
एमूर फाल्कन की अद्भुत वापसी: 23 देशों का सफर तय कर मणिपुर लौटे पक्षी
दो सैटेलाइट-टैग किए गए एमूर फाल्कन (Amur Falcons) एशिया और अफ्रीका के 23 देशों का चक्कर लगाने के बाद वापस मणिपुर लौट आए हैं। वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा ट्रैक किए गए इन प्रवासी पक्षियों की यह वापसी वैश्विक माइग्रेशन और वन्यजीव संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण है।
अनोखा वैश्विक सफर और प्रवासी मार्ग
इन प्रवासी फाल्कन ने अपने इस वार्षिक चक्र के दौरान एशिया और अफ्रीका महाद्वीप के कुल 23 देशों की सीमाओं को पार किया। चीन के प्रजनन स्थलों से उड़ान भरकर ये पक्षी करीब एक साल की लंबी यात्रा और महासागरों को पार करने के बाद अपने प्रमुख ठहराव स्थल यानी पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर पहुंचे हैं। इनकी यह यात्रा यह साबित करती है कि ये पक्षी कितने सक्षम और सहनशील होते हैं।
एमूर फाल्कन की पहचान और विशेषताएं
एमूर फाल्कन फाल्कन परिवार का एक छोटा और बेहद फुर्तीला शिकारी पक्षी (रैप्टर) है। इनके नर और मादा में स्पष्ट रूप से अंतर होता है। नर पक्षी गहरे स्लेटी रंग के होते हैं, जिनके पंखों के नीचे सफेद धारियां होती हैं, जबकि मादा के सीने पर काले धब्बे और विशिष्ट पैटर्न होते हैं। इनकी सबसे बड़ी पहचान इनकी आंखों के चारों ओर का नारंगी घेरा, चोंच का आधार और पैर होते हैं। ये मुख्य रूप से कीट-भक्षी होते हैं और अपनी लंबी उड़ान के दौरान टिड्डियों व अन्य कीटों को अपना आहार बनाते हैं।
संरक्षण और पूर्वोत्तर भारत का महत्व
पूर्वोत्तर भारत के राज्य जैसे नागालैंड और मणिपुर इन प्रवासी पक्षियों के लिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण स्टॉपओवर (ठहराव) स्थलों में गिने जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'आईयूसीएन रेड लिस्ट' में इसे 'लीस्ट कंसर्न' (Least Concern) श्रेणी में रखा गया है, लेकिन अतीत में बड़े पैमाने पर इनका शिकार एक बड़ी चुनौती रहा है। स्थानीय समुदायों, वन विभाग और जन-जागरूकता अभियानों के कारण अब इन पक्षियों को सुरक्षित संरक्षण मिल रहा है, जिससे पूर्वोत्तर क्षेत्र वैश्विक स्तर पर 'फाल्कन कैपिटल' के रूप में अपनी पहचान बना चुका है।

Indo-Pacific Regional Dialogue 2026: नई दिल्ली में जुटेगा दुनिया का पहला पंक्ति का दिमाग
भारतीय नौसेना 3 से 5 नवंबर तक नई दिल्ली में 'इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग (IPRD) 2026' का आयोजन करने जा रही है। इस आठवें संस्करण में 18 देशों के विशेषज्ञ, वैज्ञानिक और नीति निर्माता शिरकत करेंगे। इस बार का मुख्य फोकस विज्ञान, तकनीक और सामाजिक-अकादमिक सहयोग पर केंद्रित रहेगा।
भारत की समुद्री दृष्टि और आठवां संस्करण
वर्ष 2018 में पहली बार शुरू किया गया IPRD, भारतीय नौसेना का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक मंच बन चुका है। यह आयोजन भारत के महत्वाकांक्षी विजन 'महासागर' (MAHASAGAR - क्षेत्र में सुरक्षा और विकास के लिए आपसी और समग्र प्रगति) को मजबूती प्रदान करता है। साथ ही, यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2019 में बैंकॉक में ईस्ट एशिया समिट के दौरान प्रस्तावित 'इंडो-पैसिफिक ओशन्स इनिशिएटिव (IPOI)' के उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप देने का काम भी करता है।
