
घरेलू बचत से इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास: InvITs बने भारतीय निवेशकों की पहली पसंद
भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) की ओर निवेशकों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। यह माध्यम देश की घरेलू बचत को सड़कों, पावर ट्रांसमिशन नेटवर्क और अन्य आय पैदा करने वाली बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में लगाने का एक बड़ा जरिया बन चुका है।
क्या है इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट ट्रस्ट
इन्फ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट ट्रस्ट (InvIT) एक सामूहिक निवेश योजना है, जिसका ढांचा म्यूचुअल फंड की तरह होता है। इसे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के तहत ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य खुदरा निवेशकों को बड़े पैमाने की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश करने का मौका देना है, जो पहले केवल बड़े संस्थागत निवेशकों या कॉर्पोरेट्स तक सीमित था।
चार-स्तरीय मजबूत और पारदर्शी संरचना
InvITs का संचालन SEBI द्वारा निर्धारित नियमों के तहत एक चार-स्तरीय ढांचे में होता है:
स्पॉन्सर: यह वही कंपनी या इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर होता है जो ट्रस्ट की स्थापना करता है और अपनी परिसंपत्तियां इसमें ट्रांसफर करता है।
ट्रस्टी: SEBI द्वारा प्रमाणित ट्रस्टी निवेशकों के हितों की सुरक्षा और InvIT के प्रदर्शन का निरीक्षण करता है।
इन्वेस्टमेंट मैनेजर: यह इकाई निवेश के रणनीतिक फैसले और पोर्टफोलियो प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालती है।
प्रोजेक्ट मैनेजर: इसका मुख्य काम बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के दैनिक संचालन और रखरखाव को सुनिश्चित करना है।
निवेशकों के लिए आकर्षण का कारण
नियामक नियमों के तहत, InvITs को अपनी शुद्ध कमाई का कम से कम 90 प्रतिशत हिस्सा लाभांश के रूप में निवेशकों के बीच बांटना अनिवार्य होता है। इसके अलावा, इनमें से अधिकतर फंड पहले से निर्मित और चालू परियोजनाओं में लगाए जाते हैं, जिससे नए निर्माण का जोखिम बेहद कम हो जाता है। यही कारण है कि यह निवेशकों को नियमित और स्थिर आय का भरोसा देता है।

थाइलैंड के फुकेत द्वीप पर आफत की बारिश, फ्लैश फ्लड से जनजीवन अस्त-व्यस्त
थाइलैंड के प्रमुख पर्यटन स्थल फुकेत द्वीप पर मूसलाधार बारिश के बाद अचानक आई बाढ़ (फ्लैश फ्लड) ने भारी तबाही मचाई है। फुकेत शहर सहित द्वीप के तीनों प्रमुख जिले पानी में डूब गए हैं। इसके साथ ही कई इलाकों में भूस्खलन होने से सड़कों पर मलबे का ढेर लग गया है।
अचानक आई बाढ़ से जनजीवन हुआ प्रभावित
अंडमान सागर में स्थित यह खूबसूरत द्वीप अचानक आई बाढ़ और जलजमाव की चपेट में है। फुकेत शहर समेत इसके तीनों प्रशासनिक क्षेत्रों में पानी भर गया है। सड़कों पर जलभराव के कारण वाहनों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिसके चलते प्रशासन ने छोटे वाहनों और ड्राइवरों को प्रभावित इलाकों की यात्रा से बचने की सख्त हिदायत जारी की है।
भूस्खलन और मलबे से बढ़ीं मुश्किलें
बारिश के कारण कई इलाकों में भूस्खलन की घटनाएं भी दर्ज की गई हैं। पहाड़ियों से नीचे आए कीचड़, पत्थरों और मलबे से सड़कें और जल निकासी की नहरें अवरुद्ध हो गई हैं। बचाव दल और प्रांतीय आपदा दल लगातार मलबे को हटाने और जल प्रवाह को बहाल करने के काम में जुटे हुए हैं ताकि स्थिति को और गंभीर होने से रोका जा सके।
मौसम विभाग की चेतावनी और राहत कार्य
