
भारत और श्रीलंका का साझा बौद्ध विरासत को सहेजने का बड़ा कदम
भारत और श्रीलंका ने कोलंबो के प्रसिद्ध गंगातरामया मंदिर में 'सामहिता' (SAMHiTA) प्रोजेक्ट की शुरुआत करके अपनी साझा बौद्ध विरासत और सांस्कृतिक सहयोग को और मजबूत किया है। यह परियोजना दक्षिण एशियाई प्राचीन पांडुलिपियों को डिजिटल रूप से सहेजने और उनका एक वैश्विक डेटाबेस तैयार करने की अनूठी पहल है।
क्या है सामहिता प्रोजेक्ट?
संस्कृत भाषा में 'सामहिता' शब्द का अर्थ 'संग्रह' या 'संकलन' होता है। सामहिता (South Asian Manuscript Histories and Textual Archive) प्रोजेक्ट मुख्य रूप से भारत और व्यापक दक्षिण एशिया से जुड़ी उन पांडुलिपियों का एक डिजिटल डेटाबेस और ऑनलाइन आर्काइव तैयार करने की पहल है, जो भारत के बाहर विभिन्न पुस्तकालयों, अभिलेखागारों और संस्थानों में सुरक्षित हैं। इसका मुख्य उद्देश्य बिखरी हुई ऐतिहासिक जानकारियों को एक साझा मंच पर लाकर शोधकर्ताओं और आम लोगों के लिए सुलभ बनाना है।
PANDiT डेटाबेस से जुड़ाव
इस परियोजना के तहत एकत्र की गई तमाम महत्वपूर्ण जानकारियों को 'पंडित' (PANDiT: Prosopographical Database of Indic Texts and Records) पर साझा किया जाएगा। यह दक्षिण एशियाई बौद्धिक इतिहास से जुड़ा एक प्रतिष्ठित डेटाबेस है। इस पूरी पहल को नई दिल्ली स्थित 'इंडिया इंटरनेशनल सेंटर' (India International Centre) द्वारा भारत सरकार की अनुदान सहायता और विदेश मंत्रालय (MEA) के समर्थन से क्रियान्वित किया जा रहा है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रयास
यह अपनी तरह का पहला ऐसा प्रयास है, जिसके तहत भारत और दक्षिण एशिया से बाहर मौजूद पांडुलिपि भंडारों को एक ही डिजिटल मंच पर एकजुट किया जा रहा है। इसका उद्देश्य प्राचीन पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण करना और उनमें छिपे ऐतिहासिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक ज्ञान को सुरक्षित रखकर भावी पीढ़ियों तक पहुंचाना है, जिससे दोनों देशों की साझा सांस्कृतिक विरासत को और अधिक मजबूती मिल सके।

रूस की नई घातक मिसाइल 'फिलिन': यूक्रेन का बड़ा खुलासा
यूक्रेन की रक्षा खुफिया एजेंसी (HUR) ने रूस की एक नई, कम लागत वाली क्रूज मिसाइल 'फिलिन' (Filin) के बारे में चौंकाने वाला खुलासा किया है। एजेंसी ने इस मिसाइल के 3D मॉडल के साथ-साथ इसमें इस्तेमाल किए गए आधुनिक कंपोनेंट्स और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की विस्तृत जानकारी जारी की है।
निर्माण और डिजाइन की विशेषताएं
'फिलिन' एक कम लागत वाली, जमीन से दागी जाने वाली और जेट इंजन से संचालित होने वाली क्रूज मिसाइल है। इसका निर्माण रूस की मशहूर 'टैक्टिकल मिसाइल्स कॉर्पोरेशन' का हिस्सा 'एनपीओ मोल्निया' (NPO Molniya) द्वारा किया गया है। इस मिसाइल की लंबाई लगभग 3.5 मीटर और पंखों का फैलाव (Wingspan) लगभग 3 मीटर है। मिसाइल के बॉडी फ्रेम (Fuselage) में कार्बन फाइबर और ग्लास फाइबर से बने मजबूत कंपोजिट मैटेरियल्स का इस्तेमाल किया गया है। इसके अलावा, इसके कई हिस्सों का निर्माण 3D प्रिंटिंग तकनीक से किया गया है।
लॉन्चिंग और उड़ान क्षमता
यह मिसाइल जमीन पर मौजूद लॉन्चर से सॉलिड-प्रोपेलेंट बूस्टर की मदद से दागी जाती है, जिसके बाद इसका मुख्य R500 टर्बोजेट इंजन चालू हो जाता है। 'फिलिन' मिसाइल 800 किमी प्रति घंटे की अधिकतम रफ्तार हासिल कर सकती है और इसकी मारक क्षमता (रेंज) 1,200 किलोमीटर तक है। इसे रडार से बचने के लिए बेहद कम ऊंचाई पर उड़ने के लिए डिजाइन किया गया है, हालांकि जरूरत पड़ने पर यह लगभग 6 किलोमीटर की ऊंचाई तक भी जाने में सक्षम है। यह मिसाइल अपने साथ 50 किलोग्राम या 100 किलोग्राम तक का छोटा वारहेड (विस्फोटक) ले जा सकती है।
