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कोलोराडो नदी: तीव्र सूखे के दौरान ऊपरी बेसिन ने गंवाया सबसे ज्यादा भूजल

कोलोराडो नदी: तीव्र सूखे के दौरान ऊपरी बेसिन ने गंवाया सबसे ज्यादा भूजल

Delight News
📅 23 Oct2026

हालिया अध्ययन के अनुसार, 2020 से 2022 के भीषण सूखे के दौरान कोलोराडो नदी के ऊपरी बेसिन ने निचले बेसिन की तुलना में काफी अधिक भूजल खो दिया है। यह स्थिति तब देखी गई जब ऊपरी बेसिन में प्राकृतिक रीचार्ज की दर काफी अधिक है।

कोलोराडो नदी और हालिया अध्ययन के निष्कर्ष
हाल ही में हुए एक नए अध्ययन में कोलोराडो नदी बेसिन के भूजल स्तर को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। वर्ष 2020 से 2022 के बीच पड़े भीषण सूखे के दौरान, ऊपरी कोलोराडो नदी बेसिन ने निचले बेसिन की तुलना में कहीं अधिक भूजल खो दिया है। यह स्थिति तब सामने आई है जब ऊपरी बेसिन में प्राकृतिक रूप से जल पुनर्भरण (रीचार्ज) की दर बहुत अधिक रहती है। इस अध्ययन ने अमेरिका के इस महत्वपूर्ण जल स्रोत पर मंडराते जल संकट की गंभीरता को रेखांकित किया है।
कोलोराडो नदी का परिचय और भौगोलिक विस्तार
उत्तरी अमेरिका की प्रमुख नदियों में से एक कोलोराडो नदी का नाम स्पेनिश भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ 'लाल रंग का' होता है। ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक गाद (सिल्ट) ले जाने के कारण इसका पानी लाल दिखाई देता था। इस नदी का उद्गम संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलोराडो राज्य में स्थित रॉकी पर्वतों से होता है। यह नदी लगभग 2,330 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए अमेरिका के सात और मेक्सिको के दो राज्यों से होकर बहती है तथा उत्तर-पश्चिमी मेक्सिको में कैलिफोर्निया की खाड़ी में गिरती है।
जीवन रेखा और प्रमुख प्राकृतिक संरचनाएं
अत्यधिक विकास और शुष्क इलाकों को जीवन प्रदान करने के कारण इसे "दक्षिण-पश्चिम की जीवन रेखा" भी कहा जाता है। लाखों वर्षों के दौरान इस नदी के कटाव से प्रसिद्ध 'ग्रैंड कैन्यन' का निर्माण हुआ है, जो यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल है। इसके अलावा, यह कैन्यनलैंड्स नेशनल पार्क और एरिज़ोना के हॉर्सशू बैंड से होकर भी बहती है। ग्रीन नदी, गनिसन, सैन जुआन और जिला नदियां इसकी प्रमुख सहायक नदियां हैं, जिनमें ग्रीन नदी सबसे लंबी सहायक नदी है।
प्रमुख बांध और मानव निर्मित जलाशय
कोलोराडो नदी पर पानी के संचयन और विद्युत उत्पादन के लिए कई विशाल बांध बनाए गए हैं। इनमें 'हूवर बांध' प्रमुख है, जो दुनिया के सबसे ऊंचे और बड़े कंक्रीट बांधों में से एक है। यह बांध 'लेक मीड' जलाशय को नियंत्रित करता है। इसके अलावा, ग्लेन कैन्यन बांध के कारण अमेरिका के सबसे बड़े जलाशयों में शामिल 'लेक पॉवेल' का निर्माण हुआ है। वहीं, पारकर बांध को दुनिया का सबसे गहरा बांध माना जाता है।
कमला जलविद्युत परियोजना: NHPC ने 3,278 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्जन की मांगी अनुमति

कमला जलविद्युत परियोजना: NHPC ने 3,278 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्जन की मांगी अनुमति

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📅 23 Oct2026

नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (NHPC) ने अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 1,720 मेगावाट की 'कमला जलविद्युत परियोजना' के लिए 3,278 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन हेतु केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मांगी है। यह परियोजना राज्य के विकास के साथ बाढ़ नियंत्रण और हरित ऊर्जा उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

