
144 साल का लंबा इंतजार खत्म: गुजरात के बरडा वन्यजीव अभ्यारण्य में लौटे शेर
गुजरात के पोरबंदर के पास स्थित बरडा वन्यजीव अभ्यारण्य में करीब 144 साल बाद शेरों की वापसी हुई है। हालिया अध्ययन के अनुसार, 'गिर-बरडा प्रोजेक्ट' के तहत विकसित इस दूसरे सुरक्षित ठिकाने पर अब 17 एशियाई शेर आ चुके हैं, जो वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
ऐतिहासिक रियासत के शिकारगाह से सैटेलाइट हैबिटेट तक
गुजरात के पोरबंदर के पास बरडा पहाड़ियों में फैला यह अभ्यारण्य लगभग 192.31 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है और इसकी स्थापना 1979 में हुई थी। स्थानीय रूप से इसे 'जाम बरडा' के नाम से जाना जाता है, जो कभी जामनगर और पोरबंदर के राजसी परिवारों का निजी शिकारगाह हुआ करता था। राज्य सरकार ने एशियाई शेरों के लिए इसे दूसरा घर बनाने के उद्देश्य से 1979 में 'गिर-बरडा प्रोजेक्ट' की शुरुआत की थी। आज यह गुजरात का पहला पूरी तरह से सुरक्षित सैटेलाइट लायन हैबिटेट बन चुका है, जहां वर्तमान रिपोर्ट के मुताबिक 17 एशियाई शेर स्वतंत्र रूप से रह रहे हैं।
जैव विविधता और प्राकृतिक बनावट का अनूठा संगम
बरडा अभ्यारण्य की भौगोलिक और प्राकृतिक बनावट शेरों और अन्य वन्यजीवों के अनुकूल है। यह चारों तरफ से कृषि क्षेत्रों, बंजर भूमि और जंगलों से घिरा हुआ है, और इसका पूरा इलाका पहाड़ी है। यहाँ से बिलेशवरी और जोघरी नदियाँ गुजरती हैं, साथ ही खंभाला और फोदरा बांध भी स्थित हैं। यहाँ मालधारी, भरवाड, रबारी और गढ़वी जैसी पारंपरिक जनजातियाँ निवास करती हैं। दक्षिण उष्णकटिबंधीय और शुष्क पर्णपाती जंगलों वाले इस क्षेत्र में गुजरात की सबसे अधिक यानी लगभग 650 प्रकार की वानस्पतिक विविधता पाई जाती है।
समृद्ध वन्यजीवों और पक्षियों का स्वर्ग
शेरों के अलावा यह अभ्यारण्य तेंदुओं, भेड़ियों, सांभर, चिंकारा, लकड़बग्घा और नीलगाय जैसे कई वन्यजीवों का सुरक्षित ठिकाना है। पक्षी प्रेमियों के लिए भी यह किसी स्वर्ग से कम नहीं है, क्योंकि यहाँ ईगल, उल्लू, और तीतर जैसे कई स्थानीय और प्रवासी पक्षी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। 144 साल बाद शेरों की इस सफल वापसी ने भारत में वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन की दिशा में एक बड़ी सफलता हासिल की है।

कुफरी जामुनिया: उत्तर भारत में धूम मचा रहा सेहतमंद बैंगनी आलू
आलू की पारंपरिक परिभाषा बदलते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR-CPRI) ने पोषक तत्वों से भरपूर बैंगनी आलू की किस्म 'कुफरी जामुनिया' विकसित की है। उत्तर भारतीय मैदानों के लिए सिफारिश की गई यह बायोफोर्टिफाइड किस्म एंटीऑक्सीडेंट, जिंक, आयरन और एंथोसायनिन जैसे गुणों से भरपूर है।
औषधीय गुणों से भरपूर बैंगनी रंग और काया
साल 2024 में आधिकारिक तौर पर जारी की गई 'कुफरी जामुनिया' एक मध्यम अवधि में पकने वाली टेबल वैरायटी है, जिसके पौधे मध्यम-लंबे और अर्ध-सघन छत्र (semi-compact canopy) वाले होते हैं। इस आलू की सबसे बड़ी खासियत इसका रंग है। इसके कंद बाहर से गहरे बैंगनी और अंदर से भी बैंगनी गूदे वाले होते हैं। इसका आकर्षक रंग इस बात का प्रमाण है कि इसमें उच्च मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट, एंथोसायनिन, एस्कॉर्बिक एसिड और कैरोटिनाइड मौजूद हैं। इसके अलावा, इसमें जिंक और आयरन जैसे जरूरी खनिज भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
भंडारण और खेती के लिए है बेहद शानदार