इस बार क्या होगा खास
IPRD 2026 का मुख्य विषय 'इंडो-पैसिफिक में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अकादमिक सहयोग' रखा गया है। इस वर्ष के सम्मेलन की सबसे बड़ी खासियत इसका बहुविषयक दृष्टिकोण है। पारंपरिक विज्ञान और तकनीक (STEM) के अलावा, इस बार सामाजिक विज्ञान, जीव विज्ञान और मानविकी (Humanities) जैसे विषयों को भी समुद्री चर्चाओं में शामिल किया जा रहा है।
तीन दिवसीय इस सम्मेलन में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के 18 देशों के समुद्री विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और नीति निर्माता एक साथ मंच साझा करेंगे। आयोजन का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय, उप-क्षेत्रीय और क्षेत्रीय स्तरों पर समाधान-आधारित ठोस कदम उठाना है।
पांच प्रमुख विषयों पर केंद्रित मंथन
सम्मेलन के दौरान पांच विशेष थीम आधारित सत्र आयोजित किए जाएंगे:
संयुक्त अनुसंधान, रिसर्च नेटवर्क और मानव संसाधन विकास।
महत्वपूर्ण समुद्री बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और उन्नत निगरानी प्रणाली।
जलवायु लचीलापन और महासागरीय गतिकी।
समुद्री लचीलापन और जिम्मेदार महासागरीय प्रबंधन।
द्वि-उपयोगी (Dual-Use) समुद्री प्रौद्योगिकियां और उनके प्रभाव।
IPRD 2026 का यह मंच हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और साझा समृद्धि के नए रास्ते खोलने में मील का पत्थर साबित होगा।

मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: श्री रंगनाथस्वामी मंदिर की जमीन बिक्री पर रोक
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने त्रिची स्थित ऐतिहासिक श्री रंगनाथस्वामी मंदिर से जुड़ी संपत्तियों के पंजीकरण पर रोक लगा दी है। यह आदेश 1887 के एक दस्तावेज़ के तहत मंदिर को समर्पित जमीनों की सुरक्षा के लिए जारी किया गया है। यह मंदिर भारत का सबसे बड़ा क्रियाशील हिंदू मंदिर है।
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने श्रीरंगम स्थित प्रसिद्ध श्री रंगनाथस्वामी मंदिर के हक में एक बेहद महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी किया है। अदालत ने पंजीकरण अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे 1887 के एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ (Deed) के तहत मंदिर को समर्पित की गई जमीनों से जुड़े किसी भी दस्तावेज़ का पंजीकरण न करें। इस फैसले से मंदिर की कीमती संपत्तियों को अवैध बिक्री और अतिक्रमण से बचाने में बड़ी मदद मिलेगी।
दो नदियों के बीच बसा भारत का सबसे बड़ा मंदिर
तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली (त्रिची) के पास स्थित श्रीरंगम में बना श्री रंगनाथस्वामी मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र है, बल्कि यह भारत का सबसे बड़ा क्रियाशील हिंदू मंदिर परिसर भी है। लगभग 156 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला यह मंदिर कावेरी और कोलेरून नदियों द्वारा निर्मित एक द्वीप पर स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के शेषनाग पर विराजमान स्वरूप 'रंगनाथ' को समर्पित है और उनके आठ स्वयं-व्यक्त (स्वयंभू) क्षेत्रों में सबसे प्रमुख माना जाता है।
द्रविड़ स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना
