
एग्रीवोल्टिक्स: भारत की 10% उपयुक्त कृषि भूमि मिटा सकती है 2050 की बिजली मांग
भारत में उपयुक्त कृषि भूमि के मात्र 10% हिस्से पर एग्रीवोल्टिक्स तकनीक लागू करने से वर्ष 2050 तक देश की अनुमानित बिजली आवश्यकता को पूरा किया जा सकता है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने एक ही भूमि पर खेती और सौर ऊर्जा उत्पादन को मिलाकर 'एक भूमि, दो फसल' के इस मॉडल को बढ़ावा देने पर बल दिया है।
क्या है एग्रीवोल्टिक्स तकनीक
एग्रीवोल्टिक्स—जिसे एग्री-पीवी (AgriPV) या 'ड्यूअल-यूज़ सोलर' भी कहा जाता है—एक ही भूमि पर एक साथ फसल उगाने और सौर पैनलों के माध्यम से बिजली पैदा करने की अनूठी तकनीक है। 1980 के दशक से विकसित हुई यह अवधारणा अब वैश्विक स्तर पर तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इसमें फसलों के ऊपर ऊंचे पैनल (Elevated), फसलों की पंक्तियों के बीच खड़े पैनल (Row-based), लंबवत (Vertical) तथा ग्रीनहाउस के साथ एकीकृत पैनल जैसी कई प्रकार की प्रणालियां उपयोग की जाती हैं।
पानी की बचत और बेहतर फसल उत्पादन
एग्रीवोल्टिक्स से खेतों में एक अनूठा 'माइक्रो-एनवायरनमेंट' तैयार होता है। सौर पैनलों की आंशिक छाया से भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम हो जाता है, जिससे मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और सिंचाई में 30% तक पानी की बचत होती है। भीषण गर्मी के दिनों में तापमान नियंत्रित रहने से छाया-पसंद फसलों का तनाव कम होता है, जिससे पैदावार में भी सुधार देखा गया है।
भारत में एग्रीवोल्टिक्स की स्थिति और संभावनाएं
वर्तमान में भारत में एग्रीवोल्टिक्स अभी शुरुआती और पायलट स्तर पर है, जहां देशभर में लगभग 50 से अधिक संयंत्रों पर शोध और प्रयोग जारी हैं। MNRE का अनुमान है कि भारत की कुल कृषि भूमि के केवल 1% हिस्से पर सोलर पैनल लगाकर 630 GWp की अतिरिक्त सौर ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है। यह मॉडल न केवल देश को हरित ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करेगा, बल्कि किसानों को आय का एक अतिरिक्त और टिकाऊ जरिया देकर उनकी आर्थिक स्थिति को भी मजबूत बनाएगा।

विझिंजम में खुला पहला ओपन-सी मसल लांगलाइन फार्मिंग यूनिट
आईसीएआर-केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (CMFRI) की विझिंजम इकाई ने अपना पहला पूर्ण विकसित ओपन-सी मसल लांगलाइन फार्मिंग यूनिट शुरू किया है। यह पहल भारत में समुद्री मत्स्य पालन और समुद्री संसाधनों के सतत विकास को नई गति देगी।
क्या है मसल और इसकी मुख्य विशेषताएं
मसल (Mussel) द्विकपाटी (bivalve) मोलस्क की श्रेणी में आते हैं, जो समुद्री वातावरण में माइटिलिडे (Mytilidae) परिवार और मीठे पानी में यूनियोनिडे (Unionidae) परिवार से संबंधित होते हैं। आकार में 5 से 15 सेंटीमीटर तक लंबे ये जीव मुख्य रूप से ठंडे समुद्रों, नदियों, झीलों और तालाबों में पाए जाते हैं। इनका बाहरी खोल आमतौर पर गहरे नीले या गहरे हरे-भूरे रंग का होता है, जबकि अंदर से यह चमकदार मोती जैसा दिखता है। ये जीव 'बायसस थ्रेड्स' (byssus threads) नामक विशेष प्रोटीन धागों के जरिए चट्टानों या अन्य वस्तुओं से मजबूती से चिपके रहते हैं।
पोषण और आर्थिक महत्व
समुद्री खाद्य सुरक्षा और जलीय कृषि की दृष्टि से मसल का अत्यधिक महत्व है। यह उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन और आवश्यक खनिजों से समृद्ध एक पौष्टिक भोजन का स्रोत है। इसके अतिरिक्त, मीठे पानी की मसल प्रजातियों का बड़े पैमाने पर मोती (Pearl) संवर्धन के लिए भी उपयोग किया जाता है। खुले समुद्र में इसकी वैज्ञानिक खेती से तटीय समुदायों की आय बढ़ाने और मत्स्य क्षेत्र को नई दिशा देने में मदद मिलेगी।
पर्यावरण के प्रहरी और समुद्री स्वास्थ्य के संकेतक