विभिन्न स्थानों पर हुए परीक्षणों में इस किस्म ने अपनी स्थिरता और बेहतरीन प्रदर्शन का लोहा मनवाया है, जिसके बाद इसे उत्तर भारतीय मैदानों में खेती के लिए अनुशंसित किया गया है। इसके कंद आयताकार, उथली आंखों वाले और खाने में मलिदा (mealy) बनावट वाले होते हैं। इसकी एक और बड़ी खूबी इसकी मध्यम सुप्तता (dormancy) है, जो लगभग 6 से 8 सप्ताह की होती है। इसका मतलब है कि इसके कंद जल्दी अंकुरित नहीं होते, जिससे भंडारण के दौरान कम सड़न और न्यूनतम वजन घटता है।
रंगीन आलू की श्रृंखला में कुफरी नीलकंठ और कुफरी मणिक
ICAR-CPRI द्वारा सिर्फ कुफरी जामुनिया ही नहीं, बल्कि अन्य रंगीन और स्वास्थ्यवर्धक किस्में भी विकसित की गई हैं। साल 2018 में देश की पहली बैंगनी छिलके वाली विशेष किस्म 'कुफरी नीलकंठ' आई थी, जो पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बेहद लोकप्रिय है। इसके बाद 2021 में 'कुफरी मणिक' को लॉन्च किया गया, जिसके कंद गहरे लाल रंग के और अंदर से पीले गूदे वाले होते हैं। ये सभी किस्में आधुनिक खान-पान और सेहत के प्रति जागरूक लोगों के लिए एक बेहतरीन और पौष्टिक विकल्प बनकर उभर रही हैं।

असम के काछार में पुलिसिया कार्रवाई: बराक नदी में कूदे दो बांग्लादेशी गिरफ्तार
असम के काछार जिले में पुलिस से बचने के लिए बराक नदी में छलांग लगाने वाले दो बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस नाटकीय अभियान के दौरान पुलिस की नाव से पीछा कर आरोपियों को पकड़ा गया। हालांकि, कार्रवाई के दौरान दो पुलिसकर्मी घायल भी हुए हैं।
बराक नदी में छलांग लगाकर भागने की कोशिश
काटीगोड़ा पुलिस स्टेशन की टीम को सूचना मिली थी कि सीमावर्ती इलाके हरिनगर पार्ट-III में स्थित एक मकान में दो संदिग्ध विदेशी नागरिक छिपे हुए हैं। जब पुलिस की टीम ने उस ठिकाने पर दबिश दी, तो खुद को घिरता देख दोनों आरोपियों ने भागने का प्रयास किया और पास ही बह रही बराक नदी में छलांग लगा दी।
नाव से पीछा कर पुलिस ने दबोचा
आरोपियों द्वारा नदी में छलांग लगाने के बाद भी पुलिस अधिकारियों ने हिम्मत नहीं हारी। काटीगोड़ा पुलिस ने तुरंत नाव के सहारे बराक नदी के पानी में सर्च ऑपरेशन शुरू किया। कड़ी मशक्कत और नाटकीय पीछा करने के बाद दोनों आरोपियों को नदी के बीच से धर दबोचा गया। हालांकि, इस पूरे बचाव और पकड़-पकड़ अभियान के दौरान दो पुलिसकर्मी घायल हो गए। गिरफ्तार व्यक्तियों की पहचान बांग्लादेश के जकीगंज के निवासी सलमान अहमद और रसेल अहमद के रूप में हुई है।
भारत और बांग्लादेश के लिए बेहद महत्वपूर्ण है बराक नदी
जिस बराक नदी में यह घटना घटी, वह पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश की एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय नदी (Transboundary River) है। मणिपुर की पहाड़ियों से निकलने वाली यह नदी लगभग 900 किलोमीटर लंबी है और ब्रह्मपुत्र के बाद पूर्वोत्तर भारत की दूसरी सबसे बड़ी नदी प्रणाली बनाती है। यह नदी असम के काछार, करीमगंज और हैलाकांडी जिलों वाले 'बराक वैली' क्षेत्र को सींचती हुई बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहां यह सुरमा और कुशियारा नदियों में विभाजित होकर अंततः बंगाल की खाड़ी में गिरती है। सीमावर्ती जलमार्ग होने के कारण इस क्षेत्र में सुरक्षा बल लगातार चौकसी बरतते हैं।

जैसलमेर के रेगिस्तान में गर्जी भारतीय सेना, युद्धाभ्यास 'अखंड प्रहार-II' से दिखाई ताकत
भारतीय सेना ने युद्ध की तैयारियों को परखने और आधुनिक तकनीकों के समन्वय को मजबूत करने के लिए राजस्थान के जैसलमेर में 'अखंड प्रहार-II' युद्धाभ्यास का सफल आयोजन किया। इसमें ब्लैक मेस ब्रिगेड और बैटल एक्स डिवीजन ने नए दौर के उपकरणों का शानदार प्रदर्शन किया।
