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रणथंभौर टाइगर रिजर्व में गूंजी किलकारी, बाघिन टी-2403 नजर आई तीन शावकों के साथ

रणथंभौर टाइगर रिजर्व में गूंजी किलकारी, बाघिन टी-2403 नजर आई तीन शावकों के साथ

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📅 26 Oct2026

राजस्थान के सवाई माधोपुर स्थित रणथंभौर टाइगर रिजर्व से एक बार फिर खुशखबरी सामने आई है। रिजर्व के जोन-8 में साढ़े चार साल की बाघिन टी-2403 को तीन शावकों के साथ देखा गया है। इस मनमोहक दृश्य को सुबह की सफारी पर आए पर्यटकों ने भी अपने कैमरे में कैद किया, जिससे वन्यजीव प्रेमियों में भारी उत्साह है।

राजस्थान के प्रसिद्ध रणथंभौर टाइगर रिजर्व (Ranthambore Tiger Reserve) से वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक बेहद सुखद और उत्साहवर्धक खबर सामने आई है। रिजर्व के जोन नंबर 8 में हाल ही में मॉर्निंग सफारी के दौरान लगभग साढ़े चार साल की बाघिन 'टी-2403' (T-2403) को तीन नए शावकों के साथ विचरण करते हुए देखा गया। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, डायरेक्ट साइटिंग में बाघिन के साथ तीन छोटे शावक नजर आए हैं, जिनकी पुख्ता संख्या जल्द ही कैमरा ट्रैप की तस्वीरों के आधार पर सुनिश्चित की जाएगी।
सफारी पर पहुंचे पर्यटकों ने जब बाघिन को उसके शावकों के साथ दुलार करते हुए देखा, तो उनके रोमांच का ठिकाना नहीं रहा। यह सनसनीखेज और खूबसूरत नजारा रणथंभौर की समृद्ध जैव विविधता और लगातार बढ़ते बाघों के कुनबे की एक और बेहतरीन मिसाल पेश करता है।
वन विभाग की कड़ी निगरानी और सुरक्षा
बाघिन और उसके शावकों की इस पहली झलक के सामने आने के बाद रणथंभौर प्रशासन पूरी तरह सतर्क हो गया है। पार्क के उप वन संरक्षक (DFO) मानस सिंह ने जानकारी दी है कि वन विभाग की फील्ड टीमें लगातार बाघिन की गतिविधियों की मॉनिटरिंग कर रही हैं। अधिकारियों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और उनके पारिवारिक विचरण में किसी भी प्रकार का मानवीय हस्तक्षेप या व्यवधान न पहुंचे।
इसके साथ ही, वन विभाग ने पर्यटकों और सफारी जिप्सी चालकों के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं। पर्यटकों से अपील की गई है कि वे सफारी के दौरान तय नियमों का कड़ाई से पालन करें, वन्यजीवों से उचित दूरी बनाए रखें और उनके करीब जाने की कोशिश बिल्कुल न करें।
रणथंभौर का भौगोलिक और पारिस्थितिक महत्व
अरावली और विंध्य पर्वत शृंखलाओं के मिलन स्थल (ग्रेट बाउंड्री फॉल्ट) पर स्थित रणथंभौर टाइगर रिजर्व उत्तर भारत के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण टाइगर रिजर्व में शुमार है। लगभग 1,411 वर्ग किलोमीटर में फैला यह क्षेत्र अपने प्राचीन किलों, मनमोहक झीलों (जैसे पदम तालाब, राजबाग तालाब और मलिक तालाब) और 'धोक' (Anogeissus pendula) के जंगलों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहाँ बाघों के अलावा तेंदुए, सांभर, चीतल और सुस्त भालू जैसे तमाम वन्यजीव प्राकृतिक रूप से निवास करते हैं।
बाघिन टी-2403 और उसके शावकों की यह सफल साइटिंग एक बार फिर साबित करती है कि रणथंभौर का पारिस्थितिकी तंत्र बाघों के प्रजनन और उनके संरक्षण के लिए कितना अनुकूल बनता जा रहा है।
कांगो में इबोला वैक्सीन का ऐतिहासिक ट्रायल शुरू, डब्ल्यूएचओ की बड़ी पहल