वास्तुकला की दृष्टि से यह मंदिर द्रविड़ शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। संपूर्ण मंदिर परिसर सात संकेंद्री दीवारों (प्राकारम) से घिरा हुआ है, जो वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान के सात ग्रहीय प्रणालियों का प्रतीक हैं। इन दीवारों के भीतर 21 विशाल प्रवेश द्वार यानी गोपुरम बने हैं। मंदिर का मुख्य द्वार 'राजगोपुरम' 236 फीट ऊंचा है, जिसे एशिया का सबसे ऊंचा मंदिर टॉवर माना जाता है। इसके अलावा, मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बना विमानम पूरी तरह से सोने से मढ़ा गया है।
समृद्ध इतिहास और ऐतिहासिक राजवंशों का योगदान
यद्यपि इस मंदिर का अस्तित्व ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से माना जाता है, लेकिन इसके पुरातात्विक शिलालेख 10वीं शताब्दी से उपलब्ध हैं। मंदिर के परिसर में बने 1000 स्तंभों वाले विशाल हॉल का निर्माण विजयनगर साम्राज्य (1336-1565) के दौरान हुआ था। इतिहास के विभिन्न कालखंडों में चोल, चेर, पांड्य, होयसल और मदुरै के नायक राजाओं ने इसके विस्तार में योगदान दिया। इसके साथ ही, रामानुजाचार्य जैसे महान वैष्णव संतों ने यहां की पूजा पद्धतियों और परंपराओं को समृद्ध करने में निर्णायक भूमिका निभाई है।

बर्फीली चोटियों के रक्षक: ITBP के स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री ने दी बधाई
भारत-चीन सीमा की सुरक्षा में तैनात भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री ने बल के जवानों को शुभकामनाएं दी हैं। 1962 के युद्ध के बाद गठित यह केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल बेहद दुर्गम इलाकों और माइनस तापमान में देश की सीमाओं की रक्षा करता है।
देश की सीमाओं की सुरक्षा और कठिन परिस्थितियों में सेवा देने वाले भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री ने जवानों और उनके परिवारों को बधाई दी है। हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में तैनात यह बल भारतीय सीमाओं की अग्रिम पंक्ति का प्रहरी है। 'शौर्य-दृढ़ता-कर्म निष्ठा' के ध्येय वाक्य के साथ यह बल देश की संप्रभुता की रक्षा में हमेशा डटा रहता है।
1962 के युद्ध के बाद हुआ था गठन
ITBP का इतिहास भारत-चीन युद्ध से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से लगी सीमाओं की सुरक्षा के लिए इस बल की स्थापना की गई थी। शुरुआत में इसे CRPF अधिनियम के तहत गठित किया गया था, लेकिन वर्ष 1992 में संसद ने अलग से ITBPF अधिनियम पारित किया। इसके बाद 2004 में इसे गृह मंत्रालय के तहत एक पूर्ण केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के रूप में घोषित किया गया।
कारकोरम से जाचेप ला तक विशाल पहरा
ITBP का मुख्य काम भारत-चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा की रक्षा करना है। यह सीमा लद्दाख के कारकोरम दर्रे से लेकर अरुणाचल प्रदेश के जाचेप ला तक फैली हुई है। इसके बॉर्डर आउटपोस्ट 9,000 फीट से लेकर 18,800 फीट तक की ऊंचाई पर स्थित हैं, जहां सर्दियों में तापमान माइनस 45 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। इतने कठिन वातावरण में भी जवान मुस्तैदी से अपनी सेवाएं देते हैं।
पर्वतारोहण और आपदा राहत में विशेषज्ञता