उन्नत नेविगेशन और इलेक्ट्रॉनिक्स
मिसाइल के सटीक निशाने के लिए इसमें चीनी निर्मित इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का उपयोग किया गया है। इसके साथ ही इसमें 16-चैनल वाला 'कोमेटा' (Kometa) सैटेलाइट नेविगेशन मॉड्यूल भी लगाया गया है, जो एंटी-जैमिंग तकनीक के साथ आता है और विपरीत परिस्थितियों में भी मिसाइल को सही रास्ते पर बनाए रखता है।
सुरक्षा और सामरिक प्रभाव
रूस द्वारा कम लागत में 3D प्रिंटिंग और आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके बनाई गई यह मिसाइल उसकी लंबी दूरी की हमले की क्षमता को बढ़ाती है। यूक्रेन द्वारा इस मिसाइल के कंपोनेंट्स का विश्लेषण करने से यह साफ होता है कि आधुनिक युद्ध में हाई-टेक हथियारों की मैन्युफैक्चरिंग किस दिशा में आगे बढ़ रही है।

दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित वानुअतु में 6.9 तीव्रता का भूकंप
दक्षिण प्रशांत महासागर के द्वीपीय देश वानुअतु के तट के पास 6.9 तीव्रता का एक शक्तिशाली भूकंप दर्ज किया गया है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार, भूकंप के तुरंत बाद इस क्षेत्र में सुनामी की चेतावनी जारी की गई थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया। किसी भी बड़े नुकसान की फिलहाल कोई खबर नहीं है।

छत्तीसगढ़: पेड़ों को बचाने के लिए 'सर्जरी' तकनीक का सहारा
छत्तीसगढ़ के उदंती सीतानंदी टाइगर रिजर्व में अतिक्रमणकारियों द्वारा सुनियोजित तरीके से छाल काटकर सूखने के लिए छोड़े गए 500 से अधिक पेड़ों को बचाने के लिए वन विभाग ने अनूठी पहल की है। विभाग इन पेड़ों की जान बचाने के लिए 'ब्रिज-ग्राफ्टिंग' यानी पेड़ की सर्जरी तकनीक का सहारा ले रहा है।
क्या होती है गर्डलिंग तकनीक?
गर्डलिंग मूल रूप से एक वन प्रबंधन तकनीक है, जिसका उपयोग बिना पेड़ काटे उसे सुखाने या खत्म करने के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया में पेड़ के तने के चारों ओर गोलाकार रूप में छाल (Bark) और कैम्बियम की परत को पूरी तरह से छीलकर हटा दिया जाता है। इससे पेड़ के भीतर पानी और पोषक तत्वों का संचार रुक जाता है, जड़ें कुपोषित हो जाती हैं और अंततः पेड़ सूख जाता है। हालांकि इसका उपयोग वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक आवास (Standing snags) बनाने या जंगलों में अवांछित पेड़ों को हटाने के लिए किया जाता है, लेकिन अपराधियों द्वारा इसका दुरुपयोग पेड़ों को नुकसान पहुंचाने के लिए किया गया है।
कैम्बियम और उसका महत्व
पेड़ के तने में छाल और लकड़ी (जाइलम और फ्लोएम) के बीच सक्रिय रूप से विभाजित होने वाली कोशिकाओं की एक पतली परत को 'कैम्बियम' कहा जाता है। यही परत पेड़ों की मोटाई बढ़ाने यानी सेकेंडरी ग्रोथ के लिए जिम्मेदार होती है। जब इसी परत को चारों तरफ से काट दिया जाता है, तो पेड़ का जीवन चक्र बाधित हो जाता है।
ब्रिज-ग्राफ्टिंग या ट्री-सर्जरी से उम्मीद
सूखने की कगार पर पहुंच चुके इन 500 पेड़ों की जान बचाने के लिए वन विभाग 'ब्रिज-ग्राफ्टिंग' (Bridge-Grafting) तकनीक का उपयोग कर रहा है। यह एक प्रकार की मरम्मत ग्राफ्टिंग है, जिसका उपयोग मशीनी रूप से या छाल छीलकर घायल किए गए पेड़ों को ठीक करने के लिए किया जाता है। इसके तहत क्षतिग्रस्त हिस्से पर नए पौधों के तनों या टहनियों को जोड़कर एक 'पुल' (Bridge) बनाया जाता है, ताकि जड़ों और ऊपरी हिस्से के बीच पानी और पोषक तत्वों का प्रवाह फिर से शुरू हो सके। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह एक अनूठा और सराहनीय कदम है।

