
दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित वानुअतु में 6.9 तीव्रता का भूकंप
दक्षिण प्रशांत महासागर के द्वीपीय देश वानुअतु के तट के पास 6.9 तीव्रता का एक शक्तिशाली भूकंप दर्ज किया गया है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार, भूकंप के तुरंत बाद इस क्षेत्र में सुनामी की चेतावनी जारी की गई थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया। किसी भी बड़े नुकसान की फिलहाल कोई खबर नहीं है।

छत्तीसगढ़: पेड़ों को बचाने के लिए 'सर्जरी' तकनीक का सहारा
छत्तीसगढ़ के उदंती सीतानंदी टाइगर रिजर्व में अतिक्रमणकारियों द्वारा सुनियोजित तरीके से छाल काटकर सूखने के लिए छोड़े गए 500 से अधिक पेड़ों को बचाने के लिए वन विभाग ने अनूठी पहल की है। विभाग इन पेड़ों की जान बचाने के लिए 'ब्रिज-ग्राफ्टिंग' यानी पेड़ की सर्जरी तकनीक का सहारा ले रहा है।
क्या होती है गर्डलिंग तकनीक?
गर्डलिंग मूल रूप से एक वन प्रबंधन तकनीक है, जिसका उपयोग बिना पेड़ काटे उसे सुखाने या खत्म करने के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया में पेड़ के तने के चारों ओर गोलाकार रूप में छाल (Bark) और कैम्बियम की परत को पूरी तरह से छीलकर हटा दिया जाता है। इससे पेड़ के भीतर पानी और पोषक तत्वों का संचार रुक जाता है, जड़ें कुपोषित हो जाती हैं और अंततः पेड़ सूख जाता है। हालांकि इसका उपयोग वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक आवास (Standing snags) बनाने या जंगलों में अवांछित पेड़ों को हटाने के लिए किया जाता है, लेकिन अपराधियों द्वारा इसका दुरुपयोग पेड़ों को नुकसान पहुंचाने के लिए किया गया है।
कैम्बियम और उसका महत्व
पेड़ के तने में छाल और लकड़ी (जाइलम और फ्लोएम) के बीच सक्रिय रूप से विभाजित होने वाली कोशिकाओं की एक पतली परत को 'कैम्बियम' कहा जाता है। यही परत पेड़ों की मोटाई बढ़ाने यानी सेकेंडरी ग्रोथ के लिए जिम्मेदार होती है। जब इसी परत को चारों तरफ से काट दिया जाता है, तो पेड़ का जीवन चक्र बाधित हो जाता है।
ब्रिज-ग्राफ्टिंग या ट्री-सर्जरी से उम्मीद
सूखने की कगार पर पहुंच चुके इन 500 पेड़ों की जान बचाने के लिए वन विभाग 'ब्रिज-ग्राफ्टिंग' (Bridge-Grafting) तकनीक का उपयोग कर रहा है। यह एक प्रकार की मरम्मत ग्राफ्टिंग है, जिसका उपयोग मशीनी रूप से या छाल छीलकर घायल किए गए पेड़ों को ठीक करने के लिए किया जाता है। इसके तहत क्षतिग्रस्त हिस्से पर नए पौधों के तनों या टहनियों को जोड़कर एक 'पुल' (Bridge) बनाया जाता है, ताकि जड़ों और ऊपरी हिस्से के बीच पानी और पोषक तत्वों का प्रवाह फिर से शुरू हो सके। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह एक अनूठा और सराहनीय कदम है।

अंटार्कटिका की रहस्यमयी लेक अंटारसी: मिला प्राचीन जीवन का सुराग
अंटार्कटिका में स्थित रहस्यमयी 'लेक अंटारसी' (Lake Untersee) वैज्ञानिकों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। सालभर बर्फ की मोटी चादर से ढकी रहने वाली यह झील अपने अनूठे रासायनिक संतुलन, 3 अरब साल पुराने स्ट्रोमेटोलाइट्स और चरम वातावरण में जीवित रहने वाले जीवों के लिए पृथ्वी की सबसे अनोखी जगहों में से एक है।
हमेशा जमी रहने वाली अनोखी झील
लेक अंटारसी का औसत वार्षिक तापमान शून्य से लगभग 10 डिग्री सेल्सियस नीचे रहता है। इस अत्यधिक ठंड के कारण यह झील साल के 365 दिन बर्फ की कई मीटर मोटी चादर से ढकी रहती है। इतनी भीषण ठंड और वायुमंडल से पूरी तरह कटे होने के बावजूद सूर्य की किरणें बर्फ को चीरकर पानी तक पहुँचती हैं। हालांकि, तेज हवाएं और सतह के तापमान के कारण होने वाला वाष्पीकरण बर्फ को पिघलने नहीं देता। झील में मुख्य रूप से अनचिन ग्लेशियर (Anuchin Glacier) से पिघला हुआ पानी आता है।