दुनिया के सबसे विशिष्ट पर्वतीय बलों में से एक माना जाने वाला ITBP अपने जवानों को विशेष प्रशिक्षण देता है। बल के कर्मियों को पर्वतारोहण, स्कीइंग और रणनीतिक युद्ध तकनीकों में निपुण बनाया जाता है। सीमा सुरक्षा के अलावा, यह बल हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं के दौरान त्वरित प्रतिक्रिया दल के रूप में काम करता है और खोज व बचाव अभियानों में अहम भूमिका निभाता है।

दिमाग का नीला कोना: वैज्ञानिकों ने सुलझाया न्यूरोलॉजी का नया रहस्य
मस्तिष्क के लोसस कोएरुलेअस (LC) को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। नई शोध से पता चला है कि यह केंद्र पूरे दिमाग में एक जैसा सिग्नल नहीं भेजता, बल्कि अलग-अलग हिस्सों के लिए विशेष और लक्षित संदेश तैयार करता है। यह खोज अल्जाइमर, डिप्रेशन और एडीएचडी जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज की दिशा बदल सकती है।
हमारे शरीर का हर अंग अपनी तरह से अद्भुत है, लेकिन मस्तिष्क की जटिलता हमेशा से वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली रही है। हाल ही में चूहों पर किए गए एक नए शोध ने न्यूरोलॉजी की दुनिया में हलचल मचा दी है। बात हो रही है 'लोसस कोएरुलेअस' (LC) की, जो ब्रेनस्टेम के पोंस हिस्से में स्थित नसों का एक छोटा सा समूह है। लैटिन भाषा में इसका शाब्दिक अर्थ 'नीला स्थान' होता है। कम मात्रा में होने के बावजूद यह न्यूरॉन्स का क्लस्टर हमारे शरीर के लिए बेहद अहम है।
लाउडस्पीकर नहीं, लक्षित संवाद प्रणाली
अब तक वैज्ञानिक यह मानते थे कि लोसस कोएरुलेअस एक लाउडस्पीकर की तरह काम करता है, जो पूरे मस्तिष्क में एक जैसा रासायनिक सिग्नल यानी नॉरपेनेफ्राइन (NE) प्रसारित करता है। यह केमिकल ध्यान, सीखने की क्षमता, हृदय गति और तनाव जैसी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है। लेकिन आधुनिक ब्रेन इमेजिंग और आनुवंशिक तकनीकों ने इस पुरानी थ्योरी को पूरी तरह पलट दिया है। नई स्टडी बताती है कि यह केंद्र कोई सामान्य संदेश प्रसारित नहीं करता, बल्कि इसके अलग-अलग न्यूरॉन्स अलग-अलग अनुभवों के आधार पर चुनिंदा गंतव्यों तक संदेश पहुंचाते हैं।
किस तरह बंटा है कार्यक्षेत्र
इस संगठित नेटवर्क के तहत, लोसस कोएरुलेअस के ऊपरी यानी डोर्सल हिस्से के न्यूरॉन्स सीधे सेरेब्रल कॉर्टेक्स और फोरब्रेन से जुड़ते हैं। वहीं, निचले यानी वेंट्रल हिस्से की कोशिकाएं अपने सिग्नल मुख्य रूप से ब्रेनस्टेम और स्पाइनल कॉर्ड तक भेजती हैं। यह शानदार विभाजन मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों को स्वतंत्र रूप से प्रभावित करने की शक्ति देता है, जिससे शरीर की प्रतिक्रियाएं और अधिक सटीक हो जाती हैं।
मानसिक विकारों के इलाज में नई उम्मीद
यह ताज़ा खोज चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में गेम-चेंजर साबित हो सकती है। चूंकि नॉरपेनेफ्राइन मूड और अटेंशन को कंट्रोल करने में केंद्रीय भूमिका निभाता है, इसलिए यह डिप्रेशन, एंग्जायटी और एडीएचडी की दवाओं का मुख्य लक्ष्य रहा है। इसके अलावा, अल्जाइमर रोग में सबसे पहले नष्ट होने वाली कोशिकाओं में लोसस कोएरुलेअस के न्यूरॉन्स भी शामिल हैं। वर्तमान दवाएं अक्सर एक साथ कई सर्किट को प्रभावित करती हैं, जिससे एक जगह फायदा तो दूसरी जगह साइड इफेक्ट होने लगते हैं। इस नए और स्पष्ट मैप के मिलने से वैज्ञानिक अब ऐसी लक्षित दवाएं विकसित कर सकेंगे जो केवल चुनिंदा सर्किट पर असर डालें।
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