
जुकार द्वीप के पास संकट में 14 भारतीय नाविक, हूती विद्रोहियों का दावा
लाल सागर में स्थित यमन के जुकार द्वीप के पास 14 भारतीय नागरिकों से भरी एक नाव के संकट में फंसने की खबर सामने आई है। हूती विद्रोहियों ने दावा किया है कि वे इस नाव को बचाने का प्रयास कर रहे हैं, साथ ही यह आरोप भी लगाया है कि इस पर सऊदी अरब द्वारा निशाना साधा गया था।
रणनीतिक रूप से बेहद अहम है जुकार द्वीप
जुकार द्वीप दक्षिणी लाल सागर में हानिश द्वीप समूह का हिस्सा है और यह एक यमन के अधिकार क्षेत्र में आने वाला द्वीप है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 130 वर्ग किलोमीटर है। यह द्वीप मुख्य भूमि यमन और इरिट्रिया के तटों के बीच, बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के पास स्थित है, जो लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। अफ्रीकी महाद्वीप के करीब होने के बावजूद यह द्वीप एशिया महाद्वीपीय शेल्फ पर स्थित होने के कारण एशिया का हिस्सा माना जाता है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक पर स्थित होने के कारण इसका सामरिक महत्व बहुत अधिक है।
इतिहास और भौगोलिक विशेषताएं
इस द्वीप का एक विवादास्पद इतिहास भी रहा है। साल 1995 में यमन के साथ संघर्ष के बाद इरिट्रिया ने इस पर कब्जा कर लिया था, लेकिन 1998 में एक अंतरराष्ट्रीय अदालत के फैसले के बाद इसे औपचारिक रूप से वापस यमन की कस्टडी में सौंप दिया गया। भौगोलिक दृष्टि से, यह द्वीप एक शील्ड ज्वालामुखी से बना है, जिस पर बेसाल्टिक पाइरोक्लास्टिक और स्पैटर शंकु फैले हुए हैं। यहाँ से युवा दिखने वाले 'पाएकोहो' लावा प्रवाह निकलते हैं। इसके अलावा, द्वीप के आसपास के कई छोटे तटीय शंकु और टापू फ्रीयेटिक उदगारों के कारण बने हैं।
क्या होते हैं पायोहोहो लावा प्रवाह?
पायोहोहो बेसाल्टिक लावा का एक प्रकार है, जिसकी सतह चिकनी, चमकदार और लहरदार होती है। यह अत्यधिक तरल लावा पतली परतों में फैलता है और जमती हुई पपड़ी के नीचे बहते हुए रस्सी जैसे मुड़े हुए आकार बनाता है। इस लावा की सतह थोड़ी लहरदार या गुंबददार दिखाई देती है, जिसके नीचे बहता हुआ तरल लावा इसे मुड़े हुए रस्से या टेपेस्ट्री जैसी सिलवटों का रूप दे देता है। इन लावा धाराओं को आमतौर पर भीतर से तरल लावा की धाराएं पोषित करती हैं।

जावोदोव्स्की द्वीप: 14 सालों में 63% घटे चिनस्ट्रैप पेंगुइन
दक्षिण अटलांटिक महासागर स्थित जावोदोव्स्की द्वीप पर चिनस्ट्रैप पेंगुइन की आबादी में भारी गिरावट दर्ज की गई है। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे (BAS) के नए शोध के अनुसार, पिछले 14 वर्षों में यहाँ प्रजनन करने वाले चिनस्ट्रैप पेंगुइन की संख्या में लगभग 63 प्रतिशत की कमी आई है, जो पर्यावरणविदों के लिए गहरी चिंता का विषय है।
दुनिया की सबसे बड़ी पेंगुइन कॉलोनी पर संकट