पानी का अनूठा रसायन और स्ट्रैटोस्फीयर
यह झील अपने अनोखे रासायनिक संतुलन के लिए जानी जाती है। इसके पानी में घुलित ऑक्सीजन का स्तर अत्यधिक उच्च है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बेहद कम है और इसका pH मान बहुत क्षारीय (Alkaline) है। इस विषम वातावरण में भी 'स्ट्रोमेटोलाइट्स' (Stromatolites) नाम के प्राचीन सूक्ष्मजीव फल-फूल रहे हैं। स्ट्रोमेटोलाइट्स पृथ्वी की सबसे पुरानी जैविक संरचनाओं में से एक हैं, जिनके जीवाश्म 3 अरब साल से भी अधिक पुराने हैं। बर्फ की शांत और स्थिर दुनिया के कारण यहाँ ये संरचनाएं काफी ऊंची और शंक्वाकार (Conical) आकृति में विकसित होती हैं।
मंगल और अन्य ग्रहों की खोज में मददगार
लेक अंटारसी में पाए जाने वाले सबसे बड़े जीवों में 'टार्डिग्रेड्स' (Tardigrades) शामिल हैं, जिन्हें "वाटर बीयर" भी कहा जाता है। ये सूक्ष्मजीव पृथ्वी के सबसे प्रतिकूल वातावरण में भी जीवित रहने के लिए जाने जाते हैं। झील का यह ठंडा, क्षारीय वातावरण और सूर्य के प्रकाश की सीमित उपस्थिति इसे सौरमंडल के अन्य ग्रहों (जैसे मंगल या बृहस्पति के बर्फीले चंद्रमाओं) पर जीवन की संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए एक बेहतरीन प्राकृतिक प्रयोगशाला बनाती है।
स्थिर दिखने वाली झील में बदलाव के संकेत
यद्यपि लेक अंटारसी वर्षों से स्थिर और अलग-थलग प्रतीत होती है, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसमें कुछ अप्रत्याशित बदलाव भी दर्ज किए हैं। शोधकर्ताओं ने जनवरी 2019 के मैदानी कार्य के दौरान पाया था कि एक पड़ोसी झील से करोड़ों घन मीटर पानी के बहकर आने के कारण लेक अंटारसी का जलस्तर दो मीटर तक बढ़ गया था। यह घटना दर्शाती है कि अंटार्कटिका के बर्फीले वातावरण में हो रहे बदलाव इस प्राचीन और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को भी प्रभावित कर रहे हैं।

जापान के बोनिन द्वीप समूह में 6.5 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप
प्रशांत महासागर में स्थित जापान के बोनिन (ओगासावारा) द्वीप समूह क्षेत्र में 6.5 तीव्रता का एक शक्तिशाली भूकंप दर्ज किया गया है। इस भूकंप का केंद्र समुद्र की गहराई में था। गनीमत यह रही कि इस प्राकृतिक घटना से किसी भी तरह के नुकसान की खबर नहीं है और न ही सुनामी की चेतावनी जारी की गई है।
बोनिन द्वीप समूह की भौगोलिक और सामरिक स्थिति
बोनिन द्वीप समूह, जिसे स्थानीय रूप से 'ओगासावारा द्वीप समूह' के नाम से भी जाना जाता है, मध्य प्रशांत महासागर में लगभग 30 ज्वालामुखी द्वीपों और चट्टानों का एक समूह है। यह जापान की मुख्य भूमि से लगभग 800 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। पूर्वी एशिया के समुद्री रास्तों पर होने के कारण यह द्वीप समूह अत्यंत रणनीतिक स्थान रखता है। 1875 में जापान द्वारा इसे अपने अधिकार में लिया गया था और 1880 में यह टोक्यो प्रान्त का हिस्सा बन गया।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और द्वीपीय जीवन
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यह द्वीप समूह जापानी सेना का एक प्रमुख गढ़ था, जिस पर 1945 में अमेरिकी नौसेना ने कब्जा कर लिया था। अमेरिका ने 1968 तक इसका प्रशासन संभाला, जिसके बाद इसे वापस जापान को सौंप दिया गया। इस द्वीप समूह का कुल भूमि क्षेत्र लगभग 73 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से बहुत कम हिस्सा खेती योग्य है और बाकी हिस्सा पहाड़ी व जंगलों से घिरा हुआ है। चिची द्वीप इस समूह का सबसे बड़ा और प्रमुख द्वीप है, जहाँ उमूरा राजधानी और फुतामी-को प्रमुख बंदरगाह के रूप में स्थित है।