कमला जलविद्युत परियोजना का अवलोकन
नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (NHPC) ने अरुणाचल प्रदेश के कामले जिले में कमला नदी पर 1,720 मेगावाट की क्षमता वाली कमला जलविद्युत परियोजना के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाया है। पूर्व में 'सुबनसिरी मध्य जलविद्युत परियोजना' के नाम से जानी जाने वाली यह परियोजना सुबनसिरी नदी की एक प्रमुख सहायक नदी, कमला नदी पर प्रस्तावित है। यह एक भंडारण-आधारित (Storage-based) जलविद्युत योजना है, जिसमें बिजली उत्पादन के साथ-साथ बाढ़ को नियंत्रित करने का घटक भी शामिल है।
परियोजना की प्रमुख तकनीकी विशेषताएं
इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत कमला नदी पर 216 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध और एक भूमिगत पावरहाउस बनाया जाएगा। पूरा होने के बाद यह परियोजना सालाना लगभग 6,869.92 मिलियन यूनिट हरित ऊर्जा का उत्पादन करेगी। बिजली उत्पादन के अलावा, इसका प्रमुख उद्देश्य असम और निचले इलाकों की ब्रह्मपुत्र घाटी में मानसून के दौरान आने वाली विनाशकारी बाढ़ के प्रभाव को कम करना और पानी के प्रवाह को संतुलित करना है।
वित्तीय ढांचा और कार्यान्वयन मॉडल
कमला जलविद्युत परियोजना का निर्माण बिल्ड-ओन-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOOT) मॉडल के आधार पर एक संयुक्त उद्यम (JV) कंपनी द्वारा किया जाएगा। इस संयुक्त उद्यम में NHPC की 74% और अरुणाचल प्रदेश सरकार की 26% हिस्सेदारी होगी। परियोजना की कुल अनुमानित लागत ₹26,069.50 करोड़ है, जिसे 70:30 के ऋण-इक्विटी अनुपात से वित्त पोषित किया जाएगा। इसमें केंद्र सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे और बाढ़ नियंत्रण के लिए बजटीय सहायता भी दी जाएगी।
राज्य और स्थानीय क्षेत्र को मिलने वाले लाभ
इस परियोजना से अरुणाचल प्रदेश को 12% बिजली मुफ्त में मिलेगी, जबकि 1% अतिरिक्त बिजली स्थानीय क्षेत्र विकास कोष (LADF) के लिए आवंटित की जाएगी। NHPC ने परियोजना के लिए 3,278 हेक्टेयर उच्च-संरक्षण मूल्य वाले वन क्षेत्र के डायवर्जन की अनुमति मांगी है। जहां यह परियोजना पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया से गुजर रही है, वहीं इसके निर्माण से स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर रोजगार, बुनियादी ढांचे का विकास और सड़कों व पुलों का निर्माण भी होगा।
आकाश मिसाइल सिस्टम: ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को निर्यात, रक्षा क्षेत्र में भारत की बड़ी छलांग

आकाश मिसाइल सिस्टम: ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को निर्यात, रक्षा क्षेत्र में भारत की बड़ी छलांग

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📅 23 Oct2026

भारत ने स्वदेशी 'आकाश' सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली का ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को सफलतापूर्वक निर्यात किया है। रक्षा निर्यात के मामले में यह भारत के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है, जो मध्य एशिया में देश की रणनीतिक मौजूदगी और रक्षा निर्माण क्षमता को नई पहचान दिलाता है।

