंडलीय गैसों, एयरोसोल, सूक्ष्म कणों (PM2.5), धातुओं और अन्य जहरीले तत्वों के गहन विश्लेषण की क्षमता रखती है। इसकी तकनीकी विशेषताएं गाड़ियों से निकलने वाले धुएं, औद्योगिक गतिविधियों, पराली व बायोमास जलाने, निर्माण कार्य की धूल और पड़ोसी राज्यों से आने वाले प्रदूषण के अंतर को स्पष्ट रूप से पहचान सकती हैं। इसके अलावा, यह हवा में मौजूद प्रदूषकों के रासायनिक गुणों की जांच कर उनके जनस्वास्थ्य पर होने वाले जहरीले प्रभावों का भी वैज्ञानिक अध्ययन करेगी।
AIRWISE सिस्टम से मिलेगी 72 घंटे पहले चेतावनी
AATAL को IITM के 'एयरवाइज' (AIRWISE) यानी 'एयर क्वालिटी वार्निंग एंड इंटीग्रेटेड डिसीजन सपोर्ट सिस्टम फॉर एमिशन' के साथ एकीकृत किया गया है। यह सिस्टम 400 मीटर के सूक्ष्म स्तर पर अगले 72 घंटों का सटीक पूर्वानुमान प्रदान करता है। इससे दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में वायु गुणवत्ता बिगड़ने से पहले ही एडवांस जानकारी मिल जाएगी।
यह तकनीक वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) और अन्य नियामक एजेंसियों के लिए गेम-चेंजर साबित होगी, जिससे वे समय रहते निवारक कार्रवाई कर सकेंगे और अपनी रणनीतियों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कर पाएंगे।
टाटा स्टील की नई पहल: झारखंड के वेस्ट बोकारो में शुरू तकनीक 'हाइड्रोसीडिंग'

टाटा स्टील की नई पहल: झारखंड के वेस्ट बोकारो में शुरू तकनीक 'हाइड्रोसीडिंग'

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📅 27 Oct2026

टाटा स्टील ने पर्यावरण संरक्षण और सतत खनन की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए झारखंड के वेस्ट बोकारो डिविजन में आधुनिक 'हाइड्रोसीडिंग' तकनीक पेश की है। इस तकनीक के जरिए खनन कचरे के ढलानों को स्थिर करने, मिट्टी के कटाव को रोकने और बंजर भू-भाग पर तेजी से हरियाली फैलाने की कवायद शुरू की गई है।

खनन गतिविधियों के बाद प्रभावित हुए भू-भाग और ढलानों को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से टाटा स्टील ने एक अनूठी पहल की है। कंपनी ने झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित अपने वेस्ट बोकारो डिविजन में अत्याधुनिक 'हाइड्रोसीडिंग' (Hydroseeding) तकनीक का उपयोग शुरू किया है। राज्य में इस तरह का यह पहला प्रयास है, जिसके तहत 50 एकड़ से अधिक खनन क्षेत्र और ढलानों को हरा-भरा बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
क्या है हाइड्रोसीडिंग और इसका कार्य-तरीका
हाइड्रोसीडिंग पौधों के बीज बोने और पौधरोपण की एक आधुनिक और यांत्रिक तकनीक है। इसमें पानी, बीज, उर्वरक, जैविक मल्च (कटाई का अवशेष) और मृदा स्थिरीकरण एजेंटों का एक विशेष घोल तैयार किया जाता है। इस घोल को एक विशेष मशीन (हाइड्रोसीडर) की मदद से उच्च दबाव के साथ सीधे मिट्टी या ढलान की सतह पर स्प्रे किया जाता है।
यह मशीन 50 मीटर तक छिड़काव कर सकती है और 80 मीटर तक के ऊंचे ढलानों को आसानी से कवर करने में सक्षम है। इस घोल के छिड़काव से मिट्टी पर एक सुरक्षात्मक परत बन जाती है, जो नमी बनाए रखती है, बीज को धूप और पक्षियों से बचाती है और तेजी से अंकुरण में मदद करती है।
पारंपरिक रोपण की तुलना में क्यों है बेहतर
पहाड़ी, उबड़-खाबड़ और खनन कचरे (ओवरबर्डन डंप) वाले दुर्गम क्षेत्रों में पारंपरिक तरीकों से पेड़-पौधे लगाना न केवल कठिन होता है, बल्कि इसमें बहुत समय भी लगता है। हाइड्रोसीडिंग तकनीक बेहद तेज, किफायती और व्यापक क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।
यह विधि ढलानों को मजबूत बनाकर भूस्खलन और मिट्टी के कटाव (Soil Erosion) के खतरे को काफी हद तक कम करती है। साथ ही, खतरनाक ढलानों पर मानवीय श्रम की जरूरत कम होने से कामगारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है।
खनन क्षेत्रों के पुनर्निर्माण की नई दिशा
टाटा स्टील द्वारा अपनाई गई यह तकनीक जिम्मेदार और सतत खनन (Sustainable Mining) का उत्कृष्ट उदाहरण है। इससे न केवल बंजर खनन ढलान तेजी से हरे-भरे जंगलों में बदल सकेंगे, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी संतुलन को बहाल करने में भी बड़ी मदद मिलेगी।

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