कांगो में इबोला वैक्सीन का ऐतिहासिक ट्रायल शुरू, डब्ल्यूएचओ की बड़ी पहल

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📅 26 Oct2026

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) में इबोला वायरस के खिलाफ टीकों के प्रभाव का परीक्षण करने के लिए पहला ऐतिहासिक क्लिनिकल ट्रायल 'टुमैनी' (Tumaini) शुरू किया है। इसका उद्देश्य बंडिबुग्यो (Bundibugyo) स्ट्रेन के खिलाफ प्रभावी सुरक्षा की खोज करना है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) के इटुरी प्रांत स्थित बूनिया में इबोला वैक्सीन का पहला क्लिनिकल ट्रायल शुरू करने की घोषणा की है। इस ऐतिहासिक परीक्षण को स्वाहिली भाषा में 'टुमैनी' (Tumaini) नाम दिया गया है, जिसका अर्थ 'आशा' होता है। इसका मुख्य उद्देश्य देश में फैल रहे इबोला के बंडिबुग्यो (Bundibugyo) वायरस स्ट्रेन से बचाव के लिए कारगर टीकों की प्रभावकारिता और सुरक्षा का परीक्षण करना है।
वर्तमान में बंडिबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ कोई स्वीकृत टीका उपलब्ध नहीं है। इस परीक्षण के तहत सबसे पहले 'इरवेबो' (Ervebo) वैक्सीन का इस्तेमाल किया जा रहा है। यद्यपि यह टीका इबोला के ज़ायर (Zaire) स्ट्रेन के लिए स्वीकृत है, वैज्ञानिक यह जांच रहे हैं कि क्या यह बंडिबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ भी क्रॉस-प्रोटेक्शन (सुरक्षा) प्रदान कर सकता है। इसके अलावा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और मॉडर्ना द्वारा विकसित प्रायोगिक टीकों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा।
कांगो की भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक संसाधन
मध्य अफ्रीका में भूमध्य रेखा पर स्थित कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) महाद्वीप के सबसे महत्वपूर्ण देशों में से एक है। इसकी सीमाएं नौ देशों—अंगोला, कांगो गणराज्य, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, दक्षिण सूडान, युगांडा, रवांडा, बुरुंडी, तंजानिया और जाम्बिया से लगती हैं। दक्षिण-पश्चिम में इसकी सीमा अटलांटिक महासागर से जुड़ी हुई है और इसकी राजधानी किंशासा है।
भौगोलिक दृष्टि से यह देश कांगो नदी के जलग्रहण क्षेत्र में फैला हुआ है और यहाँ मुख्य रूप से विषुवतीय (Equatorial) जलवायु पाई जाती है। यहाँ की प्रमुख झीलों में तांगानिका, अल्बर्ट, एडवर्ड और किवू शामिल हैं। इसके अलावा विरंगा पर्वत श्रृंखला में स्थित 'माउंट न्यारागोंगो' एक प्रमुख सक्रिय ज्वालामुखी है। कांगो प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध देश है, जहाँ औद्योगिक हीरे, कोबाल्ट और तांबे के विशाल भंडार मौजूद हैं।
स्वास्थ्य चुनौती और परीक्षण का महत्व
इबोला वायरस के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए यह क्लिनिकल ट्रायल बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसमें 'रिंग वैक्सिनेशन' रणनीति अपनाई जा रही है, जिसके तहत संक्रमित लोगों के संपर्क में आए उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों, गर्भवती महिलाओं और 12 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों को टीका लगाया जा रहा है। यह पहल न केवल कांगो बल्कि पूरे अफ्रीकी महाद्वीप के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा कदम साबित होगी।
'द लांसेट' का बड़ा खुलासा: भारत में जानलेवा 'मेलियोइडोसिस' बीमारी का खतरा

'द लांसेट' का बड़ा खुलासा: भारत में जानलेवा 'मेलियोइडोसिस' बीमारी का खतरा

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📅 26 Oct2026

प्रतिष्ठित पत्रिका 'द लांसेट ग्लोबल हेल्थ' के एक अध्ययन के अनुसार, भारत के 15 प्रमुख अस्पतालों में भर्ती जोखिम वाले मरीजों में से 262 लोगों में 'मेलियोइडोसिस' संक्रमण की पुष्टि हुई है। मिट्टी और पानी में पाए जाने वाले बैक्टीरिया से फैलने वाली इस दुर्लभ बीमारी से 19.1% मरीजों की मौत हो गई।

