
चेन्नई में पहली बार देखा गया यूरोपीय बी-ईटर, पक्षी प्रेमियों में उत्साह
दक्षिण भारत के चेन्नई शहर में पहली बार बेहद खूबसूरत और रंग-बिरंगे यूरोपीय बी-ईटर (European Bee-eater) पक्षी को देखा गया है। इस दुर्लभ और पहली बार दर्ज की गई रिकॉर्डिंग से स्थानीय पक्षी प्रेमियों और शोधकर्ताओं के बीच भारी उत्साह का माहौल है।
सुनहरे रंग और अनूठी पहचान वाले पक्षी
यूरोपीय बी-ईटर, मेरोपिडे (Meropidae) परिवार से ताल्लुक रखने वाला एक नियर-पैसरीन पक्षी है। अपनी बेहद खूबसूरत और चमकीली रंग-बिरंगी बनावट के कारण इन्हें 'गोल्डन बी-ईटर' (Golden Bee-eaters) के रूप में भी जाना जाता है। इनकी शारीरिक बनावट की सबसे बड़ी खासियत इनकी गहरी, मोटी और हल्की नीचे की ओर मुड़ी हुई चोंच होती है, जो इन्हें शिकार करने में मदद करती है।
आवास, खान-पान और व्यवहार संबंधी विशेषताएँ
ये पक्षी आमतौर पर मीठे पानी के स्रोतों के आसपास रहना पसंद करते हैं। इसके अलावा ये जंगलों, सवाना, झाड़ियों, घास के मैदानों और कृषि क्षेत्रों जैसे विभिन्न प्रकार के आवासों में आसानी से पाए जाते हैं। अपने नाम के अनुरूप, ये मांसाहारी (कीटभक्षी) पक्षी मुख्य रूप से उड़ने वाले कीड़े-मकौड़े खाते हैं, जिनमें मधुमक्खियां, ततैया और हॉर्नेट इनकी विशेष पसंद होते हैं। ये प्रवासी और दिन में सक्रिय रहने वाले (diurnal) पक्षी हैं, जो अपने दिन का अधिकांश समय भोजन की तलाश (foraging) में बिताते हैं।
व्यापक वितरण और संरक्षण स्थिति
यूरोपीय बी-ईटर का भौगोलिक विस्तार काफी बड़ा है, जो यूरोप और अफ्रीका के अधिकांश हिस्सों को कवर करता है। जहाँ तक इनके संरक्षण की बात है, अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट के अनुसार इन्हें 'लीस्ट कंसर्न' (Least Concern) यानी न्यूनतम संकट वाली प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। चेन्नई में इनका यह नया रिकॉर्ड इस प्रजाति के बदलते आव्रजन पैटर्न और व्यापकता को समझने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

चार साल बाद भी नंजारायान पक्षी अभयारण्य में रामसर साइट जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव
तमिलनाडु के तिरुप्पुर जिले में स्थित प्रसिद्ध नंजारायान पक्षी अभयारण्य को रामसर साइट के रूप में अधिसूचित हुए चार साल से अधिक का समय बीत चुका है। हालांकि, इसके बावजूद इस क्षेत्र को एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की रामसर साइट के अनुकूल विकसित और रूपांतरित करने का काम अभी तक पूरा नहीं हो सका है, जिससे संरक्षण कार्यों पर सवाल उठ रहे हैं।
ऐतिहासिक झील और इसका भौगोलिक महत्व
यह अभयारण्य तिरुप्पुर जिले के उथुकुली तालुक के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में फैली एक विशाल और उथली आर्द्रभूमि (वेटलैंड) है। इस झील का जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण कई सदियों पहले इस क्षेत्र पर शासन करने वाले राजा नंजारायान द्वारा करवाया गया था, जिनके नाम पर इसका नामकरण हुआ है। यह पूरी तरह से एक मीठे पानी की झील पर केंद्रित है, जिसे नल्लर नदी से पानी मिलता है। नल्लर नदी, नोय्यल नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है जो तिरुप्पुर शहर से होकर गुजरती है। अपनी समृद्ध पक्षी विविधता के कारण यह तमिलनाडु का 17वां पक्षी अभयारण्य बना था और बाद में इसे अंतरराष्ट्रीय महत्व की रामसर साइट का दर्जा भी मिला।
प्रवासी पक्षियों और जैव विविधता का स्वर्ग
पारिस्थितिक दृष्टिकोण से यह अभयारण्य बेहद समृद्ध है। यह सेंट्रल एशियन फ्लाईवे (CAF) के अंतर्गत आता है, जिस वजह से यह देश-विदेश के प्रवासी और स्थानीय पक्षियों के लिए एक मुख्य प्रजनन और भोजन तलाशने का ठिकाना है। यहाँ की जैव विविधता का दायरा केवल पक्षियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इस झील के आसपास और भीतर विभिन्न प्रजातियों का अनूठा संसार बसता है।