अंटार्कटिका की रहस्यमयी लेक अंटारसी: मिला प्राचीन जीवन का सुराग
अंटार्कटिका में स्थित रहस्यमयी 'लेक अंटारसी' (Lake Untersee) वैज्ञानिकों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। सालभर बर्फ की मोटी चादर से ढकी रहने वाली यह झील अपने अनूठे रासायनिक संतुलन, 3 अरब साल पुराने स्ट्रोमेटोलाइट्स और चरम वातावरण में जीवित रहने वाले जीवों के लिए पृथ्वी की सबसे अनोखी जगहों में से एक है।
हमेशा जमी रहने वाली अनोखी झील
लेक अंटारसी का औसत वार्षिक तापमान शून्य से लगभग 10 डिग्री सेल्सियस नीचे रहता है। इस अत्यधिक ठंड के कारण यह झील साल के 365 दिन बर्फ की कई मीटर मोटी चादर से ढकी रहती है। इतनी भीषण ठंड और वायुमंडल से पूरी तरह कटे होने के बावजूद सूर्य की किरणें बर्फ को चीरकर पानी तक पहुँचती हैं। हालांकि, तेज हवाएं और सतह के तापमान के कारण होने वाला वाष्पीकरण बर्फ को पिघलने नहीं देता। झील में मुख्य रूप से अनचिन ग्लेशियर (Anuchin Glacier) से पिघला हुआ पानी आता है।
पानी का अनूठा रसायन और स्ट्रैटोस्फीयर
यह झील अपने अनोखे रासायनिक संतुलन के लिए जानी जाती है। इसके पानी में घुलित ऑक्सीजन का स्तर अत्यधिक उच्च है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बेहद कम है और इसका pH मान बहुत क्षारीय (Alkaline) है। इस विषम वातावरण में भी 'स्ट्रोमेटोलाइट्स' (Stromatolites) नाम के प्राचीन सूक्ष्मजीव फल-फूल रहे हैं। स्ट्रोमेटोलाइट्स पृथ्वी की सबसे पुरानी जैविक संरचनाओं में से एक हैं, जिनके जीवाश्म 3 अरब साल से भी अधिक पुराने हैं। बर्फ की शांत और स्थिर दुनिया के कारण यहाँ ये संरचनाएं काफी ऊंची और शंक्वाकार (Conical) आकृति में विकसित होती हैं।
मंगल और अन्य ग्रहों की खोज में मददगार
लेक अंटारसी में पाए जाने वाले सबसे बड़े जीवों में 'टार्डिग्रेड्स' (Tardigrades) शामिल हैं, जिन्हें "वाटर बीयर" भी कहा जाता है। ये सूक्ष्मजीव पृथ्वी के सबसे प्रतिकूल वातावरण में भी जीवित रहने के लिए जाने जाते हैं। झील का यह ठंडा, क्षारीय वातावरण और सूर्य के प्रकाश की सीमित उपस्थिति इसे सौरमंडल के अन्य ग्रहों (जैसे मंगल या बृहस्पति के बर्फीले चंद्रमाओं) पर जीवन की संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए एक बेहतरीन प्राकृतिक प्रयोगशाला बनाती है।
स्थिर दिखने वाली झील में बदलाव के संकेत
यद्यपि लेक अंटारसी वर्षों से स्थिर और अलग-थलग प्रतीत होती है, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसमें कुछ अप्रत्याशित बदलाव भी दर्ज किए हैं। शोधकर्ताओं ने जनवरी 2019 के मैदानी कार्य के दौरान पाया था कि एक पड़ोसी झील से करोड़ों घन मीटर पानी के बहकर आने के कारण लेक अंटारसी का जलस्तर दो मीटर तक बढ़ गया था। यह घटना दर्शाती है कि अंटार्कटिका के बर्फीले वातावरण में हो रहे बदलाव इस प्राचीन और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को भी प्रभावित कर रहे हैं।
Delight News
निष्पक्ष पत्रकारिता, सटीक विश्लेषण
Delight News परिवार से जुड़ें
ताजा खबरों के सबसे तेज नोटिफिकेशन और शानदार यूज़र इंटरफेस के साथ देश-दुनिया के लाइव अपडेट्स सीधे अपने mobile पर पाने के लिए हमारा Delight News Android App डाउनलोड करें।
📥 Download Android App