भारत में एक गंभीर और दुर्लभ जीवाणु संक्रमण 'मेलियोइडोसिस' को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की है। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल 'द लांसेट ग्लोबल हेल्थ' में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2023 से 2025 के बीच भारत के 15 तृतीयक देखभाल (tertiary-care) अस्पतालों में भर्ती 2,953 उच्च जोखिम वाले मरीजों की जांच की गई। इस दौरान 262 मरीजों में 'मेलियोइडोसिस' की पुष्टि हुई, जिनमें से 50 मरीजों (19.1%) की इलाज के दौरान अस्पताल में मृत्यु हो गई।
यह बीमारी 'बर्कहोल्डेरिया सूडोमलेई' (Burkholderia pseudomallei) नामक पर्यावरण में पाए जाने वाले ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया के कारण होती है। यह बैक्टीरिया मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की मिट्टी और सतही पानी में मौजूद रहता है।
संक्रमण का प्रसार और जोखिम वाले वर्ग
मेलियोइडोसिस को एक मौसमी बीमारी माना जाता है, क्योंकि इसके 75 से 85 प्रतिशत मामले मानसून या बरसात के मौसम के दौरान सामने आते हैं। जब दूषित मिट्टी या पानी शरीर में किसी कटे, घाव या खरोंच के जरिए प्रवेश करता है, तो व्यक्ति इस संक्रमण की चपेट में आ जाता है। इसके अलावा दूषित धूल या पानी की बूंदों के सांस के माध्यम से शरीर में जाने से भी यह फैल सकता है। हालाँकि, इंसानों से इंसानों में या जानवरों से इंसानों में इसका फैलाव बेहद दुर्लभ है।
अध्ययन के अनुसार, मधुमेह (Diabetes), अत्यधिक शराब का सेवन, पुरानी किडनी की बीमारी और फेफड़ों के गंभीर रोगों (जैसे सीओपीडी या सिस्टिक फाइब्रोसिस) से पीड़ित लोगों में इस संक्रमण का जोखिम सबसे ज्यादा होता है।
लक्षण और इलाज के तरीके
इस बीमारी के मुख्य लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, सांस लेने में तकलीफ, छाती या पेट में दर्द और त्वचा पर घाव या चकत्ते शामिल हैं। गंभीर स्थितियों में यह निमोनिया, रक्तप्रवाह का संक्रमण (सेप्टीसीमिया), और यकृत (लीवर) व प्लीहा (स्प्लीन) जैसे अंगों में फोड़े (abscesses) का कारण बन सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मेलियोइडोसिस का इलाज दो चरणों में किया जाता है। पहले चरण में मरीज को नसों के जरिए इंटेंसिव आईवी एंटीबायोटिक्स (जैसे सेफ्ताजिडिम या मेरोपेनम) दी जाती हैं। इसके बाद संक्रमण को पूरी तरह खत्म करने और दोबारा फैलने से रोकने के लिए कई महीनों तक ओरल एंटीबायोटिक थेरेपी दी जाती है। मानसून के दौरान खुले घावों का ध्यान रखना और दूषित पानी या मिट्टी से बचाव ही इससे सुरक्षित रहने का सबसे प्रभावी तरीका है।
एनसीबी का 'ऑपरेशन ट्राइडेंट': पूर्वोत्तर में अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क ध्वस्त

एनसीबी का 'ऑपरेशन ट्राइडेंट': पूर्वोत्तर में अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क ध्वस्त

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📅 26 Oct2026

नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने असम, मिजोरम और मणिपुर के 38 ठिकानों पर एक साथ छापा मारकर 'ऑपरेशन ट्राइडेंट' के तहत अंतरराष्ट्रीय ड्रग रैकेट पर बड़ा प्रहार किया है। इस कार्रवाई में 18 तस्करों को गिरफ्तार किया गया और 100 करोड़ रुपये के हवाला लेनदेन का पर्दाफाश हुआ है।