'पूर्व का गालापागोस' और अद्वितीय जैव विविधता
बोनिन द्वीप कभी भी किसी महाद्वीपीय भूमि से जुड़े नहीं रहे, बल्कि यह समुद्र के भीतर हुए ज्वालामुखीय विस्फोटों से उभरे हैं। इस कारण यह क्षेत्र जीव-वैज्ञानिकों के लिए उद्विकास (Evolution) की एक अनूठी प्रयोगशाला है। यहाँ पौधों की 195 स्थानिक प्रजातियाँ और घोंघों की 100 से अधिक दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलतीं। इसके अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र की वजह से इसे "पूर्व का गालापागोस" (Galapagos of the Orient) भी कहा जाता है।
विश्व प्राकृतिक धरोहर और अनूठा वन्यजीव
यहाँ पाई जाने वाली बोनिन फ्लाइंग फॉक्स (एक संकटग्रस्त फल चमगादड़) ओगासावारा द्वीप समूह की एकमात्र स्थानिक स्तनपाई प्रजाति है। इसके अलावा यहाँ के मूंगा चट्टानों में पाई जाने वाली मछलियों की 440 प्रजातियों में से कई प्रजातियाँ केवल इसी क्षेत्र में जीवित रहती हैं। इन प्राकृतिक विशेषताओं और दुर्लभ विविधता के कारण जुलाई 2011 में ओगासावारा द्वीप समूह को यूनेस्को (UNESCO) की 'विश्व प्राकृतिक धरोहर' सूची में शामिल किया गया था।

दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक जहाज: 'चाईना जोरिअल' शुरू
समुद्री परिवहन के क्षेत्र में एक नया इतिहास रचते हुए दुनिया के सबसे बड़े बैटरी-इलेक्ट्रिक जहाज 'चाईना जोरिअल' (China Zorrilla) ने अपनी व्यावसायिक सेवा शुरू कर दी है। अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स और उरुग्वे के कोलोनिया के बीच अपनी पहली यात्रा पूरी करने वाला यह विशाल जहाज पूरी तरह से हरित ऊर्जा पर संचालित होता है।
निर्माण और नामकरण का इतिहास
इस विशालकाय पोत को ऑस्ट्रेलियाई जहाज निर्माण कंपनी 'इनकैट तस्मानिया' (Incat Tasmania) द्वारा दक्षिण अमेरिकी फेरी ऑपरेटर 'बुकबस' (Buquebus) के लिए तैयार किया गया है। निर्माण चरण के दौरान इसे 'इनकैट हल 096' (Incat Hull 096) के नाम से जाना जाता था। बाद में इसका नाम प्रसिद्ध उरुग्वे की महान अभिनेत्री और रंगमंच हस्ती 'चाईना जोरिअल' के सम्मान में रखा गया।
चाईना जोरिअल की तकनीकी विशेषताएं
पूरी तरह से बैटरी ऊर्जा पर चलने वाला यह अब तक का निर्मित सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक जहाज है। इसकी लंबाई 130 मीटर और चौड़ाई 32 मीटर है। यह एक साथ 2,100 यात्रियों और 225 वाहनों को ले जाने में सक्षम है। इस पोत में तीन मुख्य डैक बनाए गए हैं, जिनमें 2,300 वर्ग मीटर का एक विशाल ड्यूटी-फ्री रिटेल शॉपिंग कॉम्प्लेक्स भी शामिल है।
शक्तिशाली ऊर्जा प्रणाली और क्षमता
इस जहाज की ऊर्जा प्रणाली 40 मेगावाट-घंटे (MWh) से अधिक क्षमता की है, जिसके लिए इसमें 250 मीट्रिक टन से अधिक वजन की उन्नत बैटरियों का इस्तेमाल किया गया है। यह बैटरी सिस्टम वाटरजेट्स से जुड़ी 8 इलेक्ट्रिक मोटरों को शक्ति प्रदान करता है, जिससे जहाज 25 समुद्री मील (Knots) की रफ्तार हासिल कर लेता है।
पर्यावरण-अनुकूल और आरामदायक यात्रा
यह इलेक्ट्रिक जहाज 55 से 60 किलोमीटर की दूरी को महज 90 मिनट में तय कर लेता है। पारंपरिक ईंधन वाले जहाजों की तुलना में यह यात्रा पूरी तरह से कार्बन उत्सर्जन, विषैली गैसों और कंपन्न (Vibrations) से मुक्त है। इससे न केवल यात्रियों को एक शांत और आरामदायक सफर का अनुभव मिलता है, बल्कि यह समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरण के लिए भी पूरी तरह सुरक्षित है।
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