मध्य एशिया में भारत का बढ़ा रक्षा दबदबा
भारत के रक्षा निर्यात क्षेत्र को एक बड़ी और ऐतिहासिक सफलता मिली है। देश ने अपनी स्वदेशी सतह से हवा में मार करने वाली आकाश मिसाइल प्रणाली (Akash Missile System) को ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को निर्यात किया है। आर्मेनिया के बाद अब मध्य एशियाई देशों में आकाश मिसाइल का पहुंचना यह साबित करता है कि भारत अब केवल हथियार आयातक नहीं, बल्कि एक प्रमुख रक्षा निर्यातक देश के रूप में तेजी से उभर रहा है।
क्या है आकाश मिसाइल और इसकी खासियत
आकाश एक कम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल (SAM) प्रणाली है। इसे लड़ाकू विमानों, क्रूज मिसाइलों, ड्रोनों और हेलीकॉप्टरों जैसे हवाई खतरों से संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए डिजाइन किया गया है। इसका विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) के तहत किया गया है, जबकि इसका निर्माण हैदराबाद स्थित भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) करता है। वर्तमान में यह भारतीय वायु सेना और भारतीय सेना दोनों में तैनात है।
आकाश मिसाइल सिस्टम की प्रमुख तकनीकी क्षमताएं
तकनीकी रूप से बेहद आधुनिक आकाश मिसाइल की लंबाई 5.87 मीटर और वजन 710 किलोग्राम है। यह ठोस ईंधन और रैमजेट प्रणोदन प्रणाली से लैस है, जो इसे मैक 2.5 से 3.5 (लगभग 4,200 किमी/घंटा) की तेज रफ्तार प्रदान करती है। यह प्रणाली 4.5 किमी से 25 किमी की दूरी तक और 100 मीटर से 20 किमी तक की ऊंचाई पर उड़ रहे लक्ष्यों को सटीक निशाना बना सकती है। इसका शक्तिशाली 'राजेंद्र' लड़ाकू रडार एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर उन पर मिसाइलें दागने की क्षमता रखता है।
आकाश मिसाइल के आधुनिक वेरिएंट्स
समय और जरूरतों के अनुसार आकाश मिसाइल के कई आधुनिक वेरिएंट्स भी तैयार किए गए हैं। 'आकाश-1एस' में बेहतर लक्ष्य सटीकता के लिए रेडियो-फ्रीक्वेंसी सीकर जोड़ा गया है। वहीं 'आकाश प्राइम' को ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों और कम तापमान वाले इलाकों में बेहतर संचालन के लिए अनुकूलित किया गया है। इसके अलावा, नए दौर की 'आकाश-एनजी' (न्यू जनरेशन) मिसाइल एक्टिव एईएसए रडार और कैनिस्टर लॉन्चर के साथ आती है, जो इसकी रेंज और मारक क्षमता को कई गुना बढ़ा देती है।
28वां चार्ल्स कोरिया गोल्ड मेडल: कोच्चि के छात्र ने मुंबई में जीता प्रतिष्ठित खिताब

28वां चार्ल्स कोरिया गोल्ड मेडल: कोच्चि के छात्र ने मुंबई में जीता प्रतिष्ठित खिताब

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📅 23 Oct2026

कोच्चि के एक वास्तुकला (आर्किटेक्चर) छात्र ने मुंबई में आयोजित समारोह में प्रतिष्ठित 28वां चार्ल्स कोरिया गोल्ड मेडल जीता है। यह पुरस्कार छात्र के अंडरग्रेजुएट थीसिस प्रोजेक्ट 'एनर्जी कॉमन्स' के लिए दिया गया। चार्ल्स कोरिया फाउंडेशन द्वारा प्रशासित यह वार्षिक पुरस्कार देश भर के युवा आर्किटेक्ट्स की प्रतिभा को सम्मानित करता है।