भारत को नशा मुक्त बनाने के संकल्प की दिशा में नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने पूर्वोत्तर भारत में एक बड़ा और प्रभावी अभियान चलाया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के मार्गदर्शन में एनसीबी ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राज्य पुलिस बलों के साथ मिलकर 'ऑपरेशन ट्राइडेंट' लॉन्च किया। इस संयुक्त छापेमारी के तहत असम, मिजोरम और मणिपुर के 38 संवेदनशील स्थानों पर एक साथ स्ट्राइक की गई।
इस बहु-एजेंसी कार्रवाई ने भारत, म्यांमार और बांग्लादेश से जुड़े 'डेथ ट्रायंगल कॉरिडोर' के माध्यम से मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट के वित्तीय और लॉजिस्टिक नेटवर्क की कमर तोड़ दी है।
100 करोड़ के हवाला नेटवर्क का पर्दाफाश
ऑपरेशन ट्राइडेंट की सबसे बड़ी सफलता इस सिंडिकेट की आर्थिक जड़ों को ध्वस्त करना रही। जांच के दौरान लगभग 100 करोड़ रुपये से अधिक के अवैध हवाला लेनदेन का पता चला। कार्रवाई के तहत एजेंसियों ने 1,424 बैंक खातों को फ्रीज कर दिया है, 17.82 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्तियां जब्त की हैं और 18 प्रमुख तस्करों व सहयोगियों को गिरफ्तार किया है। छापेमारी में 500 डिटोनेटर और लाखों रुपये की नकदी भी बरामद की गई है।
वित्तीय प्रहार और रणनीति में बड़ा बदलाव
यह कार्रवाई 'नार्कोटिक्स कंट्रोल विजन डॉक्यूमेंट (2026-2029)' के तहत अपनाई गई नई रणनीति का हिस्सा है। इसके तहत अब सिर्फ ड्रग्स की जब्ती करने के बजाय पूरे नारको-फाइनेंशियल नेटवर्क और शेल कंपनियों को निशाना बनाया जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री ने इस कार्रवाई को देश से ड्रग नेटवर्क के पूर्ण सफाए की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया है।
नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का ढांचा
गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाली एनसीबी भारत की प्रमुख नोडल एजेंसी है, जिसका गठन 1985 के एनडीपीएस एक्ट के तहत किया गया था। यह संस्था न केवल विभिन्न राज्य और केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंटरपोल और यूएनडीसीपी जैसी संस्थाओं के साथ मिलकर वैश्विक स्तर पर नशीली दवाओं की अवैध तस्करी पर लगाम लगाती है।
आईसीआईएमओडी की भारत में गतिविधियों के लिए जीबी पंत संस्थान को जिम्मेदारी

आईसीआईएमओडी की भारत में गतिविधियों के लिए जीबी पंत संस्थान को जिम्मेदारी

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📅 26 Oct2026

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अल्मोड़ा स्थित 'जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान' को भारत में अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वत विकास केंद्र (ICIMOD) की गतिविधियों के समन्वय की जिम्मेदारी सौंपी है। यह कदम हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन से निपटने में मददगार साबित होगा।

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने अल्मोड़ा स्थित 'जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान' (GBPNIHE) को एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। अब यह संस्थान भारत में 'अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वत विकास केंद्र' (ICIMOD) की गतिविधियों के समन्वय और संचालन के लिए एक प्रमुख नोडल निकाय के रूप में काम करेगा। इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र में अनुसंधान, जलवायु अनुकूलन और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को और अधिक एकीकृत तथा असरदार बनाना है।
आईसीआईएमओडी क्या है?
अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वत विकास केंद्र (ICIMOD) एक अंतर-सरकारी ज्ञान और शिक्षण केंद्र है, जिसकी स्थापना 5 दिसंबर 1983 को हुई थी। इसका मुख्यालय नेपाल की राजधानी काठमांडू में स्थित है। यह संस्थान हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र के आठ सदस्य देशों—भारत, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, म्यांमार, नेपाल और पाकिस्तान के लिए कार्य करता है। इसका मुख्य मिशन क्षेत्रीय नीतियों, निवेश और ज्ञान साझाकरण के माध्यम से पर्वतीय समुदायों को अधिक समावेशी और जलवायु-सहनशील विकास की ओर ले जाना है।
'थर्ड पोल' और हिंदू कुश हिमालय का महत्व
हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र लगभग 3,500 किलोमीटर के दायरे में आठ देशों में फैला हुआ है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के बाद पृथ्वी पर स्थायी बर्फ का सबसे बड़ा भंडार इसी क्षेत्र में स्थित होने के कारण इसे अक्सर 'तीसरा ध्रुव' (Third Pole) भी कहा जाता है। यह क्षेत्र 4 वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट का घर है और एशिया की 10 प्रमुख नदियों (जैसे गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, मेकांग आदि) का उद्गम स्थल है। इन नदी घाटियों पर दुनिया की लगभग एक-चौथाई यानी 1.9 अरब आबादी जल सुरक्षा के लिए निर्भर है।
भारत के लिए इस समन्वय का महत्व
जलवायु परिवर्तन और भू-मंडलीकरण के बढ़ते प्रभाव के कारण नाजुक पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय आबादी की आजीविका पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। अल्मोड़ा स्थित जीबी पंत संस्थान द्वारा आईसीआईएमओडी की गतिविधियों का समन्वय किए जाने से भारत को वैज्ञानिक अनुसंधान, सीमा पार सहयोग, और पर्वतीय क्षेत्रों के सतत विकास के लिए आधुनिक रणनीतियां तैयार करने में सीधी मदद मिलेगी। यह पहल न केवल वैज्ञानिक नेटवर्क को मजबूत करेगी बल्कि निचले इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों की जल और पर्यावरण सुरक्षा भी सुनिश्चित करेगी।

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