दक्षिण सैंडविच द्वीप समूह के ट्रावर्से द्वीप समूह में स्थित जावोदोव्स्की द्वीप एक गैर-आबादी वाला ज्वालामुखीय द्वीप है। यह स्थान दुनिया की सबसे बड़ी पेंगुइन कॉलोनी के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ अनोखी प्राकृतिक वनस्पतियाँ और जीव-जंतु पाए जाते हैं। द्वीप का मुख्य आकर्षण यहाँ का बसाल्टिक स्ट्रेटोवोलकैनो है, जिसे 'माउंट करी' के नाम से जाना जाता है। माउंट करी के मुख्य ढांचे के किनारे दो पैरासिटिक शंकुओं से पूर्व की ओर एक विशाल लावा प्लेटफॉर्म फैला हुआ है। इस दुर्गम और खूबसूरत द्वीप पर पेंगुइन की आबादी में आ रही यह गिरावट दक्षिण महासागरीय पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन की ओर इशारा करती है।
कौन हैं चिनस्ट्रैप पेंगुइन
चिनस्ट्रैप पेंगुइन (पायगोसेलिस अंटार्कटिकस) मुख्य रूप से दक्षिणी प्रशांत और अंटार्कटिक महासागर के विभिन्न द्वीपों और तटों पर निवास करते हैं। इनकी पहचान बहुत आसान है; इनके सिर के नीचे एक पतली काली पट्टी होती है, जो ऐसी लगती है मानो इन्होंने सिर पर काला हेलमेट पहन रखा हो और उसकी स्ट्रैप ठोड़ी पर बंधी हो। अपनी तेज और कर्कश आवाज के कारण इन्हें 'रिंग्ड पेंगुइन', 'बियर्डेड पेंगुइन' और 'स्टोनक्रैकर पेंगुइन' के नाम से भी जाना जाता है।
आहार और व्यवहार में अद्वितीय जीव
ये पेंगुइन बेहद सामाजिक पक्षी हैं, जो हजारों-लाखों की बड़ी कॉलोनियों में एक साथ रहते हैं और प्रजनन करते हैं। इनका मुख्य भोजन 'अंटार्कटिक क्रिल' है—झिंगा मछली जैसे दिखने वाले ये छोटे जीव अंटार्कटिक खाद्य श्रृंखला का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हालाँकि, आईयूसीएन (IUCN) की रेड लिस्ट में वर्तमान में चिनस्ट्रैप पेंगुइन को 'लीस्ट कंसर्न' यानी कम खतरे वाली श्रेणी में रखा गया है, लेकिन जावोदोव्स्की द्वीप पर 63% की गिरावट यह संकेत देती है कि अंटार्कटिक के बदलते पर्यावरण और क्रिल की उपलब्धता पर पड़ रहे प्रभावों की तुरंत समीक्षा करने की जरूरत है।

अरब सागर की गहराइयों में मिली नई इलेक्ट्रिक रे प्रजाति
शोधकर्ताओं ने उत्तरी हिंद महासागर के अरब सागर क्षेत्र में इलेक्ट्रिक रे की एक नई प्रजाति खोज निकाली है। 'अरेबियन ब्लैक इलेक्ट्रिक राया' (Tetronarce ramanamurthyi) नाम की यह मछली अपने गहरे रंग, विशेष शारीरिक बनावट और बिजली का झटका पैदा करने की क्षमता के कारण जीव विज्ञान की दुनिया में कौतूहल का विषय बनी हुई है।
उत्तरी हिंद महासागर में ऐतिहासिक खोज
यह खोज समुद्री जीव विज्ञान के क्षेत्र में बेहद अहम मानी जा रही है। उत्तरी हिंद महासागर में 'टेट्रोनार्स' वंश (Genus) की मौजूदगी का यह पहला आधिकारिक और प्रामाणिक रिकॉर्ड है। जेनेटिक अध्ययन से पता चला है कि यह मछली दुनिया भर में पाई जाने वाली अन्य सभी इलेक्ट्रिक रे प्रजातियों से अलग एक स्वतंत्र विकासवादी वंश (Evolutionary lineage) का प्रतिनिधित्व करती है।
बनावट और अनोखी शारीरिक विशेषताएं
अरेबियन ब्लैक इलेक्ट्रिक रे की शारीरिक बनावट इसे अन्य मछलियों से अलग और खास बनाती है। इसका ऊपरी शरीर एकसमान गहरे नीले-काले या गहरे भूरे रंग का है, जबकि इसका निचला हिस्सा यानी पेट सफेद रंग का होता है। अन्य प्रजातियों के विपरीत, इसके सांस लेने वाले छिद्रों (Spiracles) के आसपास त्वचा पर कोई उभार या गांठें नहीं पाई जाती हैं। कार्टिलाजीनस श्रेणी में आने वाली इस मछली का शरीर चपटा होता है और इसके बड़े पेक्टोरल फिन्स इसके सिर से जुड़े होते हैं।
बिजली के झटके से शिकार करने में माहिर