ब्लैक मेस ब्रिगेड और बैटल एक्स डिवीजन का संयुक्त पराक्रम
इस उच्चस्तरीय सैन्य अभ्यास का संचालन सेना की प्रसिद्ध 'ब्लैक मेस' ब्रिगेड और 'बैटल एक्स' डिवीजन द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। इससे पहले आयोजित हुए 'अखंड प्रहार-I' की शानदार सफलता के बाद, इस दूसरे चरण का उद्देश्य बहु-आयामी युद्ध क्षेत्रों (Multi-domain operational environment) में सैन्य टुकड़ियों की आपसी तालमेल और सटीक हमले की क्षमता को परखना था।
नई पीढ़ी के सैन्य उपकरणों और तकनीकों का परीक्षण
युद्धाभ्यास के दौरान भारतीय सेना ने अगली पीढ़ी के सैन्य उपकरणों (NGEs) और फ़ोर्स मल्टीप्लायर्स तकनीक का बड़े पैमाने पर एकीकरण किया। इस अभ्यास में आधुनिक ड्रोन तकनीक, काउंटर-ड्रोन सिस्टम्स और हाई-टेक निगरानी उपकरणों के उपयोग के साथ-साथ एकीकृत युद्ध ड्रिल्स (Integrated Battle Drills) का कड़ा अभ्यास किया गया। इससे थल और वायु सीमाओं पर सेना की गतिशीलता और मारक क्षमता में कई गुना इजाफा हुआ है।
आधुनिक युद्ध के लिए तकनीकी प्रगति पर जोर
कोनार्क कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (GOC) लेफ्टिनेंट जनरल एवीएस राठी ने भाग लेने वाली सैन्य टुकड़ियों के परिचालन कौशल और तकनीकी विशेषज्ञता की सराहना की। यह युद्धाभ्यास स्पष्ट रूप से संदेश देता है कि भारतीय सेना केवल पारंपरिक शक्ति पर निर्भर न रहकर आत्म-निर्भरता (Atmanirbharta) और आधुनिक तकनीकों के संगम से भविष्य की हर रणनीतिक चुनौती का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है।

वासुकी इंडिकस: भारत में मिला दुनिया का सबसे विशालकाय प्राचीन सांप
गुजरात के कच्छ में खोजा गया वासुकी इंडिकस सांप टाइटनोबोआ को भी टक्कर देता है। करीब 49 फीट लंबे इस विशालकाय और गैर-विषैले जीव ने प्राचीन जीवों के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। मध्य इयोसीन युग के इस शिकारी की बनावट बेहद हैरान करने वाली है।
समय के गर्भ से निकला विशालकाय शिकारी
वर्ष 2005 में गुजरात के कच्छ जिले स्थित पानांध्रो लिग्नाइट खदान से कुछ अजीबोगरीब जीवाश्म मिले थे। लेकिन लंबे अध्ययन और शोध के बाद 2024 में इस जीव से पर्दा उठा और इसे एक नए जीनस के रूप में पहचाना गया। इसे भगवान शिव के गले में लिपटे पौराणिक नाग 'वासुकी' का नाम दिया गया। यह जीव आज से लगभग 47.8 से 38 मिलियन वर्ष पहले मध्य इयोसीन काल के दौरान इस धरती पर राज करता था। उस समय पृथ्वी का गर्म तापमान ऐसे विशालकाय ठंडे खून वाले जीवों के विकास के लिए अनुकूल था।
टाइटनोबोआ से भी खतरनाक और लंबी काया
वासुकी इंडिकस की लंबाई को जानकर किसी के भी होश उड़ सकते हैं। अनुमान है कि यह दैत्य सांप लगभग 49 फीट लंबा था। आकार के मामले में इसने दक्षिण अमेरिका में पाए जाने वाले मशहूर 'टाइटनोबोआ' को भी पीछे छोड़ दिया है, जो करीब 42 फीट लंबा हुआ करता था। इसके जीवाश्म में मिले कशेरुकाओं (Vertebrae) की चौड़ाई यह बताती है कि इसका शरीर बेहद भारी-भरकम, चौड़ा और बेलनाकार था, जो इसके विशाल वजन को आसानी से संभाल सकता था।
घात लगाकर शिकार करने की अनोखी शैली
यह जीव मैड्टसोइइडे (Madtsoiidae) परिवार से ताल्लुक रखता था, जो पूरी तरह से गैर-विषैले और जकड़कर मारने वाले (Constrictor) सांपों का एक विलुप्त समूह है। अपनी भारी-भरकम और मजबूत शारीरिक बनावट के कारण वासुकी इंडिकस तेज दौड़ने वाला शिकारी नहीं था। इसकी संरचना बताती है कि यह आज के एनाकोंडा और अजगर की तरह एक धीमा लेकिन बेहद घातक घात लगाकर शिकार करने वाला शिकारी (Ambush Predator) था।
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