अभयारण्य में दर्ज विभिन्न जीव-जंतु और वनस्पतियाँ
इस क्षेत्र में वन्यजीवों और वनस्पतियों की एक विस्तृत श्रृंखला दर्ज की गई है, जो इसकी पारिस्थितिक सम्पन्नता को दर्शाती है:
लगभग 191 प्रकार की पक्षी प्रजातियाँ
87 प्रजातियों की तितलियाँ
7 प्रकार के उभयचर (एम्फिबियंस)
21 प्रकार के सरीसृप (रेप्टाइल्स)
11 प्रकार के छोटे स्तनधारी जीव
77 प्रकार की विभिन्न वनस्पतियाँ
इन तमाम खूबियों के बावजूद, रामसर साइट के मानकों के अनुसार यहाँ आधारभूत विकास कार्यों का समय पर पूरा न होना पर्यावरणविदों और प्रकृति प्रेमियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

पुझल झील में डूबे दो स्कूली छात्र, हालिया घटना से मचा हड़कंप
तमिलनाडु के थिरुवल्लूर जिले में स्थित प्रसिद्ध पुझल (रेड हिल्स) झील के पास एक दर्दनाक हादसे में दो 14 वर्षीय स्कूली छात्रों की डूबने से मौत हो गई। बचाव टीमों ने कड़ी मशक्कत के बाद दोनों बच्चों के शव बरामद कर लिए हैं। इस दुखद घटना के बाद से इलाके में शोक की लहर दौड़ गई है।
ब्रिटिश काल में बनी जीवनदायिनी झील
पुझल झील, जिसे रेड हिल्स झील के नाम से भी जाना जाता है, एक मानव निर्मित मीठे पानी की झील है। इसका निर्माण 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान किया गया था। यह चेन्नई शहर को पेयजल आपूर्ति करने वाले तीन प्रमुख वर्षा-पोषित जलाशयों में से एक है, जिसमें अन्य दो जलाशय चेंबारमक्कम झील और पोरूर झील शामिल हैं। यह विशाल झील बारिश और अन्य स्रोतों के पानी को संरक्षित करने वाले एक बड़े प्राकृतिक स्टोरेज टैंक की तरह काम करती है।
विशाल जल भंडारण और ऐतिहासिक जोन टावर
यह झील लगभग 3300 मिलियन क्यूबिक फीट पानी स्टोर करने की भारी क्षमता रखती है, जिसे बाद में ट्रीट करके पाइपलाइनों के जरिए चेन्नई के घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक पहुँचाया जाता है। इस झील का एक प्रमुख आकर्षण 'जोन टावर' है, जिसका निर्माण वर्ष 1881 में किया गया था। इस ऐतिहासिक टावर का उपयोग मुख्य रूप से झील के जलस्तर और गहराई की गणना करने के लिए किया जाता है।
प्रवासी पक्षियों का प्रमुख आश्रय स्थल
मानव उपयोगिता और जल आपूर्ति के अलावा, यह झील पर्यावरण और जैव विविधता के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र स्थानीय जलपक्षियों और दूर-दराज से आने वाले प्रवासी पक्षियों को सुरक्षित आश्रय प्रदान करता है। विशेष तौर पर शरद और सर्दियों के मौसम में, सेंट्रल एशियन फ्लाईवे (CAF) के रास्ते हजारों की संख्या में trans-continental प्रवासी पक्षी खुले पानी और प्रचुर मात्रा में भोजन की तलाश में इस झील का रुख करते हैं।

महा नवमी पर खुले काठमांडू के ऐतिहासिक तलेजू भवानी मंदिर के कपाट
बड़ा दशैं (दशहरा) पर्व के अवसर पर नेपाल के काठमांडू स्थित प्रसिद्ध और ऐतिहासिक तलेजू भवानी मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। वर्ष में केवल एक बार महा नवमी के दिन खुलने वाले इस ऐतिहासिक मंदिर में देवी भवानी के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए हजारों की संख्या में भक्त उमड़े।
मल्ला राजवंश से जुड़ा समृद्ध इतिहास
तलेजू भवानी मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी में मल्ला राजा महेंद्र मल्ला ने करवाया था। 12वीं से 18वीं शताब्दी के दौरान काठमांडू घाटी पर शासन करने वाले मल्ला राजवंश में देवी तलेजू भवानी को अपनी कुलदेवी और सुरक्षात्मक देवी के रूप में पूजा जाता था। हिंदू धर्म में देवी तलेजू भवानी को शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा का ही एक स्वरूप माना जाता है। पूरे साल बंद रहने वाला यह मंदिर पारंपरिक दशैं पर्व की नवमी तिथि को ही खुलता है, जिस कारण इसका धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