मसल केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी (Ecology) के दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये फिल्टर-फीडिंग जीव (filter-feeding organisms) हैं, जो पानी को छानकर अपना भोजन प्राप्त करते हैं और इस प्रक्रिया में सूक्ष्म प्लास्टिक (microplastics) सहित कई तरह के अदृश्य प्रदूषकों को अपने ऊतकों में सोख लेते हैं। इसी क्षमता के कारण दुनिया भर में वैज्ञानिकों द्वारा दशकों से समुद्री प्रदूषण के स्तर को मापने के लिए मसल को एक प्राकृतिक बैरोमीटर के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

कुशियारा नदी के तट पर भारत-बांग्लादेश सीमा पर दिखा अनूठा नजारा
भारत और बांग्लादेश को अलग करने वाली कुशियारा नदी के तट पर विजयदशमी के अवसर पर दोनों देशों के हजारों श्रद्धालु दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के लिए एकत्र हुए। बराक नदी की यह शाखा दोनों देशों के बीच transboundary जल और सांस्कृतिक संबंधों का एक प्रमुख प्रतीक है, जिस पर 2022 में ऐतिहासिक जल-बंटवारा समझौता भी हुआ था।
बराक नदी से उद्गम और भौगोलिक सफर
कुशियारा नदी भारत और बांग्लादेश के बीच एक महत्वपूर्ण transboundary नदी है, जो मुख्य रूप से बराक नदी की एक वितरिका (distributary) है। यह भारत-बांग्लादेश सीमा पर अमलाशीद द्विभाजन बिंदु (Amlshid bifurcation point) से निकलती है। पश्चिम की ओर बहते हुए यह नदी भारत के असम और बांग्लादेश के सिलहट जिले के बीच प्राकृतिक सीमा बनाती है। अपने सफर के दौरान यह जाकीगंज, सिलहट और करीमगंज जैसे प्रमुख कस्बों से गुजरती है और अंत में मेघना नदी में मिल जाती है। लगभग 160 किलोमीटर लंबी इस नदी में जूरी, मनु और इताखोला जैसी कई महत्वपूर्ण नदियां आकर मिलती हैं।
ऐतिहासिक जल-बंटवारा समझौता और इसका महत्व
सांस्कृतिक जुड़ाव के साथ-साथ यह नदी कूटनीतिक और आर्थिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है। 6 सितंबर 2022 को भारत और बांग्लादेश ने कुशियारा नदी जल समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। 1996 की गंगा जल संधि के बाद दोनों देशों के बीच यह अपनी तरह का पहला जल-बंटवारा समझौता है, जो द्विपक्षीय संबंधों में एक मील का पत्थर साबित हुआ है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य असम और सिलहट दोनों क्षेत्रों में मौसमी जल संकट और बाढ़ की समस्या से निपटना है।
कृषि और सिंचाई के लिए संजीवनी
इस संधि के तहत बांग्लादेश को कुशियारा नदी से लगभग 2500 क्यूसेक पानी में से 153 क्यूसेक पानी निकालने की अनुमति दी गई है। यह पानी सिलहट के रहीमपुर नहर परियोजना के माध्यम से प्रवाहित किया जाता है, जिससे वहां की शुष्क मौसम की धान (बोरों) की खेती के लिए पर्याप्त सिंचाई मिल पाती है। सबसे खास बात यह है कि तीस्ता नदी विवाद के विपरीत, इस समझौते के लिए असम राज्य स्तर की मंजूरी की आवश्यकता नहीं पड़ी, जिससे दोनों देशों के बीच सहयोग का मार्ग और अधिक सुगम हो गया।

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की बड़ी छलांग: सेना को मिलेगा स्वदेशी LLLR-I राडार
रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के लिए नेक्स्ट-जनरेशन लो लेवल लाइट वेट राडार (LLLR-I) की खरीद हेतु भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के साथ ₹770 करोड़ का समझौता किया है। एईएसए और जीएएन तकनीक से लैस यह अत्याधुनिक राडार दुश्मनों के लड़ाकू विमानों से लेकर छोटे ड्रोन तक को सटीक रूप से ट्रैक करने में सक्षम है।
बहु-स्तरीय खतरों से निपटने में सक्षम
LLLR-I एक अगली पीढ़ी का मल्टी-मिशन राडार है, जिसे विशेष रूप से कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हवाई लक्ष्यों का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह राडार न केवल पारंपरिक लड़ाकू विमानों को पहचान सकता है, बल्कि आधुनिक युद्धक्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती यानी मिनी और माइक्रो ड्रोन जैसे कम राडार क्रॉस-सेक्शन (low-RCS) वाले लक्ष्यों को भी सटीक रूप से पकड़ने में सक्षम है।