मौसम पूर्वानुमान एजेंसियों ने क्षेत्र में और भारी बारिश होने की संभावना जताई है, जिससे जलभराव और भूस्खलन का खतरा बना हुआ है। राहत एवं बचाव एजेंसियों को अलर्ट पर रखा गया है। प्रभावित परिवारों तक सहायता पहुंचाई जा रही है और प्रशासन लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है ताकि पर्यटकों और स्थानीय निवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

दिल्ली-NCR को मिली सौगात: देश में शुरू हुई प्रदूषण बताने वाली अनोखी लैब
विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान केंद्रीय राज्य मंत्री ने दिल्ली-NCR के लिए दुनिया की अपनी तरह की पहली 'एयर पोल्यूशन एनालिसिस' लैब का उद्घाटन किया है। 'ए इंटीग्रेटेड एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री एंड एयरोसोल टॉक्सिसिटी एनालिसिस लेबोरेटरी' (AATAL) नाम की यह लैब प्रदूषण के सटीक स्रोतों और उनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर की रीयल-टाइम जानकारी देगी।
मिशन मौसम के तहत मिली नई ताकत
इस अत्याधुनिक प्रयोगशाला को 'मिशन मौसम' के तहत स्थापित किया गया है। अब तक अधिकारी केवल एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) के आंकड़ों पर निर्भर रहते थे, लेकिन AATAL के जरिए प्रदूषण के सटीक कारणों और उनके सापेक्ष योगदान की रीयल-टाइम जानकारी मिल सकेगी। इससे प्रशासन को केवल आंकड़े देखने के बजाय प्रदूषण नियंत्रण के लिए ठोस और लक्षित कदम उठाने में मदद मिलेगी।
हवा के हर कण का होगा सटीक विश्लेषण
यह नई प्रयोगशाला वायुमंडलीय गैसों, एयरोसोल, सूक्ष्म कणों (PM2.5), धातुओं और अन्य जहरीले तत्वों के गहन विश्लेषण की क्षमता रखती है। इसकी तकनीकी विशेषताएं गाड़ियों से निकलने वाले धुएं, औद्योगिक गतिविधियों, पराली व बायोमास जलाने, निर्माण कार्य की धूल और पड़ोसी राज्यों से आने वाले प्रदूषण के अंतर को स्पष्ट रूप से पहचान सकती हैं। इसके अलावा, यह हवा में मौजूद प्रदूषकों के रासायनिक गुणों की जांच कर उनके जनस्वास्थ्य पर होने वाले जहरीले प्रभावों का भी वैज्ञानिक अध्ययन करेगी।
AIRWISE सिस्टम से मिलेगी 72 घंटे पहले चेतावनी
AATAL को IITM के 'एयरवाइज' (AIRWISE) यानी 'एयर क्वालिटी वार्निंग एंड इंटीग्रेटेड डिसीजन सपोर्ट सिस्टम फॉर एमिशन' के साथ एकीकृत किया गया है। यह सिस्टम 400 मीटर के सूक्ष्म स्तर पर अगले 72 घंटों का सटीक पूर्वानुमान प्रदान करता है। इससे दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में वायु गुणवत्ता बिगड़ने से पहले ही एडवांस जानकारी मिल जाएगी।
यह तकनीक वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) और अन्य नियामक एजेंसियों के लिए गेम-चेंजर साबित होगी, जिससे वे समय रहते निवारक कार्रवाई कर सकेंगे और अपनी रणनीतियों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कर पाएंगे।

टाटा स्टील की नई पहल: झारखंड के वेस्ट बोकारो में शुरू तकनीक 'हाइड्रोसीडिंग'
टाटा स्टील ने पर्यावरण संरक्षण और सतत खनन की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए झारखंड के वेस्ट बोकारो डिविजन में आधुनिक 'हाइड्रोसीडिंग' तकनीक पेश की है। इस तकनीक के जरिए खनन कचरे के ढलानों को स्थिर करने, मिट्टी के कटाव को रोकने और बंजर भू-भाग पर तेजी से हरियाली फैलाने की कवायद शुरू की गई है।
क्या है हाइड्रोसीडिंग और इसका कार्य-तरीका
हाइड्रोसीडिंग पौधों के बीज बोने और पौधरोपण की एक आधुनिक और यांत्रिक तकनीक है। इसमें पानी, बीज, उर्वरक, जैविक मल्च (कटाई का अवशेष) और मृदा स्थिरीकरण एजेंटों का एक विशेष घोल तैयार किया जाता है। इस घोल को एक विशेष मशीन (हाइड्रोसीडर) की मदद से उच्च दबाव के साथ सीधे मिट्टी या ढलान की सतह पर स्प्रे किया जाता है।