कोच्चि के छात्र को मिला 28वां चार्ल्स कोरिया गोल्ड मेडल
वास्तुकला के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए कोच्चि के एक आर्किटेक्चर छात्र ने मुंबई में 28वां चार्ल्स कोरिया गोल्ड मेडल अपने नाम किया है। यह सम्मान छात्र को उनके स्नातक स्तर के थीसिस प्रोजेक्ट 'एनर्जी कॉमन्स: रीइमेजिनिंग एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर एज ए प्लेस फॉर सिविक एंगेजमेंट' के लिए दिया गया। इस पुरस्कार का संचालन चार्ल्स कोरिया फाउंडेशन (CCF) द्वारा किया जाता है। वर्ष 2025 से 2027 के लिए इस पदक का विशेष ध्यान 'डिजाइन के माध्यम से समता' (Equitability through Design) विषय पर केंद्रित है।
क्या है चार्ल्स कोरिया गोल्ड मेडल और पात्रता मापदंड
इस वार्षिक पुरस्कार की शुरुआत भारत के प्रसिद्ध आर्किटेक्ट और शहरी नियोजक चार्ल्स कोरिया द्वारा वर्ष 1998 में की गई थी। इसका उद्देश्य कौंसिल ऑफ आर्किटेक्चर (COA) से मान्यता प्राप्त भारतीय कॉलेजों के अंतिम वर्ष के छात्रों द्वारा किए गए उत्कृष्ट थीसिस कार्यों को पहचानना है। इसमें प्रतिभागी कॉलेज किसी एक छात्र के व्यक्तिगत प्रोजेक्ट को नामांकित करते हैं और समूह कार्य इसमें मान्य नहीं होता। शुरुआत में यह पुरस्कार केवल मुंबई और गोवा के कॉलेजों के लिए था, लेकिन 2022 से इसे पूरे भारत के वास्तुकला संस्थानों के लिए खोल दिया गया है।
कौन थे प्रसिद्ध आर्किटेक्ट चार्ल्स कोरिया
चार्ल्स कोरिया स्वतंत्र भारत में आधुनिक वास्तुकला के जनक माने जाने वाले महान आर्किटेक्ट और अर्बन प्लानर थे। 1930 में सिकंदराबाद में जन्मे कोरिया ने यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन और एमआईटी से शिक्षा प्राप्त की थी। वे शहरी गरीबों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक तरीकों और 'ओपन-टू-स्काई' अवधारणा के प्रयोग के लिए जाने जाते थे। साबरमती आश्रम का महात्मा गांधी मेमोरियल, नई दिल्ली का नेशनल क्राफ्ट्स म्यूजियम, भोपाल का भारत भवन, जयपुर का जवाहर कला केंद्र और नवी मुंबई का मास्टर प्लान उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं।
जीवन की प्रमुख उपलब्धियां और सम्मान
चार्ल्स कोरिया को उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा 1972 में पद्म श्री और 2006 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा 1984 में उन्हें रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स (RIBA) द्वारा रॉयल गोल्ड मेडल दिया गया। वर्ष 2013 में RIBA ने उन्हें "भारत का सबसे महान आर्किटेक्ट" करार दिया था। उन्होंने मुंबई में अर्बन डिजाइन रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की और राष्ट्रीय शहरीकरण आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी सेवाएं दीं।
दिल्ली की हवा पर CREA की रिपोर्ट: GRAP के 4 साल बाद भी स्थिति जस की तस

दिल्ली की हवा पर CREA की रिपोर्ट: GRAP के 4 साल बाद भी स्थिति जस की तस

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📅 23 Oct2026

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के नए विश्लेषण से पता चला है कि 2022 में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) के संशोधन के चार साल बाद भी दिल्ली की शीतकालीन वायु गुणवत्ता में कोई लगातार सुधार नहीं देखा गया है। स्वच्छ ऊर्जा और प्रदूषण पर शोध करने वाली इस संस्था ने इस पर चिंता जताई है।

दिल्ली की वायु गुणवत्ता पर CREA का बड़ा खुलासा
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के एक ताज़ा विश्लेषण में दिल्ली के प्रदूषण को लेकर चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2022 में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) में किए गए संशोधनों के चार साल बाद भी दिल्ली की सर्दियों की वायु गुणवत्ता में कोई ठोस या निरंतर सुधार देखने को नहीं मिला है। हर साल ठंड के मौसम में राजधानी को घेरने वाला स्मॉग और प्रदूषण का स्तर नीतिगत सुधारों के बावजूद गंभीर चुनौती बना हुआ है।
क्या है सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA)
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर एक स्वतंत्र और गैर-लाभकारी अनुसंधान संगठन है। फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में स्थित यह संस्थान मुख्य रूप से वायु प्रदूषण के रुझानों, कारणों, स्वास्थ्य पर इसके प्रभावों और स्वच्छ ऊर्जा समाधानों पर ध्यान केंद्रित करता है। CREA दुनिया भर की सरकारों, कंपनियों और अभियानों को स्वच्छ हवा और ऊर्जा परिवर्तन की दिशा में वैज्ञानिक डेटा, शोध और साक्ष्यों के आधार पर सहायता प्रदान करता है।
CREA के कार्य और अनुसंधान का दायरा
यह गैर-सरकारी संगठन स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले प्रदूषकों के स्रोतों और प्रवृत्तियों की गहराई से जांच करता है। विशेष रूप से जीवाश्म ईंधन के दहन से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण पर इसका ध्यान रहता है, जो हर साल लाखों असमय मौतों का कारण बनता है। इसके अलावा, CREA नियमित रूप से कोयला चरणबद्ध समाप्ति, औद्योगिक उत्सर्जन और ऊर्जा उत्पादन के पर्यावरणीय प्रभावों पर शोध पत्र जारी करता है। यह संस्था संघर्षों के दौरान जीवाश्म ईंधन आयात के वित्तपोषण जैसे भू-राजनीतिक मुद्दों पर भी व्यापक शोध करती है।

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