नेवार पैगोडा वास्तुकला की अद्भुत मिसाल
यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल यह मंदिर अपनी विशिष्ट नेवार पैगोडा शैली की वास्तुकला के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। तीन मंजिला पैगोडा छत, बारीक नक्काशीदार लकड़ी के ईव्स और सुनहरे कलश इस मंदिर की भव्यता में चार चांद लगाते हैं। यह मंदिर 12-स्तरीय चबूतरे (प्लिंथ) पर बना है, जो ब्रह्मांड की परतों और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतिनिधित्व करता है। इसके चार मुख्य प्रवेश द्वारों पर पत्थर के शेर पहरा देते हैं, जबकि आंतरिक गर्भगृह में दस हाथों वाली देवी की सुनहरी प्रतिमा स्थापित है।
श्री यंत्र पर आधारित पवित्र बनावट
मंदिर की पूरी संरचना और स्थापत्य योजना पवित्र ज्यामितीय आरेख 'श्री यंत्र' पर आधारित है, जिसे स्वयं देवी का भौतिक रूप माना जाता है। नक्काशीदार लकड़ी की खिड़कियां और प्रवेश द्वारों के ऊपर बने तोरण इसकी प्राचीन कलात्मकता को दर्शाते हैं। महा नवमी के इस विशेष दिन पर श्रद्धालुओं ने पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ पूजा-अर्चना की और सुरक्षा, समृद्धि तथा शांति की प्रार्थना की।

साइलेंट किलर ऑस्टियोपोरोसिस: अब युवाओं को भी शिकार बना रही खोखली हड्डियों की बीमारी
आमतौर पर बुजुर्गों और मेनोपॉज के बाद महिलाओं में देखी जाने वाली ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियों की कमजोरी) की बीमारी अब युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही है। इसे 'साइलेंट डिसीज' कहा जाता है क्योंकि बिना फ्रैक्चर के इसके लक्षण आसानी से नजर नहीं आते। खानपान में सुधार, व्यायाम और समय पर जांच ही इससे बचाव का मुख्य जरिया हैं।
क्या है ऑस्टियोपोरोसिस और इसके कारण
'ऑस्टियोपोरोसिस' का शाब्दिक अर्थ 'छिद्रयुक्त या खोखली हड्डी' होता है। स्वस्थ हड्डियों की बनावट सूक्ष्मदर्शी से देखने पर मधुमक्खी के छत्ते जैसी दिखाई देती है, जबकि ऑस्टियोपोरोसिस होने पर ये छिद्र काफी बड़े हो जाते हैं। हमारा शरीर पुरानी हड्डियों के ऊतकों को नष्ट कर नए ऊतक बनाता है। लेकिन जब नई हड्डियों के बनने की गति पुरानी हड्डियों के नष्ट होने की दर से धीमी हो जाती है, तो बोन डेंसिटी (अस्थि घनत्व) कम होने लगती है। यह समस्या मुख्य रूप से 50 वर्ष से अधिक उम्र, महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी, स्टेरॉयड दवाओं के अत्यधिक सेवन और थायराइड के असंतुलन के कारण होती है।
'साइलेंट किलर' के रूप में पहचान
ऑस्टियोपोरोसिस को अक्सर एक 'साइलेंट बीमारी' कहा जाता है क्योंकि शुरुआती चरणों में इसके कोई स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते। अधिकांश लोगों को इसका पता तब चलता है जब उन्हें कोई फ्रैक्चर हो जाता है। हालांकि, गंभीर स्थिति में कमर दर्द (रीढ़ की हड्डी के दबने से), समय के साथ धीरे-धीरे लंबाई में कमी आना और झुककर चलने जैसी शारीरिक दिक्कतें दिखाई देने लगती हैं। यह बीमारी सबसे ज्यादा रीढ़ की हड्डी, कूल्हे (Hip) और कलाई को प्रभावित करती है।
बचाव और उपचार के रास्ते
हड्डियों को जीवनभर मजबूत बनाए रखने के लिए समय रहते जीवनशैली में बदलाव करना बेहद आवश्यक है। आहार में कैल्शियम और विटामिन-डी से भरपूर खाद्य पदार्थों को शामिल करना, रोजाना धूप सेकना और वजन उठाने वाले (Weight-bearing) व्यायाम करना बेहद फायदेमंद साबित होता है। यदि डॉक्टरी सलाह पर सही समय पर DEXA स्कैन जैसी जांच कराई जाए और आवश्यक सप्लीमेंट्स या दवाइयां ली जाएं, तो हड्डियों को टूटने से बचाया जा सकता है।
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