इलेक्ट्रिक रे मछलियाँ अपनी खास क्षमता के लिए जानी जाती हैं। यह मछली अपने शरीर के भीतर शक्तिशाली इलेक्ट्रिक शॉक (बिजली का झटका) पैदा कर सकती है। समुद्र के इकोसिस्टम में यह एक मध्य-स्तरीय शिकारी (Mesopredator) की भूमिका निभाती है। जब भी कोई छोटा जीव इसके पास से गुजरता है, तो यह बिजली का झटका देकर उसे तुरंत सुन्न कर देती है और आसानी से अपना शिकार बना लेती है।
यह नई खोज न केवल हिंद महासागर की समृद्ध समुद्री जैव विविधता को रेखांकित करती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि समुद्र के सीने में आज भी ऐसे कई रहस्य छिपे हैं जिनका सामने आना बाकी है।

कोलोराडो नदी: तीव्र सूखे के दौरान ऊपरी बेसिन ने गंवाया सबसे ज्यादा भूजल
हालिया अध्ययन के अनुसार, 2020 से 2022 के भीषण सूखे के दौरान कोलोराडो नदी के ऊपरी बेसिन ने निचले बेसिन की तुलना में काफी अधिक भूजल खो दिया है। यह स्थिति तब देखी गई जब ऊपरी बेसिन में प्राकृतिक रीचार्ज की दर काफी अधिक है।
हाल ही में हुए एक नए अध्ययन में कोलोराडो नदी बेसिन के भूजल स्तर को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। वर्ष 2020 से 2022 के बीच पड़े भीषण सूखे के दौरान, ऊपरी कोलोराडो नदी बेसिन ने निचले बेसिन की तुलना में कहीं अधिक भूजल खो दिया है। यह स्थिति तब सामने आई है जब ऊपरी बेसिन में प्राकृतिक रूप से जल पुनर्भरण (रीचार्ज) की दर बहुत अधिक रहती है। इस अध्ययन ने अमेरिका के इस महत्वपूर्ण जल स्रोत पर मंडराते जल संकट की गंभीरता को रेखांकित किया है।
कोलोराडो नदी का परिचय और भौगोलिक विस्तार
उत्तरी अमेरिका की प्रमुख नदियों में से एक कोलोराडो नदी का नाम स्पेनिश भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ 'लाल रंग का' होता है। ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक गाद (सिल्ट) ले जाने के कारण इसका पानी लाल दिखाई देता था। इस नदी का उद्गम संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलोराडो राज्य में स्थित रॉकी पर्वतों से होता है। यह नदी लगभग 2,330 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए अमेरिका के सात और मेक्सिको के दो राज्यों से होकर बहती है तथा उत्तर-पश्चिमी मेक्सिको में कैलिफोर्निया की खाड़ी में गिरती है।
जीवन रेखा और प्रमुख प्राकृतिक संरचनाएं
अत्यधिक विकास और शुष्क इलाकों को जीवन प्रदान करने के कारण इसे "दक्षिण-पश्चिम की जीवन रेखा" भी कहा जाता है। लाखों वर्षों के दौरान इस नदी के कटाव से प्रसिद्ध 'ग्रैंड कैन्यन' का निर्माण हुआ है, जो यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल है। इसके अलावा, यह कैन्यनलैंड्स नेशनल पार्क और एरिज़ोना के हॉर्सशू बैंड से होकर भी बहती है। ग्रीन नदी, गनिसन, सैन जुआन और जिला नदियां इसकी प्रमुख सहायक नदियां हैं, जिनमें ग्रीन नदी सबसे लंबी सहायक नदी है।
प्रमुख बांध और मानव निर्मित जलाशय
कोलोराडो नदी पर पानी के संचयन और विद्युत उत्पादन के लिए कई विशाल बांध बनाए गए हैं। इनमें 'हूवर बांध' प्रमुख है, जो दुनिया के सबसे ऊंचे और बड़े कंक्रीट बांधों में से एक है। यह बांध 'लेक मीड' जलाशय को नियंत्रित करता है। इसके अलावा, ग्लेन कैन्यन बांध के कारण अमेरिका के सबसे बड़े जलाशयों में शामिल 'लेक पॉवेल' का निर्माण हुआ है। वहीं, पारकर बांध को दुनिया का सबसे गहरा बांध माना जाता है।