यह मशीन 50 मीटर तक छिड़काव कर सकती है और 80 मीटर तक के ऊंचे ढलानों को आसानी से कवर करने में सक्षम है। इस घोल के छिड़काव से मिट्टी पर एक सुरक्षात्मक परत बन जाती है, जो नमी बनाए रखती है, बीज को धूप और पक्षियों से बचाती है और तेजी से अंकुरण में मदद करती है।
पारंपरिक रोपण की तुलना में क्यों है बेहतर
पहाड़ी, उबड़-खाबड़ और खनन कचरे (ओवरबर्डन डंप) वाले दुर्गम क्षेत्रों में पारंपरिक तरीकों से पेड़-पौधे लगाना न केवल कठिन होता है, बल्कि इसमें बहुत समय भी लगता है। हाइड्रोसीडिंग तकनीक बेहद तेज, किफायती और व्यापक क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।
यह विधि ढलानों को मजबूत बनाकर भूस्खलन और मिट्टी के कटाव (Soil Erosion) के खतरे को काफी हद तक कम करती है। साथ ही, खतरनाक ढलानों पर मानवीय श्रम की जरूरत कम होने से कामगारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है।
खनन क्षेत्रों के पुनर्निर्माण की नई दिशा
टाटा स्टील द्वारा अपनाई गई यह तकनीक जिम्मेदार और सतत खनन (Sustainable Mining) का उत्कृष्ट उदाहरण है। इससे न केवल बंजर खनन ढलान तेजी से हरे-भरे जंगलों में बदल सकेंगे, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी संतुलन को बहाल करने में भी बड़ी मदद मिलेगी।

80 पार बुजुर्गों और किडनी मरीजों के लिए SGLT2 इनहिबिटर्स: अध्ययन में फायदे और जोखिम उजागर
एक नए अध्ययन में 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) से पीड़ित बुजुर्गों के लिए SGLT2 इनहिबिटर्स दवाओं के संभावित फायदों और जोखिमों का विश्लेषण किया गया है। मूल रूप से टाइप-2 डायबिटीज की यह दवा किडनी और दिल की सेहत सुधारने में भी अहम भूमिका निभाती है।
क्या हैं SGLT2 इनहिबिटर्स और कैसे करते हैं काम
SGLT2 इनहिबिटर्स दवाओं का एक प्रमुख वर्ग है, जिसे मुख्य रूप से टाइप-2 डायबिटीज (T2D) के उपचार के लिए विकसित किया गया था। सामान्य स्थिति में हमारे गुर्दे (किडनी) में मौजूद SGLT2 प्रोटीन रक्त में से ग्लूकोज को अवशोषित करके वापस शरीर में भेजने का काम करता है।
ये दवाएं इस अवशोषण प्रक्रिया को रोक देती हैं। इसके परिणामस्वरूप अतिरिक्त ग्लूकोज रक्त में वापस जाने के बजाय पेशाब के रास्ते शरीर से बाहर निकल जाता है। इस प्रक्रिया से न केवल ब्लड शुगर नियंत्रित रहता है, बल्कि शरीर में ग्लूकोज का स्तर भी संतुलित बना रहता है।
डायबिटीज से आगे: किडनी और दिल की सुरक्षा
SGLT2 इनहिबिटर्स का दायरा केवल शुगर कंट्रोल करने तक सीमित नहीं है। यह क्रोनिक किडनी डिजीज और हार्ट फेलियर के मरीजों के लिए बेहद असरदार पाई गई हैं। ये दवाएं किडनी की बीमारियों के बढ़ने की रफ्तार को धीमा करती हैं और मरीज को डायलिसिस की नौबत से बचाती हैं। इसके अलावा यह दिल के दौरे और हार्ट फेलियर के जोखिम को भी काफी हद तक कम करती हैं। डैपाग्लिफ्लोज़िन (Dapagliflozin), एम्पाग्लिफ्लोज़िन (Empagliflozin), और कैनाग्लिफ्लोज़िन (Canagliflozin) इस वर्ग की प्रमुख दवाएं हैं।
बुजुर्गों के लिए फायदे के साथ सतर्कता भी जरूरी
अध्ययन के अनुसार, 80 से अधिक उम्र के बुजुर्गों में इन दवाओं के इस्तेमाल से कुल मृत्यु दर में लगभग 18% और किडनी संबंधी गंभीर समस्याओं में 22% की कमी देखी गई है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि इस उम्र वर्ग में डिहाइड्रेशन, यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI), जी मिचलाना और जोड़ों के दर्द जैसे साइड इफेक्ट्स का खतरा भी बना रहता है। इसलिए डॉक्टर की सलाह और नियमित निगरानी के साथ ही इन दवाओं का सेवन सुरक्षित माना गया है।
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