अत्याधुनिक तकनीक और 360-डिग्री कवरेज
यह राडार 'एक्टिव इलेक्ट्रॉनिक्स स्कैन्ड एरे' (AESA) तकनीक, गैलियम नाइट्राइड (GaN) एम्पलीफायरों और डिजिटल बीमफॉर्मिंग पर आधारित है। इसमें चार स्थिर पैसिवली-कूल्ड एंटीना पैनल लगे हैं जो बिना किसी मैकेनिकल मूवमेंट या लिक्विड कूलिंग के 360-डिग्री हवाई निगरानी प्रदान करते हैं। इसके अलावा, इसकी 3D प्रोसेसिंग क्षमता अवांछित राडार तरंगों के प्रभाव को कम करती है, जिससे दुर्गम परिस्थितियों में भी स्पष्ट और सटीक जानकारी मिलती है।
हर मौसम और हर इलाके में कारगर
LLLR-I की सबसे बड़ी खासियत इसका हल्का और लचीला डिज़ाइन है। इसे मैदानी इलाकों, रेगिस्तान और अत्यधिक ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में आसानी से तैनात किया जा सकता है। इसमें ट्रैकिंग के दौरान ही लगातार स्कैनिंग (Track While Scan) करने और खतरों की प्राथमिकता तय करने की अद्भुत क्षमता है। यह वायरलेस या वायर्ड संचार माध्यमों के जरिए सीधा डेटा हथियार प्रणालियों तक भेज सकता है, जिससे त्वरित कार्रवाई संभव हो पाती है।

ईमुद्रा सुरक्षा उल्लंघन: MeitY ने शुरू की प्राइवेट की लीक की विशेष जांच
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने बेंगलुरु की डिजिटल ट्रस्ट कंपनी 'ईमुद्रा' (eMudhra) के वेब सुरक्षा प्रमाणपत्रों से जुड़ी प्राइवेट की (Private Keys) लीक होने की घटना की जांच के लिए एक विशेष टीम का गठन किया है। सरकारी संस्था CERT-In ने सुरक्षा उपाय जारी कर घरेलू वेबसाइटों पर सीमित असर की पुष्टि की है।
कैसे सामने आया प्राइवेट की लीक का मामला
यह सुरक्षा मामला तब उजागर हुआ जब एक स्वतंत्र शोधकर्ता ने गूगल (Google) और मोज़िला (Mozilla) जैसी टेक दिग्गज कंपनियों को ईमुद्रा के ग्लोबल पब्लिक की इंफ्रास्ट्रक्चर (PKI) के तहत जारी 8 इंटरमीडिएट डिजिटल प्रमाणपत्रों की प्राइवेट की में खामी की सूचना दी। गूगल और मोज़िला ने तत्काल कदम उठाते हुए प्रभावित प्रमाणपत्रों को ब्लॉक कर दिया। ईमुद्रा ने बाद में बयान जारी कर इन 8 इंटरमीडिएट प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया और स्पष्ट किया कि उनके मूल इन्फ्रास्ट्रक्चर में कोई सेंध नहीं लगी है तथा घरेलू स्तर पर इसका प्रभाव काफी सीमित रहा है।
डिजिटल लेनदेन में वेब सुरक्षा प्रमाणपत्रों की भूमिका
वेब सुरक्षा प्रमाणपत्र इंटरनेट पर किसी भी वेबसाइट के पहचान पत्र की तरह कार्य करते हैं। जब कोई यूजर किसी बैंकिंग या ई-कॉमर्स वेबसाइट पर जाता है, तो ब्राउज़र उस वेबसाइट के डिजिटल सर्टिफिकेट की जांच करके यह तय करता है कि कनेक्शन असली वेबसाइट से है या किसी धोखाधड़ी वाले पेज से। यह सुरक्षा प्रक्रिया HTTPS और TLS टेक्नोलॉजी के आधार पर चलती है। इसमें पब्लिक की (Public Key) और सीक्रेट प्राइवेट की (Private Key) का संयोजन डेटा को एन्क्रिप्ट (Encrypt) करता है, जिससे पासवर्ड और क्रेडिट कार्ड डिटेल्स सुरक्षित रहती हैं।
क्या है ईमुद्रा लिमिटेड और इसका कामकाज
ईमुद्रा भारत की एक प्रमुख सर्टिफाइंग अथॉरिटी (CA) है, जो व्यक्तियों और कंपनियों को डिजिटल सर्टिफिकेट और ई-साइन सेवाएं प्रदान करती है। यह कंपनी कंट्रोलर ऑफ सर्टिफाइंग अथॉरिटीज (CCA) द्वारा लाइसेंस प्राप्त है। इसके अलावा ईमुद्रा आधार (Aadhaar) आधारित इलेक्ट्रॉनिक नो-योर-कस्टमर (e-KYC) सेवाएं भी प्रदान करती है।
CERT-In की एडवाइजरी और सुरक्षा के उपाय
मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम (CERT-In) ने इस घटना को लेकर एक विस्तृत सुरक्षा एडवाइजरी जारी की है। MeitY के अनुसार भारतीय वेबसाइटों और मोबाइल ऐप्स पर इसका असर बहुत ही कम समय के लिए और सीमित था। CERT-In और MeitY ने नागरिकों को सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों से बचने और केवल आधिकारिक सुरक्षा अपडेट्स पर विश्वास करने की सलाह दी है।
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