कमला जलविद्युत परियोजना: NHPC ने 3,278 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्जन की मांगी अनुमति
नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (NHPC) ने अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 1,720 मेगावाट की 'कमला जलविद्युत परियोजना' के लिए 3,278 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन हेतु केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मांगी है। यह परियोजना राज्य के विकास के साथ बाढ़ नियंत्रण और हरित ऊर्जा उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (NHPC) ने अरुणाचल प्रदेश के कामले जिले में कमला नदी पर 1,720 मेगावाट की क्षमता वाली कमला जलविद्युत परियोजना के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाया है। पूर्व में 'सुबनसिरी मध्य जलविद्युत परियोजना' के नाम से जानी जाने वाली यह परियोजना सुबनसिरी नदी की एक प्रमुख सहायक नदी, कमला नदी पर प्रस्तावित है। यह एक भंडारण-आधारित (Storage-based) जलविद्युत योजना है, जिसमें बिजली उत्पादन के साथ-साथ बाढ़ को नियंत्रित करने का घटक भी शामिल है।
परियोजना की प्रमुख तकनीकी विशेषताएं
इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत कमला नदी पर 216 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध और एक भूमिगत पावरहाउस बनाया जाएगा। पूरा होने के बाद यह परियोजना सालाना लगभग 6,869.92 मिलियन यूनिट हरित ऊर्जा का उत्पादन करेगी। बिजली उत्पादन के अलावा, इसका प्रमुख उद्देश्य असम और निचले इलाकों की ब्रह्मपुत्र घाटी में मानसून के दौरान आने वाली विनाशकारी बाढ़ के प्रभाव को कम करना और पानी के प्रवाह को संतुलित करना है।
वित्तीय ढांचा और कार्यान्वयन मॉडल
कमला जलविद्युत परियोजना का निर्माण बिल्ड-ओन-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOOT) मॉडल के आधार पर एक संयुक्त उद्यम (JV) कंपनी द्वारा किया जाएगा। इस संयुक्त उद्यम में NHPC की 74% और अरुणाचल प्रदेश सरकार की 26% हिस्सेदारी होगी। परियोजना की कुल अनुमानित लागत ₹26,069.50 करोड़ है, जिसे 70:30 के ऋण-इक्विटी अनुपात से वित्त पोषित किया जाएगा। इसमें केंद्र सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे और बाढ़ नियंत्रण के लिए बजटीय सहायता भी दी जाएगी।
राज्य और स्थानीय क्षेत्र को मिलने वाले लाभ
इस परियोजना से अरुणाचल प्रदेश को 12% बिजली मुफ्त में मिलेगी, जबकि 1% अतिरिक्त बिजली स्थानीय क्षेत्र विकास कोष (LADF) के लिए आवंटित की जाएगी। NHPC ने परियोजना के लिए 3,278 हेक्टेयर उच्च-संरक्षण मूल्य वाले वन क्षेत्र के डायवर्जन की अनुमति मांगी है। जहां यह परियोजना पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया से गुजर रही है, वहीं इसके निर्माण से स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर रोजगार, बुनियादी ढांचे का विकास और सड़कों व पुलों का निर्माण भी होगा।
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